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अंग 1041

अंग
1041
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सच बिनु भवजलु जाइ न तरिआ ॥
एहु समुंदु अथाहु महा बिखु भरिआ ॥
रहै अतीतु गुरमति ले ऊपरि हरि निरभउ कै घरि पाइआ ॥6॥
झूठी जग हित की चतुराई ॥
बिलम न लागै आवै जाई ॥
नामु विसारि चलहि अभिमानी उपजै बिनसि खपाइआ ॥7॥
उपजहि बिनसहि बंधन बंधे ॥
हउमै माइआ के गलि फंधे ॥
जिसु राम नामु नाही मति गुरमति सो जम पुरि बंधि चलाइआ ॥8॥
गुर बिनु मोख मुकति किउ पाईऐ ॥
बिनु गुर राम नामु किउ धिआईऐ ॥
गुरमति लेहु तरहु भव दुतरु मुकति भए सुखु पाइआ ॥9॥
गुरमति क्रिसनि गोवरधन धारे ॥
गुरमति साइरि पाहण तारे ॥
गुरमति लेहु परम पदु पाईऐ नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥10॥
गुरमति लेहु तरहु सचु तारी ॥
आतम चीनहु रिदै मुरारी ॥
जम के फाहे काटहि हरि जपि अकुल निरंजनु पाइआ ॥11॥
गुरमति पंच सखे गुर भाई ॥
गुरमति अगनि निवारि समाई ॥
मनि मुखि नामु जपहु जगजीवन रिद अंतरि अलखु लखाइआ ॥12॥
गुरमुखि बूझै सबदि पतीजै ॥
उसतति निंदा किस की कीजै ॥
चीनहु आपु जपहु जगदीसरु हरि जगंनाथु मनि भाइआ ॥13॥
जो ब्रहमंडि खंडि सो जाणहु ॥
गुरमुखि बूझहु सबदि पछाणहु ॥
घटि घटि भोगे भोगणहारा रहै अतीतु सबाइआ ॥14॥
गुरमति बोलहु हरि जसु सूचा ॥
गुरमति आखी देखहु ऊचा ॥
स्रवणी नामु सुणै हरि बाणी नानक हरि रंगि रंगाइआ ॥15॥3॥20॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सदा-स्थिर परमात्मा के नाम सिमरन के बिना इसमें से पार नहीं लांघा जा सकता। यह संसार-समुंद्र बहुत ही गहरा है और (विकारों के) जहर से भरा हुआ है। जो मनुष्य गुरू की मति लेता है वह विकारों से निर्लिप रहता है वह जहर भरे समुंद्र से ऊपर-ऊपर रहता है। उसको परमात्मा मिल जाता है और वह ऐसे (आत्मिक) ठिकाने में पहुँच जाता है जहाँ वह विकारों के डर-सहम से परे हो जाता है। 6। जगत के (पदार्थोंके) मोह की समझदारी व्यर्थ ही जाती है क्योंकि (जगत की माया का साथ समाप्त होने में) ज्यादा समय नहीं लगता और मनुष्य इस मोह के कारण जनम-मरण में पड़ जाता है। माया का गुमान करने वाले व्यक्ति परमात्मा का नाम भुला के (यहाँ से खाली हाथ) चल पड़ते हैं। (जो भी प्रभू का नाम बिसारता है वह) पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है और दुखी होता है। 7। वे इन बँधनों में बँधे हुए जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहते हैं। जिन लोगों के गले में अहंकार और माया के फंदेपड़े रहते हैं। जिस मनुष्य को सतिगुरू की मति के द्वारा परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं हुआ। वह मोह के बँधनों में बाँध के जम के शहर में धकेला जाता है। 8। गुरू की शरण के बिना (अहंकार माया के बँधनों से) खलासी किसी भी हालत में नहीं मिल सकती। क्योंकि। गुरू की शरण में आए बिना परमात्मा का नाम नहीं सिमरा जा सकता। (हे भाई !) गुरू की मति पर चल कर (नाम सिमरो। इस तरह) उस संसार-समुंद्र में से पार लांघ जाएँगे जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। जो लोग (नाम सिमर के) विकारों से बच निकले उनको आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। 9। गुरू की मति पर चल कर नाम सिमरने से बड़ी ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल हो जाती है (बड़ा आत्मिक बल प्राप्त हो जाता है) इसी गुरमति की बरकति से कृष्ण (जी) ने गौवर्धन पर्वत को (उंगलियों पर) उठा लिया था और (श्री राम चंद्र जी ने) पत्थर समुंद्र में तैरा दिए थे। हे नानक ! (जो भी मनुष्य गुरू की शरण आया) गुरू ने उसकी भटकना समाप्त कर दी। 10। (हे भाई !) गुरू की मति ग्रहण करो और सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरो। इस तरह संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए तैरो। अपने आत्मिक जीवन को ध्यान से देखो और परमात्मा को अपने हृदय में बसाओ। परमात्मा का नाम जप के जप के देश ले जाने वाले बँधन काटे जाते हैं। जो भी मनुष्य नाम जपता है उसको वह परमात्मा मिल जाता है जिसका कोई विशेष कुल नहीं है और जो माया के प्रभाव से ऊपर है। 