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अंग 1026

अंग
1026
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
छोडिहु निंदा ताति पराई ॥
पड़ि पड़ि दझहि साति न आई ॥
मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे ॥7॥
छोडहु काम क्रोधु बुरिआई ॥
हउमै धंधु छोडहु लंपटाई ॥
सतिगुर सरणि परहु ता उबरहु इउ तरीऐ भवजलु भाई हे ॥8॥
आगै बिमल नदी अगनि बिखु झेला ॥
तिथै अवरु न कोई जीउ इकेला ॥
भड़ भड़ अगनि सागरु दे लहरी पड़ि दझहि मनमुख ताई हे ॥9॥
गुर पहि मुकति दानु दे भाणै ॥
जिनि पाइआ सोई बिधि जाणै ॥
जिन पाइआ तिन पूछहु भाई सुखु सतिगुर सेव कमाई हे ॥10॥
गुर बिनु उरझि मरहि बेकारा ॥
जमु सिरि मारे करे खुआरा ॥
बाधे मुकति नाही नर निंदक डूबहि निंद पराई हे ॥11॥
बोलहु साचु पछाणहु अंदरि ॥
दूरि नाही देखहु करि नंदरि ॥
बिघनु नाही गुरमुखि तरु तारी इउ भवजलु पारि लंघाई हे ॥12॥
देही अंदरि नामु निवासी ॥
आपे करता है अबिनासी ॥
ना जीउ मरै न मारिआ जाई करि देखै सबदि रजाई हे ॥13॥
ओहु निरमलु है नाही अंधिआरा ॥
ओहु आपे तखति बहै सचिआरा ॥
साकत कूड़े बंधि भवाईअहि मरि जनमहि आई जाई हे ॥14॥
गुर के सेवक सतिगुर पिआरे ॥
ओइ बैसहि तखति सु सबदु वीचारे ॥
ततु लहहि अंतरगति जाणहि सतसंगति साचु वडाई हे ॥15॥
आपि तरै जनु पितरा तारे ॥
संगति मुकति सु पारि उतारे ॥
नानकु तिस का लाला गोला जिनि गुरमुखि हरि लिव लाई हे ॥16॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) पराई ईष्या और पराई निंदा छोड़ दो। (जो निंदा और ईष्या करते हैं वे निंदा और ईष्या की जलन में) पड़-पड़ कर जलते हैं (उनको अपने आप को भी) आत्मिक शांति नहीं मिलती। (हे भाई !) सत-संगति में मिल के प्रभू के नाम की सिफत-सालाह करो (जो लोग सिफत-सालाह करते हैं) परमात्मा उनका (सदा का) साथी बन जाता है। 7। हे भाई ! काम-क्रोध आदि मंद-कर्म त्यागो। अहंकार की उलझन छोड़ो। (विकारों में) खचित होने से बचो। (पर इन विकारों से) तब ही बच सकोगे अगर सतिगुरू का आसरा लेंगे। इसी तरह ही (भाव। गुरू की शरण पड़ कर ही) संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। 8। निंदा तात पराई कोम क्रोध बुराई वाले जीवन में पड़ कर निरोल आग की नदी में से गुजरने वाला जीवन-राह बन जाता है वहाँ वह लाटें निकलती हैं जो आत्मिक जीवन को मार-मुकाती हैं। उस आत्मिक बिपता में कोई और साथी नहीं बनता। अकेली अपनी जीवात्मा ही दुख सहती है। (निंदा-ईष्या-काम-क्रोध आदि की) आग का समुंद्र इतने शोले भड़काता है इतनी लाटें छोड़ता हैं कि अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे उस में पड़ कर जलते हैं (आत्मिक जीवन तबाह कर लेते हैं और दुखी होते हैं)। 9। (इस आग के समुंद्र से) मुक्ति (का उपाय) गुरू के पास ही है। गुरू अपनी रजा में (परमात्मा के नाम की) ख़ैर डालता है। जिसने यह ख़ैर प्राप्त की वह (वह इस समुंद्र में से बच निकलने का) भेद समझ लेता है। जिन्हें गुरू से नाम-दान मिलता है। हे भाई ! उनसे पूछ के देख लो (वे बताते हैं कि) सतिगुरू की बताई हुई सेवा करने से आत्मिक आनंद मिलता है। 10। गुरू की शरण पड़े बिना जीव विकारों में फस के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। (आत्मिक) मौत (उनके) सिर पर (बार-बार) चोट मारती है और (उनको) दुखी करती (रहती है)। (निंदा के फंदे में) बँधे हुए निंदक लोगों को (निंदा की वादी में से) मुक्ति नसीब नहीं होती। पराई निंदा (के समुंद्र में) सदा गोते खाते रहते हैं। 11। (हे भाई !) सदा-स्थिर प्रभू का नाम जपो। उसको अपने अंदर बसता प्रतीत करो। ध्यान लगा के देखो। वह आपसे दूर नहीं। गुरू की शरण पड़ कर (नाम जपो। नाम सिमरन की) तैराकी तैरो (जीवन-यात्रा में कोई) रुकावट नहीं आएगी। गुरू इस तरह (भाव। नाम जपा के) संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 12। परमात्मा का नाम हरेक जीव के शरीर के अंदर निवास रखता है। अविनाशी करतार स्वयं ही (हरेक के अंदर) मौजूद है। (जीव उस परमात्मा की ही अंश है। इस वास्ते) जीवात्मा ना मरती है। ना ही इसको कोई मार सकता है। रजा का मालिक करतार (जीव) पैदा करके अपने हुकम में (सबकी) संभाल करता है। 