चारि पदारथ लै जगि आइआ ॥ सिव सकती घरि वासा पाइआ ॥ एकु विसारे ता पिड़ हारे अंधुलै नामु विसारा हे ॥6॥ बालकु मरै बालक की लीला ॥ कहि कहि रोवहि बालु रंगीला ॥ जिस का सा सो तिन ही लीआ भूला रोवणहारा हे ॥7॥ भरि जोबनि मरि जाहि कि कीजै ॥ मेरा मेरा करि रोवीजै ॥ माइआ कारणि रोइ विगूचहि ध्रिगु जीवणु संसारा हे ॥8॥ काली हू फुनि धउले आए ॥ विणु नावै गथु गइआ गवाए ॥ दुरमति अंधुला बिनसि बिनासै मूठे रोइ पूकारा हे ॥9॥ आपु वीचारि न रोवै कोई ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होई ॥ बिनु गुर बजर कपाट न खूलहि सबदि मिलै निसतारा हे ॥10॥ बिरधि भइआ तनु छीजै देही ॥ रामु न जपई अंति सनेही ॥ नामु विसारि चलै मुहि कालै दरगह झूठु खुआरा हे ॥11॥ नामु विसारि चलै कूड़िआरो ॥ आवत जात पड़ै सिरि छारो ॥ साहुरड़ै घरि वासु न पाए पेईअड़ै सिरि मारा हे ॥12॥ खाजै पैझै रली करीजै ॥ बिनु अभ भगती बादि मरीजै ॥ सर अपसर की सार न जाणै जमु मारे किआ चारा हे ॥13॥ परविरती नरविरति पछाणै ॥ गुर कै संगि सबदि घरु जाणै ॥ किस ही मंदा आखि न चलै सचि खरा सचिआरा हे ॥14॥ साच बिना दरि सिझै न कोई ॥ साच सबदि पैझै पति होई ॥ आपे बखसि लए तिसु भावै हउमै गरबु निवारा हे ॥15॥ गुर किरपा ते हुकमु पछाणै ॥ जुगह जुगंतर की बिधि जाणै ॥ नानक नामु जपहु तरु तारी सचु तारे तारणहारा हे ॥16॥1॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा से) चार पदार्थ ले कर जीव जगत में आया है। (पर यहाँ आ के) प्रभू की रची हुई माया के घर में ठिकाना बना बैठा है (भाव। माया के मोह में फस जाता है। माया के मोह में) अंधे हुए जीव ने प्रभू का नाम भुला दिया है। जो जीव नाम भुलाता है वह मानस जनम की बाजी हार जाता है। 6। (देखो माया के मोह का प्रभाव ! जब किसी के घर में कोई) बालक मरता है। तो (माता-पिता-बहिन-भाई आदि संबंधी जन) उस बालक की प्यार-भरी खेलें याद करते हैं। और यह कह-कह के रोते हैं कि बालक बहुत ही हस-मुख था। जिस प्रभू का भेजा हुआ वह बालक था उसने वह वापस ले लिया (उसको याद कर-कर के) रोने वाला (माया के मोह में फस के जीवन-राह से) टूट जाता है। 7। जब कोई भर जवानी में मर जाते हैं तो भी क्या किया जा सकता है। ये कह-कह के रोया जाता ही है कि वह मेरा (प्यारा) था। (जो रोते भी हैं वह भी अपनी कमियां याद कर कर के) माया की खातिर रो-रो के दुखी होते हैं। जगत में ऐसा जीवन धिक्कारयोग्य हो जाता है। 8। (जवानी गुजर जाती है) काले केसों से फिर धौले आ जाते हैं (इस उम्र तक भी) प्रभू के नाम से टूटा रह के मनुष्य अपने आत्मिक जीवन का सरमाया गवाए जाता है। बुरी मति के पीछे लग के माया के मोह में अंधा हुआ जीव आत्मिक मौत सहेड़ के आत्मिक मौत मरता रहता है। माया का ठॅगा हुआ माया की खातिर ही रो-रो के पुकारता है (उस उम्र तक भी माया के रोने रोता रहता है)। 9। जो कोई मनुष्य अपने आप को विचारता है (अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है) वह पछताता नहीं। पर यह समझ किसी को तब ही होती है जब उसको गुरू मिल जाए। (माया के मोह के कारण मनुष्य की अक्ल पर पर्दा पड़ा रहता है; अक्ल मानो। करड़े किवाड़ों में बंद रहती है) गुरू के बिना (वे) करड़े किवाड़ नहीं खुलते। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है वह (इस कैद में से) मुक्ति हासिल कर लेता है। 10। मनुष्य बुढा हो जाता है। (उसका) शरीर भी कमजोर हो जाता है (पर माया का मोह इतना प्रबल है कि अभी भी) परमात्मा का नाम नहीं सिमरता जो (सब साक-संबंधियों के साथ छोड़ जाने पर भी) अंत को प्यारा साथी बनता है। परमात्मा का नाम भुला के मनुष्य बदनामी का टीका माथे पर लगा के यहाँ से चल पड़ता है। पल्ले झूठ ही है (पल्ले माया का मोह ही है। इस वास्ते) प्रभू की हजूरी में ख़्वार ही होता है। 11। (सारी उम्र) झूठ का व्यापार करने वाला व्यक्ति परमात्मा का नाम भुला के (यहाँ से आत्मिक गुणों से खाली हाथ) चल पड़ता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़े हुए के सिर पर राख ही पड़ती है (धिक्कारें पड़ती हैं)। (यहाँ से गए को) परमात्मा के दर पर कोई जगह नहीं मिलती। (जब तक) जगत में (रहा। यहाँ) भी सिर पर चोटें ही खाता रहा। 