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अंग 1024

अंग
1024
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि विरला चीनै कोई ॥
दुइ पग धरमु धरे धरणीधर गुरमुखि साचु तिथाई हे ॥8॥
राजे धरमु करहि परथाए ॥
आसा बंधे दानु कराए ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई थाके करम कमाई हे ॥9॥
करम धरम करि मुकति मंगाही ॥
मुकति पदारथु सबदि सलाही ॥
बिनु गुर सबदै मुकति न होई परपंचु करि भरमाई हे ॥10॥
माइआ ममता छोडी न जाई ॥
से छूटे सचु कार कमाई ॥
अहिनिसि भगति रते वीचारी ठाकुर सिउ बणि आई हे ॥11॥
इकि जप तप करि करि तीरथ नावहि ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि ॥
हठि निग्रहि अपतीजु न भीजै बिनु हरि गुर किनि पति पाई हे ॥12॥
कली काल महि इक कल राखी ॥
बिनु गुर पूरे किनै न भाखी ॥
मनमुखि कूड़ु वरतै वरतारा बिनु सतिगुर भरमु न जाई हे ॥13॥
सतिगुरु वेपरवाहु सिरंदा ॥
ना जम काणि न छंदा बंदा ॥
जो तिसु सेवे सो अबिनासी ना तिसु कालु संताई हे ॥14॥
गुर महि आपु रखिआ करतारे ॥
गुरमुखि कोटि असंख उधारे ॥
सरब जीआ जगजीवनु दाता निरभउ मैलु न काई हे ॥15॥
सगले जाचहि गुर भंडारी ॥
आपि निरंजनु अलख अपारी ॥
नानकु साचु कहै प्रभ जाचै मै दीजै साचु रजाई हे ॥16॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पर जो कोई विरला बँदा गुरू की शरण पड़ता है वह (जीवन के सही राह को) पहचानता है। वह उसी आत्मिक अवस्था में टिका रहता है जहाँ सदा-स्थिर प्रभू उसके अंदर प्रत्यक्ष बसता है। 8। राजा गण किसी मतलब के लिए धर्म कमाते हैं। दुनियावी (लोग) आशाओं में बँधे हुए दान-पुन्य करते हैं (ये सब कुछ कमर-टूटी हुई दया के कारण ही करते हैं। ये लोक और परलोक के सुख ही तलाशते हैं)। (दान-पुन्य आदि के) कर्म कर के थक जाते हैं। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (दुनिया के सुखों की आशाओं से) उनको खलासी नहीं मिलती (इसलिए आत्मिक आनंद नहीं मिलता)। 9। (दान-पुन्य तीर्थ आदिक) कर्म कर के मुक्ति माँगते हैं। पर। मुक्ति देने वाला नाम पदार्थ गुरू के शबद के द्वारा प्रभू की सिफत-सालाह करने से ही मिलता है। (ये पक्की बात है कि समय का नाम चाहे सतियुग रख लो चाहे त्रेता रख लो और चाहे द्वापर) गुरू के शबद के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती, सृजनहार ने यह जगत-रचना करके जीवों को अजीब भुलेखे में डाला हुआ है । 10। (समय कोई भी हो) माया का अपनत्व त्यागा नहीं जा सकता। सिर्फ वही बंदे (इस ममता के पँजे में से) निजात पाते हैं जो सदा-स्थिर प्रभू के सिमरन की कार करते हैं। जो दिन-रात परमात्मा की भक्ति (के रंग) में रंगे रहते हैं। जो उसके गुणों की विचार करते हैं और (इस तरह) जिनकी प्रीति मालिक-प्रभू के साथ बनी रहती है। 11। हे प्रभू ! अनेकों लोग ऐसे हैं जो जप करते हैं तप तापते हैं तीर्थों पर जाते हैं (और इस तरह इस लोक में और परलोक में इज्जत हासिल करनी चाहते हैं)। (पर। हे प्रभू ! उनके भी क्या वश।) जैसे आपकी रजा है आप उनको इस राह पर चला रहा है। (वे बिचारे नहीं समझते कि) जबरन इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करने से ये कभी ना पतीजने वाला मन आपके नाम-रस में आनंदित नहीं हैं सकता। गुरू की शरण पड़े बिना किसी ने कभी प्रभू की हजूरी में इज्जत नहीं प्राप्त की (समय और युग का नाम चाहे कुछ भी हो)। 12। (अगर धरम-सक्ता के चार हिस्से कर दिए जाएं और अगर किसी मनुष्य के अंदर) धर्म की सिर्फ एक ही सक्ता रह जाए तो वह मनुष्य। मानो। कलियुग में बसता है। सतिगुरू की शरण पड़े बिना उसकी यह भटकना दूर नहीं होती, पूरे गुरू के बिना कभी किसी ने यह बात नहीं समझाई । 13। अपने मन के पीछे चलने वाले उस मनुष्य के अंदर माया का मोह ही अपना प्रभाव डाल के रखता है (उसके अंदर सदा माया की भटकना बनी रहती है) सतिगुरू सृजनहार का रूप है। गुरू दुनियाँ की नजरों में बहुत ऊँचा है। गुरू को जमका डर नहीं। गुरू को दुनिया के बँदों की मुथाजी नहीं। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करता है वह नाश-रहित हो जाता है (उसको कभी आत्मिक मौत नहीं आती) मौत का डर उसको कभी नहीं सताता। 14। करतार ने अपना आप गुरू में छुपा रखा है। वह जगत की जिंदगी का आसरा है वह सब जीवों को दातें देता है। उसको किसी का डर नहीं। उसको (माया-मोह आदि की) कोई मैल नहीं लग सकती। वह करतार गुरू के द्वारा करोड़ों और असंख जीवों को (संसार-समुंद्र में डूबने से) बचा लेता है। 15। सारे जीव गुरू के खजाने में से (उस प्रभू का नाम) माँगते हैं जो स्वयं माया के प्रभाव से ऊपर है जो अलख है और बेअंत है। हे रजा के मालिक प्रभू ! नानक (भी गुरू के दर पर पड़ कर) आपका सदा-स्थिर नाम सिमरता है और माँगता है कि मुझे अपने सदा-स्थिर रहने वाले नाम की दाति दे। 16। 4।
