अंग
1044
मारू
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आपे मेले दे वडिआई ॥
आपे मेले दे वडिआई ॥
गुर परसादी कीमति पाई ॥
मनमुखि बहुतु फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआई हे ॥3॥
हउमै माइआ विचे पाई ॥
मनमुख भूले पति गवाई ॥
गुरमुखि होवै सो नाइ राचै साचै रहिआ समाई हे ॥4॥
गुर ते गिआनु नाम रतनु पाइआ ॥
मनसा मारि मन माहि समाइआ ॥
आपे खेल करे सभि करता आपे देइ बुझाई हे ॥5॥
सतिगुरु सेवे आपु गवाए ॥
मिलि प्रीतम सबदि सुखु पाए ॥
अंतरि पिआरु भगती राता सहजि मते बणि आई हे ॥6॥
दूख निवारणु गुर ते जाता ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता ॥
जिस नो लाए सोई बूझै भउ भरमु सरीरहु जाई हे ॥7॥
आपे गुरमुखि आपे देवै ॥
सचै सबदि सतिगुरु सेवै ॥
जरा जमु तिसु जोहि न साकै साचे सिउ बणि आई हे ॥8॥
त्रिसना अगनि जलै संसारा ॥
जलि जलि खपै बहुतु विकारा ॥
मनमुखु ठउर न पाए कबहू सतिगुर बूझ बुझाई हे ॥9॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
साचै नामि सदा लिव लागी ॥
अंतरि नामु रविआ निहकेवलु त्रिसना सबदि बुझाई हे ॥10॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
गुरमुखि विरलै किनै पछाणी ॥
सचे सबदि रते बैरागी आवणु जाणु रहाई हे ॥11॥
सबदु बुझै सो मैलु चुकाए ॥
निरमल नामु वसै मनि आए ॥
सतिगुरु अपणा सद ही सेवहि हउमै विचहु जाई हे ॥12॥
गुर ते बूझै ता दरु सूझै ॥
नाम विहूणा कथि कथि लूझै ॥
सतिगुर सेवे की वडिआई त्रिसना भूख गवाई हे ॥13॥
आपे आपि मिलै ता बूझै ॥
गिआन विहूणा किछू न सूझै ॥
गुर की दाति सदा मन अंतरि बाणी सबदि वजाई हे ॥14॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाइआ ॥
कोइ न मेटै धुरि फुरमाइआ ॥
सतसंगति महि तिन ही वासा जिन कउ धुरि लिखि पाई हे ॥15॥
अपणी नदरि करे सो पाए ॥
सचै सबदि ताड़ी चितु लाए ॥
नानक दासु कहै बेनंती भीखिआ नामु दरि पाई हे ॥16॥1॥
गुर परसादी कीमति पाई ॥
मनमुखि बहुतु फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआई हे ॥3॥
हउमै माइआ विचे पाई ॥
मनमुख भूले पति गवाई ॥
गुरमुखि होवै सो नाइ राचै साचै रहिआ समाई हे ॥4॥
गुर ते गिआनु नाम रतनु पाइआ ॥
मनसा मारि मन माहि समाइआ ॥
आपे खेल करे सभि करता आपे देइ बुझाई हे ॥5॥
सतिगुरु सेवे आपु गवाए ॥
मिलि प्रीतम सबदि सुखु पाए ॥
अंतरि पिआरु भगती राता सहजि मते बणि आई हे ॥6॥
दूख निवारणु गुर ते जाता ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता ॥
जिस नो लाए सोई बूझै भउ भरमु सरीरहु जाई हे ॥7॥
आपे गुरमुखि आपे देवै ॥
सचै सबदि सतिगुरु सेवै ॥
जरा जमु तिसु जोहि न साकै साचे सिउ बणि आई हे ॥8॥
त्रिसना अगनि जलै संसारा ॥
जलि जलि खपै बहुतु विकारा ॥
मनमुखु ठउर न पाए कबहू सतिगुर बूझ बुझाई हे ॥9॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
साचै नामि सदा लिव लागी ॥
अंतरि नामु रविआ निहकेवलु त्रिसना सबदि बुझाई हे ॥10॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
गुरमुखि विरलै किनै पछाणी ॥
सचे सबदि रते बैरागी आवणु जाणु रहाई हे ॥11॥
सबदु बुझै सो मैलु चुकाए ॥
निरमल नामु वसै मनि आए ॥
सतिगुरु अपणा सद ही सेवहि हउमै विचहु जाई हे ॥12॥
गुर ते बूझै ता दरु सूझै ॥
नाम विहूणा कथि कथि लूझै ॥
सतिगुर सेवे की वडिआई त्रिसना भूख गवाई हे ॥13॥
आपे आपि मिलै ता बूझै ॥
गिआन विहूणा किछू न सूझै ॥
गुर की दाति सदा मन अंतरि बाणी सबदि वजाई हे ॥14॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाइआ ॥