12। (अच्छा) खाते हैं। (अच्छा) पहनते हैं। (दुनिया की) मौज मनाते हैं (इन ही व्यस्तताओं में) हृदय परमात्मा की भक्ति से सूना रहने के कारण व्यर्थ ही आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। जो व्यक्ति (इस तरह अंधा हो के) अच्छे-बुरे समय की सूझ नहीं जानता। उसको जम दुखी करता है। और उसकी कोई पेश नहीं चलती। 13। जो मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ दुनिया से उपराम रहना जानता है। जो गुरू की संगति में रह के गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा के साथ मिलाप-अवस्था वाली सांझ डाले रखता है। जीवन-यात्रा में किसी को बुरा नहीं कहता। सदा-स्थिर-प्रभू में टिका रहता है वह सच का व्यापारी व्यक्ति (प्रभू की हजूरी में) खरा (सिक्का माना जाता) है। 14। सदा-स्थिर-प्रभू के नाम के बिना कोई मनुष्य (प्रभू के) दर पे (जिंदगी की पड़ताल में) कामयाब नहीं होता। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में जुड़ने से सिरोपा मिलता है सम्मान मिलता है। (पर जीवों के भी क्या वश।) जिस पर प्रभू स्वयं बख्शिश करता है। वह उसको प्यारा लगने लग जाता है और वह अहम्-अहंकार (अपने अंदर से) दूर करता है। 15। गुरू की मेहर से ही मनुष्य परमात्मा के हुकम को पहचानता है और युगों-युगांतरों से चली आ रही उस विधि से सांझ डालता है (जिससे संसार-समुंद्र से सही सलामत पार लांघा जा सकता है। वह विधि है परमात्मा का नाम सिमरना)। हे नानक ! (कह- हे भाई ! परमात्मा का) नाम जपो (नाम सिमरन की) तैराकी तैरो। (इस तरह) सदा-स्थिर-प्रभू और पार लंघाने में समर्थ प्रभू (संसार-समुंद्र में से) पार लंघा लेता है। 16। 1। 7।
मारू महला 1 ॥ हरि सा मीतु नाही मै कोई ॥ जिनि तनु मनु दीआ सुरति समोई ॥ सरब जीआ प्रतिपालि समाले सो अंतरि दाना बीना हे ॥1॥ गुरु सरवरु हम हंस पिआरे ॥ सागर महि रतन लाल बहु सारे ॥ मोती माणक हीरा हरि जसु गावत मनु तनु भीना हे ॥2॥ हरि अगम अगाहु अगाधि निराला ॥ हरि अंतु न पाईऐ गुर गोपाला ॥ सतिगुर मति तारे तारणहारा मेलि लए रंगि लीना हे ॥3॥ सतिगुर बाझहु मुकति किनेही ॥ ओहु आदि जुगादी राम सनेही ॥ दरगह मुकति करे करि किरपा बखसे अवगुण कीना हे ॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ मुझे परमात्मा जैसा और कोई मित्र नहीं दिखता। (परमात्मा ही है) जिसने मुझे यह शरीर दिया यह (मन) जीवात्मा दी और मेरे अंदर सुरति टिका दी। (वह सिर्फ प्रभू ही है जो) सारे जीवों की पालना करके सबकी संभाल करता है। वह सब जीवों के अंदर मौजूद है। सबके दिलों की जानता है। सबके किए कर्मों को देखता है। 1। (पर वह मित्र-प्रभू गुरू की शरण पड़ने से मिलता है) गुरू सरोवर है। हम जीव उस प्यारे (सरोवर) के हंस हैं (गुरू के हो के रहने वाले हंसों को गुरू मान-सरोवर में मोती मिलते हैं)। (गुरू समुंद्र है) उस समुंद्र में (परमात्मा की सिफत-सालाह के) रतन हैं। लाल हैं। मोती-माणक हैं। हीरे हैं। (गुरू-समुंद्र में टिक के) परमात्मा के गुण गाने से मन (हरी के प्रेम-रंग में) भीग जाता है। शरीर (भी) भीग जाता है। 2। (सब जीवों में व्यापक होते हुए भी) परमात्मा जीवों की पहुँच से परे है। अथाह है। उसके गुणों (के समुंद्र) की थाह नहीं मिलती। वह निर्लिप है। सृष्टि के रखवाले। सबसे बड़े हरी के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। सब जीवों को संसार-समुंद्र से पार लंघाने में समर्थ प्रभू सतिगुरू की मति दे कर पार लंघा लेता है। जिस जीव को वह अपने चरणों में जोड़ता है वह उसके प्रेम-रंग में लीन हो जाता है। 3। गुरू को मिले बिना (माया के मोह-समुंद्र से) मुकित नहीं मिलती। वह परमात्मा सारे जगत का मूल है। जुगों के आरम्भ से है। सबमें व्यापक और सबसे प्यार करने वाला है (वह स्वयं ही गुरू से मिलाता है)। वह परमात्मा मेहर करके हमारे किए अवगुणों को बख्शता है। हमें अवगुणों से मुक्ति देता है और अपनी हजूरी में रखता है। 4।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा से) चार पदार्थ ले कर जीव जगत में आया है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।