दोजकि पाए सिरजणहारै लेखा मंगै बाणीआ ॥2॥ संगि न कोई भईआ बेबा ॥ मालु जोबनु धनु छोडि वञेसा ॥ करण करीम न जातो करता तिल पीड़े जिउ घाणीआ ॥3॥ खुसि खुसि लैदा वसतु पराई ॥ वेखै सुणे तेरै नालि खुदाई ॥ दुनीआ लबि पइआ खात अंदरि अगली गल न जाणीआ ॥4॥ जमि जमि मरै मरै फिरि जंमै ॥ बहुतु सजाइ पइआ देसि लंमै ॥ जिनि कीता तिसै न जाणी अंधा ता दुखु सहै पराणीआ ॥5॥ खालक थावहु भुला मुठा ॥ दुनीआ खेलु बुरा रुठ तुठा ॥ सिदकु सबूरी संतु न मिलिओ वतै आपण भाणीआ ॥6॥ मउला खेल करे सभि आपे ॥ इकि कढे इकि लहरि विआपे ॥ जिउ नचाए तिउ तिउ नचनि सिरि सिरि किरत विहाणीआ ॥7॥ मिहर करे ता खसमु धिआई ॥ संता संगति नरकि न पाई ॥ अंम्रित नाम दानु नानक कउ गुण गीता नित वखाणीआ ॥8॥2॥8॥12॥20॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (ये यकीन जानो कि ऐसों को) सृजनहार ने नर्क में डाल रखा है। उनसे धर्मराज (उनके किए कर्मों का) लेखा माँगता है। 2। हे भाई ! (जगत से जाने के वक्त) ना कोई भाई ना कोई बहिन। कोई भी जीव के साथ नहीं जाता। माल। धन। जवानी- हरेक जीव अवश्य ही यहाँ से छोड़ के चला जाएगा। जिन मनुष्यों ने जगत के रचयता बख्शिंद प्रभू के साथ सांझ डाली। वह (दुखों में) इस तरह पीढ़े जाते हैं जैसे तिलों की घाणी में तिल। 3। हे भाई ! आप पराया माल-धन छीन-छीन के इकट्ठा करता रहता है। आपके साथ बसता रॅब (आपकी हरेक करतूत को) देखता है (आपके हरेक बोल को) सुनता है। आप दुनिया (के स्वादों) के चस्के में फसा पड़ा है (मानो गहरे) गड्ढे में गिरा पड़ा है। आगे घटित होने वाली बात को समझता ही नहीं। 4। हे भाई ! जब मनुष्य (जनम-मरन के चक्कर के) लंबे रास्ते पर पड़ जाता है। ये बार-बार पैदा हो के (बार-बार) मरता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। तब यह (जनम-मरण के चक्कर का) दुख सहता है। इसको बहुत सजा मिलती है। हे भाई ! जब मनुष्य (माया के मोह में) अंधा (हो के) उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता जिसने इसको पैदा किया है। 5। वह मनुष्य सृजनहार से टूटा रहता है। वह अपने आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा बैठता है; यह जगत-तमाशा उसको बुरा (दुखी करता है)। कभी (माया के गवा बैठने पर ये) घबरा जाता है। कभी माया के मिलने पर ये खुश हो हो के बैठता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू नहीं मिलता। वह अपने मन का मुरीद हो के भटकता फिरता है। उसके अंदर माया की तरफ से ना शांति है ना तृप्ति; 6। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही सारे खेल कर रहा है। कई ऐसे हैं जो माया के मोह की लहरों में फंसे हुए हैं। कई ऐसे हैं जिनको उसने इन लहरों में से निकाल लिया है। हे भाई ! परमात्मा जैसे-जैसे जीवों को (माया के हाथों में) नचाता है। वैसे-वैसे जीव नाचते हैं। हरेक जीव के सिर पर (उसके पिछले जन्मों के किए कर्मों की) कमाई असर डाल रही है। 7। हे भाई ! परमात्मा स्वयं मेहर करे। तो ही मैं उस पति-प्रभू को सिमर सका हूँ। (जो मनुष्य सिमरता है) वह संत जनों की संगति में रह के नर्क में नहीं पड़ता। हे प्रभू ! नानक को आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम-दान दे। (ता कि मैं नानक) आपकी सिफत-सालाह के गीत सदा गाता रहूँ। 8। 2। 8। 12। 20।
