Lulla Family

अंग 1032

अंग
1032
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भूले सिख गुरू समझाए ॥
उझड़ि जादे मारगि पाए ॥
तिसु गुर सेवि सदा दिनु राती दुख भंजन संगि सखाता हे ॥13॥
गुर की भगति करहि किआ प्राणी ॥
ब्रहमै इंद्रि महेसि न जाणी ॥
सतिगुरु अलखु कहहु किउ लखीऐ जिसु बखसे तिसहि पछाता हे ॥14॥
अंतरि प्रेमु परापति दरसनु ॥
गुरबाणी सिउ प्रीति सु परसनु ॥
अहिनिसि निरमल जोति सबाई घटि दीपकु गुरमुखि जाता हे ॥15॥
भोजन गिआनु महा रसु मीठा ॥
जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा ॥
दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे ॥16॥
सतिगुरु सेवहि से परधाना ॥
तिन घट घट अंतरि ब्रहमु पछाना ॥
नानक हरि जसु हरि जन की संगति दीजै जिन सतिगुरु हरि प्रभु जाता हे ॥17॥5॥11॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: भूले हुए लोगों को शिक्षा दे के गुरू (सही जीवन-राह की) समझ बख्शता है। गलत राह पर जाते को (ठीक) राह पर डालता है। (हे भाई ! आप) दिन-रात उस गुरू की बताई हुई कार कर। गुरू दुखों का नाश करने वाले परमात्मा में जोड़ के प्रभू के साथ मित्रता बना देता है। 13। (संसारी जीव) गुरू की भक्ति की क्या कद्र जान सकते हैं। ब्रहमा ने। इन्द्र ने। शिव ने (भी यह कद्र) नहीं समझी। गुरू अलख (-प्रभू का रूप) है। उसको समझा नहीं जा सकता। गुरू जिस पर मेहर करता है वही (गुरू की) पहचान करता है। 14। जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू का) प्रेम है उसको (परमात्मा का) दीदार प्राप्त होता है। जिसकी प्रीति गुरू की बाणी के साथ बन गई उसको प्रभू-चरणों की छोह मिल जाती है। उसको सारी ही लोकाई में प्रभू की पवित्र ज्योति व्यापक दिखती है। गुरू की शरण पड़ कर उसको अपने हृदय में दिन-रात (ज्ञान का) दीया (जगमगाता) दिखता है। 15। (गुरू के द्वारा मिला हुआ परमात्मा का) ज्ञान एक ऐसी (आत्मिक) खुराक है जो मीठी है और बहुत ही स्वादिष्ट है। जिसने यह स्वाद चखा है उसने परमात्मा के दीदार कर लिए हैं। जो प्रेमी (गुरू के द्वारा परमात्मा के) दर्शन करके उसके चरणों में जुड़ते हैं। उनका मन (अपनी) कामनाओं को मार के (सदा के लिए परमात्मा की याद में) लीन हो जाता है। 16। जो मनुष्य सतिगुरू की बताई हुई सेवा करते हैं वह हर जगह आदर पाते हैं। वह हरेक शरीर के अंदर परमात्मा को बसता पहचान लेते हैं। (नानक की अरदास है कि) जिन लोगों ने सतिगुरू को परमात्मा का रूप समझ लिया है उन हरी के जनों की संगति नानक को भी मिल जाए (उनकी संगति में ही रह के) परमात्मा की सिफत-सालाह की दाति मिलती है। 17। 5। 11।
मारू महला 1 ॥
साचे साहिब सिरजणहारे ॥
जिनि धर चक्र धरे वीचारे ॥
आपे करता करि करि वेखै साचा वेपरवाहा हे ॥1॥
वेकी वेकी जंत उपाए ॥
दुइ पंदी दुइ राह चलाए ॥
गुर पूरे विणु मुकति न होई सचु नामु जपि लाहा हे ॥2॥
पड़हि मनमुख परु बिधि नही जाना ॥
नामु न बूझहि भरमि भुलाना ॥
लै कै वढी देनि उगाही दुरमति का गलि फाहा हे ॥3॥
सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥
वादु वखाणहि ततु न जाणा ॥
विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ सच सूचे सचु राहा हे ॥4॥
सभ सालाहे सुणि सुणि आखै ॥
आपे दाना सचु पराखै ॥
जिन कउ नदरि करे प्रभु अपनी गुरमुखि सबदु सलाहा हे ॥5॥
सुणि सुणि आखै केती बाणी ॥
सुणि कहीऐ को अंतु न जाणी ॥
जा कउ अलखु लखाए आपे अकथ कथा बुधि ताहा हे ॥6॥
जनमे कउ वाजहि वाधाए ॥
सोहिलड़े अगिआनी गाए ॥
जो जनमै तिसु सरपर मरणा किरतु पइआ सिरि साहा हे ॥7॥
संजोगु विजोगु मेरै प्रभि कीए ॥
स्रिसटि उपाइ दुखा सुख दीए ॥
दुख सुख ही ते भए निराले गुरमुखि सीलु सनाहा हे ॥8॥
नीके साचे के वापारी ॥
सचु सउदा लै गुर वीचारी ॥
सचा वखरु जिसु धनु पलै सबदि सचै ओमाहा हे ॥9॥
काची सउदी तोटा आवै ॥
गुरमुखि वणजु करे प्रभ भावै ॥
