एको अमरु एका पतिसाही जुगु जुगु सिरि कार बणाई हे ॥1॥ सो जनु निरमलु जिनि आपु पछाता ॥ आपे आइ मिलिआ सुखदाता ॥ रसना सबदि रती गुण गावै दरि साचै पति पाई हे ॥2॥ गुरमुखि नामि मिलै वडिआई ॥ मनमुखि निंदकि पति गवाई ॥ नामि रते परम हंस बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥3॥ सबदि मरै सोई जनु पूरा ॥ सतिगुरु आखि सुणाए सूरा ॥ काइआ अंदरि अंम्रित सरु साचा मनु पीवै भाइ सुभाई हे ॥4॥ पड़ि पंडितु अवरा समझाए ॥ घर जलते की खबरि न पाए ॥ बिनु सतिगुर सेवे नामु न पाईऐ पड़ि थाके सांति न आई हे ॥5॥ इकि भसम लगाइ फिरहि भेखधारी ॥ बिनु सबदै हउमै किनि मारी ॥ अनदिनु जलत रहहि दिनु राती भरमि भेखि भरमाई हे ॥6॥ इकि ग्रिह कुटंब महि सदा उदासी ॥ सबदि मुए हरि नामि निवासी ॥ अनदिनु सदा रहहि रंगि राते भै भाइ भगति चितु लाई हे ॥7॥ मनमुखु निंदा करि करि विगुता ॥ अंतरि लोभु भउकै जिसु कुता ॥ जमकालु तिसु कदे न छोडै अंति गइआ पछुताई हे ॥8॥ सचै सबदि सची पति होई ॥ बिनु नावै मुकति न पावै कोई ॥ बिनु सतिगुर को नाउ न पाए प्रभि ऐसी बणत बणाई हे ॥9॥ इकि सिध साधिक बहुतु वीचारी ॥ इकि अहिनिसि नामि रते निरंकारी ॥ जिस नो आपि मिलाए सो बूझै भगति भाइ भउ जाई हे ॥10॥ इसनानु दानु करहि नही बूझहि ॥ इकि मनूआ मारि मनै सिउ लूझहि ॥ साचै सबदि रते इक रंगी साचै सबदि मिलाई हे ॥11॥ आपे सिरजे दे वडिआई ॥ आपे भाणै देइ मिलाई ॥ आपे नदरि करे मनि वसिआ मेरै प्रभि इउ फुरमाई हे ॥12॥ सतिगुरु सेवहि से जन साचे ॥ मनमुख सेवि न जाणनि काचे ॥ आपे करता करि करि वेखै जिउ भावै तिउ लाई हे ॥13॥ जुगि जुगि साचा एको दाता ॥ पूरै भागि गुर सबदु पछाता ॥ सबदि मिले से विछुड़े नाही नदरी सहजि मिलाई हे ॥14॥ हउमै माइआ मैलु कमाइआ ॥ मरि मरि जंमहि दूजा भाइआ ॥ बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई मनि देखहु लिव लाई हे ॥15॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: उसी का ही (जगत में) हुकम चल रहा है। उसी की ही (जगत में) राज सक्ता है। हरेक युग में हरेक जीव के सिर पर वही परमात्मा करने योग्य कार मुकरॅर करता । 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने अपने आत्मिक जीवन को पड़तालना आरम्भ कर दिया। वह मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन गया। सारे सुख देने वाला परमात्मा खुद ही उस मनुष्य से आ मिलता है। गुरू के शबद में रति हुई उस मनुष्य की जीभ सदा परमात्मा के गुण गाती रहती है। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा के दर पर इज्जत प्राप्त करता है। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य हरी-नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) नाम कमाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले निंदक मनुष्य ने (सब जगह अपनी) इज्जत गवा ली है। हे भाई ! परमात्मा के नाम में रंगे रहने वाले मनुष्य परम हँस हैं। (असल) बैरागी हैं। वे हर वक्त परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़े रखते हैं। 3। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के विकारों की मार से बचा रहता है। (विकारों का प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ने देता। विकारों से विरक्त हुआ। विकारों की तरफ से मरा हुआ) वही मनुष्य पूर्ण है। हे भाई ! (विकारों का मुकाबला सफलता के साथ करने वाले) शूरवीर गुरू ने कह कर (हरेक प्राणी को) सुना दिया है हे भाई ! उस मनुष्य के शरीर में ही सदा-स्थिर प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल का चश्मा है (जिसमें से) उसका मन बड़े प्रेम-प्यार से (नाम-जल) पीता रहता है। 4। हे भाई ! पंडित (धर्म पुस्तकें) पढ़ के औरों को समझाता है। पर (माया की तृष्णा-आग से अपना हृदय-) घर जल रहे का उसको पता नहीं लगता। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा का नाम नहीं मिलता (नाम के बिना हृदय में ठंड नहीं पड़ सकती)। पंडित लोग (औरों को उपदेश करने के लिए धर्म पुस्तक) पढ़-पढ़ के थक गए। उनके अंदर शांति पैदा ना हुई। 5। