Lulla Family

अंग 1048

अंग
1048
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
घटि घटि वसि रहिआ जगजीवनु दाता ॥
इक थै गुपतु परगटु है आपे गुरमुखि भ्रमु भउ जाई हे ॥15॥
गुरमुखि हरि जीउ एको जाता ॥
अंतरि नामु सबदि पछाता ॥
जिसु तू देहि सोई जनु पाए नानक नामि वडाई हे ॥16॥4॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (जिन्होंने यह समझा है कि) जगत का सहारा दातार हरेक शरीर में बस रहा है। किसी जगह वह छुपा हुआ (बस रहा) है। किसी जगह प्रत्यक्ष दिखा दे रहा है-गुरू के द्वारा (ये निश्चय करके मनुष्य का) भ्रम और डर दूर हो जाता है (फिर ना कोई वैरी दिखता है और ना ही किसी से डर लगता है)। 15। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है उसके अंदर प्रभू का नाम बसता है। वह गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा को (हर जगह) पहचानता है। हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आप अपना नाम देता है। वही मनुष्य आपका नाम प्राप्त करता है। नाम से उसको (लोक-परलोक की) इज्जत प्राप्त होती है। 16। 4।
मारू महला 3 ॥
सचु सालाही गहिर गंभीरै ॥
सभु जगु है तिस ही कै चीरै ॥
सभि घट भोगवै सदा दिनु राती आपे सूख निवासी हे ॥1॥
सचा साहिबु सची नाई ॥
गुर परसादी मंनि वसाई ॥
आपे आइ वसिआ घट अंतरि तूटी जम की फासी हे ॥2॥
किसु सेवी तै किसु सालाही ॥
सतिगुरु सेवी सबदि सालाही ॥
सचै सबदि सदा मति ऊतम अंतरि कमलु प्रगासी हे ॥3॥
देही काची कागद मिकदारा ॥
बूंद पवै बिनसै ढहत न लागै बारा ॥
कंचन काइआ गुरमुखि बूझै जिसु अंतरि नामु निवासी हे ॥4॥
सचा चउका सुरति की कारा ॥
हरि नामु भोजनु सचु आधारा ॥
सदा त्रिपति पवित्रु है पावनु जितु घटि हरि नामु निवासी हे ॥5॥
हउ तिन बलिहारी जो साचै लागे ॥
हरि गुण गावहि अनदिनु जागे ॥
साचा सूखु सदा तिन अंतरि रसना हरि रसि रासी हे ॥6॥
हरि नामु चेता अवरु न पूजा ॥
एको सेवी अवरु न दूजा ॥
पूरै गुरि सभु सचु दिखाइआ सचै नामि निवासी हे ॥7॥
भ्रमि भ्रमि जोनी फिरि फिरि आइआ ॥
आपि भूला जा खसमि भुलाइआ ॥
हरि जीउ मिलै ता गुरमुखि बूझै चीनै सबदु अबिनासी हे ॥8॥
कामि क्रोधि भरे हम अपराधी ॥
किआ मुहु लै बोलह ना हम गुण न सेवा साधी ॥
डुबदे पाथर मेलि लैहु तुम आपे साचु नामु अबिनासी हे ॥9॥
ना कोई करे न करणै जोगा ॥
आपे करहि करावहि सु होइगा ॥
आपे बखसि लैहि सुखु पाए सद ही नामि निवासी हे ॥10॥
इहु तनु धरती सबदु बीजि अपारा ॥
हरि साचे सेती वणजु वापारा ॥
सचु धनु जंमिआ तोटि न आवै अंतरि नामु निवासी हे ॥11॥
हरि जीउ अवगणिआरे नो गुणु कीजै ॥
आपे बखसि लैहि नामु दीजै ॥
गुरमुखि होवै सो पति पाए इकतु नामि निवासी हे ॥12॥
अंतरि हरि धनु समझ न होई ॥
गुर परसादी बूझै कोई ॥
गुरमुखि होवै सो धनु पाए सद ही नामि निवासी हे ॥13॥
अनल वाउ भरमि भुलाई ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! मैं तो उस अथाह और बड़े जिगरे वाले परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ जो सदा कायम रहने वाला है। सारा जगत जिस के हुकम में चल रहा है। जो सारे शरीर में मौजूद है और जो खुद ही सारे सुखों का श्रोत है। 1। हे भाई ! मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है। उसकी महिमा भी सदा कायम रहने वाली है। गुरू की कृपा से उसको मन में बसाया जा सकता है। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू खुद ही (मेहर कर के) आ बसता है। उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। 2। (हे भाई ! अगर आप पूछे कि) मैं किस की सेवा करता हूँ और किसकी सिफत-सालाह करता हूँ (तो इसका उक्तर यह है कि) मैं सदा गुरू की शरण पड़ा रहता हूँ और गुरू के शबद से (परमात्मा की) सिफत-सालाह करता हूं। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी की बरकति से मनुष्य की बुद्धि सदा श्रेष्ठ रहती है और मनुष्य के अंदर उसका हृदय-कमल फूल खिला रहता है। हे भाई ! मनुष्य का ये सारा शरीर कागज़ की तरह नाशवंत है। (जैसे कागज़ के ऊपर पानी की एक) बूँद पड़ जाए तो (कागज़) गल जाता है (इसी तरह इस शरीर का) नाश होते हुए भी देर नहीं लगती। पर जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (सही जीवन राह) समझ लेता है जिस के अंदर परमात्मा का नाम बस जाता है। उसका ये शरीर (विकारों से बचा रह के) शुद्ध सोना बना रहता है। 