अनहदु वाजै भ्रमु भउ भाजै ॥ सगल बिआपि रहिआ प्रभु छाजै ॥ सभ तेरी तू गुरमुखि जाता दरि सोहै गुण गाइदा ॥10॥ आदि निरंजनु निरमलु सोई ॥ अवरु न जाणा दूजा कोई ॥ एकंकारु वसै मनि भावै हउमै गरबु गवाइदा ॥11॥ अंम्रितु पीआ सतिगुरि दीआ ॥ अवरु न जाणा दूआ तीआ ॥ एको एकु सु अपर परंपरु परखि खजानै पाइदा ॥12॥ गिआनु धिआनु सचु गहिर गंभीरा ॥ कोइ न जाणै तेरा चीरा ॥ जेती है तेती तुधु जाचै करमि मिलै सो पाइदा ॥13॥ करमु धरमु सचु हाथि तुमारै ॥ वेपरवाह अखुट भंडारै ॥ तू दइआलु किरपालु सदा प्रभु आपे मेलि मिलाइदा ॥14॥ आपे देखि दिखावै आपे ॥ आपे थापि उथापे आपे ॥ आपे जोड़ि विछोड़े करता आपे मारि जीवाइदा ॥15॥ जेती है तेती तुधु अंदरि ॥ देखहि आपि बैसि बिज मंदरि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती हरि दरसनि सुखु पाइदा ॥16॥1॥13॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: (उस गुरमुख के हृदय में) एक-रस (सिफत सालाह का बाजा बजता रहता है। उसके अंदर से) भटकनें और डर-सहम दूर हो जाते हैं (उसको प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा सारे संसार में मौजूद है और सब पर (अपनी रक्षा की) छाया कर रहा है। हे प्रभू ! यह सारी रचना आपकी है (और आप ही इसकी रक्षा करने वाला है) – (‘सफल बिरख’ गुरू से नाम-फल प्राप्त करने वाला) गुरमुख ये बात समझ लेता है। वह गुरमुख आपके गुण गाता है और आपके दर पर शोभा पाता है। 10। उस गुरमुख ने जान लिया है कि वह पवित्र स्वरूप परमात्मा ही सारी सृष्टि का आदि है और माया के प्रभाव से ऊपर है। उस जैसा दूसरा और कोई नहीं। उस गुरमुख के मन में वही एक अकाल-पुरख बसता है और मन को प्यारा लगता है (इसकी बरकति से वह अपने अंदर से) हउमै-अहंकार दूर कर लेता है। 11। जिस गुरमुख को सतिगुरू नें नाम-अमृत दिया उसने लेकर पीया उसको जगत में कहीं भी परमात्मा के बिना और कोई दूसरा नहीं दिखता। (उसके अंदर कोई मेर-तेर नहीं रह जाती)। (उस गुरमुख को निष्चय हो जाता है कि हर जगह) एक ही एक अपर-अपार परमात्मा स्वयं ही है। वह खुद ही (जीवों के कर्मों को) परख के (और पसंद करके उनको) अपने खजाने में मिला लेता है। 12। हे गहरे और बड़े जिगरे वाले ! आपके साथ जान-पहचान डालनी और आपके चरणों में जुड़ना ही सदा-स्थिर रहने वाला (उद्यम) है। (आप एक ऐसा बेअंत समुंद्र है कि) आपके पसारे को कोई समझ नहीं सकता। जितनी भी सृष्टि है ये सारी की सारी आपसे ही (हरेक पदार्थ) माँगती है। वह ही जीव कुछ प्राप्त करता है जिसको आपकी बख्शिश से कुछ मिलता है। 13। हे बेपरवाह प्रभू ! (लोग अपनी-अपनी समझ के अनुसार धार्मिक निहित कर्म करते हैं। पर) आपके सदा-स्थिर-नाम का सिमरन ही असल धर्म है। और यह नाम आपके कभी ना समाप्त होने वाले खजाने में मौजूद है। हे प्रभू ! आप सदा दया का कृपा का घर है। सब का मालिक (प्रभू) है। आप खुद ही (अपने खजाने में से यह दाति दे के) अपनी संगति में मिला लेता है। 14। प्रभू स्वयं ही (जीवों की) संभाल करके स्वयं ही (जीवों को) अपने दर्शन कराता है। खुद ही पैदा करता है खुद नाश करता है। करतार स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही (चरणों से) विछोड़ता है। स्वयं ही (किसी को) आत्मिक मौत मारता है। स्वयं ही आत्मिक जीवन देता है। 15। ये जितनी भी सृष्टि है सारी की सारी आपके हुकम के अंदर चल रही है। आप अपने सदा-स्थिर महल में बैठ के खुद ही सबकी संभाल कर रहा है। हे हरी ! आपका दास नानक आपका चिर-स्थाई नाम सिमरता है (आपके दीदार के लिए आपके दर पर) विनती करता है (जिसको आपका दीदार नसीब होता है। वह उस) दीदार की बरकति से आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 16। 1। 13।
