नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: वह सुजान प्रभू सब शरीरों में व्यापक होता हुआ भी माया के प्रभाव से परे है। और (हरेक बात में) न्याय करता है। जो मनुष्य गुरू के बख्शे इस ज्ञान में अपने आप को लीन करता है वह अपने अंदर से काम और क्रोध का बिल्कुल ही नाश कर देता है। उसने अहंकार और लोभ को भी समाप्त कर लिया है। 6। वह परमात्मा जिसका कोई विशेष रूप नहीं बताया जा सकता एक ऐसी जगह पर बिराजमान है जो हमेशा कायम रहने वाली है। वह आप ही अपने आप को विचारता है और स्वयं ही समझता है। जिस जीव ने उस सदा-स्थिर प्रभू के चरणों (महल) में अपना ठिकाना सदा के लिए बना लिया (भाव। जो मनुष्य सदा उसकी याद में जुड़ा रहता है) परमात्मा उसके पैदा होने मरने के चक्करों को समाप्त कर देता है। 7। उस मनुष्य का मन (माया की खातिर) नहीं भटकता। माया की तृष्णा उसको जगह-जगह नहीं भटकाए फिरती। प्रभू-चरणों में जुड़ा हुआ वह मनुष्य (अपने अंदर) एक-रस सिफत सालाह (का बाजा) बजाता रहता है। जिसकी बरकति से उसके अंदर। मानो। एक मीठा-मीठा एक-रस राग होता रहता है जैसे पाँच-किस्मों के साजों के एक साथ बजाने से पैदा होता है। उस राग को बाहर से किसी साज़ के आसरे की जरूरत नहीं पड़ती। यह राग (अंदर बसते) प्रभू ने स्वयं ही बजा के उसको सुनाया है। 8। उस मनुष्य के अंदर परमात्मा का डर-अदब पैदा होता है। परमात्मा का प्यार उपजता है। (जिसके कारण) वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह मनुष्य अहंकार दूर करके अविनाशी प्रभू (के नाम-रंग) में रंगा रहता है। (प्रभू के नाम का) सुरमा डाल के वह पहचान लेता है कि वह राजन-प्रभू स्वयं माया के प्रभाव से परे है और (शरण पड़े) सब जीवों को भी माया के प्रभाव से बचा लेता है। 9। प्रभू जीवों के डर और दुख नाश करने वाला है और स्वयं कभी नाश होने वाला नहीं। वह जीवों के रोग काटता है। जम के फंदे तोड़ता है। हे नानक ! वह हरी। वह भय-भंजन प्रभू तभी मिलता है जब गुरू मिल जाए। 10। जो मनुष्य माया-रहित परमात्मा के साथ सांझ डाल लेता है वह मौत को ग्रास लेता है (निवाला बना लेता है वह मौत का डर समाप्त कर लेता है)। वह परमात्मा की बख्शिश को समझ लेता है। वह प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी के साथ जान-पहचान डालता है। (उसको ये निश्चय बन जाता है कि) परमात्मा स्वयं सब जीवों के दिल की जानता है और पहचानता है। यह सारा जगत-तमाशा उसी का रचा हुआ है। 11। (यह जगत। मानो। एक शहर है जहाँ जीव प्रभू के नाम का व्यापार करने आते हैं) परमात्मा स्वयं ही (राशि-पूँजी देने वाला) शाहूकार है स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के) व्यापारी है। वह स्वयं ही इस सौदे को परखता है क्योंकि वह खुद ही इसे परखने की योग्यता रखता है। (हरेक जीव-वणजारे के किए हुए वणज को व्यापार को) प्रभू स्वयं ही परखता है जैसे सोनियारा सोने को कसवॅटी पर घिसा के परखता है। और फिर प्रभू स्वयं ही (उस वस्तु का) मूल्य डालता है। 12। जिस मनुष्य पर दया-के-घर प्रभू ने मेहर की उसे पक्का यकीन हो गया कि जगत का मालिक प्रभू हरेक शरीर में व्यापक है। हरेक शरीर में बसते हुए भी वह माया के प्रभाव से परे है और पवित्र स्वरूप है। (जिस पर प्रभू की मेहर हुई) उसको सतिगुरू पुरख ने वह सर्व-व्यापक प्रभू मिला दिया। 13। प्रभू सब जीवों के दिलों की जानता है सब के किए काम देखता है (जिस पर मेहर करे उसका) अहंकार मिटाता है। उसके अंदर से और सभी आसरों की झाक दूर कर देता है। और उसको एक अपना आप दिखा देता है। वह मनुष्य दुनियां की आशाओं में (विचरता हुआ भी) आशाओं के आसरे से बेमुथाज हो जाता है क्योंकि वह उस प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है जो माया के प्रभाव से परे है और जिसकी कोई खास कुल नहीं। 14। जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है वही असल ज्ञानवान है। वह मनुष्य अहंकार को दूर करके गुरू के शबद में जुड़ता है और इस तरह उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। हे नानक ! परमात्मा की सिफत-सालाह करनी परमात्मा के गुण गाने- (जगत में यही असल) कमाई है। जो मनुष्य साध-संगति में आता है वह यह सदा-कायम रहने वाला फल पा लेता है। 15। 2। 19।
