जुग चारे गुर सबदि पछाता ॥ गुरमुखि मरै न जनमै गुरमुखि गुरमुखि सबदि समाहा हे ॥10॥ गुरमुखि नामि सबदि सालाहे ॥ अगम अगोचर वेपरवाहे ॥ एक नामि जुग चारि उधारे सबदे नाम विसाहा हे ॥11॥ गुरमुखि सांति सदा सुखु पाए ॥ गुरमुखि हिरदै नामु वसाए ॥ गुरमुखि होवै सो नामु बूझै काटे दुरमति फाहा हे ॥12॥ गुरमुखि उपजै साचि समावै ॥ ना मरि जंमै न जूनी पावै ॥ गुरमुखि सदा रहहि रंगि राते अनदिनु लैदे लाहा हे ॥13॥ गुरमुखि भगत सोहहि दरबारे ॥ सची बाणी सबदि सवारे ॥ अनदिनु गुण गावै दिनु राती सहज सेती घरि जाहा हे ॥14॥ सतिगुरु पूरा सबदु सुणाए ॥ अनदिनु भगति करहु लिव लाए ॥ हरि गुण गावहि सद ही निरमल निरमल गुण पातिसाहा हे ॥15॥ गुण का दाता सचा सोई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥ नानक जनु नामु सलाहे बिगसै सो नामु बेपरवाहा हे ॥16॥2॥11॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! चारों युगों में ही गुरू के शबद के द्वारा ही प्रभू के साथ सांझ बनती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता वह गुरू के शबद में लीन रहता है। 10। हे भाई ! गुरमुख मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़ता है। गुरू के शबद द्वारा अगम अगोचर बेपरवाह प्रभू की सिफत-सालाह करता है। (हे भाई ! गुरमुख जानता है कि) परमात्मा के नाम ने ही चारों युगों के जीवों का पार-उतारा किया है। और गुरू के शबद से नाम का व्यापार किया जा सकता है। 11। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा आत्मिक ठंड और आत्मिक आनंद पाता है। वह अपने दिल में परमात्मा का नाम बसाए रखता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह हरी के नाम से सांझ पा लेता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह उस सदा-स्थिर परमात्मा (की याद) में लीन रहता है जिससे वह पैदा हुआ है। (इसलिए) वह बार-‘बार पैदा होता-मरता नहीं। वह जूनियों में नहीं पड़ता। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे सदा परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे हर समय यह लाभ कमाते रहते हैं। 13। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले भक्त परमात्मा की हजूरी में आदर पाते हैं। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी से गुरू के शबद की बरकति से उनके जीवन सुधर जाते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त दिन रात परमात्मा के गुण गाता है। वह आत्मिक अडोलता से प्रभू-चरणों में टिका रहता है (उसका मन बाहर नहीं भटकता)। 14। हे भाई ! पूरा गुरू शबद सुनाता है (और कहता है कि) हर समय सुरति जोड़ के परमात्मा की भक्ति करते रहो। जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते हैं। प्रभू-पातशाह के पवित्र गुण गाते हैं। वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 15। पर। हे भाई ! (अपने) गुणों (के गायन) की दाति देने वाला वह सदा-स्थिर परमात्मा स्वयं ही है। गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य (इस बात को) समझता है। हे नानक ! परमात्मा का जो सेवक परमात्मा के नाम की वडिआई करता है। बेपरवाह प्रभू का नाम जपता है। वह सदा खिला हुआ रहता है। 16। 2। 11।
