अंग
1031
मारू
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हउमै ममता करदा आइआ ॥
हउमै ममता करदा आइआ ॥
आसा मनसा बंधि चलाइआ ॥
मेरी मेरी करत किआ ले चाले बिखु लादे छार बिकारा हे ॥15॥
हरि की भगति करहु जन भाई ॥
अकथु कथहु मनु मनहि समाई ॥
उठि चलता ठाकि रखहु घरि अपुनै दुखु काटे काटणहारा हे ॥16॥
हरि गुर पूरे की ओट पराती ॥
गुरमुखि हरि लिव गुरमुखि जाती ॥
नानक राम नामि मति ऊतम हरि बखसे पारि उतारा हे ॥17॥4॥10॥
आसा मनसा बंधि चलाइआ ॥
मेरी मेरी करत किआ ले चाले बिखु लादे छार बिकारा हे ॥15॥
हरि की भगति करहु जन भाई ॥
अकथु कथहु मनु मनहि समाई ॥
उठि चलता ठाकि रखहु घरि अपुनै दुखु काटे काटणहारा हे ॥16॥
हरि गुर पूरे की ओट पराती ॥
गुरमुखि हरि लिव गुरमुखि जाती ॥
नानक राम नामि मति ऊतम हरि बखसे पारि उतारा हे ॥17॥4॥10॥
हिन्दी अर्थ: जीव दुनियां की आशाओं और मन के मायावी फुरनों में बँधा चला । (जन्म-जन्मांतरों से) अहंम् और ममता अहंकार-भरी बातें करता । ये माया मेरी है ये माया मेरी है'- यह कह-कह के यहाँ से अपने साथ भी कुछ नहीं ले जा सकता। विकारों की राख और विकारों का जहर ही लाद लेता है (जो इसके आत्मिक जीवन को मार देता है)। 15। हे भाई जनो ! परमात्मा की भक्ति करो। उस परमात्मा को याद करते रहो जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते। (इस तरह ये विकारी) मन (रॅब) मन में ही लीन हो जाएगा। हे भाई ! इस मन को जो (माया के पीछे) उठ-उठ के भागता है रोक के अपने अडोल आत्मिक ठिकाने में काबू कर के रखो। (इस तरह) सारे दुख काटने के समर्थ प्रभू दुख दूर कर देगा। 16। जिस मनुष्य ने परमात्मा की और पूरे गुरू की शरण की कद्र पहचान ली है। जिस ने गुरू के सन्मुख हो के गुरू के द्वारा परमात्मा में सुरति जोड़नी सीख समझ ली है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में जुड़ के उसकी मति श्रेष्ठ हो जाती है। परमात्मा उस पर मेहर करता है और उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 17। 4। 10।
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥
मारू महला 1 ॥
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥
तू समरथु दइआलु मुरारी ॥
तेरे चोज न जाणै कोई तू पूरा पुरखु बिधाता हे ॥1॥
तू आदि जुगादि करहि प्रतिपाला ॥
घटि घटि रूपु अनूपु दइआला ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि सभु तेरो कीआ कमाता हे ॥2॥
अंतरि जोति भली जगजीवन ॥
सभि घट भोगै हरि रसु पीवन ॥
आपे लेवै आपे देवै तिहु लोई जगत पित दाता हे ॥3॥
जगतु उपाइ खेलु रचाइआ ॥
पवणै पाणी अगनी जीउ पाइआ ॥
देही नगरी नउ दरवाजे सो दसवा गुपतु रहाता हे ॥4॥
चारि नदी अगनी असराला ॥
कोई गुरमुखि बूझै सबदि निराला ॥
साकत दुरमति डूबहि दाझहि गुरि राखे हरि लिव राता हे ॥5॥
अपु तेजु वाइ प्रिथमी आकासा ॥
तिन महि पंच ततु घरि वासा ॥
सतिगुर सबदि रहहि रंगि राता तजि माइआ हउमै भ्राता हे ॥6॥
इहु मनु भीजै सबदि पतीजै ॥
बिनु नावै किआ टेक टिकीजै ॥
अंतरि चोरु मुहै घरु मंदरु इनि साकति दूतु न जाता हे ॥7॥
दुंदर दूत भूत भीहाले ॥
खिंचोताणि करहि बेताले ॥
सबद सुरति बिनु आवै जावै पति खोई आवत जाता हे ॥8॥