कोइ न मेटै धुरि फुरमाइआ ॥
सतसंगति महि तिन ही वासा जिन कउ धुरि लिखि पाई हे ॥15॥
अपणी नदरि करे सो पाए ॥
सचै सबदि ताड़ी चितु लाए ॥
नानक दासु कहै बेनंती भीखिआ नामु दरि पाई हे ॥16॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को गुरू से) मिलाता है और इज्जत बख्शता है। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य इस मानस जनम की) कद्र समझता है। मन की मुरीद दुनिया माया के प्यार के कारण (सही जीवन-राह से) टूटी हुई बहुत विलकती फिरती है। 3। हे भाई ! (यह सृष्टि पैदा करके प्रभू ने स्वयं ही) इसके बीच में ही अहंकार और माया पैदा कर दी है। मन के पीछे चलने वाली दुनिया ने (अहंकार माया के कारण) गलत रास्ते पर पड़ के अपनी इज्जत गवा ली है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। वह परमात्मा के नाम में मस्त रहता है (और नाम की बरकति से वह) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ और परमात्मा का कीमती नाम हासिल कर लेता है। वह अपने मन के फुरने को मार के अंतरात्मे ही लीन रहता है। उसको परमात्मा स्वयं ही यह समझ बख्श देता है कि सारे खेल परमात्मा स्वयं ही कर रहा है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य स्वै भाव दूर करके गुरू की शरण पड़ता है। वह मनुष्य प्रीतम प्रभू को मिल के गुरू के शबद द्वारा आत्मिक आनंद लेता है। उसके अंदर परमात्मा का प्यार बना रहता है। वह मनुष्य परमात्मा की भक्ति में रंगा रहता है। आत्मिक अडोलता वाली बुद्धि के कारण प्रभू के साथ उसकी प्रतीति बनी रहती है। 6। हे भाई ! गुरू के द्वारा जिस मनुष्य ने दुखों के नाश करने वाले प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली। सब दातें देने वाला और जगत का आसरा प्रभू स्वयं उसको आ मिला। वही मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। जिसको प्रभू स्वयं भक्ति में जोड़ता है। उस मनुष्य के अंदर से हरेक किस्म का डर हरेक भ्रम दूर हो जाता है। 7। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही गुरू के सन्मुख रखता है जिस को स्वयं ही भक्ति की दाति देता है। वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ा रहता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद में जुड़ा रहता है। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ उसकी ऐसी प्रीति बन जाती है कि उस प्रीति को ना बुढ़ापा और ना ही आत्मिक मौत देख सकते हैं (भाव। ना वह प्रीति कभी कमजोर होती है और ना ही वहाँ विकारों को आने का मौका मिलता है)। 8। हे भाई ! जगत माया की तृष्णा की आग में जल रहा है। विकारों में जल-जल के बहुत दुखी हो रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस आग से बचाव का) रास्ता कभी भी नहीं पा सकता। (वही मनुष्य बचाव का राह पाता है जिसको) गुरू आत्मिक जीवन की सूझ देता है। 9। हे भाई ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं। जो गुरू की शरण पड़ते हैं। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में उनकी सुरति सदा जुड़ी रहती है। उनके अंदर परमात्मा का पवित्र करने वाला नाम सदा टिका रहता है। गुरू के शबद से (उन्होंने अपने अंदर से) तृष्णा (की आग) बुझा ली होती है। 