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अंग १०५४ · मारू

अंग
1054
मारू
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  1. पूरै सतिगुरि सोझी पाई ॥
  2. सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥

पूरै सतिगुरि सोझी पाई ॥

अंग १०५३ से चला आ रहा अंश

पूरै सतिगुरि सोझी पाई ॥
एको नामु मंनि वसाई ॥
नामु जपी तै नामु धिआई महलु पाइ गुण गाहा हे ॥11॥
सेवक सेवहि मंनि हुकमु अपारा ॥
मनमुख हुकमु न जाणहि सारा ॥
हुकमे मंने हुकमे वडिआई हुकमे वेपरवाहा हे ॥12॥
गुर परसादी हुकमु पछाणै ॥
धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥
नामे राता सदा बैरागी नामु रतनु मनि ताहा हे ॥13॥
सभ जग महि वरतै एको सोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
सबदु सलाहहि से जन निरमल निज घरि वासा ताहा हे ॥14॥
सदा भगत तेरी सरणाई ॥
अगम अगोचर कीमति नही पाई ॥
जिउ तुधु भावहि तिउ तू राखहि गुरमुखि नामु धिआहा हे ॥15॥
सदा सदा तेरे गुण गावा ॥
सचे साहिब तेरै मनि भावा ॥
नानकु साचु कहै बेनंती सचु देवहु सचि समाहा हे ॥16॥1॥10॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! पूरे सतिगुरू ने (मुझे आत्मिक जीवन की) समझ बख्शी है। अब मैं परमात्मा का ही नाम अपने मन में बसाता हूँ। मैं परमात्मा का नाम जपता हूँ। और उसका नाम ध्याता हूँ। (नाम की बरकति से प्रभू-चरनों में) ठिकाना प्राप्त करके मैं उसके गुणों में डुबकी लगा रहा हूँ। 11। हे भाई ! परमात्मा के भगत तो उस बेअंत प्रभू का हुकम मान के उसकी सेवा-भगती करते हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य उसके हुकम की कद्र नहीं समझते। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के हुकम को मानता है। वह प्रभू हुकम (मानने) के कारण (लोक-परलोक की) वडिआई प्राप्त करता है। वह बेपरवाह प्रभू के हुकम में ही लीन रहता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की कृपा से परमात्मा की रजा को पहचानता है। वह अपने भटकते मन को रोक के रखता है। वह (अपने मन को) एक घर में ही ले आता है। वह मनुष्य हरी-नाम में रंगा रहता है। वह (विकारों से) सदा निर्लिप रहता है। परमात्मा का रतन-नाम उसके मन में बसा रहता है। 13। हे भाई ! सारे जगत में एक परमात्मा ही बसता है। पर वह गुरू की कृपा से दिखता है। जो मनुष्य गुरू के शबद को (हृदय में बसा के परमात्मा की) सिफत सालाह करते हैं। वे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। उनका निवास सदा स्वै-स्वरूप में हुआ रहता है। 14। आपके भगत सदा आपकी शरण में रहते हैं। हे प्रभू ! हे अपहुँच और अगोचर ! पर कोई आपका मूल्य नहीं पा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले आप नहीं मिल सकता)। हे प्रभू ! आप (अपने भक्तों को) वैसे ही रखते हैं। जैसे वह आपको प्यारे लगते हैं। (आपके भगत) गुरू की शरण पड़ कर आपका नाम ध्याते हैं। 15। हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं सदा आपके गुण गाता रहूँ। ताकि। हे सदा-स्थिर मालिक ! मैं आपके मन में प्यारा लगता रहूँ। (आपका दास) नानक (आपके आगे) विनती करता है। आप सदा कायम रहने वाले हैं। मुझे अपना सदा-स्थिर नाम दे। मैं आपके सदा-स्थिर नाम में लीन हुआ रहूँ। 16। 1। 10।

सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥

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मारू महला 3 ॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
अनदिनु साचि नामि लिव लागी ॥
सदा सुखदाता रविआ घट अंतरि सबदि सचै ओमाहा हे ॥1॥
नदरि करे ता गुरू मिलाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
हरि मनि वसिआ सदा सुखदाता सबदे मनि ओमाहा हे ॥2॥
क्रिपा करे ता मेलि मिलाए ॥
हउमै ममता सबदि जलाए ॥
सदा मुकतु रहै इक रंगी नाही किसै नालि काहा हे ॥3॥
बिनु सतिगुर सेवे घोर अंधारा ॥
बिनु सबदै कोइ न पावै पारा ॥
जो सबदि राते महा बैरागी सो सचु सबदे लाहा हे ॥4॥
दुखु सुखु करतै धुरि लिखि पाइआ ॥
दूजा भाउ आपि वरताइआ ॥
गुरमुखि होवै सु अलिपतो वरतै मनमुख का किआ वेसाहा हे ॥5॥
से मनमुख जो सबदु न पछाणहि ॥
गुर के भै की सार न जाणहि ॥
भै बिनु किउ निरभउ सचु पाईऐ जमु काढि लएगा साहा हे ॥6॥
अफरिओ जमु मारिआ न जाई ॥
गुर कै सबदे नेड़ि न आई ॥
सबदु सुणे ता दूरहु भागै मतु मारे हरि जीउ वेपरवाहा हे ॥7॥
हरि जीउ की है सभ सिरकारा ॥
एहु जमु किआ करे विचारा ॥
हुकमी बंदा हुकमु कमावै हुकमे कढदा साहा हे ॥8॥
गुरमुखि साचै कीआ अकारा ॥
गुरमुखि पसरिआ सभु पासारा ॥
गुरमुखि होवै सो सचु बूझै सबदि सचै सुखु ताहा हे ॥9॥
गुरमुखि जाता करमि बिधाता ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे बहुत भाग्यशाली हैं; सदा-स्थिर हरी-नाम में उनकी लगन हर वक्त लगी रहती है। सारे सुखों का दाता परमात्मा हर वक्त उनके हृदय में बसा रहता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद से उनके अंदर आत्मिक जीवन के हिलौरे बने रहते हैं। 1। पर। हे भाई ! जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है तब (ही) गुरू मिलाता है। (गुरू के मिलाप की बरकति से वह मनुष्य) परमात्मा का नाम (अपने) मन में बसा लेता है। सारे सुखों का दाता प्रभू उसके मन में बसा रहता है। शबद की बरकति से उसके मन में जीवन-उत्साह बना रहता है। 2। हे भाई ! जब प्रभू कृपा करता है तब (जीव को गुरू से) मिला के (अपने चरणों से) मिला लेता है। वह मनुष्यगुरू के शबद से (अपने अंदर से) अहंकार और ममता को जला लेता है। सिर्फ परमात्मा के प्रेम-रंग के सदका वह मनुष्य (अहंकार और ममता से) सदा आजाद रहता है। उसका किसी के साथ भी वैर-विरोध नहीं होता। 3। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना (जीव के जीवन-राह में अहंकार और ममता आदि का) घोर अंधकार बना रहता है। गुरू के शबद के बिना कोई मनुष्य (इस घोर अंधेरे का) परला किनारा नहीं पा सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद में मस्त रहते हैं। वे बड़े त्यागी है। गुरू के शबद से वे सदा-स्थिर हरी-नाम ही (उनके लिए असल) कमाई है। 4। हे भाई ! करतार ने अपने हुकम से ही दुख और सुख (भोगना जीवों के भाग्यों में) लिख के डाल दिया है। माया का मोह भी परमात्मा ने खुद ही फैलाया हुआ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह (माया के मोह से) निर्लिप रहता है; पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का कोई ऐतबार नहीं किया जा सकता (कि कौन से वक्त माया के मोह में फस जाए)। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के साथ सांझ नहीं डालते। अपने मन के पीछे चलने लग जाते हैं। वे मनुष्य गुरू के डर-अदब की कद्र नहीं जानते। जब तक गुरू के भय-अदब में ना रहें। तब तक सदा-स्थिर निर्भय परमात्मा के साथ मिलाप नहीं हो सकता। (सदा ये सहम बना रहता है कि पता नहीं) जमराज (कब आ के) प्राण निकाल के ले जाएगा। 6। हे भाई ! जमराज को रोका नहीं जा सकता। जमराज को मारा नहीं जा सकता। पर। गुरू के शबद में जुड़ने से (जमराज का सहम मनुष्य के) नजदीक नहीं फटकता। जब वह गुरू का शबद (गुरमुख के मुँह से) सुनता है। तब दूर से ही (उसके पास से) भाग जाता है कि कहीं ऐसा ना हो कि बेपरवाह प्रभू (इस खुनामी के पीछे) सजा ही ना दे दे (जमराज गुरमुख मनुष्य को मौत का डर दे ही नहीं सकता)। 7। हे भाई ! सारी ही सृष्टि परमात्मा के हुकम में है (यमराज भी परमात्मा की ही प्रजा है रईयत है)। परमात्मा के हुकम के बिना जमराज बेचारा कुछ नहीं कर सकता। जमराज भी प्रभू के हुकम में ही चलने वाला है। प्रभू के हुकम अनुसार ही कार करता है। हुकम के अनुसार ही प्राण निकालता है। 8। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (समझता है कि) सारा जगत सदा-स्थिर परमात्मा ने पैदा किया है। ये सारा जगत पसारा परमात्मा का ही पसारा हुआ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ जाता है। वह सदा-स्थिर प्रभू के साथ सांझ डाल लेता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी की बरकति से उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। 9। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (प्रभू की) बख्शिश से सृजनहार प्रभू के साथ सांझ डालता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1054 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०५४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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