Lulla Family

अंग 1042

अंग
1042
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अति रसु मीठा नामु पिआरा ॥
नानक कउ जुगि जुगि हरि जसु दीजै हरि जपीऐ अंतु न पाइआ ॥5॥
अंतरि नामु परापति हीरा ॥
हरि जपते मनु मन ते धीरा ॥
दुघट घट भउ भंजनु पाईऐ बाहुड़ि जनमि न जाइआ ॥6॥
भगति हेति गुर सबदि तरंगा ॥
हरि जसु नामु पदारथु मंगा ॥
हरि भावै गुर मेलि मिलाए हरि तारे जगतु सबाइआ ॥7॥
जिनि जपु जपिओ सतिगुर मति वा के ॥
जमकंकर कालु सेवक पग ता के ॥
ऊतम संगति गति मिति ऊतम जगु भउजलु पारि तराइआ ॥8॥
इहु भवजलु जगतु सबदि गुर तरीऐ ॥
अंतर की दुबिधा अंतरि जरीऐ ॥
पंच बाण ले जम कउ मारै गगनंतरि धणखु चड़ाइआ ॥9॥
साकत नरि सबद सुरति किउ पाईऐ ॥
सबदु सुरति बिनु आईऐ जाईऐ ॥
नानक गुरमुखि मुकति पराइणु हरि पूरै भागि मिलाइआ ॥10॥
निरभउ सतिगुरु है रखवाला ॥
भगति परापति गुर गोपाला ॥
धुनि अनंद अनाहदु वाजै गुर सबदि निरंजनु पाइआ ॥11॥
निरभउ सो सिरि नाही लेखा ॥
आपि अलेखु कुदरति है देखा ॥
आपि अतीतु अजोनी संभउ नानक गुरमति सो पाइआ ॥12॥
अंतर की गति सतिगुरु जाणै ॥
सो निरभउ गुर सबदि पछाणै ॥
अंतरु देखि निरंतरि बूझै अनत न मनु डोलाइआ ॥13॥
निरभउ सो अभ अंतरि वसिआ ॥
अहिनिसि नामि निरंजन रसिआ ॥
नानक हरि जसु संगति पाईऐ हरि सहजे सहजि मिलाइआ ॥14॥
अंतरि बाहरि सो प्रभु जाणै ॥
रहै अलिपतु चलते घरि आणै ॥
ऊपरि आदि सरब तिहु लोई सचु नानक अंम्रित रसु पाइआ ॥15॥4॥21॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पर वह नाम बड़ा ही रसीला बड़ा ही मीठा और बड़ा ही प्यारा है। (मेरी नानक की अरदास है कि। हे प्रभू ! मुझे) नानक को सदा ही अपनी सिफत-सालाह की दाति दे। (ज्यों-ज्यों) प्रभू का नाम जपें (त्यों-त्यों वह बेअंत दिखाई देने लगता है। पर उसकी ताकतों का) अंत नहीं पाया जा सकता। 5। जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम बस जाता है जिसको नाम-हीरा मिल जाता है। परमात्मा का नाम सिमरते-सिमरते उसका मन अंदर से ही धैर्य-शांति हासिल कर लेता है। (सिमरन की बरकति से) मुश्किल जीवन-पथ का डर नाश करने वाला परमात्मा मिल जाता है (जिसको मिल जाता है) वह दोबारा जनम में नहीं आता वह पुनः जनम-मरण में नहीं पड़ता। 6। हे प्रभू ! मैं (आपके दर से) आपकी सिफत-सालाह (की दाति) माँगता हूँ। आपके नाम (का) सरमाया माँगता हूँ। मैं यह माँगता हूँ कि गुरू के शबद में जुड़ के आपकी भक्ति करने के लिए मेरे अंदर उत्साह पैदा हैं। (जो भाग्यशाली जीव) परमात्मा को अच्छा लगता है उसको वह गुरू की संगति में मिलाता है। परमात्मा (चाहे तो) सारे जगत को (विकारों के समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 7। जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का जाप जपा है सतिगुरू की शिक्षा ने (समझो) उसके अंदर घर कर लिया है। काल और जम के सेवक उसके चरणों के दास बन गए हैं। उसकी संगति (औरों को भी) श्रेष्ठ बना देती है। उसकी आत्मिक अवस्था ऊँची हो जाती है। उसका रहन-सहन ऊँचा हो जाता है। वह औरों को भी संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 8। गुरू के शबद में जुड़ के इस संसार-समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। (गुरू के शबद की बरकति से मनुष्य की) अंदरूनी अशांति अंदर ही जल जाती है। वह मनुष्य अपने चिक्त-आकाश में (गुरू के शबद-रूप) धनुष को ऐसा कसता है कि (सत। संतोख। दया। धर्म व धैर्य के) पाँच तीर ले के जम को (मौत के डर को। आत्मिक मौत को) मार लेता है। 9। पर माया-ग्रसित मनुष्य के अंदर गुरू के शबद की लगन ही पैदा नहीं होती। शबद से लगन के बिना (माया के मोह में फस के) वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ना ही (माया के मोह से) खलासी का उपाय है। और पूरी किस्मत से ही परमात्मा गुरू मिलाता है। 