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अंग १०२३ · मारू

अंग
1023
मारू
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  1. सचै ऊपरि अवर न दीसै साचे कीमति पाई हे ॥8॥
  2. आदि जुगादी अपर अपारे ॥

सचै ऊपरि अवर न दीसै साचे कीमति पाई हे ॥8॥

अंग १०२२ से चला आ रहा अंश

सचै ऊपरि अवर न दीसै साचे कीमति पाई हे ॥8॥
ऐथै गोइलड़ा दिन चारे ॥
खेलु तमासा धुंधूकारे ॥
बाजी खेलि गए बाजीगर जिउ निसि सुपनै भखलाई हे ॥9॥
तिन कउ तखति मिली वडिआई ॥
निरभउ मनि वसिआ लिव लाई ॥
खंडी ब्रहमंडी पाताली पुरीई त्रिभवण ताड़ी लाई हे ॥10॥
साची नगरी तखतु सचावा ॥
गुरमुखि साचु मिलै सुखु पावा ॥
साचे साचै तखति वडाई हउमै गणत गवाई हे ॥11॥
गणत गणीऐ सहसा जीऐ ॥
किउ सुखु पावै दूऐ तीऐ ॥
निरमलु एकु निरंजनु दाता गुर पूरे ते पति पाई हे ॥12॥
जुगि जुगि विरली गुरमुखि जाता ॥
साचा रवि रहिआ मनु राता ॥
तिस की ओट गही सुखु पाइआ मनि तनि मैलु न काई हे ॥13॥
जीभ रसाइणि साचै राती ॥
हरि प्रभु संगी भउ न भराती ॥
स्रवण स्रोत रजे गुरबाणी जोती जोति मिलाई हे ॥14॥
रखि रखि पैर धरे पउ धरणा ॥
जत कत देखउ तेरी सरणा ॥
दुखु सुखु देहि तूहै मनि भावहि तुझ ही सिउ बणि आई हे ॥15॥
अंत कालि को बेली नाही ॥
गुरमुखि जाता तुधु सालाही ॥
नानक नामि रते बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥16॥3॥

