Lulla Family

अंग 1031

अंग
1031
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउमै ममता करदा आइआ ॥
आसा मनसा बंधि चलाइआ ॥
मेरी मेरी करत किआ ले चाले बिखु लादे छार बिकारा हे ॥15॥
हरि की भगति करहु जन भाई ॥
अकथु कथहु मनु मनहि समाई ॥
उठि चलता ठाकि रखहु घरि अपुनै दुखु काटे काटणहारा हे ॥16॥
हरि गुर पूरे की ओट पराती ॥
गुरमुखि हरि लिव गुरमुखि जाती ॥
नानक राम नामि मति ऊतम हरि बखसे पारि उतारा हे ॥17॥4॥10॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जीव दुनियां की आशाओं और मन के मायावी फुरनों में बँधा चला । (जन्म-जन्मांतरों से) अहंम् और ममता अहंकार-भरी बातें करता । ये माया मेरी है ये माया मेरी है’- यह कह-कह के यहाँ से अपने साथ भी कुछ नहीं ले जा सकता। विकारों की राख और विकारों का जहर ही लाद लेता है (जो इसके आत्मिक जीवन को मार देता है)। 15। हे भाई जनो ! परमात्मा की भक्ति करो। उस परमात्मा को याद करते रहो जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते। (इस तरह ये विकारी) मन (रॅब) मन में ही लीन हो जाएगा। हे भाई ! इस मन को जो (माया के पीछे) उठ-उठ के भागता है रोक के अपने अडोल आत्मिक ठिकाने में काबू कर के रखो। (इस तरह) सारे दुख काटने के समर्थ प्रभू दुख दूर कर देगा। 16। जिस मनुष्य ने परमात्मा की और पूरे गुरू की शरण की कद्र पहचान ली है। जिस ने गुरू के सन्मुख हो के गुरू के द्वारा परमात्मा में सुरति जोड़नी सीख समझ ली है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में जुड़ के उसकी मति श्रेष्ठ हो जाती है। परमात्मा उस पर मेहर करता है और उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 17। 4। 10।
मारू महला 1 ॥
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥
तू समरथु दइआलु मुरारी ॥
तेरे चोज न जाणै कोई तू पूरा पुरखु बिधाता हे ॥1॥
तू आदि जुगादि करहि प्रतिपाला ॥
घटि घटि रूपु अनूपु दइआला ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि सभु तेरो कीआ कमाता हे ॥2॥
अंतरि जोति भली जगजीवन ॥
सभि घट भोगै हरि रसु पीवन ॥
आपे लेवै आपे देवै तिहु लोई जगत पित दाता हे ॥3॥
जगतु उपाइ खेलु रचाइआ ॥
पवणै पाणी अगनी जीउ पाइआ ॥
देही नगरी नउ दरवाजे सो दसवा गुपतु रहाता हे ॥4॥
चारि नदी अगनी असराला ॥
कोई गुरमुखि बूझै सबदि निराला ॥
साकत दुरमति डूबहि दाझहि गुरि राखे हरि लिव राता हे ॥5॥
अपु तेजु वाइ प्रिथमी आकासा ॥
तिन महि पंच ततु घरि वासा ॥
सतिगुर सबदि रहहि रंगि राता तजि माइआ हउमै भ्राता हे ॥6॥
इहु मनु भीजै सबदि पतीजै ॥
बिनु नावै किआ टेक टिकीजै ॥
अंतरि चोरु मुहै घरु मंदरु इनि साकति दूतु न जाता हे ॥7॥
दुंदर दूत भूत भीहाले ॥
खिंचोताणि करहि बेताले ॥
सबद सुरति बिनु आवै जावै पति खोई आवत जाता हे ॥8॥
कूड़ु कलरु तनु भसमै ढेरी ॥
बिनु नावै कैसी पति तेरी ॥
बाधे मुकति नाही जुग चारे जमकंकरि कालि पराता हे ॥9॥
जम दरि बाधे मिलहि सजाई ॥
तिसु अपराधी गति नही काई ॥
करण पलाव करे बिललावै जिउ कुंडी मीनु पराता हे ॥10॥
साकतु फासी पड़ै इकेला ॥
जम वसि कीआ अंधु दुहेला ॥
राम नाम बिनु मुकति न सूझै आजु कालि पचि जाता हे ॥11॥
सतिगुर बाझु न बेली कोई ॥
ऐथै ओथै राखा प्रभु सोई ॥
