गिआनी धिआनी आखि सुणाए ॥ सभना रिजकु समाहे आपे कीमति होर न होई हे ॥2॥ माइआ मोहु अंधु अंधारा ॥ हउमै मेरा पसरिआ पासारा ॥ अनदिनु जलत रहै दिनु राती गुर बिनु सांति न होई हे ॥3॥ आपे जोड़ि विछोड़े आपे ॥ आपे थापि उथापे आपे ॥ सचा हुकमु सचा पासारा होरनि हुकमु न होई हे ॥4॥ आपे लाइ लए सो लागै ॥ गुर परसादी जम का भउ भागै ॥ अंतरि सबदु सदा सुखदाता गुरमुखि बूझै कोई हे ॥5॥ आपे मेले मेलि मिलाए ॥ पुरबि लिखिआ सो मेटणा न जाए ॥ अनदिनु भगति करे दिनु राती गुरमुखि सेवा होई हे ॥6॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु जाता ॥ आपे आइ मिलिआ सभना का दाता ॥ हउमै मारि त्रिसना अगनि निवारी सबदु चीनि सुखु होई हे ॥7॥ काइआ कुटंबु मोहु न बूझै ॥ गुरमुखि होवै त आखी सूझै ॥ अनदिनु नामु रवै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु होई हे ॥8॥ मनमुख धातु दूजै है लागा ॥ जनमत की न मूओ आभागा ॥ आवत जात बिरथा जनमु गवाइआ बिनु गुर मुकति न होई हे ॥9॥ काइआ कुसुध हउमै मलु लाई ॥ जे सउ धोवहि ता मैलु न जाई ॥ सबदि धोपै ता हछी होवै फिरि मैली मूलि न होई हे ॥10॥ पंच दूत काइआ संघारहि ॥ मरि मरि जंमहि सबदु न वीचारहि ॥ अंतरि माइआ मोह गुबारा जिउ सुपनै सुधि न होई हे ॥11॥ इकि पंचा मारि सबदि है लागे ॥ सतिगुरु आइ मिलिआ वडभागे ॥ अंतरि साचु रवहि रंगि राते सहजि समावै सोई हे ॥12॥ गुर की चाल गुरू ते जापै ॥ पूरा सेवकु सबदि सिञापै ॥ सदा सबदु रवै घट अंतरि रसना रसु चाखै सचु सोई हे ॥13॥ हउमै मारे सबदि निवारे ॥ हरि का नामु रखै उरि धारे ॥ एकसु बिनु हउ होरु न जाणा सहजे होइ सु होई हे ॥14॥ बिनु सतिगुर सहजु किनै नही पाइआ ॥ गुरमुखि बूझै सचि समाइआ ॥ सचा सेवि सबदि सच राते हउमै सबदे खोई हे ॥15॥ आपे गुणदाता बीचारी ॥ गुरमुखि देवहि पकी सारी ॥ नानक नामि समावहि साचै साचे ते पति होई हे ॥16॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: समझदार मनुष्य और समाधियाँ लगाने वाले भी (यही बात) कह के सुना गए हैं। वह परमात्मा खुद ही सब जीवों को रिज़क पहुँचाता है। उस परमात्मा के बराबर की और कोई हस्ती नहीं। 2। हे भाई ! (जगत में हर जगह) माया का मोह (भी प्रबल) है। (मोह के कारण जगत में) घोर अंधेरा बना हुआ है। (हर तरफ) अहंकार और ममता का पसारा पसरा हुआ है। जगत हर वक्त दिन-रात (तृष्णा की आग में) जल रहा है। गुरू की शरण के बिना शांति प्राप्त नहीं होती। 3। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) जोड़ के (यहाँ परिवारों में इकट्ठे करके) खुद ही (इनको आपस से) विछोड़ देता है। आप ही पैदा करके आप ही नाश करता है। हे भाई ! परमात्मा का हुकम अटल है। (उसके हुकम में पैदा हुआ यह) जगत-पसारा भी सच-मुच अस्तित्व वाला है। किसी और द्वारा (ऐसा) हुकम नहीं चलाया जा सकता। 4। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। वह मनुष्य (प्रभू की भक्ति में) लगता है। गुरू की कृपा से (उसके अंदर से) मौत का डर दूर हो जाता है। उसके अंदर सदा आत्मिक आनंद देने वाला गुरू-शबद बसा रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला ही कोई मनुष्य (इस भेद को) समझता है। 5। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (पूर्बले लिखे अनुसार जीव को गुरू-चरणों में) जोड़ के (अपने साथ) मिलाता है। पूर्बले किए कर्मों के अनुसार जो लेख (माथे पर) लिखा जाता है। वह (जीव से) मिटाया नहीं जा सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य हर वक्त दिन-रात परमात्मा की भगती करता है। गुरू की शरण पड़ने से ही भगती हैं सकती है। 6। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा आत्मिक आनंद पाया जा सकता है। सबको दातें देने वाला प्रभू भी (गुरू की शरण पड़ने से) आप ही आ मिलता है। (गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार मार के तृष्णा की आग बुझा लेता है। हे भाई ! गुरू के शबद को पहचान के ही सुख मिल सकता है। 7। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) शरीर का मोह (ग्रस रहा है) परिवार (का मोह ग्रस रहा है) (वह मनुष्य आत्मिक जीवन की खेल को) नहीं समझता। अगर मनुष्य गुरू की शरण पड़ जाए। तो इसको इन आँखों से सब कुछ दिखाई दे जाता है। वह मनुष्य हर वक्त दिन रात परमात्मा का नाम जपने लग जाता है। प्रीतम प्रभू को मिल के उसके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। 8। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को माया (ग्रसे रखती है। वह मनुष्य) माया (के आहर) में व्यस्त रहता है। पर वह बदनसीब पैदा होते ही क्यों ना मर गया। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ा हुआ व्यर्थ जनम गवा जाता है। गुरू के बिना (इस चक्कर में से) खलासी नहीं होती। 9। हे भाई ! वह शरीर अपवित्र है जिसको अहंकार की मैल लगी हुई है। अगर (ऐसे शरीर को तीर्थों आदि पर लोग) सौ-सौ बार भी धोते रहें। तो भी इसकी मैल दूर नहीं होती। (यदि मनुष्य का हृदय) गुरू के शबद से धोया जाय। तो शरीर पवित्र हो जाता है। दोबारा शरीर (अहंकार की मैल से) कभी गंदा नहीं होता। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने मन में नहीं बसाते। कामादिक पाँचों वैरी उनके शरीर को गलाते रहते हैं और वे जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। उनके अंदर माया के मोह का अंधेरा पड़ा रहता है। उनको अपने आप की सूझ नहीं होती। वे ऐसे हैं जैसे सपने में हैं। 11। वे कामादिक पाँचों को मार के गुरू के शबद में लीन रहते हैं; हे भाई ! कई ऐसे भाग्यशाली हैं। जिनको गुरू आ मिला है। अपने हृदय में सदा-स्थिर प्रभू को याद करते रहते हैं। वे प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। (हे भाई ! जो मनुष्य प्रेम-रंग में रंगा जाता है) वही आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 12। हे भाई ! गुरू वाली जीवन-जुगति गुरू से ही सीखी जा सकती है। गुरू के शबद में जुड़ा हुआ मनुष्य ही पूरन सेवक पहचाना जाता है; वही मनुष्य अपनी जीभ से सदा-स्थिर नाम-रस चखता रहता है और अपने हृदय में गुरू का शबद सदा बसाए रखता है। 13। हे भाई ! (पूर्ण सेवक) गुरू के शबद के माध्यम से अपने अहंकार को मार मुकाता है। स्वै भाव को दूर कर देता है। और परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। (पूर्ण सेवक यही यकीन रखता है-) एक परमात्मा के बिना मैं किसी और को (उस जैसा) नहीं समझता। जो कुछ उसकी रज़ा में हो रहा है वही ठीक हो रहा है। 14। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना किसी मनुष्य ने आत्मिक अडोलता प्राप्त नहीं की। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ही इसको समझता है और सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की बाणी में रति हुए मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन कर के गुरू के शबद के द्वारा ही अहंकार दूर कर लेते हैं। 15। हे प्रभू ! आप स्वयं ही (योग्य पात्र) विचार के (जीवों को अपने) गुणों की दाति देने वाला है; जिन्हें आप गुरू के द्वारा (अपने गुणों की दाति) देता है वे इस जीवन-खेल में माहिर हैं जाते हैं। हे नानक1 वह मनुष्य नाम में लीन रहते हैं। सदा-स्थिर प्रभू से ही उनको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। 16। 2।
मारू महला 3 ॥ जगजीवनु साचा एको दाता ॥ गुर सेवा ते सबदि पछाता ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है और (सारे) जगत का सहारा है। वही सब जीवों को दातें देने वाला है। गुरू की शरण पड़ने से। गुरू के शबद से ही उसके साथ गहरी सांझ पड़ सकती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “समझदार मनुष्य और समाधियाँ लगाने वाले भी (यही बात) कह के सुना गए हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।