हिन्दी अर्थ: उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के (सिर) पर और कोई (ताकत) नहीं दिखती जो उस सदा-स्थिर (की समर्था) का मूल्य डाल सके। 8। (जैसे मुश्किल के दिनों में दरियाओं के किनारे पशू-मवेशियों को चराने आए लोगों का वहाँ थोड़े दिनों के लिए ही ठिकाना होता है। वैसे ही) यहाँ जगत में जीवों का चार दिनों का ही बसेरा है। यह जगत एक खेल है। एक तमाशा है। पर (जीव माया के मोह के कारण अज्ञानता के) घोर अंधेरे में फसे पड़े हैं। बाज़ीगरों की तरह जीव (माया की) बाज़ी खेल के चले जाते हैं। (इस खेल में से किसी के हाथ-पल्ले कुछ नहीं पड़ता) जैसे रात के सपने में कोई व्यक्ति (धन पा के) बड़-बड़ाता है (पर सपना टूट जाने पर पल्ले कुछ भी नहीं रहता)। 9। (वह। मानो। आत्मिक मण्डल में बादशाह बन जाते हैं) उनको तख़्त पर बैठने की महिमा मिलती है (वे सदा अपने हृदय-तख़्त पर बैठते हैं)। वह निर्भय प्रभू जिन मनुष्यों के मन में बस जाता है जो मनुष्य उस प्रभू की याद में जुड़ते हैं जो परमात्मा सारे खण्डों-ब्रहमण्डों-पातालों-मण्डलों में तीनों ही भवनों में गुप्त रूप में व्यापक है 10। उसका ये शरीर उसका यह हृदय-तख़्त सदा-स्थिर प्रभू का निवास-स्थान बन जाता है। जिस मनुष्य को गुरू के सन्मुख हो के सदा-स्थिर प्रभू मिल जाता है उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। उस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू के सदा-स्थिर तख़्त पर (माया की ओर से सदा अडोल रहने वाले हृदय-तख़्त पर बैठने की) वडिआई महिमा मिलती है। वह मनुष्य अहंकार और माया की सोचें दूर कर लेता है। 11। जब तलक माया की सोचें सोचते रहें प्राणों में सहम बना ही रहता है। ना ही प्रभू के बिना किसी अन्य झाक में और ना ही त्रिगुणी माया की लगन में - सुख कहीं नहीं मिलता। जिस मनुष्य ने पूरे गुरू की शरण पड़ कर इज्जत कमा ली (उसको निश्चय हो जाता है कि) सब दातें देने वाला एक परमात्मा ही है जो पवित्र-स्वरूप है और जिस पर माया की कालिख़ का प्रभाव नहीं पड़ता। 12। हरेक युग में (भाव। युग चाहे कोई भी हो) किसी उस विरले ने ही सदा-स्थिर प्रभू के साथ सांझ डाली है जो गुरू की शरण पड़ा है। वह सदा-स्थिर प्रभू हर जगह मौजूद है। (गुरू के माध्यम से जिसका) मन (उस प्रभू के प्रेम-रंग में) रंगा गया है। जिसने उस सदा-स्थिर प्रभू का पल्ला पकड़ा है उसको आत्मिक आनंद मिल गया है। उसके मन में उसके तन में (विकारों की) कोई मैल नहीं रह जाती। 13। जिस मनुष्य की जीभ सब रसों के श्रोत सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगी जाती है। हरी परमात्मा उसका (सदा के लिए) साथी बन जाता है। उसको कोई डर नहीं व्यापता। उसको कोई भटकना नहीं रह जाती। सतिगुरू की बाणी सुनने में उसके कान सदा मस्त रहते हैं। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में मिली रहती है। 14। हे प्रभू ! वह मनुष्य धरती पर अपनी जीवन-पथ समाप्त करते हुए बड़े ही ध्यान से पैर रखता है (विकारों की ओर बिल्कुल ही नहीं पड़ता)। मैं जिधर देखता हूँ उधर सब जीव आपकी ही शरण पड़ते हैं। जिस मनुष्य की प्रीति सिर्फ आपके साथ ही निभ रही है (भाव। जिसने अन्य सारे आसरे छोड़ के सिर्फ एक आपका ही आसरा पकड़ा है) आप ही उसके मन को प्यारे लगने लगते हैं। (उसको निश्चय हो जाता है कि) आप ही सुख देते हैं आप ही दुख देते हैं। 15। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे यह समझ लेते हैं कि जगत में आखिरी वक्त कोई (साक-संबंधी) साथी नहीं बन सकता। (इस वास्ते। हे प्रभू !) वह आपकी ही सिफत-सालाह करते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य प्रभू के नाम-रंग में रंगे रहते हैं। वे माया के मोह से उपराम रहते हैं। वे सदा अपने हृदय-गृह में टिक के प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हैं। 16। 3।

