सभु को बोलै आपण भाणै ॥ मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥ अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥11॥ दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥ दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥ दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥12॥ सची करणी गुर की सिरकारा ॥ आवणु जाणु नही जम धारा ॥ डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥13॥ हरि के लोग नही जमु मारै ॥ ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥ राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥14॥ ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥ जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥ दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥15॥ किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥ अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥ नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥16॥6॥12॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला हरेक मनुष्य प्रभू के बिना और आसरे की झाक में अपने स्वार्थ के स्वभाव में ही (सब वचन) बोलता है। (परमात्मा की सिफत-सालाह के बोल) बोलना नहीं जानता। माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य की बुद्धि अंधी व बहरी हो जाती है (उसको ना कहीं परमात्मा दिखता है। ना ही उसकी सिफत-सालाह वह सुनता है)। उसको जनम-मरण के चक्करों में दुख मिलता रहता है। 11। मनमुख मनुष्य दुखों में ग्रसित हुआ पैदा होता है (सारी उम्र दुख सह-सह के) दुखों में ही मरता है। गुरू की शरण पड़े बिना (ये जन्म-जन्मांतरों का लंबा) दुख मिट नहीं सकता। दुखों में पैदा होता और दुखों में ही मरता है। सदाचारी आत्मिक जीवन ना ही ले के यहाँ आता है। ना ही यहाँ से ले के जाता है। 12। गुरू की अगुवाई में चलना ही सही जीवन-रास्ता है। इस तरह जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। आत्मिक मौत के रास्ते से भी बचा जाता है। जो मनुष्य (गुरू की रहनुमाई में) टहनियों को छोड़ कर मूल को पहचान लेता है (प्रभू की रची हुई माया का मोह छोड़ कर सृजनहार प्रभू के साथ जान-पहचान बनाता है) उसके मन में सदा-स्थिर रहने वाला उत्साह पैदा हो जाता है। 13। जो लोग परमात्मा के सेवक बनते हैं उनको जम नहीं मार सकता (आत्मिक मौत नहीं मार सकती)। वह (आत्मिक मौत के) कठिन रास्ते पर (नहीं पड़ते और) दुख नहीं देखते। उनके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है (वे अंतरात्मे परमात्मा की) भगती करते हैं। उनको (माया का) कोई और बखेड़ा नहीं होता। 14। हे प्रभू ! आपके भगत जैसे आपको अच्छे लगते हैं आपकी रजा में रहते हैं। वे आपकी सुंदर सिफतें करते रहते हैं उनके इस उद्यम का खात्मा नहीं होता। हे सदा-स्थिर रहने वाले पातशाह ! आपके हुकम के अनुसार वे आपकी हजूरी में सम्मान-सहित आसानी से पहुँचते हैं। 15। हे प्रभू ! अनेकों ही जीव आपके गुण कथन करते हैं। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। (दुनिया में) बड़े-बड़े (देवते आदि कहलवाने वाले भी) आपके गुणों का अंत नहीं पा सकते। हे प्रभू ! आप पातशाहों के सिर पर भी पातशाह है (मेरी अरदास है) मुझे नानक को आपका सदा-स्थिर रहने वाला नाम मिल जाए। मेरी लाज रख। 16। 6। 12।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: {पन्ना 1033-1मारू दखणी-दखणी किस्म की मारू रागिनी।॥ (लोग अपने बसने के लिए शहर बसाते हैं और रक्षा के लिए किले बनाते हैं। इन) शहरों और किलों (की गिनती) में (मनुष्य का) शरीर भी एक शहर है (ये शहर परमात्मा ने अपने बसने के लिए बसाया है)। इस शरीर में इसके दसम-द्वार में प्रभू का सदा-स्थिर निवास है। वह परमात्मा पवित्र-स्वरूप है। उसका ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। वह स्वयं ही अपने आप को (शरीरों के रूप में) प्रकट करता है। 