13। वह परमात्मा शुद्ध-स्वरूप है। उसमें (माया के मोह आदि का) रक्ती भर भी अंधेरा नहीं। वह सत्य-स्वरूप प्रभू स्वयं ही (हरेक के) हृदय तख़्त पर बैठा हुआ है। पर माया-गसित जीव माया के मोह में बँध के भटकना में पड़े हुए हैं। मरते हैं पैदा होते हैं। उनका ये आवागवन का चक्र बना रहता है। 14। गुरू से प्यार करने वाले गुरू के सेवक (माया-मोह से निर्लिप रह के) हृदय-तख़्त पर बैठे रहते हैं। गुरू के शबद को अपनी सोच के मण्डल में टिकाते हैं। वे जगत के मूल प्रभू को पा लेते हैं। अपने अंदर बसता पहचान लेते हैं। साध-संगति में टिक के सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं। और आदर पाते हैं। 15। (जो मनुष्य नाम सिमरता है) वह स्वयं संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। अपने पित्रों को (पिता-दादा आदि बुजुर्गों को) भी पार लंघा लेता है। उसकी संगति में आने वालों को भी माया के बँधनों से स्वतंत्रता मिल जाती है। वह सेवक उनको पार लंघा देता है। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ी है नानक (भी) उस (भाग्यशाली) का सेवक है गुलाम है। 16। 6।
मारू महला 1 ॥
केते जुग वरते गुबारै ॥
ताड़ी लाई अपर अपारै ॥
धुंधूकारि निरालमु बैठा ना तदि धंधु पसारा हे ॥1॥
जुग छतीह तिनै वरताए ॥
जिउ तिसु भाणा तिवै चलाए ॥
तिसहि सरीकु न दीसै कोई आपे अपर अपारा हे ॥2॥
गुपते बूझहु जुग चतुआरे ॥
घटि घटि वरतै उदर मझारे ॥
जुगु जुगु एका एकी वरतै कोई बूझै गुर वीचारा हे ॥3॥
बिंदु रकतु मिलि पिंडु सरीआ ॥
पउणु पाणी अगनी मिलि जीआ ॥
आपे चोज करे रंग महली होर माइआ मोह पसारा हे ॥4॥
गरभ कुंडल महि उरध धिआनी ॥
आपे जाणै अंतरजामी ॥
सासि सासि सचु नामु समाले अंतरि उदर मझारा हे ॥5॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ अनेकों ही युग घोर अंधकार में गुजर गए। (भाव। सृष्टि-रचना से पहले बेअंत समय ऐसी हालत थी जिसके बाबत कुछ भी समझ नहीं आ सकती)। तब अपर-अपार परमात्मा ने (अपने आप में) समाधि लगाई हुई थी। उस घुप अंधेरे में प्रभू स्वयं निर्लिप बैठा हुआ था। तब ना जगत का पसारा था और ना ही माया वाली दौड़-भाग थी। 1। (घोर अंधकार के) छक्तिस युग उस परमात्मा ने ही बरताए रखे। जैसे उसे अच्छा लगा उसी तरह (उस घुप अंधेरे वाली कार ही) चलाता रहा। वह परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। उससे परे और कोई हस्ती नहीं। उसका परला छोर नहीं पाया जा सकता। कोई भी उसके बराबर का नहीं दिखता। 2। (अब जब उसने जगत-रचना रच ली है। तो भी। हे भाई ! उसी को) चारों जुगों (जगत के अंदर) गुप्त व्यापक जानो। वह हरेक शरीर के अंदर हरेक के हृदय में मौजूद है। वह अकेला स्वयं ही हरेक युग में (सारी सृष्टि के अंदर) रम रहा है- इस भेद को कोई वह विरला व्यक्ति समझता है जो गुरू (की बाणी) की विचार करता है। 3। (उस परमात्मा के हुकम में ही) पिता के वीर्य की बूँद और माता के पेट के लहू ने मिल के (मनुष्य का) शरीर बना दिया। हवा-पानी-आग (आदि तत्वों ने मिल के) जीव रच दिए। हरेक शरीर में बैठा परमात्मा स्वयं ही सब चोज-तमाशे कर रहा है। उसने स्वयं ही माया के मोह का खिलारा पसारा हुआ है। 4। (उस प्रभू के हुकम अनुसार ही) जीव माँ के पेट में अल्टा (लटक के) प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। प्रभू अंतरजामी स्वयं ही (जीव के दिल की) जानता है। जीव माँ के पेट के अंदर हर सांस में सदा-स्थिर परमात्मा का नाम चेते करता रहता है। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) पराई ईष्या और पराई निंदा छोड़ दो।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।