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो साधूओं वाला पहिरावा पहन के (शरीर पर) राख मल के चलते फिरते हैं। पर गुरू के शबद के बिना कोई भी मनुष्य अहंकार खत्म नहीं कर सका। (साधू-भेष में होते हुए भी) वह हर-वक्त दिन-रात (तृष्णा की आग में) जलते फिरते हैं। वह भरम में भेष के भुलेखे में भटकते फिरते हैं। 6। पर। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो गृहस्त में परिवार में (रहते हुए ही) सदा निर्मोह हैं। वह गुरू के शबद की बरकति से माया के मोह से मरे हुए हैं। वह सदा प्रभू के नाम में लीन रहते हैं। वे हर वक्त सदा ही प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं; प्रभू के अदब और प्यार के सदका वह प्रभू की भक्ति में चित्त जोड़े रखते हैं। 7। हे भाई ! मन का मुरीद मनुष्य (दूसरों की) निंदा कर कर के दुखी होता रहता है। उसके अंदर लोभ जोर डाले रखता है। जैसे कुक्ता (नित्य) भौंकता रहता है। हे भाई ! आत्मिक मौत ऐसे मनुष्य की कभी मुक्ति नहीं करती। आखिर में मरने के वक्त भी वह यहां से हाथ मलता ही जाता है। 8। सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में जुड़ने से सदा कायम रहने वाली इज्जत मिल जाती है। नाम (जपे) बिना कोई मनुष्य (लोभ आदि विकारों से) निजात नहीं पा सकता। हे भाई ! प्रभू ने ऐसी मर्यादा बना रखी है कि गुरू (की शरण पड़े) बिना कोई मनुष्य प्रभू का नाम प्राप्त नहीं कर सकता। 9। हे भाई ! कई (ऐसे हैं जो) योग-साधना में माहिर जोगी (कहलवाते) हैं। कई (अभी) जोग-साधना कर रहे हैं। कई चर्चा (आदि) करने वाले हैं। कई दिन-रात निरंकार के नाम में रंगे रहते हैं। जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं अपने चरणों में जोड़ लेता है वह (सही जीवन-राह) समझ लेता है। प्रभू की भक्ति और प्रभू के प्रेम की बरकति से (उसके अंदर से) हरेक किस्म का डर दूर हो जाता है। 10। हे भाई ! अनेकों प्राणी तीर्थों पर स्नान करते हैं। दान करते हैं (पर इन कर्मों से वे सही जीवन-राह) नहीं समझ सकते। कई ऐसे हैं जो अपने मन को (विकारों की तरफ से) मार के सदा मन के साथ ही युद्ध करते रहते हैं। वे एक प्रभू के प्रेम-रंग वाले बँदे सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में रति रहते हैं। गुरू के शबद के द्वारा सदा कायम रहने वाले परमात्मा में उनका मेल हुआ रहता है। 11। (पर। हे भाई ! जीवों के वश की बात नहीं)। प्रभू स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है। स्वयं ही इज्जत देता है; खुद ही अपनी रज़ा के अनुसार (जीवों को अपने चरणों में) जोड़ लेता है। प्रभू खुद ही मेहर की निगाह करता है और जीव के मन में आ बसता है- प्रभू ने ऐसा ही हुकम कायम किया हुआ है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के दर पर पहुँचते हैं। वे मनुष्य ठहराव वाले आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। पर मन के मुरीद गुरू के दर पर पहुँचना नहीं जानते। वे कमजोर जीवन वाले रह जाते हैं। (पर। जीवों के भी क्या वश।) करतार स्वयं ही यह करिश्मे कर कर के देख रहा है। जैसे उसको अच्छा लगता है। वह वैसे ही जीवों को कारे लगा रहा है। 13। हे भाई ! हरेक युग में सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही (नाम की दाति) देने वाला है। (जिसको यह दाति देता है वह मनुष्य) बड़ी किस्मत से गुरू के शबद (की कद्र) को समझ लेता है। जो मनुष्य गुरू के शबद में लीन हो जाते हैं वे वहाँ से फिर विछुड़ते नहीं। हे भाई ! प्रभू उन्हें अपनी मेहर की निगाह से आत्मिक अडोलता में मिलाए रखता है। 14। हे भाई ! जो मनुष्य माया के अहंकार के कारण विकारों की मैल इकट्ठी करते रहते हैं। वे सदा जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहते हैं। उन्हें वह दूसरा पासा ही प्यारा लगता है। पर। आप बेशक अपने मन में गहरी विचार करके देख लो। गुरू की शरण पड़े बिना (विकारों की मैल से) निजात नहीं मिल सकती। 15।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “उसी का ही (जगत में) हुकम चल रहा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।