करि किरपा प्रभि पारि उतारी ॥ अगनि पाणी सागरु अति गहरा गुरु सतिगुरु पारि उतारा हे ॥2॥ मनमुख अंधुले सोझी नाही ॥ आवहि जाहि मरहि मरि जाही ॥ पूरबि लिखिआ लेखु न मिटई जम दरि अंधु खुआरा हे ॥3॥ इकि आवहि जावहि घरि वासु न पावहि ॥ किरत के बाधे पाप कमावहि ॥ अंधुले सोझी बूझ न काई लोभु बुरा अहंकारा हे ॥4॥ पिर बिनु किआ तिसु धन सीगारा ॥ पर पिर राती खसमु विसारा ॥ जिउ बेसुआ पूत बापु को कहीऐ तिउ फोकट कार विकारा हे ॥5॥ प्रेत पिंजर महि दूख घनेरे ॥ नरकि पचहि अगिआन अंधेरे ॥ धरम राइ की बाकी लीजै जिनि हरि का नामु विसारा हे ॥6॥ सूरजु तपै अगनि बिखु झाला ॥ अपतु पसू मनमुखु बेताला ॥ आसा मनसा कूड़ु कमावहि रोगु बुरा बुरिआरा हे ॥7॥ मसतकि भारु कलर सिरि भारा ॥ किउ करि भवजलु लंघसि पारा ॥ सतिगुरु बोहिथु आदि जुगादी राम नामि निसतारा हे ॥8॥ पुत्र कलत्र जगि हेतु पिआरा ॥ माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥ जम के फाहे सतिगुरि तोड़े गुरमुखि ततु बीचारा हे ॥9॥ कूड़ि मुठी चालै बहु राही ॥ मनमुखु दाझै पड़ि पड़ि भाही ॥ अंम्रित नामु गुरू वड दाणा नामु जपहु सुख सारा हे ॥10॥ सतिगुरु तुठा सचु द्रिड़ाए ॥ सभि दुख मेटे मारगि पाए ॥ कंडा पाइ न गडई मूले जिसु सतिगुरु राखणहारा हे ॥11॥ खेहू खेह रलै तनु छीजै ॥ मनमुखु पाथरु सैलु न भीजै ॥ करण पलाव करे बहुतेरे नरकि सुरगि अवतारा हे ॥12॥ माइआ बिखु भुइअंगम नाले ॥ इनि दुबिधा घर बहुते गाले ॥ सतिगुर बाझहु प्रीति न उपजै भगति रते पतीआरा हे ॥13॥ साकत माइआ कउ बहु धावहि ॥ नामु विसारि कहा सुखु पावहि ॥ त्रिहु गुण अंतरि खपहि खपावहि नाही पारि उतारा हे ॥14॥ कूकर सूकर कहीअहि कूड़िआरा ॥ भउकि मरहि भउ भउ भउ हारा ॥ मनि तनि झूठे कूड़ु कमावहि दुरमति दरगह हारा हे ॥15॥ सतिगुरु मिलै त मनूआ टेकै ॥ राम नामु दे सरणि परेकै ॥ हरि धनु नामु अमोलकु देवै हरि जसु दरगह पिआरा हे ॥16॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (जिस भी मनुष्य ने गुरू की ओर मुँह किया उसको) प्रभू ने मेहर करके संसार-समुंद्र से पार लंघा लिया। यह संसार एक बड़ा ही गहरा समुंद्र है इसमें पानी (की जगह विकारों की) आग (भड़क रही) है। इसमें से सतिगुरू ही पार लंघा सकता है। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले और माया के मोह में अंधे हुए लोगों को (इस तृष्णा-अग्नि के समुंद्र की) समझ नहीं आती। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़ते हैं और बार-बार आत्मिक मौत मरते हैं। (पर वे बिचारे भी क्या करें।) पिछले जन्मों-जन्मांतरों के किए कर्मों के संस्कारों के लिखे लेख (जो उनके मन में उकरे हुए हैं) मिटते नहीं। माया के मोह में अंधा हुआ जीव जम के दर पर दुखी हेता है। 3। (इसी तरह माया के मोह में फस के) अनेकों ही जीव पैदा होते हैं मरते हैं। पैदा होते हैं मरते हैं। पर अपने अंतरात्मे अडोलता नहीं प्राप्त कर सकते। वे पिछले किए कर्मों के संस्कारों में बँधे हुए (और और) पाप किए जाते हैं। माया का लोभ और अहंकार बड़ी बुरी बला है। इसमें अँधे हुए जीव को कोई सूझ-बूझ नहीं आ सकती (कि किस राह पर पड़ा हुआ है)। 4। जो स्त्री। पति से विछुड़ी हुई हो उसका हार-श्रृंगार किस अर्थ का। उसने तो अपना पति बिसार रखा है और वह पराए मर्द से रंग-रलियाँ मनाती है। (ये हार-श्रृंगार उसको और भी ज्यादा नर्क में डालता है)। जैसे किसी वैश्या के पुत्र के पिता का नाम नहीं बताया जा सकता (वह जगत में हास्यास्पद ही होता है। इसी तरह पति-प्रभू से विछुड़ी हुई जीव-स्त्री के) और-और किये हुए कर्म फोके और विकार ही हैं (इनमें से उसे मायूसी ही मिलती है)। 5। (जो जीव प्रभू का नाम नहीं सिमरते वे। मानो। प्रेत-जून में हैं। उनके ये मानस शरीर भी प्रेत के रहने का पिंजर ही है) इन प्रेत-पिंजरों में वह बेअंत दुख सहते हैं। अज्ञानता के अंधकार में पड़ कर वह (आत्मिक मौत के) नर्क में दुखी होते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया है (उसके सिर पर विकारों का कर्जा चढ़ जाता है। वह मनुष्य धर्मराज का करजाई हो जाता है) उससे धर्मराज के इस कर्जे की वसूली की जाती है (भाव। विकारों के कारण उसको दुख ही सहने पड़ते हैं)। 