मारू महला 1 ॥
साचै मेले सबदि मिलाए ॥
जा तिसु भाणा सहजि समाए ॥
त्रिभवण जोति धरी परमेसरि अवरु न दूजा भाई हे ॥1॥
जिस के चाकर तिस की सेवा ॥
सबदि पतीजै अलख अभेवा ॥
भगता का गुणकारी करता बखसि लए वडिआई हे ॥2॥
देदे तोटि न आवै साचे ॥
लै लै मुकरि पउदे काचे ॥
मूलु न बूझहि साचि न रीझहि दूजै भरमि भुलाई हे ॥3॥
गुरमुखि जागि रहे दिन राती ॥
साचे की लिव गुरमति जाती ॥
मनमुख सोइ रहे से लूटे गुरमुखि साबतु भाई हे ॥4॥
कूड़े आवै कूड़े जावै ॥
कूड़े राती कूड़ु कमावै ॥
सबदि मिले से दरगह पैधे गुरमुखि सुरति समाई हे ॥5॥
कूड़ि मुठी ठगी ठगवाड़ी ॥
जिउ वाड़ी ओजाड़ि उजाड़ी ॥
नाम बिना किछु सादि न लागै हरि बिसरिऐ दुखु पाई हे ॥6॥
भोजनु साचु मिलै आघाई ॥
नाम रतनु साची वडिआई ॥
चीनै आपु पछाणै सोई जोती जोति मिलाई हे ॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ उस सदा-स्थिर प्रभू ने जिन लोगों को (अपने चरणों में) मिलाया जिन्हें गुरू के शबद में जोड़ा तब जब उसे अच्छा लगा। वह लोग अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो गए। परमेश्वर ने अपनी ज्योति तीनों भवनों में टिका के रखी है; हे भाई ! कोई और उस प्रभू जैसा नहीं। 1। जब (भक्तजन) गुरू के शबद में जुड़ते हैं। जब उस प्रभू के सेवक बन के उसकी सेवा-भक्ति करते हैं। तब वह अलख और अभेव प्रभू (उनकी इस मेहनत पर) प्रसन्न होता है। करतार अपने भक्तों में आत्मिक गुण पैदा करता है। स्वयं उन पर बख्शिश करता है उनको महातम देता है। 2। (जीवों को दातें) दे दे के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के (भण्डारों में) कमी नहीं आती (घाटा नहीं पड़ता)। पर तुच्छ जीव दातें ले ले के (भी) मुकर जाते हैं। (अपने जीवन के) मूल-प्रभू (के खुल-दिले-स्वाभाव) को नहीं समझते। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने की जीवों में रीझ पैदा नहीं होती। प्रभू के बिना और आसरों की झाक में भटक के गलत राह पर पड़े रहते हैं। 3। जो लोग गुरू की शरण पड़ते हैं वे हर वक्त माया के मोह से सचेत रहते हैं। गुरू की शिक्षा ले के वे सदा-स्थिर प्रभू की लगन (का आनंद) पहचान लेते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे अपने आत्मिक जीवन की पूँजी को (माया के हमलों से) बचा के रखते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया के मोह में गाफिल टिके रहते हैं। और आत्मिक गुणों का सरमाया लुटा बैठते हैं। 4। जो जीव-स्त्री माया के मोह के रंग में रंगी रहती है। वह माया के मोह में ग्रसी ही पैदा होती है। यहाँ (संसार में) हमेशा माया के मोह का ही व्यापार करती है। माया के मोह में फसी हुई ही दुनिया से चली जाती है। जो लोग गुरू के शबद में जुड़े रहते हैं उन्हें परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है। गुरू की शरण पड़ने वाले लोगों की सुरति (प्रभू की याद में) टिकी रहती है। 5। जो जीव-स्त्री माया की तृष्णा में मोही रहती है उसके आत्मिक जीवन की बगीची को कामादिक ठॅग। ठॅग लेते हैं। जैसे कोई फुलवाड़ी कहीं उजाड़ में (बिना किसी वाली वारिस रखवाले की होने के कारण) उजड़ जाती है। (भले वह माया के मोह में फसी रहती है फिर भी) परमात्मा के नाम के बिना कोई भी चीज स्वादिष्ट नहीं लग सकती (कोई भी आकर्षण अच्छा नहीं लग सकता)। प्रभू का नाम भूलने के कारण वह सदा दुख ही पाती है। 6। जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू का नाम (आत्मिक जिंदगी के लिए) भोजन मिलता है। वह (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। जिसको परमात्मा का नाम-रत्न मिल जाता है। उसको (लोक-परलोक में) सदा-स्थिर रहने वाली इज्जत मिलती है। जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। वही (अपने जीवन-मनोरथ को) पहचानता है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में मिली रहती है। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर जो कोई विरला बँदा गुरू की शरण पड़ता है वह (जीवन के सही राह को) पहचानता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।