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अंग 1028

अंग
1028
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु दाता मुकति कराए ॥
सभि रोग गवाए अंम्रित रसु पाए ॥
जमु जागाति नाही करु लागै जिसु अगनि बुझी ठरु सीना हे ॥5॥
काइआ हंस प्रीति बहु धारी ॥
ओहु जोगी पुरखु ओह सुंदरि नारी ॥
अहिनिसि भोगै चोज बिनोदी उठि चलतै मता न कीना हे ॥6॥
स्रिसटि उपाइ रहे प्रभ छाजै ॥
पउण पाणी बैसंतरु गाजै ॥
मनूआ डोलै दूत संगति मिलि सो पाए जो किछु कीना हे ॥7॥
नामु विसारि दोख दुख सहीऐ ॥
हुकमु भइआ चलणा किउ रहीऐ ॥
नरक कूप महि गोते खावै जिउ जल ते बाहरि मीना हे ॥8॥
चउरासीह नरक साकतु भोगाईऐ ॥
जैसा कीचै तैसो पाईऐ ॥
सतिगुर बाझहु मुकति न होई किरति बाधा ग्रसि दीना हे ॥9॥
खंडे धार गली अति भीड़ी ॥
लेखा लीजै तिल जिउ पीड़ी ॥
मात पिता कलत्र सुत बेली नाही बिनु हरि रस मुकति न कीना हे ॥10॥
मीत सखे केते जग माही ॥
बिनु गुर परमेसर कोई नाही ॥
गुर की सेवा मुकति पराइणि अनदिनु कीरतनु कीना हे ॥11॥
कूड़ु छोडि साचे कउ धावहु ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु ॥
साच वखर के वापारी विरले लै लाहा सउदा कीना हे ॥12॥
हरि हरि नामु वखरु लै चलहु ॥
दरसनु पावहु सहजि महलहु ॥
गुरमुखि खोजि लहहि जन पूरे इउ समदरसी चीना हे ॥13॥
प्रभ बेअंत गुरमति को पावहि ॥
गुर कै सबदि मन कउ समझावहि ॥
सतिगुर की बाणी सति सति करि मानहु इउ आतम रामै लीना हे ॥14॥
नारद सारद सेवक तेरे ॥
त्रिभवणि सेवक वडहु वडेरे ॥
सभ तेरी कुदरति तू सिरि सिरि दाता सभु तेरो कारणु कीना हे ॥15॥
इकि दरि सेवहि दरदु वञाए ॥
ओइ दरगह पैधे सतिगुरू छडाए ॥
हउमै बंधन सतिगुरि तोड़े चितु चंचलु चलणि न दीना हे ॥16॥
सतिगुर मिलहु चीनहु बिधि साई ॥
जितु प्रभु पावहु गणत न काई ॥
हउमै मारि करहु गुर सेवा जन नानक हरि रंगि भीना हे ॥17॥2॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा की मेहर से मिला हुआ) सतिगुरू आत्मिक जीवन के गुणों की दाति देता है। विकारों से बचाता है। हमारे हृदय में अमृत-नाम का रस डाल के हमारे रोग दूर करता है। (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य की तृष्णा-अग्नि बुझ जाती है जिसकी छाती (नाम की ठंड से) ठंडी-ठार हो जाती है। जम-मसूलिया उसके नजदीक नहीं फटकता। उसको (जम का) कर नहीं देना पड़ता (क्योंकि उसको गुरू की किरपा से सिमरन के बिना और कोई मायावी वस्तु सौदा अपने जीवन-बेड़े में लादा ही नहीं)। 5। यह काया (जैसे) एक सुंदर स्त्री है (पर जगत में आ के) पक्षी जीवात्मा काया-नारि से बहुत प्रीति बना लेता है। यह जीवात्मा (मानो) एक जोगी है (जो जोगी वाली फेरी डाल के जगत से चला जाता है)। रंग-रलियों में मस्त जोगी-जीवात्मा दिन-रात काया को भोगता है (दरगाह से संदेशा बुलावा आने पर) चलने के वक्त (जोगी-जीव काया नारि से) सलाह भी नहीं करता। 6। जगत पैदा करके प्रभू सब जीवों की रक्षा करता है। हवा पानी आग (आदि सब तत्वों से शरीर रच के सबके अंदर) प्रकट रहता है। (पर उस रखवाले प्रभू को भुला के) मूर्ख मन कामादिक वैरियों की संगति में मिल के भटकता है। और अपने किए का फल पाता है। 7। परमात्मा का नाम भुला के दोखों (विकारों) में फस जाया जाता है दुख सहने पड़ते हैं। जब प्रभू का हुकम (बुलावा) आता है। यहाँ से चलना पड़ता है। फिर यहाँ रह ही नहीं सकते। (परमात्मा की याद से टूट के सारी उम्र) नर्कों के कूएँ में गोते खाता रहता है (इस तरह तड़फता है) जैसे पानी से बाहर निकल के मछली (तड़फती है)। 8। माया-ग्रसित जीव (परमात्मा को भुला के) चौरासी लाख जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है। (सृजनहार की रजा का नियम ही ऐसा है कि) जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं। गुरू की शरण पड़े बिना (चौरासी के चक्करों में से) मुक्ति नहीं होती। अपने किए कर्मों का बँधा जीव उस चक्कर में फंसा ही रहता है। 