सतिगुर बचनी गति मिति पाई ॥
नानक हरि जपि हरि मन मेरे हरि मेले मेलणहारा हे ॥17॥3॥9॥
घरि रहु रे मन मुगध इआने ॥
रामु जपहु अंतरगति धिआने ॥
लालच छोडि रचहु अपरंपरि इउ पावहु मुकति दुआरा हे ॥1॥
जिसु बिसरिऐ जमु जोहणि लागै ॥
सभि सुख जाहि दुखा फुनि आगै ॥
राम नामु जपि गुरमुखि जीअड़े एहु परम ततु वीचारा हे ॥2॥
हरि हरि नामु जपहु रसु मीठा ॥
गुरमुखि हरि रसु अंतरि डीठा ॥
अहिनिसि राम रहहु रंगि राते एहु जपु तपु संजमु सारा हे ॥3॥
राम नामु गुर बचनी बोलहु ॥
संत सभा महि इहु रसु टोलहु ॥
गुरमति खोजि लहहु घरु अपना बहुड़ि न गरभ मझारा हे ॥4॥
सचु तीरथि नावहु हरि गुण गावहु ॥
ततु वीचारहु हरि लिव लावहु ॥
अंत कालि जमु जोहि न साकै हरि बोलहु रामु पिआरा हे ॥5॥
सतिगुरु पुरखु दाता वड दाणा ॥
जिसु अंतरि साचु सु सबदि समाणा ॥
जिस कउ सतिगुरु मेलि मिलाए तिसु चूका जम भै भारा हे ॥6॥
पंच ततु मिलि काइआ कीनी ॥
तिस महि राम रतनु लै चीनी ॥
आतम रामु रामु है आतम हरि पाईऐ सबदि वीचारा हे ॥7॥
सत संतोखि रहहु जन भाई ॥
खिमा गहहु सतिगुर सरणाई ॥
आतमु चीनि परातमु चीनहु गुर संगति इहु निसतारा हे ॥8॥
साकत कूड़ कपट महि टेका ॥
अहिनिसि निंदा करहि अनेका ॥
बिनु सिमरन आवहि फुनि जावहि ग्रभ जोनी नरक मझारा हे ॥9॥
साकत जम की काणि न चूकै ॥
जम का डंडु न कबहू मूकै ॥
बाकी धरम राइ की लीजै सिरि अफरिओ भारु अफारा हे ॥10॥
बिनु गुर साकतु कहहु को तरिआ ॥
हउमै करता भवजलि परिआ ॥
बिनु गुर पारु न पावै कोई हरि जपीऐ पारि उतारा हे ॥11॥
गुर की दाति न मेटै कोई ॥
जिसु बखसे तिसु तारे सोई ॥
जनम मरण दुखु नेड़ि न आवै मनि सो प्रभु अपर अपारा हे ॥12॥
गुर ते भूले आवहु जावहु ॥
जनमि मरहु फुनि पाप कमावहु ॥
साकत मूड़ अचेत न चेतहि दुखु लागै ता रामु पुकारा हे ॥13॥
सुखु दुखु पुरब जनम के कीए ॥
सो जाणै जिनि दातै दीए ॥
किस कउ दोसु देहि तू प्राणी सहु अपणा कीआ करारा हे ॥14॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मिलता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।