Lulla Family

अंग १०३६ · मारू

अंग
1036
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥
  2. आपे आपु उपाइ निराला ॥

वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥

अंग १०३५ से चला आ रहा अंश

वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥
देउ न देहुरा गऊ गाइत्री ॥
होम जग नही तीरथि नावणु ना को पूजा लाइदा ॥10॥
ना को मुला ना को काजी ॥
ना को सेखु मसाइकु हाजी ॥
रईअति राउ न हउमै दुनीआ ना को कहणु कहाइदा ॥11॥
भाउ न भगती ना सिव सकती ॥
साजनु मीतु बिंदु नही रकती ॥
आपे साहु आपे वणजारा साचे एहो भाइदा ॥12॥
बेद कतेब न सिंम्रिति सासत ॥
पाठ पुराण उदै नही आसत ॥
कहता बकता आपि अगोचरु आपे अलखु लखाइदा ॥13॥
जा तिसु भाणा ता जगतु उपाइआ ॥
बाझु कला आडाणु रहाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए माइआ मोहु वधाइदा ॥14॥
विरले कउ गुरि सबदु सुणाइआ ॥
करि करि देखै हुकमु सबाइआ ॥
खंड ब्रहमंड पाताल अरंभे गुपतहु परगटी आइदा ॥15॥
ता का अंतु न जाणै कोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
नानक साचि रते बिसमादी बिसम भए गुण गाइदा ॥16॥3॥15॥

हिन्दी अर्थ: तब ना कोई ब्राहमण खत्री आदि वर्ण थे ना कहीं जोगी-जंगम आदि भेख थे। तब ना कोई देवता था ना ही देवताओं के मन्दिर थे। तब ना कोई गऊ थी ना कहीं गायत्री थी। ना कहीं हवन थे ना यज्ञ हो रहे थे। ना कहीं तीर्थों का स्नान था और ना कोई (देव-) पूजा कर रहा था। 10। तब ना कोई मौलवी था ना काज़ी था। ना कोई शेख था ना हाज़ी था। तब ना कहीं प्रजा थी ना कोई राजा था। ना कहीं दुनियावी अहंकार था। ना ही कोई इस तरह की बातें ही करने वाला था। 11। तब ना कहीं प्रेम था ना कहीं भक्ति थी। ना कहीं जड़ था ना चेतन्न था। ना कहीं कोई सज्जन था ना मित्र था। ना कहीं पिता का वीर्य था ना माता का रक्त ही था। तब परमात्मा स्वयं ही शाह था स्वयं ही शाहूकार (वणज करने वाला)। तब उस सदा-स्थिर प्रभू को यही कुछ अच्छा लगता था। 12। तब ना कहीं शास्त्र-स्मृतियाँ और वेद थे। ना कहीं कुरान अंजील आदि पश्चिमी पुस्तकें थीं। तब कहीं पुराणों का पाठ भी नहीं थे। तब ना कहीं सूरज का चढ़ना था ना डूबना था। तब ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाला परमात्मा खुद ही बोलने-चालने वाला था। खुद ही अदृश्य था। और खुद ही अपने आप को प्रकट करने वाला था। 13। जब उस परमात्मा को अच्छा लगा तब उसने जगत पैदा कर दिया। इस सारे जगत-पसारे को उसने (किसी दिखाई देते) सहारे के बिना ही (अपनी-अपनी जगह) टिका दिया। तब उसने ब्रहमा विष्णू और शिव भी पैदा कर दिए। (जगत में) माया का मोह भी बढ़ा दिया। 14। जिस किसी विरले व्यक्ति को गुरू ने उपदेश सुनाया (उसे ये समझ आ गई कि) परमात्मा जगत पैदा करके खुद ही संभाल कर रहा है। हर जगह उसका ही हुकम चल रहा है। उस परमात्मा ने स्वयं ही खंड-ब्रहमंड पाताल आदिक बनाए हैं और वह स्वयं ही गुप्त अवस्था से प्रकट हुआ है। 15। कोई भी जीव परमात्मा की ताकत का अंत नहीं जान सकता। पूरे गुरू के माध्यम से ये समझ आ जाती है हे नानक ! जो लोग उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (के नाम-रंग) में रंगे जाते हैं वह (उसकी बेअंत ताकत और करिश्मे देख-देख के) हैरान ही हैरान होते हैं और उसके गुण गाते रहते हैं। 16। 3। 15।