4। वह हृदय ही सदा (स्वच्छ) रहने वाला चौका है। प्रभू-चरणों में बनी हुई लगन उस चौके की लकीरें हैं (जो विकारों को। बाहर से आ के चौके को भ्रष्ट करने से अपवित्र करने से रोकते हैं)। ऐसे हृदय की खुराक परमात्मा का नाम है। सदा स्थिर परमात्मा ही उस हृदय की खुराक है। हे भाई ! जिस हृदय में परमात्मा का नाम बसता है। वह हृदय (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहता है उसका हृदय सदा पवित्र है। 5। हे भाई ! मैं उन मनुष्यों पर से कुर्बान जाता हूँ। जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा में जुड़े रहते हैं। जो हर वक्त (माया के हमलों से) सचेत रह के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनके अंदर सदा टिके रहने वाला आनंद बना रहता है। उनकी जीभ नाम-रस में रसी रहती है। 6। हे भाई ! मैं तो परमात्मा का नाम ही सदा याद करता हूँ। मैं किसी और की पूजा नहीं करता। मैं एक परमात्मा की ही सेवा-भगती करता हूँ। किसी और दूसरे की सेवा मैं नहीं करता। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने सदा कायम रहने वाला हरी परमात्मा हर जगह दिखा दिया। वह सदा-स्थिर प्रभू के नाम में लीन रहता है। 7। हे भाई ! जीव भटक-भटक के बार-बार जूनियों में पड़ा रहता है। (जीव के भी क्या वश।) जब मालिक प्रभू ने इसे गलत राह पर डाल दिया। तो ये जीव भी भटक गया। हे भाई ! जब परमात्मा इसको मिलता है (इस पर दया करता है) तब गुरू की शरण पड़ कर ये (सही जीवन-राह) समझता है। तब अविनाशी प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी को (अपने हृदय में) तोलता है। 8। हे प्रभू ! हम भूलनहार जीव काम-क्रोध (के कीचड़) से लिबड़े रहते हैं। आपके आगे अर्ज करते हुए ही शर्म आती है। ना हमारे अंदर कोई गुण हैं। ना हमने कोई सेवा- भगती की है। (पर आप सदा दयालु है। मेहर कर) आप खुद हम डूब रहे पत्थरों को (विकारों में डूब रहे पत्थर-दिलों को) अपने नाम में लगा ले। आपका नाम ही सदा अटल है और नाश रहित है। 9। हे प्रभू ! (आपकी प्रेरणा के बिना) कोई भी जीव कुछ नहीं कर सकता। करने की समर्था भी नहीं रखता। जगत में वही कुछ हो सकता है जो आप खुद ही करता है और (जीवों से) करवाता है। जिस मनुष्य पर आप ही दयावान होता है। वह आत्मिक आनंद पाता है और सदा ही आपके नाम में लीन रहता है। 10। हे भाई ! (अपने) इस शरीर को धरती बना। इस में बेअंत प्रभू की सिफत-सालाह के बीज डाल। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ ही (उसके नाम का) वणज-व्यापार किया कर। (इस तरह) सदा कायम रहने वाला (नाम-) धन पैदा होता है। उसमें कभी कमी नहीं होती। (जो मनुष्य यह उद्यम करता है। उसके) अंदर परमात्मा का नाम सदा बसा रहता है। 11। हे प्रभू जी ! गुण-हीन जीव में गुण पैदा कर। आप स्वयं ही मेहर कर और इसको अपना नाम बख्श। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है। वह (लोक-परलोक में) इज्जत कमाता है; वह सदा प्रभू के नाम में लीन रहता है। 12। हे भाई ! हरेक मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम-धन मौजूद है। पर मनुष्य को ये समझ नहीं। कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (यह भेद) समझता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (अपने अंदर यह) धन पा लेता है। फिर वह सदा ही नाम में टिका रहता है। 13। हे भाई ! (जगत में तृष्णा की) आग (जल रही है)। (तृष्णा का) तूफान (मच रहा है)। भटकना में पड़ कर मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जिन्होंने यह समझा है कि) जगत का सहारा दातार हरेक शरीर में बस रहा है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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