6। (मनमुख के अंदर। मानो। माया के मोह का) सूरज तपता रहता है। उसके अंदर विषौली तृष्णा-अग्नि की लपटें निकलती रहती हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। मानो। भूत है (मनुष्य-शरीर होते हुए भी अंतरात्मे) पशु है। उसे कहीं आदर नहीं मिलता। जो लोग दुनियां की आशाओं और मन के मायावी फुरनों में फस के माया के मोह की कमाई ही करते रहते हैं। उनको (मोह का यह) अत्यंत बुरा रोग चिपका रहता है। 7। जिस मनुष्य के माथे पर सिर पर (पापों के) कलॅर का बहुत सारा भार रखा हो। वह संसार-समुंद्र में से कैसे पार लांघेगा। दुनिया के आरम्भ से ही जुगों में आदि से ही सतिगुरू जहाज है जो जीवों को परमात्मा के नाम में जोड़ के पार लंघा देता है। 8। जगत में माया का मोह रूप पसारा पसरा हुआ है। (सब जीवों का) पुत्र से स्त्री से मोह है प्यार है (पर यह मोह आत्मिक मौत का कारण बनता है)। इस आत्मिक मौत के फंदे सतिगुरू ने (उस मनुष्य के गले में) तोड़ डाले हैं जो गुरू के सन्मुख रह के मूल-प्रभू को अपने सोच-मण्डल में टिकाता है। 9। जो जीव-स्त्री माया के मोह में (पड़ कर आत्मिक जीवन की पूँजी) लुटा बैठती है। वह (सही जीवन राह से भटक के) कई और राहों में भटकती फिरती है। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है वह तृष्णा की आग में पड़-पड़ कर जलता है (दुखी होता है)। (इस रोग से बचाने के लिए) गुरू (जो) बहुत समझदार (हकीम) है आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम देता है। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) नाम जपो (इसी में) श्रेष्ठ सुख है। 10। जिस मनुष्य पर गुरू प्रसन्न होता है उसके (हृदय में) सदा-स्थिर हरी-नाम पक्का कर देता है। उसके सारे दुख मिटा देता है। उसको जिंदगी के सही रास्ते पर डाल देता है। सतिगुरू जिस मनुष्य का रखवाला बनता है (जिंदगी के राहों में गुजरते हुए) उसके पैरों में काँटा नहीं चुभता (उसको अहंकार का काँटा दुखी नहीं करता)। 11। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पत्थर दिल ही रहता है कभी (भक्ति-भाव में) नहीं भीगता। सारी उम्र माया के मोह में ही उसका शरीर आखिर नाश हो जाता है (उसका श्रेष्ठ मनुष्य जीवन) राख में मिल जाता है। (जीवन का समय बीत जाने पर अगर वह) बहुत सारे तरले भी करे (तो किसी अर्थ के नहीं) वह कभी नर्क में और कभी स्वर्ग में पैदा ही होता रहता है (भाव। जनम-मरण के चक्कर में पड़ कर दुख-सुख भोगता रहता है)। 12। (गुरू की शरण पड़े बिना) माया के मोह-रूपी साँप का जहर जीवों के अंदर टिका रहता है (और जीवों को आत्मिक मौत मारता रहता है)। इसने दुविधा में डाल के अनेकों घर गला दिए हैं (मोह ने प्रभू के बिना और ही आसरों की झाक में पड़ कर अनेकों जीवन बर्बाद कर दिए हैं)। गुरू के बिना मनुष्य के हृदय में प्रभू-चरणों के प्रति प्रीति पैदा नहीं होती। जो मनुष्य (गुरू के द्वारा) परमात्मा के भक्ति-रंग में रंगे जाते हैं उनका मन प्रभू की याद में प्रसन्न रहता है। 13। माया-ग्रसित जीव माया इकट्ठी करने की खातिर बहुत दौड़-भाग करते हैं (क्योंकि वे इसी में सुख तलाशने की आशा रखते हैं) पर परमात्मा का नाम भुला के आत्मिक आनंद कहाँ से ले सकते हैं। वे माया के तीन गुणों में ही फसे रह के दुखी होते हैं (औरों को भी) दुखी करते हैं। दुखों के इस समुंद्र में से वे दूसरे छोर पर नहीं पहुँच सकते। 14। निरे झूठ के व्यापारी व्यक्ति (देखने में तो मनुष्य हैं। पर दरअसल वे) कुत्ते और सूअर ही (अपने आपको कहलवाते हैं) (क्योंकि कुक्तों और सूअरों की तरह माया की खातिर) भौंक-भौंक के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। सारी उम्र भटकते-भटकते थक टूट जाते हैं। उनके मन में माया का मोह। उनके शरीर में माया का मोह। सारी उम्र वह मोह की कमाई ही करते हैं। इस बुरी मति के पीछे लग के परमात्मा की दरगाह में वे जीवन-बाज़ी हार जाते हैं। 15। अगर सतिगुरू मिल जाए तो मनुष्य को परमात्मा का नाम दे के उसके (डोलते) मन को सहारा देता है। गुरू उसको परमात्मा का नाम-रूप अमूल्य (कीमती) धन देता है। परमात्मा की सिफत-सालाह (की दाति) देता है (जिसकी बरकति से उसको) प्रभू की दरगाह में आदर-प्यार मिलता है। 16।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(जिस भी मनुष्य ने गुरू की ओर मुँह किया उसको) प्रभू ने मेहर करके संसार-समुंद्र से पार लंघा लिया।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।