9। (इस विकार भरे जगत में सही इन्सानी जीवन का रास्ता। मानो) एक बड़ी ही तंग गली (में से गुजरता है जहाँ बहुत ही संकोच करके संजोअ के चलना पड़ता) है (वह रास्ता। जैसे) खंडे की धार (जैसा तेज) है (जिसके ऊपर से गुजरते हुए थोड़ा सा भी डोलने से विकारों के समुंद्र में गिर जाते हैं)। किए कर्मों का हिसाब भी पूरा करना पड़ता है (भाव। जब तक मन में विकारों के संस्कार मौजूद हैं। तब तक विकारों से मुक्ति नहीं मिलती) जैसे तिलों को (कोल्हू में) पीड़ने से ही तेल निकलता है (वैसे ही दुख के कोल्हू में पड़ कर विकारों से मुक्ति मिलती है)। इस दुख में माता-पिता-पत्नी-पुत्र कोई भी सहायक नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम-रस की प्राप्ति के बिना (विकारों से) मुक्ति नहीं मिलती। 10। जगत में (चाहे) अनेकों ही मित्र साथी (बना लें)। पर गुरू के बिना परमात्मा के बिना (विकारों के समुंद्र में डूबते जीव का) कोई मददगार नहीं बनता। गुरू की बताई हुई सेवा ही (विकारों से) मुक्ति का आसरा बनता है। (जो व्यक्ति) हर वक्त प्रभू की सिफत सालाह करता है (वह विकारों से स्वतंत्र हो जाता है)। 11। (हे भाई !) माया का मोह छोड़ के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मिलने का उद्यम करो (माया की ओर से नहीं तरसोगे)। जो कुछ (प्रभू-दर से) माँगोगे वही मिल जाएगा। (पर माया इतनी प्रबल है कि) सदा-कायम रहने वाले नाम-वस्तु के व्यापार वाले (जगत में) कोई एक-आध ही होते हैं। जो मनुष्य ये वाणज्य करता है वह (उच्च आत्मिक अवस्था का) लाभ कमा लेता है। 12। (हे भाई !) परमात्मा के नाम का सौदा (यहाँ से) खरीद के चलो। परमात्मा के दर्शन पाएँगे। उसकी दरगाह से (वह दाति मिलेगी जिसकी बरकति से) अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहोगे। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे लोग (आत्मिक गुणों में) पूर्ण (हो के प्रभू का नाम-सौदा) हासिल कर लेते हैं। और इस तरह प्यार करने वाले परमात्मा को (अपने अंदर बसता ही) पहचान लेते हैं। 13। कोई विरले (भाग्यशाली) लोग गुरू की मति ले कर बेअंत गुणों के मालिक परमात्मा को पा लेते हैं। गुरू के शबद में जुड़ के (अपने) मन को (विकारों की तरफ दौड़ने से हटाने के लिए) समझाते हैं। हे भाई ! सतिगुरू की बाणी में पूर्ण श्रद्धा बनाओ। इस तरह (भाव। गुरू की बाणी में श्रद्धा बनाने से) सर्व-व्यापक परमात्मा में लीन हुआ जाता है (और विकारों की ओर की दौड़ भटकना समाप्त हो जाती है)। 14। हे प्रभू ! नारद (आदि बड़े-बड़े ऋषिगण) और शारदा (जैसी बेअंत देवियाँ) सब आपके (ही दर के) सेवक हैं। इस त्रिभवनी संसार में बड़े से बड़े कहलवाने वाले भी आपके दर के सेवक हैं। यह सारी रचना आपकी ही रची हुई है। यह सारा संसार आपका ही बनाया हुआ है। आप हरेक जीव के सिर पर राज़क है। 15। अनेकों ही जीव (आपके नाम की बरकति से अपना) दुख-दर्द दूर करके आपके दर पर आपकी सेवा-भक्ति करते हैं। जिनको सतिगुरू (विकारों के पँजे से) छुड़ा लेता है उनको परमात्मा की दरगाह में आदर-सत्कार मिलता है। जिन (भाग्यशालियों) के अहंकासर के बँधन सतिगुरू ने तोड़ दिए। उनके चँचल मन को गुरू ने (विकारों की तरफ) भटकने नहीं दिया। 16। हे भाई ! आप गुरू को मिलो। और (गुरू से) वह ढंग-तरीका सीख लो जिसकी सहायता से परमात्मा को मिल सको। और कर्मों का लेखा भी कोई ना रह जाए। अपने अहंकार को मार कर गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करो। हे दास नानक ! (जो मनुष्य गुरू द्वारा बताई हुई सेवा करता है) वह परमात्मा के प्रेम-रंग में भीग जाता है। 17। 2। 8।
मारू महला 1 ॥
असुर सघारण रामु हमारा ॥
घटि घटि रमईआ रामु पिआरा ॥
नाले अलखु न लखीऐ मूले गुरमुखि लिखु वीचारा हे ॥1॥
गुरमुखि साधू सरणि तुमारी ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हमारा परमात्मा (हमारे मनों में से कामादिक) दैत्यों का नाश करने में समर्थ है। वह प्यारा सुंदर राम हरेक शरीर में बसता है। हर वक्त हमारे अंदर मौजूद है। फिर भी वह अलख है। उसका स्वरूप बिल्कुल ही बयान नहीं किया जा सकता। (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर उसके गुणों की विचार (अपने हृदय में) परो लो। 1। हे प्रभू ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के आपकी शरण पड़ते हैं वे अपने मन को साध लेते हैं (विकारों से रोक लेते हैं)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा की मेहर से मिला हुआ) सतिगुरू आत्मिक जीवन के गुणों की दाति देता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।