मारू महला 3 ॥ हरि जीउ सेविहु अगम अपारा ॥ तिस दा अंतु न पाईऐ पारावारा ॥ गुर परसादि रविआ घट अंतरि तितु घटि मति अगाहा हे ॥1॥ सभ महि वरतै एको सोई ॥ गुर परसादी परगटु होई ॥ सभना प्रतिपाल करे जगजीवनु देदा रिजकु संबाहा हे ॥2॥ पूरै सतिगुरि बूझि बुझाइआ ॥ हुकमे ही सभु जगतु उपाइआ ॥ हुकमु मंने सोई सुखु पाए हुकमु सिरि साहा पातिसाहा हे ॥3॥ सचा सतिगुरु सबदु अपारा ॥ तिस दै सबदि निसतरै संसारा ॥ आपे करता करि करि वेखै देदा सास गिराहा हे ॥4॥ कोटि मधे किसहि बुझाए ॥ गुर कै सबदि रते रंगु लाए ॥ हरि सालाहहि सदा सुखदाता हरि बखसे भगति सलाहा हे ॥5॥ सतिगुरु सेवहि से जन साचे ॥ जो मरि जंमहि काचनि काचे ॥ अगम अगोचरु वेपरवाहा भगति वछलु अथाहा हे ॥6॥ सतिगुरु पूरा साचु द्रिड़ाए ॥ सचै सबदि सदा गुण गाए ॥ गुणदाता वरतै सभ अंतरि सिरि सिरि लिखदा साहा हे ॥7॥ सदा हदूरि गुरमुखि जापै ॥ सबदे सेवै सो जनु ध्रापै ॥ अनदिनु सेवहि सची बाणी सबदि सचै ओमाहा हे ॥8॥ अगिआनी अंधा बहु करम द्रिड़ाए ॥ मनहठि करम फिरि जोनी पाए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! बेअंत और अपहुँच परमात्मा का सिमरन करते रहा करो। उस (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता। (उसकी हस्ती) उसके इस पार-उस पार का छोर नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस हृदय में परमात्मा आ बसता है। उस हृदय में बड़ी ऊँची मति प्रकट हो जाती है। 1। हे भाई ! सिर्फ वह परमात्मा ही सब जीवों में व्यापक है। पर गुरू की कृपा से ही वह प्रकट होता है। वह जगत-का-सहारा प्रभू सब जीवों की पालना करता है। सबको रिजक देता है। सबको रिज़क पहुँचाता है। 2। हे भाई ! पूरे गुरू ने (खुद) समझ के (जगत को) समझाया है कि परमात्मा ने अपने हुकम में ही सारा जगत पैदा किया है। जो मनुष्य उसके हुकम को (मीठा करके) मानता है। वही आत्मिक आनंद पाता है। उसका हुकम शाहों-पातशाहों के सिर पर भी चल रहा है (कोई उससे आकी नहीं हो सकता)। 3। हे भाई ! गुरू अभूल है। उसका उपदेश भी बहुत गहरा है। उसके शबद से जगत (संसार-समुंद्र से) पार लांघता है। (गुरू यह बताता है कि) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके (उनकी) संभाल करता है। (सबको) साँसें (प्राण) भी देता है रोज़ी भी देता है। 4। हे भाई ! करोड़ों में से किसी विरले को (परमात्मा सही आत्मिक जीवन की) सूझ बख्शता है। हे भाई ! जो मनुष्य प्यार से गुरू के शबद में मस्त रहते हैं। और सारे सुखों के दाते हरी की सदा सिफत सालाह करते हैं। परमात्मा उनको भगती और सिफत सालाह की (और) दाति बख्शता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे अडोल जीवन वाले हो जाते हैं। पर जो जनम-मरण के चक्करों में पड़े हुए हैं। वे बहुत ही कमजोर आत्मिक जीवन वाले हैं। हे भाई ! अपहुँच अगोचर बेपरवाह और बेअंत परमात्मा भगती से प्यार करता है। 6। हे भाई ! पूरा गुरू जिस मनुष्य के दिल में सदा-स्थिर हरी का नाम पक्का करता है। वह मनुष्य शबद से सदा स्थिर प्रभू के गुण गाता है। उसे इस तरह दिखता है कि गुण-दाता प्रभू सब जीवों में बस रहा है। और हरेक के सिर पर वह समय (साहा) लिखता है (जब जीवात्मा दुल्हन ने परलोक ससुराल चले जाना है)। 7। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को परमात्मा अंग-संग बसता दिखता है। जो मनुष्य गुरू के शबद से सेवा-भक्ति करता है वह मनुष्य (माया की तृष्णा से) तृप्त रहता है। हे भाई ! जो मनुष्य सिफत सालाह वाली बाणी के द्वारा हर वक्त परमात्मा की सेवा-भगती करते हैं। शबद की बरकति से उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। 8। हे भाई ! (आत्मिक जीवन से) बेसमझ (और माया के मोह में) अंधा (हुआ) मनुष्य (हरी-नाम भुला के तीर्थ-स्नान आदि और और ही) अनेकों (मिथे हुए धार्मिक) कर्मों पर जोर देता है। पर जो मनुष्य मन के हठ से (ऐसे) कर्म (करता रहता है। वह) बार-बार जूनियों में पड़ता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! चारों युगों में ही गुरू के शबद के द्वारा ही प्रभू के साथ सांझ बनती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।