कूड़ु कलरु तनु भसमै ढेरी ॥
बिनु नावै कैसी पति तेरी ॥
बाधे मुकति नाही जुग चारे जमकंकरि कालि पराता हे ॥9॥
जम दरि बाधे मिलहि सजाई ॥
तिसु अपराधी गति नही काई ॥
करण पलाव करे बिललावै जिउ कुंडी मीनु पराता हे ॥10॥
साकतु फासी पड़ै इकेला ॥
जम वसि कीआ अंधु दुहेला ॥
राम नाम बिनु मुकति न सूझै आजु कालि पचि जाता हे ॥11॥
सतिगुर बाझु न बेली कोई ॥
ऐथै ओथै राखा प्रभु सोई ॥
राम नामु देवै करि किरपा इउ सललै सलल मिलाता हे ॥12॥
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥
तू समरथु दइआलु मुरारी ॥
तेरे चोज न जाणै कोई तू पूरा पुरखु बिधाता हे ॥1॥
तू आदि जुगादि करहि प्रतिपाला ॥
घटि घटि रूपु अनूपु दइआला ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि सभु तेरो कीआ कमाता हे ॥2॥
अंतरि जोति भली जगजीवन ॥
सभि घट भोगै हरि रसु पीवन ॥
आपे लेवै आपे देवै तिहु लोई जगत पित दाता हे ॥3॥
जगतु उपाइ खेलु रचाइआ ॥
पवणै पाणी अगनी जीउ पाइआ ॥
देही नगरी नउ दरवाजे सो दसवा गुपतु रहाता हे ॥4॥
चारि नदी अगनी असराला ॥
कोई गुरमुखि बूझै सबदि निराला ॥
साकत दुरमति डूबहि दाझहि गुरि राखे हरि लिव राता हे ॥5॥
अपु तेजु वाइ प्रिथमी आकासा ॥
तिन महि पंच ततु घरि वासा ॥
सतिगुर सबदि रहहि रंगि राता तजि माइआ हउमै भ्राता हे ॥6॥
इहु मनु भीजै सबदि पतीजै ॥
बिनु नावै किआ टेक टिकीजै ॥
अंतरि चोरु मुहै घरु मंदरु इनि साकति दूतु न जाता हे ॥7॥
दुंदर दूत भूत भीहाले ॥
खिंचोताणि करहि बेताले ॥
सबद सुरति बिनु आवै जावै पति खोई आवत जाता हे ॥8॥
कूड़ु कलरु तनु भसमै ढेरी ॥
बिनु नावै कैसी पति तेरी ॥
बाधे मुकति नाही जुग चारे जमकंकरि कालि पराता हे ॥9॥
जम दरि बाधे मिलहि सजाई ॥
तिसु अपराधी गति नही काई ॥
करण पलाव करे बिललावै जिउ कुंडी मीनु पराता हे ॥10॥
साकतु फासी पड़ै इकेला ॥
जम वसि कीआ अंधु दुहेला ॥
राम नाम बिनु मुकति न सूझै आजु कालि पचि जाता हे ॥11॥
सतिगुर बाझु न बेली कोई ॥
ऐथै ओथै राखा प्रभु सोई ॥
राम नामु देवै करि किरपा इउ सललै सलल मिलाता हे ॥12॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हॅूँ। आप (कामादिक) वैरियों को मारने वाले हैं। आप सब ताकतों के मालिक हैं। आप दया का स्रोत हैं। कोई जीव आपके करिश्मों को समझ नहीं सकता। आप सब गुणों के मालिक हैं। आप सबमें व्यापक हैं। आप सृष्टि को पैदा करने वाले हैं। 1। जगत के शुरू से ही जुगों के आरम्भ से ही आप (सब जीवों की) पालना करते हैं। आप हरेक शरीर में मौजूद हैं। आपका रूप ऐसा है कि उस जैसा और किसी का नहीं। आप दया का स्रोत हैं। जैसे आपको अच्छा लगता है वैसे ही आप संसार की कार चला रहे हैं। हरेक जीव आपका ही प्रेरित हुआ (कर्म) करता है। 2। जगत के जीवन प्रभू की ज्योति हरेक के अंदर शोभा दे रही है। सारे शरीरों में व्यापक हो के प्रभू स्वयं ही अपने नाम का रस पी रहा है। भोग रहा है। यह हरी-नाम-रस स्वयं ही (जीवों में बैठा) ले रहा है। स्वयं ही (जीवों को यह नाम-रस) देता है। जगत का पिता प्रभू तीनों ही भवनों में मौजूद है और सब दातें दे रहा है। 