मारू महला 1 ॥ दरसनु पावा जे तुधु भावा ॥ भाइ भगति साचे गुण गावा ॥ तुधु भाणे तू भावहि करते आपे रसन रसाइदा ॥1॥ सोहनि भगत प्रभू दरबारे ॥ मुकतु भए हरि दास तुमारे ॥ आपु गवाइ तेरै रंगि राते अनदिनु नामु धिआइदा ॥2॥ ईसरु ब्रहमा देवी देवा ॥ इंद्र तपे मुनि तेरी सेवा ॥ जती सती केते बनवासी अंतु न कोई पाइदा ॥3॥ विणु जाणाए कोइ न जाणै ॥ जो किछु करे सु आपण भाणै ॥ लख चउरासीह जीअ उपाए भाणै साह लवाइदा ॥4॥ जो तिसु भावै सो निहचउ होवै ॥ मनमुखु आपु गणाए रोवै ॥ नावहु भुला ठउर न पाए आइ जाइ दुखु पाइदा ॥5॥ निरमल काइआ ऊजल हंसा ॥ तिसु विचि नामु निरंजन अंसा ॥ सगले दूख अंम्रितु करि पीवै बाहुड़ि दूखु न पाइदा ॥6॥ बहु सादहु दूखु परापति होवै ॥ भोगहु रोग सु अंति विगोवै ॥ हरखहु सोगु न मिटई कबहू विणु भाणे भरमाइदा ॥7॥ गिआन विहूणी भवै सबाई ॥ साचा रवि रहिआ लिव लाई ॥ निरभउ सबदु गुरू सचु जाता जोती जोति मिलाइदा ॥8॥ अटलु अडोलु अतोलु मुरारे ॥ खिन महि ढाहे फेरि उसारे ॥ रूपु न रेखिआ मिति नही कीमति सबदि भेदि पतीआइदा ॥9॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे सदा-स्थिर (चिर-स्थाई) प्रभू ! अगर मैं आपको अच्छा लगूँ। तो ही आपके दर्शन कर सकता हूँ। और आपके प्रेम में (जुड़ के) आपकी भक्ति (कर सकता हूँ। तथा) आपके गुण गा सकता हूँ। हे करतार ! जो लोग आपको प्यारे लगते हैं उन्हें आप प्यारा लगता है। आप स्वयं ही उनकी जीभ में (अपने नाम का) रस पैदा करता है। 1। हे प्रभू ! आपके भगत आपके दरबार में सुंदर लगते हैं। हे हरी ! आपके दास (माया के बँधनों से) स्वतंत्र हैं जाते हैं। वे स्वै भाव मिटा के आपके नाम-रंग में रंगे रहते हैं। और हर रोज (हर समय) आपका नाम सिमरते हैं। 2। शिव। ब्रहमा अनेकों देवी-देवते। इन्द्र देवता। तपी लोग। ऋषि-मुनि -ये सब आपकी ही सेवा-भगती करते हैं (भाव। चाहे ये कितने ही बड़े गिने जाएं। पर आपके सामने ये आपके साधारण से सेवक हैं)। अनेकों जतधारी। और अनेकों ही बनों में बसने वाले त्यागी (आपके गुण गाते हैं। पर आपके गुणों का) कोई भी अंत नहीं पा सकता। 3। जब तक परमात्मा स्वयं समझ ना बख्शे कोई जीव (परमात्मा की भगती करने की) सूझ प्राप्त नहीं कर सकता। परमात्मा जो कुछ करता है अपनी रजा में (अपनी मर्जी से) करता है। परमात्मा ने चौरासी लाख जूनियों में जीव पैदा किए हैं। वह अपनी मर्जी से ही इन जीवों को साँस लेने देता है (इनको जीवित रखता है)। 4। (जगत में) वही कुछ अवश्य होता है जो उस करतार को अच्छा लगता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस अस्लियत को नहीं समझता। वह) अपने आप को बड़ा जताता है (और अहंकार में ही) दुखी होता है। परमात्मा के नाम से टूटा हुआ (मनमुख) कहीं आत्मिक शांति का ठिकाना नहीं पा सकता। पैदा होता है मरता है। पैदा होता है मरता है। और (इस चक्कर में ही) दुख पाता है। 5। वह शरीर पवित्र है जिस में पवित्र (जीवन वाली) जीवात्मा बसती है (क्योंकि) उस (शरीर) में परमात्मा का नाम बसता है। (वह जीवात्मा सही अर्थों में) माया-रहित प्रभू का अंश है। प्रभू के नाम-अमृत की बरकति से वह मनुष्य अपने सारे दुख मिटा लेता है। और दोबारा वह कभी दुख नहीं पाता। 6। बहुत ज्यादा (भोगों के) स्वादों से दुख ही मिलता है (क्योंकि) भोगों से (आखिर) रोग पैदा होते हैं और आखिर में मनुष्य दुखी होता है। (माया की) खुशियों से भी चिंता ही पैदा होती है जो कभी नहीं मिटती। परमात्मा की रज़ा में चले बिना मनुष्य भटकना में पड़ा रहता है। 7। चिर-स्थाई रहने वाला परमात्मा सारी सृष्टि में गुप्त व्यापक है। पर इस बात से वंचित रह के सारी दुनिया भटक रही है। जिस मनुष्य ने गुरू का शबद। जो निर्भयता देने वाला है। अपने हृदय में बसाया है उसने सदा-स्थिर प्रभू को सदार सृष्टि में बसता पहचान लिया है। गुरू का शबद उसकी सुरति को परमात्मा की ज्योति में मिला देता है। 8। मुर (आदि दैत्यों) का वैरी परमात्मा (मुरारी) चिर-स्थाई रहने वाला है। माया के मोह में कभी डोलने वाला नहीं। उसका स्वरूप कभी तोला-नापा नहीं जा सकता। वह (अपने रचे हुए जगत को) एक छिन में गिरा सकता है और दोबारा पैदा कर सकता है। उसका कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता। उसके कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं कहे जा सकते। वह कितना बड़ा है और कैसा है- ये भी बयान से परे है। जो मनुष्य (अपने मन को गुरू के) शबद में भेद लेता है वह उस परमात्मा (की याद) में पतीज जाता है। 9।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(उस गुरमुख के हृदय में) एक-रस (सिफत सालाह का बाजा बजता रहता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।