आपे आपु उपाइ निराला ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मारू महला 1 ॥
आपे आपु उपाइ निराला ॥
साचा थानु कीओ दइआला ॥
पउण पाणी अगनी का बंधनु काइआ कोटु रचाइदा ॥1॥
नउ घर थापे थापणहारै ॥
दसवै वासा अलख अपारै ॥
साइर सपत भरे जलि निरमलि गुरमुखि मैलु न लाइदा ॥2॥
रवि ससि दीपक जोति सबाई ॥
आपे करि वेखै वडिआई ॥
जोति सरूप सदा सुखदाता सचे सोभा पाइदा ॥3॥
गड़ महि हाट पटण वापारा ॥
पूरै तोलि तोलै वणजारा ॥
आपे रतनु विसाहे लेवै आपे कीमति पाइदा ॥4॥
कीमति पाई पावणहारै ॥
वेपरवाह पूरे भंडारै ॥
सरब कला ले आपे रहिआ गुरमुखि किसै बुझाइदा ॥5॥
नदरि करे पूरा गुरु भेटै ॥
जम जंदारु न मारै फेटै ॥
जिउ जल अंतरि कमलु बिगासी आपे बिगसि धिआइदा ॥6॥
आपे वरखै अंम्रित धारा ॥ रतन जवेहर लाल अपारा ॥
सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ प्रेम पदारथु पाइदा ॥7॥
प्रेम पदारथु लहै अमोलो ॥
कब ही न घाटसि पूरा तोलो ॥
सचे का वापारी होवै सचो सउदा पाइदा ॥8॥
सचा सउदा विरला को पाए ॥
पूरा सतिगुरु मिलै मिलाए ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (परमात्मा) आप ही अपने आप को (जगत के रूप में) पैदा करके (माया के मोह से) निर्लिप (भी) रहता है। सदा स्थिर दयालु प्रभू इस शरीर को (अपने रहने के लिए) जगह बनाता है। हवा पानी आग (आदि तत्वों) का मेल करके वह परमात्मा शरीर-किला रचता है 1। बनाने की ताकत रखने वाले प्रभू ने इस शरीर के नौ घर (कर्म-इन्द्रिए) बनाए हैं। दसवें घर (दसम द्वार) में उस अदृश्य और बेअंत प्रभू की रिहायश है। (जीव माया के मोह में फस के अपने आप को मलीन कर लेते हैं। पर) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसका मन और उसकी बुद्धि - यह सातों ही सरोवर प्रभू के नाम के पवित्र जल से भरे रहते हैं। इसलिए उसको माया की मैल नहीं लगती। 2। इन सूरज। चँद्रमा (आदि) दीयों में सारी सृष्टि में उसकी अपनी ही ज्योति (रौशनी कर रही) है। परमात्मा स्वयं ही सूरज चँद्रमा (जगत के) दीए बना के अपनी वडिआई (महानता) देखता है। वह प्रभू सदा प्रकाश ही प्रकाश है। वह सदा (जीवों को) सुख देने वाला है। जो जीव उसका रूप हो जाता है उसको प्रभू स्वयं शोभा देता है। 3। (प्रभू के रचे हुए इस शरीर-) किले में (ज्ञान-इन्द्रियाँ जैसे) शहर की हाट हैं जहाँ (प्रभू स्वयं ही) व्यापार कर रहा है। (प्रभू का नाम ही एक ऐसा तोल है जिसके द्वारा किए हुए वणज में कोई घाटा नहीं पड़ता। इस) पूरे तोल द्वारा प्रभू-वणजारा (शरीर-किले में बैठ के) स्वयं ही नाम-सौदा (वॅखर) तौलता है। आप ही नाम-रत्न का व्यापार करता है। आप ही नाम रतन का (ठीक) मूल्य डालता है। 4। कद्र समझने वाला प्रभू अपने नाम-रतन की कद्र पा रहा है। (जिसको ये समझ देता है वह) उस बेपरवाह परमात्मा के भरे खजाने में से नाम-रतन प्राप्त करता है। प्रभू किसी (विरले भाग्यशाली) को गुरू के माध्यम से ये समझ बख्शता है कि वह स्वयं ही अपनी सारी सक्ता (अपने अंदर) रख के सब जीवों में व्याप रहा है 5। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है उसको पूरा सतिगुरू मिल जाता है। ज़ालिम जम उस को कोई चोट नहीं पहुँचाता। जैसे पानी में कमल का फूल खिलता है (निर्लिप रहता है) वैसे प्रभू स्वयं ही उस मनुष्य के अंदर खिल के (अपने आप को) सिमरता है। 6। (जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है उसके अंदर प्रभू) स्वयं ही नाम-अमृत की धाराओं की बरखा करता है। जिसमें प्रभू के बेअंत गुण-रूप रतन जवाहर और लाल होते हैं। गुरू मिल जाए तो पूरा प्रभू मिल जाता है। (जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा पूरा परमात्मा मिलता है वह) प्रभू-प्रेम का अमूल्य सौदा प्राप्त कर लेता है। 7। (गुरू की शरण पड़ कर) जो मनुष्य प्रभू-प्रेम का कीमती सौदा हासिल कर लेता है। उसका ये सौदा कम नहीं होता। (जब कभी भी तौला जाए उसका) तोल पूरा ही निकलेगा (भाव। माया के भले ही कई कमले हों। उसके अंदर बसा हुआ प्रभू-चरणों के प्रति प्रेम डोलता नहीं)। जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम का व्यापार करने लग जाता है। वह इस सदा-स्थिर नाम का सौदा ही लादता है। 8। (पर जगत में) कोई विरला व्यक्ति सदा-स्थिर रहने वाला यह सौदा प्राप्त करता है। जिसको पूरा सतिगुरू मिल जाता है गुरू उसको यह सौदा दिला देता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1036 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०३६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English