Lulla Family

अंग 1059

अंग
1059
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि होवै सु सोझी पाए ॥
हउमै माइआ भरमु गवाए ॥
गुर की पउड़ी ऊतम ऊची दरि सचै हरि गुण गाइदा ॥7॥
गुरमुखि सचु संजमु करणी सारु ॥
गुरमुखि पाए मोख दुआरु ॥
भाइ भगति सदा रंगि राता आपु गवाइ समाइदा ॥8॥
गुरमुखि होवै मनु खोजि सुणाए ॥
सचै नामि सदा लिव लाए ॥
जो तिसु भावै सोई करसी जो सचे मनि भाइदा ॥9॥
जा तिसु भावै सतिगुरू मिलाए ॥
जा तिसु भावै ता मंनि वसाए ॥
आपणै भाणै सदा रंगि राता भाणै मंनि वसाइदा ॥10॥
मनहठि करम करे सो छीजै ॥
बहुते भेख करे नही भीजै ॥
बिखिआ राते दुखु कमावहि दुखे दुखि समाइदा ॥11॥
गुरमुखि होवै सु सुखु कमाए ॥
मरण जीवण की सोझी पाए ॥
मरणु जीवणु जो सम करि जाणै सो मेरे प्रभ भाइदा ॥12॥
गुरमुखि मरहि सु हहि परवाणु ॥
आवण जाणा सबदु पछाणु ॥
मरै न जंमै ना दुखु पाए मन ही मनहि समाइदा ॥13॥
से वडभागी जिनी सतिगुरु पाइआ ॥
हउमै विचहु मोहु चुकाइआ ॥
मनु निरमलु फिरि मैलु न लागै दरि सचै सोभा पाइदा ॥14॥
आपे करे कराए आपे ॥
आपे वेखै थापि उथापे ॥
गुरमुखि सेवा मेरे प्रभ भावै सचु सुणि लेखै पाइदा ॥15॥
गुरमुखि सचो सचु कमावै ॥
गुरमुखि निरमलु मैलु न लावै ॥
नानक नामि रते वीचारी नामे नामि समाइदा ॥16॥1॥15॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त कर लेता है। वह अपने अंदर से अहंकार और माया वाली भटकना दूर कर लेता है। वह मनुष्य प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ के प्रभू के गुण गाता रहता है। यही है गुरू की (बताई हुई) ऊँची और उक्तम सीढ़ी (जिसके द्वारा मनुष्य ऊँचे आत्मिक मण्डल में चढ़ कर प्रभू को जा मिलता है)। 7। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। सदा स्थिर हरी-नाम सिमरता है- यही है उसका करने-योग्य काम। यही है उसके लिए (विकारों से बचने की) बढ़िया जुगति। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (विकारों से) मुक्ति पाने का (यह) दरवाजा पा लेता है। गुरू की शरण में रहने वाला मनुष्य प्रभू के प्रेम में प्रभू की भक्ति में प्रभू के नाम-रंग में सदा रंगा रहता है। वह (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करके प्रभू में समाया रहता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम में सदा अपनी सुरति जोड़े रखता है। वह मनुष्य (अपने) मन को खोज के (यह निश्चय बनाता है। और औरों को भी) सुनाता है कि जो कुछ उस परमात्मा को अच्छा लगता है। वही कुछ वह करता है। (जगत में वही कुछ वह है) जो उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के मन में भा जाता है। 9। हे भाई ! (गुरमुख मनुष्य औरों को भी यही सुनाता है कि) जब परमात्मा की रजा होती है तब वह मनुष्य को गुरू मिलाता है। तब उसके मन में (अपना नाम) बसाता है। जिस मनुष्य को परमात्मा अपनी रज़ा में रखता है। वह मनुष्य सदा उस प्रेम-रंग में रंगा रहता है। (हे भाई ! गुरमुख यह यकीन बनाता है कि) प्रभू अपनी रजा के अनुसार ही (अपना नाम) मनुष्य के मन में बसाता है। 10। हे भाई ! जो मनुष्य के मन के हठ से (ही निहित किए धार्मिक) कर्म करता है वह (आत्मिक जीवन की ओर से) कमजोर होता जाता है (ऐसा मनुष्य) धार्मिक पहरावे तो बहुत सारे अपनाता है पर (इस तरह उसका मन प्रभू के प्यार में) भीगता नहीं। हे भाई ! माया के मोह में मस्त मनुष्य (जो भी कर्म करते हैं। वे उनमें से) दुख (ही) कमाते हैं। (हे भाई ! माया के मोह के कारण मनुष्य) हर वक्त दुख में ही फसा रहता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (अपने उद्यमों से) आत्मिक आनंद कमाता है। वह मनुष्य ये समझ लेता है कि आत्मिक मौत क्या है और आत्मिक जीवन क्या है। हे भाई ! जो मनुष्य मौत और जीवन को (परमात्मा की रजा में व्याप्त देख के) एक समान ही समझता है (ना जीवन की लालसा। ना मौत से डर)। वह मनुष्य मेरे परमात्मा को प्यारा लगता है। 12। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के जो मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करते हैं। वह सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं वह प्रभू की हजूरी में कबूल होते हैं (वे पैदा होने मरने को परमात्मा का हुकम समझते हैं)। हे भाई ! आप भी पैदा होने मरने को प्रभू का हुकम ही समझ। (जो मनुष्य ऐसा यकीन बनाता है) वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। वह (ये) दुख नहीं पाता। वह (बाहर भटकने की जगह) सदा ही अंतरात्मे टिका रहता है। 13। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्हें गुरू मिल गया। वे अपने अंदर से अहंकार और माया का मोह दूर कर लेते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। जिसके मन को दोबारा विकारों की मैल नहीं लगती। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर पाता है। 14। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। खुद ही (सबकी) संभाल करता है। खुद ही पैदा करके नाश करता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के की हुई सेवा-भगती प्रभू को प्यारी लगती है। (जीव से) हरी-नाम का सिमरन सुन के परमात्मा (उसकी) ये मेहनत परवान करता है। 15। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। उसको विकारों की मैल नहीं लगती। हे नानक ! जो मनुष्य हरी-नाम में मस्त रहते हैं। वे आत्मिक जीवन की सूझ वाले हो जाते हैं। (आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य) सदा हरी-नाम में ही लीन रहता है। 16। 1। 15।
मारू महला 3 ॥
आपे स्रिसटि हुकमि सभ साजी ॥
आपे थापि उथापि निवाजी ॥
आपे निआउ करे सभु साचा साचे साचि मिलाइदा ॥1॥
काइआ कोटु है आकारा ॥
माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥
बिनु सबदै भसमै की ढेरी खेहू खेह रलाइदा ॥2॥
काइआ कंचन कोटु अपारा ॥
जिसु विचि रविआ सबदु अपारा ॥
गुरमुखि गावै सदा गुण साचे मिलि प्रीतम सुखु पाइदा ॥3॥
काइआ हरि मंदरु हरि आपि सवारे ॥
तिसु विचि हरि जीउ वसै मुरारे ॥
गुर कै सबदि वणजनि वापारी नदरी आपि मिलाइदा ॥4॥
सो सूचा जि करोधु निवारे ॥
सबदे बूझै आपु सवारे ॥
आपे करे कराए करता आपे मंनि वसाइदा ॥5॥
निरमल भगति है निराली ॥
मनु तनु धोवहि सबदि वीचारी ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! परमात्मा ने यह स्वयं ही ये सारी सृष्टि अपने हुकम से पैदा की हुई है। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके (स्वयं ही) नाश करता है (खुद ही जीवों पर) मेहर करता है। प्रभू आप ही यह सारा अपना अटॅल न्याय करता है। स्वयं ही (जीवों को अपने) सदा स्थिर हरी-नाम में जोड़ के रखता है। 1। हे भाई ! (यह मनुष्य) शरीर (मानो एक) किला है। यह परमात्मा का दिखाई देता स्वरूप है। (पर अगर इसमें) माया का मोह (ही प्रबल हो। और इसमें माया के मोह का ही) पसारा पसरा हुआ है। तो प्रभू की सिफत सालाह के बिना (ये शरीर) राख की ढेरी ही है। (मनुष्य हरी-नाम से वंचित रह कर इस शरीर को) मिट्टी में ही मिला देता है। 2। वह (मनुष्य) शरीर बेअंत परमात्मा के रहने के लिए (मानो) सोने का किला है। हे भाई ! जिस शरीर में बेअंत परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी हर वक्त मौजूद है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (इस शरीर के माध्यम से) सदा-स्थिर परमात्मा के गुण हमेशा गाता है। वह प्रीतम प्रभू को मिल के आत्मिक आनंद लेता है। 3। हे भाई ! ये मनुष्य का शरीर परमात्मा का (पवित्र) घर है। परमात्मा इसको खुद ही सुंदर बनाता है। इसमें विचार-दैत्यों को मारने वाला प्रभू स्वयं बसता है। हे भाई ! जो जीव वणजारे (इस शरीर में) गुरू के शबद से हरी-नाम का वणज करते हैं। प्रभू मेहर की निगाह से उनको (अपने साथ) मिला लेता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य (अपने अंदर से) क्रोध दूर कर लेता है। वह पवित्र हृदय वाला बन जाता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से (आत्मिक जीवन को) समझ लेता है। और। अपने जीवन को सँवार लेता है। (पर। हे भाई ! यह उसकी अपनी ही मेहर है) प्रभू स्वयं ही (जीव के अंदर बैठा यह उद्यम) करता है। (जीव से) करतार स्वयं ही (यह काम) करवाता है। स्वयं ही (उसके) मन में (अपना नाम) बसाता है। 5। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति (जीवन को) पवित्र करने वाली (एक) अनोखी (दाति) है। गुरू के शबद में जुड़ के (भगती के अमृत के साथ जो मनुष्य अपना) मन और तन धोते हैं। वे सुंदर विचार के मालिक बन जाते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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