मारू महला 1 ॥ सचु कहहु सचै घरि रहणा ॥ जीवत मरहु भवजलु जगु तरणा ॥ गुरु बोहिथु गुरु बेड़ी तुलहा मन हरि जपि पारि लंघाइआ ॥1॥ हउमै ममता लोभ बिनासनु ॥ नउ दर मुकते दसवै आसनु ॥ ऊपरि परै परै अपरंपरु जिनि आपे आपु उपाइआ ॥2॥ गुरमति लेवहु हरि लिव तरीऐ ॥ अकलु गाइ जम ते किआ डरीऐ ॥ जत जत देखउ तत तत तुम ही अवरु न दुतीआ गाइआ ॥3॥ सचु हरि नामु सचु है सरणा ॥ सचु गुर सबदु जितै लगि तरणा ॥ अकथु कथै देखै अपरंपरु फुनि गरभि न जोनी जाइआ ॥4॥ सच बिनु सतु संतोखु न पावै ॥ बिनु गुर मुकति न आवै जावै ॥ मूल मंत्रु हरि नामु रसाइणु कहु नानक पूरा पाइआ ॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (हे भाई !) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरो। (सिमरन की बरकति से उस) सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में जगह मिली रहेगी। जीवन-यात्रा में विकारों के हमलों से बचे रहोगे। और संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएँगे। हे मन ! (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए) गुरू जहाज है। गुरू बेड़ी है। (गुरू की शरण पड़ कर) हरी-नाम जप। (जिस जिस ने नाम जपा है गुरू ने उसको) पार लंघा दिया है। 1। परमात्मा का नाम अहंकार ममता और लोभ का नाश करने वाला है। (नाम सिमरन की बरकति से) शरीर के नौ दरवाजों (गोलकों) के विषयों से निजात मिली रहती है। सुरति दसवें द्वार में टिकी रहती है (भाव। दसवें द्वार के द्वारा परमात्मा के साथ संबंध बना रहता है)। जिस परमात्मा ने अपने आप को (सृष्टि के रूप में) प्रकट किया है जो परे से परे है और बेअंत है वह उस दसम द्वार में प्रत्यक्ष हो जाता है। 2। (हे भाई !) गुरू की मति ग्रहण करो (गुरू की मति के द्वारा) परमात्मा में सुरति जोड़ने से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। (एक-रस व्यापक) अखण्ड प्रभू की सिफत-सालाह करने से जम से डरने की आवश्यक्ता नहीं रह जाती। (हे प्रभू ! यह आपके सिमरन के सदके ही है कि) मैं जिधर-जिधर देखता हूँ उधर-उधर आप ही आप दिखता है। मुझे आपके जैसा और कोई नहीं दिखाई देता। मैं आपकी उस्तति करता हूँ। 3। परमात्मा का नाम सदा-स्थिर रहने वाला है। उसका ओट-आसरा भी सदा-स्थिर रहने वाला है। गुरू का शबद (भी) सदा-स्थिर रहने वाला (वसीला) है। शबद में जुड़ के ही संसार-समुंद्र में से पार लांघा जा सकता है। परमात्मा का स्वरूप् बयान से परे है। जो मनुष्य उस परे से परे परमात्मा की सिफत-सालाह करता है वह उसके दर्शन कर लेता है। वह मनुष्य फिर गर्भ जोनि में नहीं आता। 4। सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरन के बिना (कोई मनुष्य दूसरों की) सेवा व संतोख (का आत्मिक गुण) प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू की शरण के बिना विकारों से खलासी नहीं मिलती। मनुष्य जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। हे नानक ! हरी का नाम सिमर जो सब मंत्रों का मूल है और सब रसों को श्रोत है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर नाम सिमरता है) उसको पूर्ण प्रभू मिल जाता है। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह सुजान प्रभू सब शरीरों में व्यापक होता हुआ भी माया के प्रभाव से परे है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।