10। निर्भय (परमात्मा का रूप) सतिगुरू (जिस मनुष्य का) रखवाला बनता है उसको गुरू से परमात्मा की भक्ति (की दाति) मिल जाती है। उस मनुष्य के अंदर आत्मिक आनंद की एक-रस ध्वनि (रौंअ) चल पड़ती है। गुरू के शबद में जुड़ के मनुष्य उस परमात्मा से मिल जाता है जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। 11। परमात्मा को कोई डर व्याप नहीं सकता क्योंकि उसके सिर पर किसी और का हुकम नहीं। वह प्रभू स्वयं अलेख है (भाव। कोई और व्यक्ति उससे किए कर्मों का हिसाब नहीं माँग सकता)। अपनी रची हुई सारी कुदरति में वह ही व्यापक दिखाई दे रहा है। (सारी कुदरति में व्यापक होते हुए भी) वह निर्लिप है। जूनियों से रहित है। और अपने आप से ही प्रकट होने की ताकत रखता है। हे नानक ! गुरू की मति पर चलने से ही वह परमात्मा मिलता है। 12। जो मनुष्य सतिगुरू के साथ गहरी सांझ डाल लेता है वह अपनी अंदरूनी आत्मिक हालत को समझने लग जाता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह निर्भय परमात्मा को (हर जगह बसता) पहचान लेता है। वह मनुष्य अपना अंदरूनी (हृदय) परख के प्रभू को एक-रस सब जगह व्यापक समझता है। (इसलिए) उसका मन किसी और (आसरे की झाक) की तरफ नहीं डोलता। 13। जिस मनुष्य का हृदय दिन-रात माया-रहित प्रभू के नाम में रसा हुआ रहता है। निरभउ परमात्मा उसके हृदय में प्रकट हो जाता है। हे नानक ! उस परमात्मा की सिफत-सालाह संगति (में बैठने से) मिलती है। (सिफत-सालाह करने वाले बंदे को) परमात्मा अडोल आत्मिक अवस्था में मिलाए रखता है। 14। (सिफत-सालाह करने वाला व्यक्ति) उस परमात्मा को अपने अंदर व बाहर (सारी सृष्टि में) व्यापक समझता है। वह माया के मोह से निर्लिप रहता है। और (माया की ओर) दौड़ते (मन) को (मोड़ के अपने) अंदर ही ले आता है। हे नानक ! उस मनुष्य को सदा-स्थिर परमात्मा सब जीवों का रखवाला व सबका मूल और तीनों भवनों में व्यापक (की हकीकत) दिखाई दे जाती है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस हासिल कर लेता है। 15। 4। 21।
मारू महला 1 ॥
कुदरति करनैहार अपारा ॥
कीते का नाही किहु चारा ॥
जीअ उपाइ रिजकु दे आपे सिरि सिरि हुकमु चलाइआ ॥1॥
हुकमु चलाइ रहिआ भरपूरे ॥
किसु नेड़ै किसु आखां दूरे ॥
गुपत प्रगट हरि घटि घटि देखहु वरतै ताकु सबाइआ ॥2॥
जिस कउ मेले सुरति समाए ॥
गुर सबदी हरि नामु धिआए ॥
आनद रूप अनूप अगोचर गुर मिलिऐ भरमु जाइआ ॥3॥
मन तन धन ते नामु पिआरा ॥
अंति सखाई चलणवारा ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ इस सारी सृष्टि को रखने वाला परमात्मा बेअंत है (उसकी ताकतों का परला किनारा नहीं मिल सकता। कोई जीव उसकी ताकत के आगे अड़ना चाहे। तो) उसके पैदा किए हुए जीवकी पेश नहीं चलती। वह परमात्मा सारे जीव पैदा करके स्वयं ही (सबको) रिजक देता है और स्वयं ही हरेक पर अपना हुकम चला रहा है (हरेक को अपने हुकम में चला रहा है)। 1। परमात्मा (सारी सृष्टि में अपना) हुकम वरता रहा है। और सारी ही सृष्टि में पूरी तौर से व्यापक है। मैं क्या बताऊँ कि किस के वह नजदीक है और किस से दूर। (भाव। परमात्मा हरेक जीव के अंदर भी बस रहा है और निर्लिप भी है)। (हे भाई !) हरेक शरीर में हरी को गुप्त भी और प्रकट भी बसता देखो। वह सारी रचना में एक स्वयं ही स्वयं मौजूद है। 2। जिस जीव को परमात्मा अपने साथ मिलाता है उसकी सुरति (प्रभू चरणों में) जुड़ती है। वह जीव गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा का नाम सिमरता है। उसको हर जगह वह परमात्मा दिखाई देता है जो आनंद-स्वरूप है जो बेमिसाल है और जिस तक मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। गुरू की शरण पड़ने के कारण उसकी भटकना दूर हो जाती है। 3। जिस मनुष्य को अपने मन से अपने शरीर से अपने धन-पदार्थ से ज्यादा प्यारा परमात्मा का नाम लगता है। परमात्मा उसका आखिर तक साथी बनता है उसके साथ जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर वह नाम बड़ा ही रसीला बड़ा ही मीठा और बड़ा ही प्यारा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English