Lulla Family

अंग 1047

अंग
1047
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जो तिसु भावै सोई करसी ॥
आपहु होआ ना किछु होसी ॥
नानक नामु मिलै वडिआई दरि साचै पति पाई हे ॥16॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (ये सारी जगत-खेल प्रभू के हाथ में है) जो कुछ उसको अच्छा लगता है। वही वह करेगा। जीव के अपने प्रयासों से ना अब तक कुछ हो सका ह ैना ही आगे कुछ हो सकेगा। हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिल जाती है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर प्राप्त करता है। 16। 3।
मारू महला 3 ॥
जो आइआ सो सभु को जासी ॥
दूजै भाइ बाधा जम फासी ॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे साचे साचि समाई हे ॥1॥
आपे करता करि करि वेखै ॥
जिस नो नदरि करे सोई जनु लेखै ॥
गुरमुखि गिआनु तिसु सभु किछु सूझै अगिआनी अंधु कमाई हे ॥2॥
मनमुख सहसा बूझ न पाई ॥
मरि मरि जंमै जनमु गवाई ॥
गुरमुखि नामि रते सुखु पाइआ सहजे साचि समाई हे ॥3॥
धंधै धावत मनु भइआ मनूरा ॥
फिरि होवै कंचनु भेटै गुरु पूरा ॥
आपे बखसि लए सुखु पाए पूरै सबदि मिलाई हे ॥4॥
दुरमति झूठी बुरी बुरिआरि ॥
अउगणिआरी अउगणिआरि ॥
कची मति फीका मुखि बोलै दुरमति नामु न पाई हे ॥5॥
अउगणिआरी कंत न भावै ॥
मन की जूठी जूठु कमावै ॥
पिर का साउ न जाणै मूरखि बिनु गुर बूझ न पाई हे ॥6॥
दुरमति खोटी खोटु कमावै ॥
सीगारु करे पिर खसम न भावै ॥
गुणवंती सदा पिरु रावै सतिगुरि मेलि मिलाई हे ॥7॥
आपे हुकमु करे सभु वेखै ॥
इकना बखसि लए धुरि लेखै ॥
अनदिनु नामि रते सचु पाइआ आपे मेलि मिलाई हे ॥8॥
हउमै धातु मोह रसि लाई ॥
गुरमुखि लिव साची सहजि समाई ॥
आपे मेलै आपे करि वेखै बिनु सतिगुर बूझ न पाई हे ॥9॥
इकि सबदु वीचारि सदा जन जागे ॥
इकि माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥
आपे करे कराए आपे होरु करणा किछू न जाई हे ॥10॥
कालु मारि गुर सबदि निवारे ॥
हरि का नामु रखै उर धारे ॥
सतिगुर सेवा ते सुखु पाइआ हरि कै नामि समाई हे ॥11॥
दूजै भाइ फिरै देवानी ॥
माइआ मोहि दुख माहि समानी ॥
बहुते भेख करै नह पाए बिनु सतिगुर सुखु न पाई हे ॥12॥
किस नो कहीऐ जा आपि कराए ॥
जितु भावै तितु राहि चलाए ॥
आपे मिहरवानु सुखदाता जिउ भावै तिवै चलाई हे ॥13॥
आपे करता आपे भुगता ॥
आपे संजमु आपे जुगता ॥
आपे निरमलु मिहरवानु मधुसूदनु जिस दा हुकमु न मेटिआ जाई हे ॥14॥
से वडभागी जिनी एको जाता ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! जो भी जीव (जगत में) पैदा होता है वह हरेक ही (अवश्य इस जगत से) कूच (भी) कर जाता है। (पर) माया के मोह के कारण (जीव) आत्मिक मौत के बँधनों में बँध जाता है। गुरू ने जिनकी रक्षा की। वह मनुष्य (माया के मोह से) बच निकलते हैं; वे सदा ही सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहते हैं। 1। हे भाई ! (ये सारा खेल) करतार स्वयं ही कर कर के देख रहा है; जिस मनुष्य पर वह मेहर की निगाह करता है वही मनुष्य उसकी परवानगी में है। जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा आत्मिक जीवन की सूझ पड़ जाती है उसको (आत्मिक जीवन के बारे में) हरेक बात की समझ आ जाती है। ज्ञान से वंचित मनुष्य अंधों वाले काम ही करता रहता है। 2। हे भाई ! मन के मुरीद मनुष्य को (हर वक्त कोई ना कोई) सहम (खाए जाता है। क्योंकि) उसको आत्मिक जीवन की समझ नहीं होती वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। वह अपना मानस जन्म व्यर्थ गवा जाता है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं। वे आत्मिक आनंद पाते हैं। वे आत्मिक अडोलता में सदा-स्थिर प्रभू में हर वक्त टिके रहते हैं। 3। हे भाई ! दुनियां के धंधों में दौड़-भाग करते हुए मनुष्य जला हुआ लोहा बन जाता है (ऐसे जला रहता है जैसे जला हुआ लोहा)। पर जब उसे पूरा गुरू मिलता है। तब वह दोबारा (शुद्ध) सोना बन जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं बख्शिश करता है वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। वह पूरन प्रभू की सिफत-सालाह में लीन रहता है। 