हम दासन के दास पिआरे ॥ साधिक साच भले वीचारे ॥ मंने नाउ सोई जिणि जासी आपे साचु द्रिड़ाइदा ॥10॥ पलै साचु सचे सचिआरा ॥ साचे भावै सबदु पिआरा ॥ त्रिभवणि साचु कला धरि थापी साचे ही पतीआइदा ॥11॥ वडा वडा आखै सभु कोई ॥ गुर बिनु सोझी किनै न होई ॥ साचि मिलै सो साचे भाए ना वीछुड़ि दुखु पाइदा ॥12॥ धुरहु विछुंने धाही रुंने ॥ मरि मरि जनमहि मुहलति पुंने ॥ जिसु बखसे तिसु दे वडिआई मेलि न पछोताइदा ॥13॥ आपे करता आपे भुगता ॥ आपे त्रिपता आपे मुकता ॥ आपे मुकति दानु मुकतीसरु ममता मोहु चुकाइदा ॥14॥ दाना कै सिरि दानु वीचारा ॥ करण कारण समरथु अपारा ॥ करि करि वेखै कीता अपणा करणी कार कराइदा ॥15॥ से गुण गावहि साचे भावहि ॥ तुझ ते उपजहि तुझ माहि समावहि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती मिलि साचे सुखु पाइदा ॥16॥2॥14॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मैं प्यारे प्रभू के उन दासों का दास हूँ जो उसके मिलने के प्रयत्न करते रहते हैं जो उस सदा-स्थिर परमात्मा के गुणों की विचार करते हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपना मान लेता है (भाव। नाम-जपने को जीवन का उद्देश्य निश्चत कर लेता है) वह (जगत में से जीवन की बाज़ी) जीत के जाता है। (पर ये खेलें जीव के अपने वश की नहीं) परमात्मा स्वयं ही अपना सदा-स्थिर नाम जीवों के दिल में दृढ़ कराता है। 10। जिन मनुष्यों के पास चिर-स्थाई रहने वाला नाम है। वह उस सदा स्थ्रि प्रभू का रूप हो जाते हैं। वे चिर-स्थाई नाम के वनजारे हैं। जिस मनुष्य को प्रभू की सिफत-सालाह का शबद प्यारा लगता है वह सदा-स्थिर प्रभू को अच्छा लगता है। वह सदा-स्थिर प्रभू सारी सृष्टि में (व्यापक है)। उसने अपनी सक्ता दे के सृष्टि रची है। (सदा-स्थिर नाम का वाणज्य कराने वाले मनुष्य) उस सदा-स्थिर प्रभू की याद में ही खुश रहता है। 11। (वैसे तो) हरेक जीव कहता है कि परमात्मा सबसे बड़ा है पर सतिगुरू की शरण पड़े बिनाकिसी को सही समझ नहीं पड़ती। जो मनुष्य (गुरू से) सदा-स्थिर-प्रभू में जुड़ता है वह सदा-स्थिर-प्रभू को प्यारा लगता है। वह (उसके चरणों से विछुड़ता नहीं) विछुड़ के दुख नहीं पाता है। 12। पर जो लोग आदि से ही प्रभू से विछुड़े चले आ रहे हैं वे ढाहें मार-मार के रोते आ रहे हैं। जब-जब जिंदगी का समय समाप्त हो जाता है वे मरते हैं पैदा होते हैं। पैदा होते हैं मरते हैं (इस चक्कर में पड़े रहते हैं)। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है उसको (अपना नाम बख्श के) वडिआई देता है। उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह मनुष्य (दोबारा कभी नहीं विछुड़ता है) ना पछताता है। 13। प्रभू स्वयं ही सारे जगत को पैदा करने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं ही सारे पदार्थों को भोगने वाला है। फिर खुद ही इन भोगों से तृप्त हो जानें वाला है और खुद ही पदार्थों के मोह से स्वतंत्र हो जाने वाला है। प्रभू स्वयं ही मुक्ति का मालिक है। स्वयें ही विकारों से मुक्ति की दाति देता है। स्वयं ही जीवों के अंदर से माया की ममता और माया के मोह को दूर करता है। 14। वह जीवों को अपने गुणों की विचार बख्शता है और उसकी यह दाति उसकी और सब दातों से श्रेष्ठ है। परमात्मा इस जगत को रचने वाला है। सारी ताकतों का मालिक है और बेअंत है। सारी सृष्टि पैदा करके वह स्वयं ही इसकी संभाल करता है। और जीवों से वह कार करवाता है। जो कराने योग्य हो। 15। जो जीव सदा-स्थिर प्रभू को प्यारे लगते हैं वे उसके गुण गाते हैं। हे प्रभू ! सारे जीव-जंतु आपसे पैदा होते हैं और आपके में ही लीन हैं जाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य चिर-स्थाई-प्रभू को सिमरता है (उसके दर पर) विनतियाँ करता है। वह उस सदा-स्थिर परमात्मा को मिल के आत्मिक आनंद पाता है। 16। 2। 14।
