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अंग 1025

अंग
1025
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नावहु भुली चोटा खाए ॥
बहुतु सिआणप भरमु न जाए ॥
पचि पचि मुए अचेत न चेतहि अजगरि भारि लदाई हे ॥8॥
बिनु बाद बिरोधहि कोई नाही ॥
मै देखालिहु तिसु सालाही ॥
मनु तनु अरपि मिलै जगजीवनु हरि सिउ बणत बणाई हे ॥9॥
प्रभ की गति मिति कोइ न पावै ॥
जे को वडा कहाइ वडाई खावै ॥
साचे साहिब तोटि न दाती सगली तिनहि उपाई हे ॥10॥
वडी वडिआई वेपरवाहे ॥
आपि उपाए दानु समाहे ॥
आपि दइआलु दूरि नही दाता मिलिआ सहजि रजाई हे ॥11॥
इकि सोगी इकि रोगि विआपे ॥
जो किछु करे सु आपे आपे ॥
भगति भाउ गुर की मति पूरी अनहदि सबदि लखाई हे ॥12॥
इकि नागे भूखे भवहि भवाए ॥
इकि हठु करि मरहि न कीमति पाए ॥
गति अविगत की सार न जाणै बूझै सबदु कमाई हे ॥13॥
इकि तीरथि नावहि अंनु न खावहि ॥
इकि अगनि जलावहि देह खपावहि ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई कितु बिधि पारि लंघाई हे ॥14॥
गुरमति छोडहि उझड़ि जाई ॥
मनमुखि रामु न जपै अवाई ॥
पचि पचि बूडहि कूड़ु कमावहि कूड़ि कालु बैराई हे ॥15॥
हुकमे आवै हुकमे जावै ॥
बूझै हुकमु सो साचि समावै ॥
नानक साचु मिलै मनि भावै गुरमुखि कार कमाई हे ॥16॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से टूटी रहती है वह दुख सहती है (दुनिया के कामों में चाहे वह) बहुत समझदारी (दिखाए)। उसकी (माया की) भटकना दूर नहीं होती। जो लोग परमात्मा की याद से बेखबर रहते हैं परमात्मा को याद नहीं करते। (वे माया के मोह में) दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। वे (मोह के) बहुत ही भारे बोझ तले लदे रहते हैं। 8। (माया के मोह में फसे हुओं का जिधर-किधर भी हाल देखो) झगड़ों से विरोध से कोई भी खाली नहीं है (और अगर आपको यकीन नहीं आता तो) मुझे कोई ऐसा दिखाओ। मैं उसका आदर करता हूँ। अपना मन और शरीर भेटा करने से ही (भाव। अपने मन की अगुवाई और ज्ञानेन्द्रियों की भटकना को छोड़ के ही) जगत का जीवन परमात्मा मिलता है। तब ही उसके साथ सांझ बनती है। 9। कोई आदमी नहीं जान सकता कि परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा है। अगर कोई मनुष्य अपने आप को बड़ा कहलवा के (ये घमण्ड करे कि मैं प्रभू की गति-मिति पा सकता हूँ तो यह) घमण्ड उसके आत्मिक जीवन को तबाह कर देता है। सारी सृष्टि सदा-स्थिर रहने वाले मालिक ने पैदा की है (सबको दातें देता है। पर उसकी) दातों में कमी नहीं होती। 10। (परमात्मा की यह एक) बड़ी भारी खूबी है कि (इतने बड़े जगत-परिवार का मालिक-पति हो के भी) बे-परवाह है (प्रबंध करने में घबराता नहीं)। स्वयं ही पैदा करता है और स्वयं ही सबको रिजक पहुँचाता है। सब दातों का मालिक प्रभू दया का श्रोत है। किसी भी जीव से दूर नहीं। वह रजा का मालिक जिस जीव को मिल जाता है वह (भी) आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। 11। (सृष्टि के) अनेकों जीव सोग में ग्रसे रहते हैं। अनेकों जीव रोग तले दबाए रहते हैं। जो कुछ करता है प्रभू स्वयं ही करता है। जो मनुष्य गुरू की पूरी मति के द्वारा परमात्मा की भगती करता है परमात्मा के साथ प्रेम गाठता है। वह उस अमर प्रभू में लीन रहता है। गुरू के शबद के द्वारा प्रभू उसको अपने आप की समझ दे देता है (और उसको कोई सोग कोई रोग नहीं व्यापता)। 12। अनेकों लोग (जगत त्याग के) नंगे रहते हैं। भूख काटते हैं (त्याग के भुलेखे के) भटकाए हुए (जगह-जगह) भटकते फिरते हैं। अनेकों लोग (किसी निहित आत्मिक उन्नति की प्राप्ति की खातिर) अपने शरीर पर जोर-जबरदस्ती कर-कर के मरते हैं। पर ऐसा कोई मनुष्य (मनुष्य जीवन की) कद्र नहीं समझता। ऐसे किसी व्यक्ति को अच्छे-बुरे आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। वही व्यक्ति समझता है जो गुरू का शबद कमाता है (जो गुरू के शबद अनुसार अपना जीवन ढालता है)। 13। अनेकों लोग (जगत त्याग के) तीर्थ (तीर्थों) पर स्नान करते हैं। और अन्न नहीं खाते (दूधाधारी बनते हैं)। अनेकों लोग (त्यागी बन के) आग जलाते हैं (धूणियाँ तपाते हैं और) अपने शरीर को (तपों का) कष्ट देते हैं पर परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (माया के बँधनों से) खलासी नहीं मिलती। सिमरन के बिना और किसी तरीके से कोई मनुष्य संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघ सकता। 