Lulla Family

अंग १०४३ · मारू

अंग
1043
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥4॥
  2. हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥

मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥4॥

अंग १०४२ से चला आ रहा अंश

मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥4॥
जिस कउ नदरि करे गुरु पूरा ॥
सबदि मिलाए गुरमति सूरा ॥
नानक गुर के चरन सरेवहु जिनि भूला मारगि पाइआ ॥5॥
संत जनां हरि धनु जसु पिआरा ॥
गुरमति पाइआ नामु तुमारा ॥
जाचिकु सेव करे दरि हरि कै हरि दरगह जसु गाइआ ॥6॥
सतिगुरु मिलै त महलि बुलाए ॥
साची दरगह गति पति पाए ॥
साकत ठउर नाही हरि मंदर जनम मरै दुखु पाइआ ॥7॥
सेवहु सतिगुर समुंदु अथाहा ॥
पावहु नामु रतनु धनु लाहा ॥
बिखिआ मलु जाइ अंम्रित सरि नावहु गुर सर संतोखु पाइआ ॥8॥
सतिगुर सेवहु संक न कीजै ॥
आसा माहि निरासु रहीजै ॥
संसा दूख बिनासनु सेवहु फिरि बाहुड़ि रोगु न लाइआ ॥9॥
साचे भावै तिसु वडीआए ॥
कउनु सु दूजा तिसु समझाए ॥
हरि गुर मूरति एका वरतै नानक हरि गुर भाइआ ॥10॥
वाचहि पुसतक वेद पुरानां ॥
इक बहि सुनहि सुनावहि कानां ॥
अजगर कपटु कहहु किउ खुल॑ै बिनु सतिगुर ततु न पाइआ ॥11॥
करहि बिभूति लगावहि भसमै ॥
अंतरि क्रोधु चंडालु सु हउमै ॥
पाखंड कीने जोगु न पाईऐ बिनु सतिगुर अलखु न पाइआ ॥12॥
तीरथ वरत नेम करहि उदिआना ॥
जतु सतु संजमु कथहि गिआना ॥
राम नाम बिनु किउ सुखु पाईऐ बिनु सतिगुर भरमु न जाइआ ॥13॥
निउली करम भुइअंगम भाठी ॥
रेचक कुंभक पूरक मन हाठी ॥
पाखंड धरमु प्रीति नही हरि सउ गुर सबद महा रसु पाइआ ॥14॥
कुदरति देखि रहे मनु मानिआ ॥
गुर सबदी सभु ब्रहमु पछानिआ ॥
नानक आतम रामु सबाइआ गुर सतिगुर अलखु लखाइआ ॥15॥5॥22॥