पूंजी साबतु रासि सलामति चूका जम का फाहा हे ॥10॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे सदा-स्थिर रहने वाले मालिक ! हे जगत के रचनहार ! जिस आप ने धरती के चक्कर बनाए हैं। तूने स्वयं ही सोच-विचार के (अपनी-अपनी जगह) टिकाए हैं ! करतार खुद ही जगत की रच-रच के संभाल करता है। वह सदा कायम रहने वाला है। (जगत का इतना बड़ा पसारा होते हुए भी) वह बेफिक्र है। 1। परमात्मा ने रंग-बिरंगे जीव पैदा कर दिए हैं। कोई गुरमुख बना दिए हैं कोई मनमुख बना दिए हैं। गुरमुखता और मनमुखता- ये दोनों रास्ते चला दिए हैं। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना (बुरे रास्ते से) मुक्ति नहीं मिलती। (गुरू के द्वारा) सदा-स्थिर नाम जप के ही (मनुष्य जीवन में आत्मिक) लाभ कमाया जा सकता है। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले व्यक्ति (धार्मिक पुस्तकें) पढ़ते हैं। पर वह (उस पढ़े हुए पर अमल करने की) जाच नहीं सीखते। वे परमात्मा के नाम की (कद्र) नहीं समझते। (माया की) भटकना में (पड़ कर) गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। रिश्वत ले के झूठी गवाहियाँ दे देते हैं। दुर्मति का फंदा उनके गले में पड़ा रहता है। 3। (पण्डित लोग भी) स्मृतियाँ-शास्त्र-पुराण पढ़ते हैं (पर) चर्चा (ही) करते हैं। अस्लियत को नहीं समझते। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना अस्लियत मिल ही नहीं सकती। जो लोग सदा-स्थिर (नाम सिमरते हैं) वे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। वे सही जीवन-राह को पकड़ लेते हैं। 4। (ज़बानी-ज़बानी तो) सारी दुनिया परमात्मा की सिफत-सालाह करती है (दूसरों से) सुन-सुन के (प्रभू के महातम) बयान करती है। पर सदा-स्थिर प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है (हरेक द्वारा की हुई भक्ति को) वह खुद ही परखता है। जिन पर प्रभू अपनी मेहर की नजर करता है। वह गुरू की शरण पड़ कर शबद को (हृदय में बसाते हैं) सिफत सालाह को (दिल में बसाते हैं)। 5। (दूसरों से) सुन-सुन के बेअंत दुनिया सिफत सालाह की बाणी भी बोलती है। सुन-सुन के प्रभू के गुणों का कथन कर लेते हैं। पर कोई जीव उसके गुणों का अंत नहीं जानता। जिस मनुष्य को वह अदृष्य प्रभू अपना स्वयं दिखाता है। उस मनुष्य को वह बुद्धि मिल जाती है जिससे वह उस अकथ प्रभू की कथा-कहानियाँ करता रहता है। 6। (जब कोई जीव पैदा होता है तो उसके) पैदा होने पर बाजे बजते हैं। वधाईयाँ (शुभ-कामनाएं। मुबारकें) मिलती हैं। ज्ञान से वंचित लोग खुशी के गीत गाते हैं। पर जो जीव पैदा होता है। उसने मरना भी अवश्य है। हरेक जीव के किए कर्मों के अनुसार (मौत का) महूरत उसके माथे पर लिखा जाता है। 7। (पैदा हो के परिवार में) मिलना और (मर कर परिवार से) विछुड़ना – ये खेल परमात्मा ने बना दी है। जगत पैदा करके दुख-सुख भी उसी ने ही दिए हैं। जो लोग गुरू की शरण पड़ कर मीठे स्वभाव वाला संजोअ (कवच) पहनते हैं वे दुख-सुख से निर्लिप रहते हैं। 8। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम विहाजने वाले लोग अच्छे जीवन वाले होते हैं गुरू की बताई विचार पर चल के यहाँ से सदा-स्थिर रहने वाला सौदा ले के जाते हैं। जिस मनुष्य के पल्ले सदा-स्थिर रहने वाला सौदा है धन है वह सदा-स्थिर प्रभू की सिॅफत-सालाह के शबद द्वारा आत्मिक उत्साह प्राप्त करते हैं। 9। सिर्फ मायावी होछे व्यापार (वणज) करने से (आत्मिक जीवन में) घाटा पड़ता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला व्यक्ति वह (आत्मिक) व्यापार करता है जो प्रभू को पसंद आता है। उसका सरमाया उसकी राशि-पूँजी अमन-अमान रहती है। आत्मिक मौत का फंदा उसके गले से कट जाता है। 10।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “भूले हुए लोगों को शिक्षा दे के गुरू (सही जीवन-राह की) समझ बख्शता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।