4। हे भाई ! खोटी मति वाली जीव स्त्री झूठ में बुराई में मस्त रहती है। वह बुराई का अड्डा बनी रहती है। वह सदा ही अवगुणों से भरी रहती है। उसकी मति सदा (विकारों में) बहकती है। वह मुँह से कठोर वचन बोलती है। खोटी मति के कारण उसको परमात्मा का नाम नसीब नहीं होता। 5। हे भाई ! अवगुण-भरी जीव-स्त्री पति-प्रभू को अच्छी नहीं लगती। मन की गंदी वह जीव-स्त्री सदा गंदा काम ही करती है। वह मूर्ख जीव-स्त्री पति-रूप के मिलाप का आनंद नहीं जानती। गुरू के बिना उसको आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ती। 6। हे भाई ! खोटी मति वाली जीव-स्त्री सदा खोट से भरी रहती है सदा खोट ही कमाती है (खोटा काम करती है)। (दुराचारिन स्त्री की तरह वह बाहर से धार्मिक) सजावट करती है। पर पति-प्रभू को पसंद नहीं आती। गुणवान जीव-स्त्री को पति-प्रभू सदा मिला रहता है। उसको गुरू (-चरणों) में मिला के (अपने साथ) मिलाए रखता है। 7। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा हर जगह स्वयं ही हुकम कर के (अपने प्रेरित किए हुए जीवों का हरेक काम) देख रहा है। धुर से अपने हुकम में ही कई जीवों को लेखे में बख्श लेता है; वह जीव हर वक्त उसके नाम में रंगे रहते हैं। उन्हें वह सदा-स्थिर प्रभू मिला रहता है। प्रभू स्वयं ही उनको (गुरू से) मिला के अपने चरणों में जोड़े रखता है। 8। हे भाई ! माया (जीव को) अहंकार में मोह के रस में लगाए रखती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को प्रभू-चरणों की सदा-स्थिर लगन आत्मिक अडोलता में टिकाए रखती है। पर। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (जीव को अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही यह खेल करके देख रहा है- ये समझ गुरू के बिना नहीं पड़ती। 9। हे भाई ! कई ऐसे मनुष्य हैं जो गुरू के शबद को विचार के (माया के हमलों से) सचेत रहते हैं। कई ऐसे बद्किस्मत हैं जो सदा माया के मोह में गाफिल हुए रहते हैं। (पर। जीवों के भी क्या वश।) प्रभू खुद ही (सबमें व्यापक हो के सब कुछ) करता है। खुद ही (जीवों से) करवाता है (उसकी रजा के विरुद्ध) और कुछ भी किया नहीं जा सकता। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से आत्मिक मौत को मार के (अपने अंदर से स्वै भाव) दूर करता है। और परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य गुरू की शरण की बरकति से आत्मिक आनंद पाता है। परमात्मा के नाम में सदा टिका रहता है। 11। हे भाई ! जो जीव-स्त्री माया के मोह में झल्ली हुई भटकती फिरती है वह माया के मोह में और दुखों में ग्रसी रहती है; अगर वह बहुत सारे धार्मिक पहिरावे भी धारण कर ले। वह सुख प्राप्त नहीं कर सकती। गुरू की शरण पड़े बिना वह सुख नहीं मिल सकता। 12। हे भाई ! जब (परमात्मा) स्वयं (ही जीवों से सब कुछ) करवा रहा है। तो उसके बिना किसी और के पास पुकार नहीं की जा सकती। जिस राह पर चलाना उसको अच्छा लगता है उस राह पर ही (जीवों को) चलाता है। 13। वह स्वयं ही मेहरबान एवं सुख देने वाला है, जैसा उसे मंजूर है, वैसे ही वह जीवों को चलाता है॥ 13॥ हे भाई ! परमात्म स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है। खुद ही (जीवों में बैठ के पदार्थों को) भोगने वाला है। प्रभू खुद ही (पदार्थों के भोगने से) परहेज (करने वाला) है। स्वयं ही सब जीवों में और पदार्थों में व्यापक है। वह स्वयं ही पवित्र है। स्वयं ही दया करने वाला है। स्वयं ही विकारियों का नाश करने वाला है। (वह ऐसा है) जिसके हुकम की अवहेलना नहीं की जा सकती। 14। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं जिन्होंने उस एक परमात्मा को (हर जगह) जाना है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (ये सारी जगत-खेल प्रभू के हाथ में है) जो कुछ उसको अच्छा लगता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English