Lulla Family

अंग 1056

अंग
1056
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिखिआ कारणि लबु लोभु कमावहि दुरमति का दोराहा हे ॥9॥
पूरा सतिगुरु भगति द्रिड़ाए ॥
गुर कै सबदि हरि नामि चितु लाए ॥
मनि तनि हरि रविआ घट अंतरि मनि भीनै भगति सलाहा हे ॥10॥
मेरा प्रभु साचा असुर संघारणु ॥
गुर कै सबदि भगति निसतारणु ॥
मेरा प्रभु साचा सद ही साचा सिरि साहा पातिसाहा हे ॥11॥
से भगत सचे तेरै मनि भाए ॥
दरि कीरतनु करहि गुर सबदि सुहाए ॥
साची बाणी अनदिनु गावहि निरधन का नामु वेसाहा हे ॥12॥
जिन आपे मेलि विछोड़हि नाही ॥
गुर कै सबदि सदा सालाही ॥
सभना सिरि तू एको साहिबु सबदे नामु सलाहा हे ॥13॥
बिनु सबदै तुधुनो कोई न जाणी ॥
तुधु आपे कथी अकथ कहाणी ॥
आपे सबदु सदा गुरु दाता हरि नामु जपि संबाहा हे ॥14॥
तू आपे करता सिरजणहारा ॥
तेरा लिखिआ कोइ न मेटणहारा ॥
गुरमुखि नामु देवहि तू आपे सहसा गणत न ताहा हे ॥15॥
भगत सचे तेरै दरवारे ॥
सबदे सेवनि भाइ पिआरे ॥
नानक नामि रते बैरागी नामे कारजु सोहा हे ॥16॥3॥12॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य माया (कमाने) की खातिर लब-लोभ (को चमकाने वाले) कर्म करते हैं। उनकी जीवन-यात्रा में खोटी मति का दु-चिक्ता-पन आ जाता है। 9। हे भाई ! पूरा गुरू जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा की भक्ति करने का विश्वास पैदा करता है। वह मनुष्य गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के नाम में (अपना) चित्त जोड़ता है। उसके मन में तन में दिल में सदा परमात्मा बसा रहता है। हे भाई ! (परमात्मा में) मन भीगने से मनुष्य उसकी भक्ति और सिफत-सालाह करता रहता है। 10। हे भाई ! मेरा परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। (मनुष्य के अंदर से कामादिक) दैत्यों का नाश करने वाला है। गुरू के शबद में (जोड़ के) भक्ती में (लगा के संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाला है। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है सदा ही कायम रहने वाला है। वह तो शाहों-पातशाहों के सिर पर (भी हुकम चलाने वाला) है। 11। हे प्रभू ! वही भगत अडोल आत्मिक जीवन वाले बनते हैं। जो आपके मन को प्यारे लगते हैं; वे आपके दर पर (टिक के। ठहर कर) आपकी सिफत-सालाह करते हैं। गुरू के शबद की बरकति से उनका आत्मिक जीवन सुंदर बन जाता है। हे भाई ! वह भक्त-जन सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी हर वक्त गाते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम। (नाम-) धन से वंचित मनुष्यों के लिए राशि-पूँजी है। 12। हे प्रभू ! आप स्वयं ही जिन मनुष्यों को (अपने चरणों में) जोड़ के (फिर) विछोड़ता नहीं। वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा आपकी सिफत-सालाह करते रहते हैं। हे प्रभू ! सब जीवों के सिर पर आप खुद ही मालिक है। (आपकी मेहर से ही जीव गुरू के) शबद में (जुड़ के आपका) नाम (जप सकते हैं और आपकी) सिफत सालाह कर सकते हैं। 13। हे प्रभू ! गुरू के शबद के बिना कोई मनुष्य आपके साथ सांझ नहीं डाल सकता। (गुरू के शबद से) आप स्वयं ही अपना अकथ स्वरूप बयान करता है। आप स्वयं ही गुरू-रूप हैं के सदा शबद की दाति देता आया है। गुरू-रूप हैं के आप खुद ही हरी-नाम जप के (जीवों को भी यह दाति) देता । 14। हे प्रभू ! आप खुद ही (सारी सृष्टि को) पैदा कर सकने वाला करतार है। कोई जीव आपके लिखे लेखों को मिटा सकने के काबिल नहीं। गुरू की शरण में ला के आप खुद ही अपना नाम देता है। (और। जिसको आप नाम की दाति देता है) उसको कोई सहम कोई चिंता-फिक्र छू नहीं सकते। 15। हे प्रभू ! आपके दरबार में आपके भक्त सुर्खरू रहते हैं। क्योंकि। वे आपके प्रेम-प्यार में गुरू के शबद द्वारा आपकी सेवा-भगती करते हैं। हे नानक ! परमातमा के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य (दर असल) त्यागी है। नाम की बरकति से उनका हरेक काम सफल हो जाता है। 16। 3। 12।
