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अंग १०३३ · मारू

अंग
1033
मारू
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  1. सभु को बोलै आपण भाणै ॥
  2. काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥

सभु को बोलै आपण भाणै ॥

अंग १०३२ से चला आ रहा अंश

सभु को बोलै आपण भाणै ॥
मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥
अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥11॥
दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥
दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥
दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥12॥
सची करणी गुर की सिरकारा ॥
आवणु जाणु नही जम धारा ॥
डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥13॥
हरि के लोग नही जमु मारै ॥
ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥
राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥14॥
ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥
जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥
दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥15॥
किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥
अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥
नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥16॥6॥12॥

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला हरेक मनुष्य प्रभू के बिना और आसरे की झाक में अपने स्वार्थ के स्वभाव में ही (सब वचन) बोलता है। (परमात्मा की सिफत-सालाह के बोल) बोलना नहीं जानता। माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य की बुद्धि अंधी व बहरी हो जाती है (उसको ना कहीं परमात्मा दिखता है। ना ही उसकी सिफत-सालाह वह सुनता है)। उसको जनम-मरण के चक्करों में दुख मिलता रहता है। 11। मनमुख मनुष्य दुखों में ग्रसित हुआ पैदा होता है (सारी उम्र दुख सह-सह के) दुखों में ही मरता है। गुरू की शरण पड़े बिना (ये जन्म-जन्मांतरों का लंबा) दुख मिट नहीं सकता। दुखों में पैदा होता और दुखों में ही मरता है। सदाचारी आत्मिक जीवन ना ही ले के यहाँ आता है। ना ही यहाँ से ले के जाता है। 12। गुरू की अगुवाई में चलना ही सही जीवन-रास्ता है। इस तरह जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। आत्मिक मौत के रास्ते से भी बचा जाता है। जो मनुष्य (गुरू की रहनुमाई में) टहनियों को छोड़ कर मूल को पहचान लेता है (प्रभू की रची हुई माया का मोह छोड़ कर सृजनहार प्रभू के साथ जान-पहचान बनाता है) उसके मन में सदा-स्थिर रहने वाला उत्साह पैदा हो जाता है। 13। जो लोग परमात्मा के सेवक बनते हैं उनको जम नहीं मार सकता (आत्मिक मौत नहीं मार सकती)। वह (आत्मिक मौत के) कठिन रास्ते पर (नहीं पड़ते और) दुख नहीं देखते। उनके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है (वे अंतरात्मे परमात्मा की) भगती करते हैं। उनको (माया का) कोई और बखेड़ा नहीं होता। 14। हे प्रभू ! आपके भगत जैसे आपको अच्छे लगते हैं आपकी रजा में रहते हैं। वे आपकी सुंदर सिफतें करते रहते हैं उनके इस उद्यम का खात्मा नहीं होता। हे सदा-स्थिर रहने वाले पातशाह ! आपके हुकम के अनुसार वे आपकी हजूरी में सम्मान-सहित आसानी से पहुँचते हैं। 15। हे प्रभू ! अनेकों ही जीव आपके गुण कथन करते हैं। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। (दुनिया में) बड़े-बड़े (देवते आदि कहलवाने वाले भी) आपके गुणों का अंत नहीं पा सकते। हे प्रभू ! आप पातशाहों के सिर पर भी पातशाह हैं (मेरी अरदास है) मुझे नानक को आपका सदा-स्थिर रहने वाला नाम मिल जाए। मेरी लाज रख। 16। 6। 12।

काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥

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मारू महला 1 दखणी ॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥
साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥
असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥1॥
अंदरि कोट छजे हटनाले ॥
आपे लेवै वसतु समाले ॥
बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥2॥
भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥
नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥
दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥3॥
पउण पाणी अगनी इक वासा ॥
आपे कीतो खेलु तमासा ॥
बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥4॥
धरति उपाइ धरी धरम साला ॥
उतपति परलउ आपि निराला ॥
पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥5॥
भार अठारह मालणि तेरी ॥
चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥
चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥6॥
पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥
सफलिओ बिरखु अंम्रित फलु पावहि ॥
गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥7॥
झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥
सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥
अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥8॥
पसरी किरणि जोति उजिआला ॥
करि करि देखै आपि दइआला ॥
अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥9॥