10। सदा-स्थिर पदार्थ गुरू-शबद ही है। सदा-स्थिर वस्तु सिफत-सालाह की बाणी ही है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझ ली है जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में रंगे रहते हैं। वे माया से उपराम रहते हैं। उनका पैदा होना मरना (चक्कर) समाप्त हो जाता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को समझ लेता है (भाव। अपनी बुद्धि का हिस्सा बना लेता है) वह (अपने अंदर विकारों की) मैल दूर कर लेता है। परमात्मा का पवित्र नाम उसके मन में आ बसता है। जो मनुष्य सदा अपने गुरू की शरण पड़े रहते हैं। उनके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। 12। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू से (सही जीवन राह का उपदेश) समझ लेता है। तब उसको परमात्मा का दर दिखाई देता है (भाव। यह दिखाई दे जाता है कि हरी-नाम ही प्रभू-मिलाप का वसीला है उपाय है)। पर जो मनुष्य नाम से टूटा हुआ है वह (औरों को) व्याख्यान कर कर के (स्वयं अंदर से तृष्णा की आग में) जलता रहता है। हे भाई ! गुरू के शरण पड़ने की बरकति यह है कि मनुष्य (अपने अंदर से माया की) तृष्णा (माया की) भूख दूर कर लेता है। 13। पर। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही जीव को मिल जाए। तब ही वह (सही जीवन-राह को) समझता है। आत्मिक जीवन की सूझ के बिना मनुष्य को (माया की तृष्णा की भूख के बिना और) कुछ नहीं सूझता। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में गुरू की बख्शी (आत्मिक जीवन की सूझ की) दाति सदा बसती है। वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा की सिफत-सालाह का प्रभाव अपने अंदर बनाए रखता है (जैसे बज रहे बाजों के कारण कोई और छोटी मोटी आवाज नहीं सुनती)। 14। (हे भाई ! सारी खेल परमात्मा की रज़ा में हो रही है) धुर दरगाह से (रज़ा के अनुसार जीव के माथे पर जो लेख) लिखे जाते हैं। वही कर्म जीव कमाता रहता है। धुर से हुए हुकम को कोई जीव मिटा नहीं सकता। हे भाई ! साध-संगति में उन मनुष्यों को ही बैठने का अवसर मिलता है। जिनके माथे पर धुर से लिख के यह बख्शिश सौंपी जाती है। 15। हे भाई ! (साध-संगति में टिकने की दाति) वह मनुष्य हासिल करता है। जिस पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में अपना मन जोड़ता है- यही है (उसकी जोगियों वाली) समाधि। हे भाई ! (प्रभू का) दास नानक विनती करता है (कि वह मनुष्य प्रभू के) दर पर (हाजिर रह के) प्रभू के नाम की भिक्षा प्राप्त कर लेता है। 16। 1।
एको एकु वरतै सभु सोई ॥
मारू महला 3 ॥
एको एकु वरतै सभु सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
एको रवि रहिआ सभ अंतरि तिसु बिनु अवरु न कोई हे ॥1॥
लख चउरासीह जीअ उपाए ॥
एको एकु वरतै सभु सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
एको रवि रहिआ सभ अंतरि तिसु बिनु अवरु न कोई हे ॥1॥
लख चउरासीह जीअ उपाए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! सिर्फ एक वह परमात्मा ही हर जगह मौजूद है। गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य (इस भेद को) समझता है कि सब जीवों के अंदर एक परमात्मा ही व्यापक है। उस (परमात्मा) के बिना और कोई दूसरा नहीं। 1। हे भाई ! (उस परमात्मा ने ही) चौरासी लाख जूनियों के जीव पैदा किए हैं।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1044 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०४४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।