हिन्दी अर्थ: जगत के मोह के पसारे किसी मनुष्य के साथ साथी नहीं बन सकते। परमात्मा के नाम के बिना गुरू की शरण के बिना कभी किसी ने सुख प्राप्त नहीं किया। 4। जिस मनुष्य पर पूरा गुरू मेहर की नजर करता है। उसको अपने शबद में जोड़ता है। वह मनुष्य गुरू की मति के आसरे (विकारों का मुकाबला करने के लिए) शूरवीर हो जाता है। हे नानक ! जिस गुरू ने भूले हुए जीव को सही जीवन-रास्ते पर डाला है (भाव। जो गुरू भटकते जीव को ठीक रास्ते पर डाल देता है) उस गुरू की शरण पहुँचो (भाव। स्वै भाव गवा के उस गुरू का पल्ला पकड़ो)। 5। जिन संत-जनों को ही मिलता है उनको यह नाम-धन प्यारा लगता है उनको आपकी सिफत सालाह प्यारी लगती है। हे प्रभू ! आपका नाम गुरू की मति पर चलने से ही मिलता है। प्रभू के दर का मँगता प्रभू के दर पर टिक कर प्रभू की सेवा-भक्ति करता है। प्रभू की हजूरी में (जुड़ के प्रभू की) सिफत-सालाह करता है। 6। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। परमात्मा उसको अपनी हजूरी में बुलाता है (भाव। अपने चरणों में जोड़े रखता है)। वह मनुष्य प्रभू के चरणों में जुड़ के ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त करता है (लोक-परलोक में) इज्जत पाता है। पर माया-ग्रसित व्यक्ति को परमात्मा के महल का ठिकाना नहीं मिलता। वह जन्मों के चक्कर में पड़ कर दुख सहता है। 7। (हे भाई !) सतिगुरू अथाह समुंद्र है (उसमें प्रभू के गुणों के रतन भरे हुए हैं)। गुरू की सेवा करो। गुरू से नाम-रतन नाम-धन हासिल कर लेंगे (यही मनुष्य के जीवन का) लाभ (है)। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) नाम-अमृत के सरोवर में (आत्मिक) स्नान करो। (इस तरह) माया (के मोह) की मैल (मन से) धुल जाएगी (तृष्णा समाप्त हो जाएगी और) गुरू सरोवर का संतोख (-जल) प्राप्त हो जाएगा। 8। (हे भाई ! पूरी श्रद्धा से) गुरू की बताई हुई सेवा करो। (गुरू के हुकम में रक्ती भर भी) शक ना करो (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने से) दुनियां की आशाओं से निर्लिप रह के जीया जा सकता है। परमात्मा (का नाम) सिमरो जो सारे सहम और दुख नाश करने वाला है। जो मनुष्य सिमरता है उसको दोबारा (मोह का) रोग नहीं व्यापता। 9। जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को अच्छा लग जाता है उसको वह (गुरू के माध्यम से अपने नाम की दाति दे के) इज्जत बख्शता है। गुरू केू बिना कोई और नहीं जो सही रास्ता बता सके। गुरू और परमात्मा दोनों की एक ही हस्ती है जो जगत में काम कर रही है। हे नानक ! जो हरी को अच्छा लगता है वह गुरू को अच्छा लगता है। और गुरू को भाता है वही हरी-प्रभू को पसंद है। 10। (गुरू से टूट के पंडित लोग) वेद पुराण आदि (धर्म-) पुस्तकें पढ़ते हैं। जो कुछ वे सुनाते हैं उसको अनेकों व्यक्ति बैठ के ध्यान से सुनते हैं। पर इस तरह (मन को काबू रखने वाला माया के मोह का) करड़ा किवाड़ किसी भी हालत में खुल नहीं सकता। (क्योंकि) गुरू की शरण के बिना अस्लियत नहीं मिलती। 11। (एक वे भी हैं जो त्यागी बन के जंगलों में जा के बैठते हैं। लकड़ियाँ जला के) राख तैयार करते हैं और वह राख (अपने शरीर पर) मल लेते हैं। पर उनके अंदर (हृदय में) चण्डाल क्रोध बसता है अहंकार बसता है। (सो। त्याग के) ये पाखंड करने से परमात्मा का मिलाप प्राप्त नहीं हो सकता। गुरू की शरण पड़े बिना अदृश्य प्रभू नहीं मिलता। 12। (त्यागी बन के) जंगलों में निवास करते हैं तीर्थों पर स्नान करते हैं व्रतों के नियम धारते हैं। ज्ञान की बातें करते हैं जत सत संजम के साधन करते हैं। पर परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता। सतिगुरू के बिना मन की भटकना दूर नहीं होती। 13। (यह लोग) नियोली कर्म करते हैं। कुण्डलनी को दसम द्वार में खोलना बताते हैं। मन के हठ से (प्राणायाम के अभ्यास में) प्राण ऊपर चढ़ाते हैं। सुखमनां में रोक के रखते हैं और फिर नीचे उतारते हैं पर ये धार्मिक कर्म निरे पाखण्ड धर्म ही हैं। इसके द्वारा परमात्मा के साथ प्रीति नहीं बन सकती। गुरू-शबद वाला महान (आनंद देने वाला) रस नहीं मिलता। 14। (एक वे हैं जो) कुदरति में बस रहे प्रभू को देखते हैं उनका मन उस दीदार में प्रसन्न होता है। गुरू के शबद में जुड़ के वे हर जगह गुरू को बसता पहचानते हैं। हे नानक ! उनको सारी सृष्टि में व्यापक परमात्मा दिखता है। गुरू ही अदृष्ट परमात्मा के दीदार करवाता है। 15। 5। 22।

हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मारू सोलहे महला 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥
करि करि वेखै अपणी वडिआई ॥
आपे करे कराए आपे हुकमे रहिआ समाई हे ॥1॥
माइआ मोहु जगतु गुबारा ॥
गुरमुखि बूझै को वीचारा ॥
आपे नदरि करे सो पाए आपे मेलि मिलाई हे ॥2॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 3 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! परमात्मा ने बिना किसी विशेष प्रयत्न के अपने हुकम से ये सृष्टि पैदा कर दी है। (जगत उत्पक्ति के काम) कर कर के अपनी वडिआई (स्वयं ही) देख रहा है। आप ही सब कुछ कर रहा है। (जीवों से) खुद ही करवा रहा है। अपनी रजा के अनुसार (सारी सृष्टि में) व्यापक हो रहा है। 1। हे भाई ! (सृष्टि में प्रभू स्वयं ही) माया का मोह पैदा करने वाला है (जिसने) जगत में घॅुप अंधेरा बना रखा है। इस विचार को गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य ही समझता है। हे भाई ! जिस जीव पर प्रभू स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। वही। यह सूझ प्राप्त करता है कि प्रभू स्वयं ही (गुरू से) मिला के (अपने चरणों में) मिलाता है। 2।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1043 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०४३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English