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अंग 1039

अंग
1039
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तू दाता हम सेवक तेरे ॥
अंम्रित नामु क्रिपा करि दीजै गुरि गिआन रतनु दीपाइआ ॥6॥
पंच ततु मिलि इहु तनु कीआ ॥
आतम राम पाए सुखु थीआ ॥
करम करतूति अंम्रित फलु लागा हरि नाम रतनु मनि पाइआ ॥7॥
ना तिसु भूख पिआस मनु मानिआ ॥
सरब निरंजनु घटि घटि जानिआ ॥
अंम्रित रसि राता केवल बैरागी गुरमति भाइ सुभाइआ ॥8॥
अधिआतम करम करे दिनु राती ॥
निरमल जोति निरंतरि जाती ॥
सबदु रसालु रसन रसि रसना बेणु रसालु वजाइआ ॥9॥
बेणु रसाल वजावै सोई ॥
जा की त्रिभवण सोझी होई ॥
नानक बूझहु इह बिधि गुरमति हरि राम नामि लिव लाइआ ॥10॥
ऐसे जन विरले संसारे ॥
गुर सबदु वीचारहि रहहि निरारे ॥
आपि तरहि संगति कुल तारहि तिन सफल जनमु जगि आइआ ॥11॥
घरु दरु मंदरु जाणै सोई ॥
जिसु पूरे गुर ते सोझी होई ॥
काइआ गड़ महल महली प्रभु साचा सचु साचा तखतु रचाइआ ॥12॥
चतुर दस हाट दीवे दुइ साखी ॥
सेवक पंच नाही बिखु चाखी ॥
अंतरि वसतु अनूप निरमोलक गुरि मिलिऐ हरि धनु पाइआ ॥13॥
तखति बहै तखतै की लाइक ॥
पंच समाए गुरमति पाइक ॥
आदि जुगादी है भी होसी सहसा भरमु चुकाइआ ॥14॥
तखति सलामु होवै दिनु राती ॥
इहु साचु वडाई गुरमति लिव जाती ॥
नानक रामु जपहु तरु तारी हरि अंति सखाई पाइआ ॥15॥1॥18॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! हम जीव आपके दर के सेवक हैं। आप हम सबको दातें देने वाला है। कृपा करके हमें आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम दे। (जिसके ऊपर आप कृपा करता है) गुरू ने उसके ऊपर आपके ज्ञान का रत्न रौशन कर दिया है। 6। (सर्व-व्यापक परमात्मा की रजा में) पाँच तत्वों ने मिल के यह (मनुष्य का) शरीर बनाया। जिस मनुष्य ने उस सर्व-व्यापक प्रभू को पा लिया उसके अंदर आत्मिक आनंद बन गया। (परमात्मा के साथ संबंध बनाने वाले उसके) कामों को उसके उद्यम को वह नाम-फल लगा जिस ने उसको आत्मिक जीवन बख्शा। उसने अपने मन में ही परमात्मा का नाम-रतन पा लिया। 7। जिस मनुष्य का मन (परमात्मा की याद में) पतीज जाता है उसको माया की भूख-प्यास नहीं रहती। वह निरंजन को सब जगह हरेक घट में पहचान लेता है। वह आत्मिक जीवन देने वाले सिर्फ नाम-रस में ही मस्त रहता है। दुनिया के रसों से उपराम रहता है। गुरू की मति से परमात्मा के प्रेम में जुड़ के उसका आत्मिक जीवन सुंदर लगने लग जाता है। 8। वह मनुष्य दिन-रात वही कर्म करता है जो उसकी जिंद को परमात्मा के साथ जोड़े रखते हैं। वह परमात्मा की पवित्र ज्योति को हर जगह एक-रस पहचान लेता है। सब रसों के श्रोत गुरू-शबद को (वह अपने हृदय में बसाता है)। उसकी जीभ महान श्रेष्ठ रस नाम में (रसी) रहती है। वह (अपने अंदर आत्मिक आनंद की। मानो) एक रसीली बाँसुरी बजाता है। 9। पर यह रसीली बाँसुरी वही मनुष्य बजा सकता है जिसको तीन भवनों में व्यापक परमात्मा की सूझ पड़ जाती है। हे नानक ! आप भी गुरू की मति ले के यह सलीका सीख ले। जिस किसी ने भी गुरू की मति ली है उसकी सुरति परमात्मा के नाम में जुड़ी रहती है। 10। जगत में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिकाते हैं और (दुनियां में विचरते हुए भी माया के मोह से) निर्लिप रहते हैं। वह संसार-समुंद्र से खुद पार लांघ जाते हैं। अपनी कुलों को और उनको भी पार लंघा लेते हैं जो उनकी संगति करते हैं। जगत में ऐसे लोगों का आना लाभदायक है। 11। वही व्यक्ति परमात्मा का घर परमात्मा का दर परमात्मा का महल पहचान लेता है जिसको पूरे गुरू से (ऊँची) समझ मिलती है। उसको समझ आ जाती है कि ये शरीर परमात्मा के किले हैं महल हैं। वह महलों का मालिक प्रभू सदा-स्थिर रहने वाला है (मनुष्य का शरीर) उसने अपने बैठने के लिए तख़्त बनाया हुआ है। 12। यह बेमिसाल और अमूल्य नाम-धन हरेक शरीर महल के अंदर मौजूद है। अगर गुरू मिल जाए तो अंदर से ही यह धन प्राप्त हो जाता है। (जिनको यह नाम-धन मिल जाता है वह प्रभू के जाने-माने सेवक कहलवाते हैं) वह जाने-पहचाने सेवक (फिर) उस माया-जहर को नहीं चखते जो आत्मिक मौत लाती है (वे अटल आत्मिक जीवन के मालिक बन जाते हैं) चौदह लोक और चाँद व सूरज इस बात के गवाह हैं। 