Lulla Family

अंग 1030

अंग
1030
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राम नामु साधू सरणाई ॥
सतिगुर बचनी गति मिति पाई ॥
नानक हरि जपि हरि मन मेरे हरि मेले मेलणहारा हे ॥17॥3॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मिलता है। गुरू के वचनों पर चलने से ये समझ आ जाती है कि परमात्मा कैसा (दयालु) है और कितना बड़ा (बेअंत) है। हे नानक ! (अपने मन को समझा और कह-) हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम जप (नाम जपने वाले भाग्यशाली को) मेलनहार प्रभू अपने चरणों में मिला देता है। 17। 3। 9।
मारू महला 1 ॥
घरि रहु रे मन मुगध इआने ॥
रामु जपहु अंतरगति धिआने ॥
लालच छोडि रचहु अपरंपरि इउ पावहु मुकति दुआरा हे ॥1॥
जिसु बिसरिऐ जमु जोहणि लागै ॥
सभि सुख जाहि दुखा फुनि आगै ॥
राम नामु जपि गुरमुखि जीअड़े एहु परम ततु वीचारा हे ॥2॥
हरि हरि नामु जपहु रसु मीठा ॥
गुरमुखि हरि रसु अंतरि डीठा ॥
अहिनिसि राम रहहु रंगि राते एहु जपु तपु संजमु सारा हे ॥3॥
राम नामु गुर बचनी बोलहु ॥
संत सभा महि इहु रसु टोलहु ॥
गुरमति खोजि लहहु घरु अपना बहुड़ि न गरभ मझारा हे ॥4॥
सचु तीरथि नावहु हरि गुण गावहु ॥
ततु वीचारहु हरि लिव लावहु ॥
अंत कालि जमु जोहि न साकै हरि बोलहु रामु पिआरा हे ॥5॥
सतिगुरु पुरखु दाता वड दाणा ॥
जिसु अंतरि साचु सु सबदि समाणा ॥
जिस कउ सतिगुरु मेलि मिलाए तिसु चूका जम भै भारा हे ॥6॥
पंच ततु मिलि काइआ कीनी ॥
तिस महि राम रतनु लै चीनी ॥
आतम रामु रामु है आतम हरि पाईऐ सबदि वीचारा हे ॥7॥
सत संतोखि रहहु जन भाई ॥
खिमा गहहु सतिगुर सरणाई ॥
आतमु चीनि परातमु चीनहु गुर संगति इहु निसतारा हे ॥8॥
साकत कूड़ कपट महि टेका ॥
अहिनिसि निंदा करहि अनेका ॥
बिनु सिमरन आवहि फुनि जावहि ग्रभ जोनी नरक मझारा हे ॥9॥
साकत जम की काणि न चूकै ॥
जम का डंडु न कबहू मूकै ॥
बाकी धरम राइ की लीजै सिरि अफरिओ भारु अफारा हे ॥10॥
बिनु गुर साकतु कहहु को तरिआ ॥
हउमै करता भवजलि परिआ ॥
बिनु गुर पारु न पावै कोई हरि जपीऐ पारि उतारा हे ॥11॥
गुर की दाति न मेटै कोई ॥
जिसु बखसे तिसु तारे सोई ॥
जनम मरण दुखु नेड़ि न आवै मनि सो प्रभु अपर अपारा हे ॥12॥
गुर ते भूले आवहु जावहु ॥
जनमि मरहु फुनि पाप कमावहु ॥
साकत मूड़ अचेत न चेतहि दुखु लागै ता रामु पुकारा हे ॥13॥
सुखु दुखु पुरब जनम के कीए ॥
सो जाणै जिनि दातै दीए ॥
किस कउ दोसु देहि तू प्राणी सहु अपणा कीआ करारा हे ॥14॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे अंजान मूर्ख मन ! अडोलता में टिका रह। अपने अंदर ही टिका रह के और सुरति जोड़ के प्रभू का नाम जप। (हे मन ! माया का) लालच छोड़ के उस प्रभू में लीन रह जो परे से परे है (जिससे आगे कोई और हस्ती नहीं है)। इसी तरह आप (माया की लालच से) मुक्ति पाने का रास्ता तलाश लेगा। 1। जिस प्रभू के भूल जाने से मौत घूरने लग जाती है सारे सुख दूर हो जाते हैं और उनकी जगह जीवन-पथ में दुख ही दुख पैदा हो जाते हैं। हे जिंदे ! गुरू की शरण पड़ कर उस प्रभू का नाम जप। और जगत के मूल प्रभू को अपनी सोच-मण्डल में टिका के रख। 2। हे जिंदे ! सदा परमात्मा का नाम जप (जपने से ही समझ पड़ेगी कि नाम जपने का) मीठा स्वाद है। गुरू की शरण पड़ कर ये नाम-रस अपने ही अंदर अनुभव किया जा सकता है। (हे भाई !) दिन-रात परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहो। ये नाम-रंग ही श्रेष्ठ जप है। श्रेष्ठ तप है। श्रेष्ठ संयम है। 