मारू महला 3 ॥
मेरै प्रभि साचै इकु खेलु रचाइआ ॥
कोइ न किस ही जेहा उपाइआ ॥
आपे फरकु करे वेखि विगसै सभि रस देही माहा हे ॥1॥
वाजै पउणु तै आपि वजाए ॥
सिव सकती देही महि पाए ॥
गुर परसादी उलटी होवै गिआन रतनु सबदु ताहा हे ॥2॥
अंधेरा चानणु आपे कीआ ॥
एको वरतै अवरु न बीआ ॥
गुर परसादी आपु पछाणै कमलु बिगसै बुधि ताहा हे ॥3॥
अपणी गहण गति आपे जाणै ॥
होरु लोकु सुणि सुणि आखि वखाणै ॥
गिआनी होवै सु गुरमुखि बूझै साची सिफति सलाहा हे ॥4॥
देही अंदरि वसतु अपारा ॥
आपे कपट खुलावणहारा ॥
गुरमुखि सहजे अंम्रितु पीवै त्रिसना अगनि बुझाहा हे ॥5॥
सभि रस देही अंदरि पाए ॥
विरले कउ गुरु सबदु बुझाए ॥
अंदरु खोजे सबदु सालाहे बाहरि काहे जाहा हे ॥6॥
विणु चाखे सादु किसै न आइआ ॥
गुर कै सबदि अंम्रितु पीआइआ ॥
अंम्रितु पी अमरा पदु होए गुर कै सबदि रसु ताहा हे ॥7॥
आपु पछाणै सो सभि गुण जाणै ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्रभू ने (यह जगत) एक तमाशा रचा हुआ है। (इसमें उसने) कोई जीव किसी दूसरे जैसा नहीं बनाया। खुद ही (जीवों में) अंतर पैदा करता है। और (ये अंतर) देख के खुश होता है। (फिर उसने) शरीर में ही सारे चस्के पैदा कर दिए हें। 1। हे प्रभू ! (आपकी अपनी कला से हरेक शरीर में) श्वासों का बाजा बज रहा है (श्वास चल रहे हैं)। आप स्वयं ही ये साँसों के बाजे बजा रहा है। हे भाई ! परमात्मा ने शरीर में जीवात्मा और माया (दोनों ही) डाल दिए हैं। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य की सुरति माया की ओर से पलटती है। उसको आत्मिक जीवन वाला श्रेष्ठ गुरू-शबद प्राप्त हो जाता है। 2। हे भाई ! (माया के मोह का) अंधेरा और (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश प्रभू ने स्वयं ही बनाया है। (सारे जगत में परमात्मा) स्वयं ही व्यापक है। (उसके बिना) कोई और नहीं। जो मनुष्य गुरू की कृपा से अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। उसका हृदय-कमल-फूल खिला रहता है। उसको (आत्मिक जीवन की परख करने वाली) बुद्धि प्राप्त होती रहती है। 3। हे भाई ! अपनी गहरी आत्मिक अवस्था परमात्मा स्वयं ही जानता है। जगत तो (दूसरों से) सुन-सुन के (फिर) कह के (औरों को) सुनाता है। जो मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ वाला हो जाता है। वह गुरू के सन्मुख रह के (इस भेद को) समझता है। और। वह प्रभू की सदा कायम रहने वाली सिफत-सालाह करता रहता है। 4। हे भाई ! मनुष्य के शरीर में (ही) बेअंत परमात्मा का नाम-पदार्थ (मौजूद) है (पर मनुष्य की मति के चारों तरफ मोह की भिक्ति बनी रहती है)। परमात्मा स्वयं ही इन किवाड़ों को खोलने में समर्थ है। जो मनुष्य गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता है (वह मनुष्य अपने अंदर से माया की) तृष्णा की आग बुझा लेता है। 5। हे भाई ! परमात्मा ने मनुष्य के शरीर में ही सारे चस्के भी डाल दिए हुए हैं (नाम-वस्तु को ये कैसे मिले।)। किसी विरले को गुरू (अपने) शबद की सूझ बख्शता है। वह मनुष्य अपना अंदर खोजता है। शबद (के हृदय में बसा के परमात्मा की) सिफत-सालाह करता है। फिर वह बाहर भटकता नहीं। 6। हे भाई ! (नाम-अमृत मनुष्य के अंदर ही है। पर) चखे बिना किसी को (उसका) स्वाद नहीं आता। जिस मनुष्य को गुरू के शबद में जोड़ के परमात्मा यह अमृत पिलाता है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला वह नाम-जल पी के उस अवस्था पर पहुँच जाता है। जहाँ आत्मिक मौत अपना असर नहीं डाल सकती। गुरू के शबद की बरकति से उसको (नाम-अमृत का) स्वाद आ जाता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। वह सारे (रॅबी) गुणों से सांझ डालता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जो मनुष्य माया (कमाने) की खातिर लब-लोभ (को चमकाने वाले) कर्म करते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English