मारू महला 1 ॥ अरबद नरबद धुंधूकारा ॥ धरणि न गगना हुकमु अपारा ॥ ना दिनु रैनि न चंदु न सूरजु सुंन समाधि लगाइदा ॥1॥ खाणी न बाणी पउण न पाणी ॥ ओपति खपति न आवण जाणी ॥ खंड पताल सपत नही सागर नदी न नीरु वहाइदा ॥2॥ ना तदि सुरगु मछु पइआला ॥ दोजकु भिसतु नही खै काला ॥ नरकु सुरगु नही जंमणु मरणा ना को आइ न जाइदा ॥3॥ ब्रहमा बिसनु महेसु न कोई ॥ अवरु न दीसै एको सोई ॥ नारि पुरखु नही जाति न जनमा ना को दुखु सुखु पाइदा ॥4॥ ना तदि जती सती बनवासी ॥ ना तदि सिध साधिक सुखवासी ॥ जोगी जंगम भेखु न कोई ना को नाथु कहाइदा ॥5॥ जप तप संजम ना ब्रत पूजा ॥ ना को आखि वखाणै दूजा ॥ आपे आपि उपाइ विगसै आपे कीमति पाइदा ॥6॥ ना सुचि संजमु तुलसी माला ॥ गोपी कानु न गऊ गोुआला ॥ तंतु मंतु पाखंडु न कोई ना को वंसु वजाइदा ॥7॥ करम धरम नही माइआ माखी ॥ जाति जनमु नही दीसै आखी ॥ ममता जालु कालु नही माथै ना को किसै धिआइदा ॥8॥ निंदु बिंदु नही जीउ न जिंदो ॥ ना तदि गोरखु ना माछिंदो ॥ ना तदि गिआनु धिआनु कुल ओपति ना को गणत गणाइदा ॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (जगत की रचना से पहले बेअंत समय जिसकी गिनती के वास्ते) अरबद नरबद (शब्द भी नहीं बरते जा सकते। ऐसे) घोर अंधेरे की हालत थी (भाव। ऐसे हालात थे) जिसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। तब ना धरती थी। ना आकाश था। ना ही कहीं बेअंत प्रभू का हुकम चल रहा था। तब ना दिन था। ना रात थी। ना चाँद था। ना सूरज था। तब परमात्मा अपने आप में ही (माना ऐसी) समाधि लगाए बैठा था जिसमें कोई किसी किस्म का फुरना नहीं था। 1। जब ना जगत-रचना की चार-खाणियाँ थीं ना जीवों की चार बाणियाँ थीं। तब ना हवा थी। ना पानी था। ना उत्पक्ति थी ना पर्लय था। ना जन्म था ना मरना था। तब ना धरती के नौ-खण्ड थे ना पाताल था। ना सात-समुंद्र थे ना ही नदियों में पानी बह रहा था। 2। तब ना स्वर्ग-लोक था। ना मातृ-लोक था और ना ही पाताल था। तब ना कोई दोज़क था ना बहिश्त था। ना ही मौत लाने वाला काल था। तब ना स्वर्ग था ना नर्क था। ना जनम था ना मरण था। ना कोई पैदा होता था ना कोई मरता था। 3। तब ना कोई ब्रहमा था ना विष्णू था और ना ही शिव था। तब एक परमात्मा ही परमात्मा था। और कोई व्यक्ति नहीं था दिखता। तब ना कोई स्त्री था ना ही कोई मर्द था तब ना कोई जाति थी ना ही किसी जाति में कोई जन्म लेता था। ना कोई दुख भोगने वाला जीव ही था। 4। तब ना कोई जती था ना कोई सती था ना ही कोई त्यागी था। तब ना कोई सिद्ध था ना साधिक थे और ना ही कोई गृहस्ती था। तब ना कोई जोगियों का ना जंगमों का भेष था। ना ही कोई जोगियों का गुरू कहलवाने वाला था। 5। तब ना कहीं जप हो रहे थे ना तप हो रहे थे। ना कहीं संजम साधे जा रहे थे ना व्रत रखे जा रहे थे ना ही पूजा की जा रही थी। तब कोई ऐसा जीव नहीं था जो परमात्मा के बिना किसी और का जिक्र कर सकता। तब परमात्मा खुद ही अपने आप में प्रकट हैं के खुश हैं रहा था और अपने बड़प्पन का मूल्य खुद ही डालता था। 6। तब ना कहीं स्वच्छता रखी जा रही थी। ना कहीं कोई संजम किया जा रहा था। ना कहीं तुलसी की माला थी। तब ना कहीं कोई गोपी था ना कोई कान्हा था। ना कोई गऊ थी ना गऊऔं का (रखवाला) ग्वाला था। तब ना कोई तंत्र-मंत्र आदि पाखण्ड था ना ही कोई बाँसुरी बजा रहा था। 7। तब ना कहीं धार्मिक कर्म-काण्ड ही थे ना कहीं मीठी माया थी। तब ना कहीं कोई (ऊँची-नीची) जाति थी और ना ही किसी जाति में कोई जन्म लेता आँखों से देखा जा सकता था। तब ना कहीं माया थी ना ममता का जाल था। ना कहीं किसी के सिर पर काल (कूकता था)। ना कोई जीव किसी का सिमरन-ध्यान धरता था। 8। तब ना कहीं निंदा थी ना खुशामद थी। ना कोई जीवात्मा थी ना कोई जिंद थी। तब ना गोरख था ना माछिन्द्र नाथ था। तब ना कहीं (धार्मिक पुस्तकों की) ज्ञान-चर्चा थी ना कहीं समाधि-स्थित ध्यान था। तब ना कहीं कुलों की उत्पक्ति थी और ना ही कोई (अच्छी कुल में पैदा होने का) मान करता था। 9।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं प्यारे प्रभू के उन दासों का दास हूँ जो उसके मिलने के प्रयत्न करते रहते हैं जो उस सदा-स्थिर परमात्मा के गुणों की विचार करते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।