हिन्दी अर्थ: {पन्ना 1033-1मारू दखणी-दखणी किस्म की मारू रागिनी।॥ (लोग अपने बसने के लिए शहर बसाते हैं और रक्षा के लिए किले बनाते हैं। इन) शहरों और किलों (की गिनती) में (मनुष्य का) शरीर भी एक शहर है (ये शहर परमात्मा ने अपने बसने के लिए बसाया है)। इस शरीर में इसके दसम-द्वार में प्रभू का सदा-स्थिर निवास है। वह परमात्मा पवित्र-स्वरूप है। उसका ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। वह स्वयं ही अपने आप को (शरीरों के रूप में) प्रकट करता है। 1। इस (शरीर-) किले के अंदर ही। मानो। छॅजे और बाजार हैं जिनमें प्रभू खुद ही सौदा खरीदता है और संभालता है। (माया के मोह के) मजबूत किवाड़ भी अंदर जड़े हुए हैं। परमात्मा खुद ही ये किवाड़ बंद करने जानता है और खुद ही गुरू-शबद में (जीव को जोड़ के किवाड़) खुला देता है। 2। इस (शरीर) किले गुफा में परमात्मा की रिहायश की जगह है। रज़ा के मालिक प्रभू ने अपने हुकम में ही (इस किले में) नौ घर बना दिए हैं (जो प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं)। दसवें घर में (जो गुप्त है) सर्व-व्यापक लेखे से रहित और बेअंत प्रभू खुद बसता है। वह अदृश्य प्रभू स्वयं ही अपने आप के दर्शन करवाता है। 3। (इस शरीर में उसने) हवा। पानी। आग (आदि तत्वों) को एक साथ बसा दिया है। (जगत रचना का) यह खेल और तमाश उसने खुद ही रचा हुआ है। जो जलती हुई आग उसकी कृपा से पानी से बुझ जाती है वही आग (बड़वा अग्नि) उसने समुंद्र में टिका रखी है। 4। धरती पैदा करके परमात्मा ने इसको धर्म कमाने की स्थली बना दी है। जगत की उत्पक्ति और प्रलय करने वाला परमात्मा स्वयं ही है। पर खुद इस उत्पक्ति और प्रलय से निर्लिप रहता है। हर जगह (भाव। सब जीवों में) उसने श्वासों की खेल रची हुई है (भाव। श्वासों के आसरे जीव जीवित रखे हुए हैं)। खुद ही (इन श्वासों की) ताकत खींच के (निकाल के शरीरों की खेल को) गिरा देता है। 5। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति (आपके आगे फूल भेटा करने वाली) आपकी मालिन है (जो हवा) फेरियाँ लेती है (भाव। हर तरफ चलती है। उस) वायु का (मानो) चवर (आपके ऊपर) झूल रहा है। (अपने जगत-महल में) आपने खुद ही चाँद और सूरज (मानो) दो दीए (जला) रखे हैं। चँद्रमा के घर में सूरज समाया हुआ है (सूरज की किरणें चँद्रमा में पड़ कर चँद्रमा को रौशनी दे रही हैं)। 6। उनकी (ज्ञानेन्द्रियाँ) पक्षी उड़ के बाहर (विकारों की ओर) दौड़ते नहीं फिरते। गुरू (मानो) फल देने वाला वृक्ष है (इस वृक्ष से जो) गुरमुख आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला जीव-पक्षी आत्मिक अडोलता में रह कर नाम सिमरता है और प्रभू के गुण गाता है। प्रभू स्वयं ही उसको अपना नाम-रस (रूपी) चोग चुगाता है। 7। ('सफल बिरख' अर्थात सफल वृक्ष गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करने वाले गुरमुख के अंदर आत्म-प्रकाश पैदा होता है जो) ऐसा झिलमिल-झिलमिल करके चमकता है कि उसकी चमक तक ना चाँद। ना कोई तारा। ना सूरज की किरण। और ना ही आकाश की बिजली पहुँच सकती है (बराबरी कर सकती है)। (मैं उस प्रकाश का) बयान तो कर रहा हूँ (पर वह प्रकाश) बयान से बाहर है उसका कोई निशान नहीं दिया जा सकता। (जिस मनुष्य के अंदर वह प्रकाश अपना) ज़हूर करता है उसके मन को वह बहुत भाता है। 8। (जिस मनुष्य के अंदर 'सफल बिरख' गुरू की मेहर से) ईश्वरीय ज्योति की किरण प्रकाशमान होती है उसके अंदर (आत्मिक) रौशनी होती है। दया का श्रोत प्रभू स्वयं ही यह करिश्मे कर कर के देखता है। (उस गुरमुख के अंदर। मानो) एक-रस मीठी-मीठी सुर वाला गीत चल पड़ता है जिसकी धुनि सदा (उसके अंदर जारी रहती है)। (वह गुरमुख अपने अंदर। मानो। ऐसा साज़) बजाने लग जाता है (जिसकी बरकति से) वह निडरता के आत्मिक ठिकाने में (टिक जाता है)। 9।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1033 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०३३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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