3। (हे भाई !) गुरू की बाणी के द्वारा परमात्मा का नाम सिमरो (आत्मिक आनंद मिलेगा। पर ये आनंद साध-संगति में प्राप्त होता है) साध-संगति में जा के इस आनंद की तलाश करो। गुरू की मति पर चल कर अपना वह आत्मिक ठिकाना ढूँढो जहाँ पहुँच के दोबारा जनम-मरण के चक्कर में ना पड़ना पड़े। 4। सदा-स्थिर प्रभू का नाम (सिमरो)। परमात्मा के गुण गाओ (यही है तीर्थ-स्नान। इस) तीरथ में स्नान करो। परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ो। परमात्मा के गुणों को विचारो। प्यारे प्रभू का नाम सिमरो। आखिरी समय मौत का डर छू नहीं सकेगा। 5। गुरू अकाल-पुरख (का रूप) है। सब दातें देने के समर्थ है। बहुत समझदार है। उसके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू हमेशा बसता है। वह परमात्मा की सिफत-सालाह में हमेशा लीन रहता है। वह गुरू जिस मनुष्य को अपनी संगति में मिलाता है उस (के सिर) पर से जमों का डर दूर हो जाता है। 6। (हे भाई ! अपने) इस शरीर में। जो परमात्मा ने पाँच (विरोधी) तत्वों को मिला के बनाया है। परमात्मा का नाम-रतन खोज के तलाश ले। (ज्यों-ज्यों) गुरू के शबद द्वारा विचार करें। (त्यों-त्यों ये समझ आ जाती है कि) आत्मा और परमात्मा एक-रूप हैं। 7। हे भाई ! जनो ! सेवा और संतोष में जीवन बिताओ। गुरू की शरण पड़ कर दूसरों की ज्यादती सहने का गुण ग्रहण करो। अपनी आत्मा को पहचान के दूसरों की आत्मा को भी पहचानो। गुरू की संगति में रहने से ये निर्णय आता है। 8। माया-ग्रसित लोग माया के मोह में और छल में (अपने जीवन का) आसरा (तलाशते हैं)। वह दिन-रात अनेकों किस्मों की पराई निंदा करते रहते हैं। सिमरन से वंचित रह कर वे (इस निंदा आदि कर कर के गलत रास्ते पड़ कर) जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाते हैं। गरभ-जून के नर्कों में पड़ते हैं। 9। माया-ग्रसित जीवों के अंदर से जम का डर दूर नहीं होता। जम की सजा उनके सिर से नहीं टलती। अहंकारियों के सिर पर (विकारों का) असहि भार टिका रहता है (यह। मानो। उनके सिर पर कर्जा है) धर्मराज के इस कर्जे का लेखा उनके पास से लिया ही जाता है। 10। गुरू की शरण के बिना कोई भी माया-ग्रसित जीव (माया-मोह के समुंद्र से) पार नहीं लांघ सकता (माया की मस्ती के कारण वह) ‘हउ हउ मैं मैं’ करता संसार-समुंद्र में डूबा रहता है। गुरू के बिना कोई मनुष्य (इस समुंद्र का) परला किनारा नहीं ढूँढ सकता। परमात्मा का नाम जपना चाहिए। (नाम जपने से ही) उस पार के किनारे पर पहुँचा जा सकता है। 11। कोई आदमी गुरू की इस बख्शिश के राह में रुकावट नहीं डाल सकता। जिस मनुष्य पर गुरू बख्शिश करता है उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। (गुरू की मेहर से) जिस मनुष्य के मन में वह अपर-अपार प्रभू आ बसता है जनम-मरण का दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। 12। हे भाई ! अगर गुरू के दर से टूटे रहोगे तो (संसार में बार-बार) पैदा होते मरते रहोगे। जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहोगे और पाप-कर्म करते रहोगे। माया-ग्रसित मूर्ख गाफिल मनुष्य परमात्मा को याद नहीं करते। जब कोई दुख व्यापता है तो उस वक्त ‘हाय राम ! हाय राम !’ पुकारते हैं। 13। हे प्राणी ! पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के अनुसार दुख-सुख भोगे जाते हैं। इस भेद को वही परमात्मा जानता है जिसने (जिसने ये दुख-सुख भोगने के लिए) दिए हैं। हे प्राणी ! (होने वाले दुखों के कारण) आप किसी और को दोष नहीं दे सकता। ये अपने ही किए कर्मों का कठोर फल सह। 14।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मिलता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।