14। (कई व्यक्ति ऐसे हैं जो) कुर्मागी हो कर गुरू की मति पर चलना छोड़ देते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला अवैड़ा मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं जपता। परमात्मा के नाम से टूटे हुए बंदे (निरा) माया का ही धंधा करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति दुखी हो-हो के (माया के मोह के समुंद्र में ही) गोते खाते रहते हैं (माया के मोह के) झूठे धंधों में (फसे रहने के कारण) आत्मिक मौत उनकी वैरनि बन जाती है। 15। हरेक जीव परमात्मा के हुकम अनुसार ही (जगत में) आता है। उसके हुकम अनुसार (यहाँ से) चला जाता है। जो जीव उसकी रजा को समझ लेता है वह उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन की) कार करता है उसको सदा-स्थिर प्रभू मिल जाता है। उसके मन को प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। 16। 5।
मारू महला 1 ॥
आपे करता पुरखु बिधाता ॥
जिनि आपे आपि उपाइ पछाता ॥
आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे स्रिसटि उपाई हे ॥1॥
आपे नेड़ै नाही दूरे ॥
बूझहि गुरमुखि से जन पूरे ॥
तिन की संगति अहिनिसि लाहा गुर संगति एह वडाई हे ॥2॥
जुगि जुगि संत भले प्रभ तेरे ॥
हरि गुण गावहि रसन रसेरे ॥
उसतति करहि परहरि दुखु दालदु जिन नाही चिंत पराई हे ॥3॥
ओइ जागत रहहि न सूते दीसहि ॥
संगति कुल तारे साचु परीसहि ॥
कलिमल मैलु नाही ते निरमल ओइ रहहि भगति लिव लाई हे ॥4॥
बूझहु हरि जन सतिगुर बाणी ॥
एहु जोबनु सासु है देह पुराणी ॥
आजु कालि मरि जाईऐ प्राणी हरि जपु जपि रिदै धिआई हे ॥5॥
छोडहु प्राणी कूड़ कबाड़ा ॥
कूड़ु मारे कालु उछाहाड़ा ॥
साकत कूड़ि पचहि मनि हउमै दुहु मारगि पचै पचाई हे ॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ करतार स्वयं ही सृष्टि को पैदा करने वाला है और स्वयं ही इसमें व्यापक है। उस करतार ने स्वयं ही जगत पैदा करके इसकी संभाल का फर्ज भी पहचाना है। प्रभू खुद ही सतिगुरू है खुद ही सेवक है। प्रभू ने स्वयं ही ये सृष्टि रची है। 1। (सर्व-व्यापक होने के कारण प्रभू) स्वयं ही (हरेक जीव के) नजदीक है किसी से भी दूर नहीं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के यह भेद समझ लेते हैं वे अभॅुल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। गुरू की संगति करने के कारण उन्हें ये महत्वता मिलती है कि उनकी संगत से भी दिन-रात लाभ ही लाभ मिलता है। 2। हे प्रभू ! हरेक युग में आपके संत नेक बँदे होते हैं। वे जीभ से रस ले के आपके गुण गाते हैं। आपके बिना उन्हें किसी और की आस नहीं होती। हे प्रभू ! वह आपकी सिफत-सालाह करते हैं (अपने अंदर से) दुख-दरिद्रता दूर कर लेते हैं। 3। वह (संत जन माया के हमलों से सदा) सचेत रहते हैं। वह गफ़लत की नींद में कभी भी सोते नहीं दिखते। उनकी संगति अनेकों कुल तार देती है क्योंकि वह सबको सदा-स्थिर प्रभू का नाम बाँटते हैं। (उनके अंदर) पापों की मैल (रक्ती भर भी) नहीं होती। वह पवित्र जीवन वाले होते हैं। वह प्रभू की भक्ति में व्यस्त रहते हैं। प्रभू के चरणों में सुरति जोड़े रखते हैं। 4। हे प्राणियो ! हरी-जनों की संगति में रह के सतिगुरू की बाणी में जुड़ के (ये पक्की बात) समझ लो कि ये जवानी ये सांस ये शरीर सब पुराने हो जाने वाले हैं। हे प्राणी ! (जो भी पैदा हुआ है उसने) थोड़े ही समय में मौत के वश आ जाना है। (इस वास्ते) परमात्मा का नाम जपो और हृदय में उसका ध्यान धरो। 5। हे प्राणी ! निरी माया के मोह की बातें छोड़ो। जिस मनुष्य के अंदर निरा माया का मोह ही है उसको आत्मिक मौत पहुँच-पहुँच के मारती है। माया-ग्रसित जीव माया के मोह में दुखी होते हैं। जिस मनुष्य के मन में अहंकार है वह मेर-तेर के रास्ते पर पड़ कर दुखी होता है। अहंकार उसको ख्वार करता है। 6।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से टूटी रहती है वह दुख सहती है (दुनिया के कामों में चाहे वह) बहुत समझदारी (दिखाए)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।