13। वह हृदय-तख़्त पर बैठने-योग्य हो जाता है और हृदय-तख़्त पर बैठा रहता है (भाव। ना उसकी ज्ञानेन्द्रियां माया की तरफ डोलती हैं ना ही उसका मन विकारों की ओर जाता है)। जो मनुष्य गुरू की मति पर चलता है उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसकी सेवक बन के उसके वश में रहती हैं। जो परमात्मा सृष्टि के आदि से भी पहले का है जुगों से भी आदि से है। अब भी मौजूद है और सदा के लिए कायम रहेगा वह परमात्मा गुरू की मति पर चलने वाले मनुष्य के अंदर प्रकट होकर उसका सहम और उसकी भटकना दूर कर देता है। 14। हृदय-तख़्त पर बैठे मनुष्य को दिन-रात आदर मिलता है। जिस मनुष्य ने गुरू की मति पर चल कर परमात्मा के चरणों के साथ लिव की सांझ डाल ली उसको ये आदर सदा के लिए मिला रहता है ये इज्जत सयदा के लिए मिली रहती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम जपो। (संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए सिमरन की) तैराकी तैरो। जो मनुष्य सिमरन करता है वह उस हरी को मिल जाता है जो आखिर तक साथी बना रहता है। 15। 1। 18।
मारू महला 1 ॥
हरि धनु संचहु रे जन भाई ॥
सतिगुर सेवि रहहु सरणाई ॥
तसकरु चोरु न लागै ता कउ धुनि उपजै सबदि जगाइआ ॥1॥
तू एकंकारु निरालमु राजा ॥
तू आपि सवारहि जन के काजा ॥
अमरु अडोलु अपारु अमोलकु हरि असथिर थानि सुहाइआ ॥2॥
देही नगरी ऊतम थाना ॥
पंच लोक वसहि परधाना ॥
ऊपरि एकंकारु निरालमु सुंन समाधि लगाइआ ॥3॥
देही नगरी नउ दरवाजे ॥
सिरि सिरि करणैहारै साजे ॥
दसवै पुरखु अतीतु निराला आपे अलखु लखाइआ ॥4॥
पुरखु अलेखु सचे दीवाना ॥
हुकमि चलाए सचु नीसाना ॥
नानक खोजि लहहु घरु अपना हरि आतम राम नामु पाइआ ॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे भाई जनो ! परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो (पर ये धन गुरू के बताए राह पर चलने से मिलता है। इस वास्ते) गुरू की बताई हुई सेवा करके गुरू की शरण में टिके रहो। (जो मनुष्य ये आत्मिक रास्ता पकड़ता है) उसको कोई (कामादिक) चोर नहीं लगता (कोई चोर उस पर अपना दाव नहीं लगा सकता क्योंकि) गुरू ने अपने शबद के द्वारा उसको जगा दिया है और उसके अंदर (नाम-सिमरन की) ध्वनि पैदा हुई रहती है। 1। हे प्रभू ! आप एक स्वयं ही स्वयं है। आपको किसी सहारे की आवश्यक्ता नहीं। आप सारी सृष्टि का राजा है। अपने सेवकों के काम आप खुद सवारता है। हे हरी ! आपको मौत नहीं छू सकती। आपको माया डुला नहीं सकती। आप बेअंत है। आपका मूल्य नहीं डाला जा सकता। आप ऐसी जगह शोभायमान है जो हमेशा कायम रहने वाला है। 2। मनुष्य का शरीर। मानो। एक शहर है। जिस-जिस शरीर-शहर में जाने-माने संत-जन रहते हैं। वह-वह शरीर-शहर (परमात्मा के बसने के लिए) श्रेष्ठ जगह है। जो परमात्मा सब जीवों के सिर पर रखवाला है। जो एक स्वयं ही स्वयं (अपने जैसा) है। जिसको और किसी आसरे-सहारे की आवश्यक्ता नहीं। वह परमात्मा (उस शरीर-शहर में। मानो) ऐसी समाधि लगाए बैठा है जिसमें कोई मायावी फुरने नहीं उठते। 3। सृजनहार प्रभू ने हरेक शरीर-शहर को नौ-नौ दरवाजे लगा दिए हैं (इन दरवाजों के द्वारा शरीर-शहर में बसने वाली जीवात्मा बाहरी दुनियां से अपना संबंध बनाए रखती है। एक दसवाँ दरवाजा भी है जिसके द्वारा परमात्मा और जीवात्मा का मेल होता है। उस) में वह परमात्मा खुद टिकता है जो सर्व-व्यापक है जो माया के प्रभाव से परे है। जो निर्लिप है जो अदृष्ट है। (पर जीव को अपना आप) वह स्वयं ही दिखाता है। 4। हरेक शरीर-शहर में रहने वाला परमात्मा ऐसा है कि उसका कोई चित्र नहीं बना सकता (वह सदा-स्थिररहने वाला है और) उस सदा-स्थिर प्रभू का दरबार भी सदा-स्थिर है। (जगत की सारी कार वह) अपने हुकम में चला रहा है (उसके हुकम का) परवाना अटल है। हे नानक ! (सर्व-व्यापक प्रभू हरेक शरीर-घर में मौजूद है) अपना हृदय-घर खोज के उसको ढूँढ लो। (जिस-जिस मनुष्य ने ये खोज-बीन की है) उसने उस सर्व-व्यापक प्रभू का नाम-धन हासिल कर लिया है। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! हम जीव आपके दर के सेवक हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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