राम नामु देवै करि किरपा इउ सललै सलल मिलाता हे ॥12॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हॅूँ। आप (कामादिक) वैरियों को मारने वाला है। आप सब ताकतों का मालिक है। आप दया का श्रोत है। कोई जीव आपके करिश्मों को समझ नहीं सकता। आप सब गुणों का मालिक है। आप सबमें व्यापक है। आप सृष्टि को पैदा करने वाला है। 1। जगत के शुरू से ही जुगों के आरम्भ से ही आप (सब जीवों की) पालना करता । आप हरेक शरीर में मौजूद है। आपका रूप ऐसा है कि उस जैसा और किसी का नहीं। आप दया का श्रोत है। जैसे आपको अच्छा लगता है वैसे ही आप संसार की कार चला रहा है। हरेक जीव आपका ही प्रेरित हुआ (कर्म) करता है। 2। जगत के जीवन प्रभू की ज्योति हरेक के अंदर शोभा दे रही है। सारे शरीरों में व्यापक हो के प्रभू स्वयं ही अपने नाम का रस पी रहा है। भोग रहा है। यह हरी-नाम-रस स्वयं ही (जीवों में बैठा) ले रहा है। स्वयं ही (जीवों को यह नाम-रस) देता है। जगत का पिता प्रभू तीनों ही भवनों में मौजूद है और सब दातें दे रहा है। 3। जगत पैदा करके प्रभू ने (मानो। एक) खेल बना दी है। हवा पानी आग (आदि तत्वों को इकट्ठा करके और शरीर बना के उस में) जीवात्मा टिका दी है। इस शरीर-नगरी को उसने नौ दरवाजे (तो प्रकट रूप में) लगा दिए हैं। (जिस दरवाजे से उसके घर में पहुँचते हैं) वह दसवाँ दरवाजा (उसने) गुप्त रखा हुआ है। 4। (इस जगत में निर्दयता मोह लोभ और क्रोध) चार आग की भयानक नदियां हैं। पर कोई विरला मनुष्य जो गुरू की शरण पड़ता है वह गुरू के शबद में जुड़ के इस बात को समझता है। (वरना) माया-ग्रसित जीव बुरी मति के पीछे लग के (इन नदियों में) गोते खाते हैं जलते हैं। जिन्हें गुरू ने (इन अग्नि-नदियों से) बचा लिया वह परमात्मा में सुरति जोड़े रखते हैं। 5। पानी आग हवा धरती और आकाश- इन पाँचों के मेल से परमात्मा ने पंच-तत्वी घर बना दिया है उस घर में जीवात्मास का निवास कर दिया है। जो जीव सतिगुरू के शबद में जुड़ते हैं वह माया के अहंकार और माया की खातिर भटकना छोड़ के परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। 6। जिस मनुष्य का ये मन गुरू के शबद में भीग जाता है (शबद में खुश हो के जुड़ता है) वह परमात्मा के नाम में जुड़ के प्रसन्न होता है। परमात्मा के नाम के बिना वह और कोई आसरा नहीं तलाशता। पर जो मनुष्य माया-ग्रसित है उसके अंदर (विकारी मन-) चोर का घर-घाट लुटता जाता है। इस माया-ग्रसित जीव ने इस चोर को पहचाना ही नहीं। 7। जिस मनुष्य के अंदर शोर मचाने वाले और डरावने भूतों जैसे कामादिक वैरी बसते हों और वह भूत अपनी-अपनी तरफ को खिंचातानी कर रहे हों। वह मनुष्य गुरू के शबद में सुरति-सूझ से वंचित रह के पैदा होता मरता रहता है। अपनी इज्जत गवा लेता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 8। हे जीव ! आप सारी उम्र झूठ (रूपी) कलॅर का ही (व्यापार करता है)। शरीर भी आखिर राख की ढेरी हैं जाने वाला है (आपके पल्ले क्या पड़ा है।)। परमात्मा के नाम से टूट के आप अपनी इज्जत गवा लेता है। माया के मोह में बंधे हुए की मुक्ति प्रभू के नाम के बिना कभी भी नहीं हो सकेगी (ऐसे है जैसे) काल-जमदूत ने आपको (खास तौर पर) पहचाना हुआ है (कि यह मेरा शिकार है)। 9। (झूठ-कॅलर के व्यापारी को) जम के दर पर बँधे हुए को सजाएं मिलती हैं। उस (बिचारे) दुष्कर्मी का बुरा हाल होता है। बिलकता है। करुणाप्रलाप करता है (पर मोह के फंदे मे से मुक्ति नहीं मिलती) जैसे मछली कुंडी में फस जाती है। 10। माया-ग्रसित माया के मोह में अंधा हुआ जीव जम के वश में पड़ा हुआ दुखी होता है। उसकी अपनी अकेली जान ही उस फंदे में फसी होती है। (वह माया-ग्रसित जीव प्रभू-नाम से वंचित रहता है। और) हरी-नाम के बिना मुक्ति का कोई तरीका नहीं सूझ सकता। नित्य (मोह के फंदे में ही) दखी होता है। 11। सतिगुरू के बिना (जीवन-राह बताने वाला) कोई मददगार नहीं बनता (गुरू ही बताता है कि) लोक-परलोक में परमात्मा ही (जीव की) रक्षा करने वाला है। (सतिगुरू) मेहर कर के परमात्मा का नाम बख्शता है। इस तरह (जीव परमात्मा के चरणों में इस तरह मिल जाता है जैसे) पानी में पानी मिल जाता है। 12।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जीव दुनियां की आशाओं और मन के मायावी फुरनों में बँधा चला।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।