नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जगत के मोह के पसारे किसी मनुष्य के साथ साथी नहीं बन सकते। परमात्मा के नाम के बिना गुरू की शरण के बिना कभी किसी ने सुख प्राप्त नहीं किया। 4। जिस मनुष्य पर पूरा गुरू मेहर की नजर करता है। उसको अपने शबद में जोड़ता है। वह मनुष्य गुरू की मति के आसरे (विकारों का मुकाबला करने के लिए) शूरवीर हो जाता है। हे नानक ! जिस गुरू ने भूले हुए जीव को सही जीवन-रास्ते पर डाला है (भाव। जो गुरू भटकते जीव को ठीक रास्ते पर डाल देता है) उस गुरू की शरण पहुँचो (भाव। स्वै भाव गवा के उस गुरू का पल्ला पकड़ो)। 5। जिन संत-जनों को ही मिलता है उनको यह नाम-धन प्यारा लगता है उनको आपकी सिफत सालाह प्यारी लगती है। हे प्रभू ! आपका नाम गुरू की मति पर चलने से ही मिलता है। प्रभू के दर का मँगता प्रभू के दर पर टिक कर प्रभू की सेवा-भक्ति करता है। प्रभू की हजूरी में (जुड़ के प्रभू की) सिफत-सालाह करता है। 6। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। परमात्मा उसको अपनी हजूरी में बुलाता है (भाव। अपने चरणों में जोड़े रखता है)। वह मनुष्य प्रभू के चरणों में जुड़ के ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त करता है (लोक-परलोक में) इज्जत पाता है। पर माया-ग्रसित व्यक्ति को परमात्मा के महल का ठिकाना नहीं मिलता। वह जन्मों के चक्कर में पड़ कर दुख सहता है। 7। (हे भाई !) सतिगुरू अथाह समुंद्र है (उसमें प्रभू के गुणों के रतन भरे हुए हैं)। गुरू की सेवा करो। गुरू से नाम-रतन नाम-धन हासिल कर लेंगे (यही मनुष्य के जीवन का) लाभ (है)। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) नाम-अमृत के सरोवर में (आत्मिक) स्नान करो। (इस तरह) माया (के मोह) की मैल (मन से) धुल जाएगी (तृष्णा समाप्त हो जाएगी और) गुरू सरोवर का संतोख (-जल) प्राप्त हो जाएगा। 8। (हे भाई ! पूरी श्रद्धा से) गुरू की बताई हुई सेवा करो। (गुरू के हुकम में रक्ती भर भी) शक ना करो (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने से) दुनियां की आशाओं से निर्लिप रह के जीया जा सकता है। परमात्मा (का नाम) सिमरो जो सारे सहम और दुख नाश करने वाला है। जो मनुष्य सिमरता है उसको दोबारा (मोह का) रोग नहीं व्यापता। 9। जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को अच्छा लग जाता है उसको वह (गुरू के माध्यम से अपने नाम की दाति दे के) इज्जत बख्शता है। गुरू केू बिना कोई और नहीं जो सही रास्ता बता सके। गुरू और परमात्मा दोनों की एक ही हस्ती है जो जगत में काम कर रही है। हे नानक ! जो हरी को अच्छा लगता है वह गुरू को अच्छा लगता है। और गुरू को भाता है वही हरी-प्रभू को पसंद है। 10। (गुरू से टूट के पंडित लोग) वेद पुराण आदि (धर्म-) पुस्तकें पढ़ते हैं। जो कुछ वे सुनाते हैं उसको अनेकों व्यक्ति बैठ के ध्यान से सुनते हैं। पर इस तरह (मन को काबू रखने वाला माया के मोह का) करड़ा किवाड़ किसी भी हालत में खुल नहीं सकता। (क्योंकि) गुरू की शरण के बिना अस्लियत नहीं मिलती। 11। (एक वे भी हैं जो त्यागी बन के जंगलों में जा के बैठते हैं। लकड़ियाँ जला के) राख तैयार करते हैं और वह राख (अपने शरीर पर) मल लेते हैं। पर उनके अंदर (हृदय में) चण्डाल क्रोध बसता है अहंकार बसता है। (सो। त्याग के) ये पाखंड करने से परमात्मा का मिलाप प्राप्त नहीं हो सकता। गुरू की शरण पड़े बिना अदृश्य प्रभू नहीं मिलता। 12। (त्यागी बन के) जंगलों में निवास करते हैं तीर्थों पर स्नान करते हैं व्रतों के नियम धारते हैं। ज्ञान की बातें करते हैं जत सत संजम के साधन करते हैं। पर परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता। सतिगुरू के बिना मन की भटकना दूर नहीं होती। 13। (यह लोग) नियोली कर्म करते हैं। कुण्डलनी को दसम द्वार में खोलना बताते हैं। मन के हठ से (प्राणायाम के अभ्यास में) प्राण ऊपर चढ़ाते हैं। सुखमनां में रोक के रखते हैं और फिर नीचे उतारते हैं पर ये धार्मिक कर्म निरे पाखण्ड धर्म ही हैं। इसके द्वारा परमात्मा के साथ प्रीति नहीं बन सकती। गुरू-शबद वाला महान (आनंद देने वाला) रस नहीं मिलता। 14। (एक वे हैं जो) कुदरति में बस रहे प्रभू को देखते हैं उनका मन उस दीदार में प्रसन्न होता है। गुरू के शबद में जुड़ के वे हर जगह गुरू को बसता पहचानते हैं। हे नानक ! उनको सारी सृष्टि में व्यापक परमात्मा दिखता है। गुरू ही अदृष्ट परमात्मा के दीदार करवाता है। 15। 5। 22।
मारू सोलहे महला 3 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥ करि करि वेखै अपणी वडिआई ॥ आपे करे कराए आपे हुकमे रहिआ समाई हे ॥1॥ माइआ मोहु जगतु गुबारा ॥ गुरमुखि बूझै को वीचारा ॥ आपे नदरि करे सो पाए आपे मेलि मिलाई हे ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 3 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! परमात्मा ने बिना किसी विशेष प्रयत्न के अपने हुकम से ये सृष्टि पैदा कर दी है। (जगत उत्पक्ति के काम) कर कर के अपनी वडिआई (स्वयं ही) देख रहा है। आप ही सब कुछ कर रहा है। (जीवों से) खुद ही करवा रहा है। अपनी रजा के अनुसार (सारी सृष्टि में) व्यापक हो रहा है। 1। हे भाई ! (सृष्टि में प्रभू स्वयं ही) माया का मोह पैदा करने वाला है (जिसने) जगत में घॅुप अंधेरा बना रखा है। इस विचार को गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य ही समझता है। हे भाई ! जिस जीव पर प्रभू स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। वही। यह सूझ प्राप्त करता है कि प्रभू स्वयं ही (गुरू से) मिला के (अपने चरणों में) मिलाता है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जगत के मोह के पसारे किसी मनुष्य के साथ साथी नहीं बन सकते।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।