3। जगत पैदा करके प्रभू ने (मानो। एक) खेल बना दी है। हवा पानी आग (आदि तत्वों को इकट्ठा करके और शरीर बना के उस में) जीवात्मा टिका दी है। इस शरीर-नगरी को उसने नौ दरवाजे (तो प्रकट रूप में) लगा दिए हैं। (जिस दरवाजे से उसके घर में पहुँचते हैं) वह दसवाँ दरवाजा (उसने) गुप्त रखा हुआ है। 4। (इस जगत में निर्दयता मोह लोभ और क्रोध) चार आग की भयानक नदियां हैं। पर कोई विरला मनुष्य जो गुरू की शरण पड़ता है वह गुरू के शबद में जुड़ के इस बात को समझता है। (वरना) माया-ग्रसित जीव बुरी मति के पीछे लग के (इन नदियों में) गोते खाते हैं जलते हैं। जिन्हें गुरू ने (इन अग्नि-नदियों से) बचा लिया वह परमात्मा में सुरति जोड़े रखते हैं। 5। पानी आग हवा धरती और आकाश- इन पाँचों के मेल से परमात्मा ने पंच-तत्वी घर बना दिया है उस घर में जीवात्मास का निवास कर दिया है। जो जीव सतिगुरू के शबद में जुड़ते हैं वह माया के अहंकार और माया की खातिर भटकना छोड़ के परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। 6। जिस मनुष्य का ये मन गुरू के शबद में भीग जाता है (शबद में खुश हो के जुड़ता है) वह परमात्मा के नाम में जुड़ के प्रसन्न होता है। परमात्मा के नाम के बिना वह और कोई आसरा नहीं तलाशता। पर जो मनुष्य माया-ग्रसित है उसके अंदर (विकारी मन-) चोर का घर-घाट लुटता जाता है। इस माया-ग्रसित जीव ने इस चोर को पहचाना ही नहीं। 7। जिस मनुष्य के अंदर शोर मचाने वाले और डरावने भूतों जैसे कामादिक वैरी बसते हों और वह भूत अपनी-अपनी तरफ को खिंचातानी कर रहे हों। वह मनुष्य गुरू के शबद में सुरति-सूझ से वंचित रह के पैदा होता मरता रहता है। अपनी इज्जत गवा लेता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 8। हे जीव ! आप सारी उम्र झूठ (रूपी) कलॅर का ही (व्यापार करते हैं)। शरीर भी आखिर राख की ढेरी हो जाने वाला है (आपके पल्ले क्या पड़ा है।)। परमात्मा के नाम से टूट के आप अपनी इज्जत गवा लेते हैं। माया के मोह में बंधे हुए की मुक्ति प्रभू के नाम के बिना कभी भी नहीं हो सकेगी (ऐसे है जैसे) काल-जमदूत ने आपको (खास तौर पर) पहचाना हुआ है (कि यह मेरा शिकार है)। 9। (झूठ-कॅलर के व्यापारी को) जम के दर पर बँधे हुए को सजाएं मिलती हैं। उस (बिचारे) दुष्कर्मी का बुरा हाल होता है। बिलकता है। करुणाप्रलाप करता है (पर मोह के फंदे मे से मुक्ति नहीं मिलती) जैसे मछली कुंडी में फस जाती है। 10। माया-ग्रसित माया के मोह में अंधा हुआ जीव जम के वश में पड़ा हुआ दुखी होता है। उसकी अपनी अकेली जान ही उस फंदे में फसी होती है। (वह माया-ग्रसित जीव प्रभू-नाम से वंचित रहता है। और) हरी-नाम के बिना मुक्ति का कोई तरीका नहीं सूझ सकता। नित्य (मोह के फंदे में ही) दखी होता है। 11। सतिगुरू के बिना (जीवन-राह बताने वाला) कोई मददगार नहीं बनता (गुरू ही बताता है कि) लोक-परलोक में परमात्मा ही (जीव की) रक्षा करने वाला है। (सतिगुरू) मेहर कर के परमात्मा का नाम बख्शता है। इस तरह (जीव परमात्मा के चरणों में इस तरह मिल जाता है जैसे) पानी में पानी मिल जाता है। 12।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1031 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०३१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।