1। इस (शरीर-) किले के अंदर ही। मानो। छॅजे और बाजार हैं जिनमें प्रभू खुद ही सौदा खरीदता है और संभालता है। (माया के मोह के) मजबूत किवाड़ भी अंदर जड़े हुए हैं। परमात्मा खुद ही ये किवाड़ बंद करने जानता है और खुद ही गुरू-शबद में (जीव को जोड़ के किवाड़) खुला देता है। 2। इस (शरीर) किले गुफा में परमात्मा की रिहायश की जगह है। रज़ा के मालिक प्रभू ने अपने हुकम में ही (इस किले में) नौ घर बना दिए हैं (जो प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं)। दसवें घर में (जो गुप्त है) सर्व-व्यापक लेखे से रहित और बेअंत प्रभू खुद बसता है। वह अदृश्य प्रभू स्वयं ही अपने आप के दर्शन करवाता है। 3। (इस शरीर में उसने) हवा। पानी। आग (आदि तत्वों) को एक साथ बसा दिया है। (जगत रचना का) यह खेल और तमाश उसने खुद ही रचा हुआ है। जो जलती हुई आग उसकी कृपा से पानी से बुझ जाती है वही आग (बड़वा अग्नि) उसने समुंद्र में टिका रखी है। 4। धरती पैदा करके परमात्मा ने इसको धर्म कमाने की स्थली बना दी है। जगत की उत्पक्ति और प्रलय करने वाला परमात्मा स्वयं ही है। पर खुद इस उत्पक्ति और प्रलय से निर्लिप रहता है। हर जगह (भाव। सब जीवों में) उसने श्वासों की खेल रची हुई है (भाव। श्वासों के आसरे जीव जीवित रखे हुए हैं)। खुद ही (इन श्वासों की) ताकत खींच के (निकाल के शरीरों की खेल को) गिरा देता है। 5। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति (आपके आगे फूल भेटा करने वाली) आपकी मालिन है (जो हवा) फेरियाँ लेती है (भाव। हर तरफ चलती है। उस) वायु का (मानो) चवर (आपके ऊपर) झूल रहा है। (अपने जगत-महल में) तूने खुद ही चाँद और सूरज (मानो) दो दीए (जला) रखे हैं। चँद्रमा के घर में सूरज समाया हुआ है (सूरज की किरणें चँद्रमा में पड़ कर चँद्रमा को रौशनी दे रही हैं)। 6। उनकी (ज्ञानेन्द्रियाँ) पक्षी उड़ के बाहर (विकारों की ओर) दौड़ते नहीं फिरते। गुरू (मानो) फल देने वाला वृक्ष है (इस वृक्ष से जो) गुरमुख आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला जीव-पक्षी आत्मिक अडोलता में रह कर नाम सिमरता है और प्रभू के गुण गाता है। प्रभू स्वयं ही उसको अपना नाम-रस (रूपी) चोग चुगाता है। 7। (‘सफल बिरख’ अर्थात सफल वृक्ष गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करने वाले गुरमुख के अंदर आत्म-प्रकाश पैदा होता है जो) ऐसा झिलमिल-झिलमिल करके चमकता है कि उसकी चमक तक ना चाँद। ना कोई तारा। ना सूरज की किरण। और ना ही आकाश की बिजली पहुँच सकती है (बराबरी कर सकती है)। (मैं उस प्रकाश का) बयान तो कर रहा हूँ (पर वह प्रकाश) बयान से बाहर है उसका कोई निशान नहीं दिया जा सकता। (जिस मनुष्य के अंदर वह प्रकाश अपना) ज़हूर करता है उसके मन को वह बहुत भाता है। 8। (जिस मनुष्य के अंदर ‘सफल बिरख’ गुरू की मेहर से) ईश्वरीय ज्योति की किरण प्रकाशमान होती है उसके अंदर (आत्मिक) रौशनी होती है। दया का श्रोत प्रभू स्वयं ही यह करिश्मे कर कर के देखता है। (उस गुरमुख के अंदर। मानो) एक-रस मीठी-मीठी सुर वाला गीत चल पड़ता है जिसकी धुनि सदा (उसके अंदर जारी रहती है)। (वह गुरमुख अपने अंदर। मानो। ऐसा साज़) बजाने लग जाता है (जिसकी बरकति से) वह निडरता के आत्मिक ठिकाने में (टिक जाता है)। 9।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मन के पीछे चलने वाला हरेक मनुष्य प्रभू के बिना और आसरे की झाक में अपने स्वार्थ के स्वभाव में ही (सब वचन) बोलता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।