आदि जुगादी अपर अपारे ॥

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मारू महला 1 ॥
आदि जुगादी अपर अपारे ॥
आदि निरंजन खसम हमारे ॥
साचे जोग जुगति वीचारी साचे ताड़ी लाई हे ॥1॥
केतड़िआ जुग धुंधूकारै ॥
ताड़ी लाई सिरजणहारै ॥
सचु नामु सची वडिआई साचै तखति वडाई हे ॥2॥
सतजुगि सतु संतोखु सरीरा ॥
सति सति वरतै गहिर गंभीरा ॥
सचा साहिबु सचु परखै साचै हुकमि चलाई हे ॥3॥
सत संतोखी सतिगुरु पूरा ॥
गुर का सबदु मने सो सूरा ॥
साची दरगह साचु निवासा मानै हुकमु रजाई हे ॥4॥
सतजुगि साचु कहै सभु कोई ॥
सचि वरतै साचा सोई ॥
मनि मुखि साचु भरम भउ भंजनु गुरमुखि साचु सखाई हे ॥5॥
त्रेतै धरम कला इक चूकी ॥
तीनि चरण इक दुबिधा सूकी ॥
गुरमुखि होवै सु साचु वखाणै मनमुखि पचै अवाई हे ॥6॥
मनमुखि कदे न दरगह सीझै ॥
बिनु सबदै किउ अंतरु रीझै ॥
बाधे आवहि बाधे जावहि सोझी बूझ न काई हे ॥7॥
दइआ दुआपुरि अधी होई ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे सारी रचना के मूल ! हे जुगों के शुरू से मौजूद प्रभू ! हे अपर और अपार हरी ! हे निरंजन ! हे हमारे खसम ! हे सदा-स्थिर प्रभू ! हे मिलाप की जुगती को विचारने वाले ! (जब आपने संसार की रचना नहीं की थी) आपने अपने आप में समाधि लगाई हुई थी। 1। अनेकों ही युग उस अवस्था में जिसकी बाबत कुछ भी पता नहीं चल सकता (जगत-रचना से पहले) सृजनहार ने समाधि लगाई । उस सृजनहार का नाम सदा-स्थिर रहने वाला है। उसकी वडिआई सदा कायम रहने वाली है। वह वडिआई का मालिक प्रभू सदा टिके रहने वाले तख़्त पर बैठा हुआ है। 2। जिन प्राणियों के अंदर (उस सृजनहार की मेहर के सदका) सत्य और संतोख (वाला जीवन उघड़ता) है। वह। मानो। सतियुग में (बस रहे हैं)। गहरा और बड़े जिगरे वाला प्रभू (हर जगह) व्यापक हो रहा है। (जगत रचना करके) वह सदा-स्थिर रहने वाला। सदा-स्थिर रहने वाला मालिक (सब जीवों की) सही परख करता है। वह सृष्टि की कार को अपने अॅटल हुकम में चला रहा है। 3। पूरा गुरू (भी) सत और संतोख का मालिक है। जो मनुष्य गुरू का शबद मानता है (अपने हृदय में टिकाता है) वह सूरमा (बन जाता) है (विकार उसको जीत नहीं सकते)। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में सदा का निवास प्राप्त कर लेता है। वह उस रजा के मालिक प्रभू का हुकम मानता है। 4। जो जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करता है वह। मानो। सतियुग में है। वह सदा-स्थिर-प्रभू की याद में टिका हुआ ही जगत की कार करता है। उसको हर जगह सदा-स्थिर प्रभू ही दिखता है। उसके मन में उसके मुँह में सदा-स्थिर-प्रभू उसका सदा साथी बन जाता है। 5। जिस मनुष्य के अंदर से धर्म की एक ताकत समाप्त हो जाती है। जिसके अंदर धर्म के तीन पैर रह जाते हैं और मेर-तेर अपना जोर डाल लेती है। वह मानो। त्रेते युग में बस रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला व्यक्ति (मेर-तेर के) अवैड़ेपन में दुखी होता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन करता है (और। वह मानो। सतियुग में है)। 6। अपने मन के पीछे चलने वाला बँदा कभी परमात्मा की हजूरी में आदर नहीं पाता। उसकी अंतरात्मा कभी भी (सिमरन की) उत्साह में नहीं आती। ऐसे व्यक्ति अपने मन की वासना में बँधे हुए जगत में आते हैं और बँधे हुए ही यहाँ से चले जाते हैं। उन्हें (सही जीवन-मार्ग की) कोई सूझ नहीं होती। 7। जिन लोगों के अंदर दया आधी रह गई (दया का गुण कम हो गया) जिनके हृदय में धरती का आसरा धर्म सिर्फ दो पैर टिकाता है (भाव। जिनके अंदर सुरी संपदा और असुरी संपदा एक समान हो गई) वह। मानो। द्वापर में बसते हैं।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1023 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०२३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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