11। गुरू की मति पर चलने से सत-संतोख आदि पाँचों मनुष्य के आत्मिक साथी बन जाते हैं गुर-भाई बन जाते हैं। गुरू की मति तृष्णा की आग को दूर कर के नाम में जोड़ देती है। (हे भाई !) जगत के जीवन प्रभू का नाम अपने मन में अपने मुँह से जपते रहो। (जो मनुष्य जपता है वह) अपने दिल में अदृष्ट प्रभू के दर्शन कर लेता है। 12। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (ये जीवन-जुगति) समझ लेता है वह गुरू के शबद में जुड़ कर आत्मिक शांति हासिल कर लेता है। यह फिर ना किसी की खुशामद उस्तति करता है ना किसी की निंदा करता है। (हे भाई !) अपने आत्मिक जीवन को (हमेशा) पड़तालते रहो। और जगत के मालिक (का नाम) जपते रहो। (जो मनुष्य नाम जपता है) उसको जगत का नाथ हरि अपने मन में प्यारा लगने लग जाता है। 13। जो परमात्मा सारी सृष्टि में बसता है उसको अपने शरीर में बसता पहचानो। गुरू की शरण पड़ कर यह भेद समझो। गुरू के शबद में जुड़ कर इस अस्लियत को पहचानो। दुनिया के सारे पदार्थों को भोग सकने वाला परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक हो के सारे भोग भोग रहा है। फिर भी सारी सृष्टि से निर्लिप रहता है। 14। (हे भाई !) गुरू की मति के द्वारा परमात्मा की सिफत-सालाह करो जो जीवन को पवित्र बना देती है। गुरू की शिक्षा पर चल कर उस सबसे ऊँचे परमात्मा को अपनी आँखों से (अंदर-बाहर हर जगह) देखो। हे नानक ! जो मनुष्य अपने कानों से परमात्मा का नाम सुनता है प्रभू की सिफत-सालाह सुनता है वह परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 125। 3। 20।
मारू महला 1 ॥
कामु क्रोधु परहरु पर निंदा ॥
लबु लोभु तजि होहु निचिंदा ॥
भ्रम का संगलु तोड़ि निराला हरि अंतरि हरि रसु पाइआ ॥1॥
निसि दामनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै ॥
अहिनिसि जोति निरंतरि पेखै ॥
आनंद रूपु अनूपु सरूपा गुरि पूरै देखाइआ ॥2॥
सतिगुर मिलहु आपे प्रभु तारे ॥
ससि घरि सूरु दीपकु गैणारे ॥
देखि अदिसटु रहहु लिव लागी सभु त्रिभवणि ब्रहमु सबाइआ ॥3॥
अंम्रित रसु पाए त्रिसना भउ जाए ॥
अनभउ पदु पावै आपु गवाए ॥
ऊची पदवी ऊचो ऊचा निरमल सबदु कमाइआ ॥4॥
अद्रिसट अगोचरु नामु अपारा ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (हे भाई ! अपने अंदर से) काम क्रोध और पराई निंदा दूर कर। लब और लोभ त्याग के निष्चिंत हो जा (भाव। अगर आप काम। क्रोध। पराई निंदा। लब और लोभ दूर कर लेगा। तो आपका मन हर वक्त शांत रहेगा)। जो मनुष्य (इन विकारों की कई किस्मों की) भटकनों की जंजीरों को तोड़ के निर्लिप हो जाता है वह परमात्मा को अपने अंदर ही पा लेता है। वह परमात्मा का नाम-रस प्राप्त करता है। 1। जैसे रात के वक्त बिजली की चमक से मनुष्य (अंधेरे में) रौशनी देख लेता है। इसी तरह (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन की बरकति से) दिन-रात (हर वक्त) परमात्मा की ज्योति को हर जगह व्यापक देख सकता है। वह आनंद-रूप और आनंद-स्वरूप प्रभू (जिस किसी ने देखा है) पूरे गुरू ने ही दिखाया है। 2। (हे भाई !) सतिगुरू की शरण पड़ो (जो मनुष्य गुरू को मिलता है उसको) परमात्मा स्वयं ही (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। उसके शांत हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। उसके हृदय-क्षितिज (हृदय-आकाश) में (मानो) दीया जग उठता है। (हे भाई ! अपने अंदर) अदृष्ट प्रभू को देख के उसमें सुरति जोड़े रखो। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसको) हर जगह सारे त्रिभवणी जगत में परमात्मा ही परमात्मा दिखता है। 3। जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस प्राप्त करता है उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है उसका सहम दूर हो जाता है। उसको वह आत्मिक अवस्था मिल जाती है जहाँ ज्ञान का प्रकाश होता है। वह स्वै भाव दूर कर लेता है। वह बड़ी ऊँची आत्मिक अवस्था पा लेता है। ऊँचे से ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल करता है। जीवन को पवित्र करने वाला गुरू-शबद वह मनुष्य अपने अंदर कमाता है (भाव। गुरू-शबद के अनुसार जीवन-घाड़त घड़ता है)। 4। अदृश्य और बेअंत प्रभू का नाम मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा-स्थिर परमात्मा के नाम सिमरन के बिना इसमें से पार नहीं लांघा जा सकता।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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