मारू सोलहे महला 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ साचा सचु सोई अवरु न कोई ॥ जिनि सिरजी तिन ही फुनि गोई ॥ जिउ भावै तिउ राखहु रहणा तुम सिउ किआ मुकराई हे ॥1॥ आपि उपाए आपि खपाए ॥ आपे सिरि सिरि धंधै लाए ॥ आपे वीचारी गुणकारी आपे मारगि लाई हे ॥2॥ आपे दाना आपे बीना ॥ आपे आपु उपाइ पतीना ॥ आपे पउणु पाणी बैसंतरु आपे मेलि मिलाई हे ॥3॥ आपे ससि सूरा पूरो पूरा ॥ आपे गिआनि धिआनि गुरु सूरा ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचे सिउ लिव लाई हे ॥4॥ आपे पुरखु आपे ही नारी ॥ आपे पासा आपे सारी ॥ आपे पिड़ बाधी जगु खेलै आपे कीमति पाई हे ॥5॥ आपे भवरु फुलु फलु तरवरु ॥ आपे जलु थलु सागरु सरवरु ॥ आपे मछु कछु करणीकरु तेरा रूपु न लखणा जाई हे ॥6॥ आपे दिनसु आपे ही रैणी ॥ आपि पतीजै गुर की बैणी ॥ आदि जुगादि अनाहदि अनदिनु घटि घटि सबदु रजाई हे ॥7॥ आपे रतनु अनूपु अमोलो ॥ आपे परखे पूरा तोलो ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 1 सतिगुर प्रसादि॥ वह परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है। सदा अटल रहने वाला है। कोई और उस जैसा नहीं। जिस (प्रभू) ने (ये रचना) रची है उसने ही दोबारा नाश किया है (वही इसको नाश करने वाला है)। हे प्रभू ! जैसे आपको अच्छा लगता है वैसे ही आप हम जीवों को रखता है। वैसे ही हम रह सकते हैं। हम जीव आपके (हुकम) के आगे कोई ना-नुक्कर नहीं कर सकते। 1। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है स्वयं ही मारता है। स्वयं ही हरेक जीव को उसके किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार दुनियां के धंधों में लगाता है। प्रभू स्वयं ही जीवों के कर्मों को विचारने वाला है। स्वयं ही (जीवों के अंदर) गुण पैदा करने वाला है। खुद ही (जीवों को) सही जीवन-रास्ते पर लाता है। 2। परमात्मा स्वयं ही सब जीवों के दिल की जानने वाला है। स्वयं ही जीवों के किए कर्मों को देखने वाला है। प्रभू स्वयं ही अपने आप को (सृष्टि के रूप में) प्रकट करके (स्वयं ही इसको देख-देख के) खुश हैं रहा है। परमात्मा खुद ही (अपने आप से) हवा-पानी-आग (आदि तत्व पैदा करने वाला) है। प्रभू ने स्वयं ही (इन तत्वों को) इकट्ठा करके जगत-रचना की है। 3। हर जगह रौशनी देने वाला परमात्मा स्वयं ही सूर्य है स्वयं ही चँद्रमा है। प्रभू खुद ही ज्ञान का मालिक और सुरति का मालिक सूरमा गुरू है। जिस भी जीव ने उस सदा-स्थिर प्रभू से पे्रम-लगन लगाई है जमराज उसकी ओर देख भी नहीं सकता। 4। (हरेक) मर्द भी प्रभू स्वयं ही है और (हरेक) स्त्री भी स्वयं ही है। प्रभू खुद ही (ये जगत रूप) चौपड़ (की खेल) है और खुद ही (चौपड़ की जीव-) नर्दें है। परमात्मा ने स्वयं ही ये जगत (चौपड़ की खेल-रूप) मैदान को तैयार किया है। स्वयं ही इस खेल को परख रहा है। 5। आप स्वयं ही भौरा है। स्वयं ही फूल है। आप खुद ही फल है। और खुद ही वृक्ष है। आप स्वयं ही पानी है। स्वयं ही सूखी हुई धरती है। आप स्वयं ही समुंद्र है स्वयं ही तालाब है। आप स्वयं ही मछली है आप स्वयं ही कछूआ है।(हे प्रभू !) आपका सही स्वरूप क्या है। – ये बयान नहीं किया जा सकता। आप स्वयं ही (अपने आप से) सारी रचना रचने वाला है। 6। परमात्मा खुद ही दिन है खुद ही रात है। वह खुद ही गुरू के वचनों के द्वारा खुश हो रहा है। सारे जगत का मूल है। जुगों से भी आदि से है। उसका ना कभी नाश हो सकता है। हर वक्त हरेक शरीर में उसी रजा के मालिक की जीवन-रौंअ रुमक रही है। 7। प्रभू स्वयं ही एक ऐसा रतन है जिस जैसा और कोई नहीं और जिसका मूल्य नहीं डाला जा सकता। प्रभू स्वयं ही उस रत्न को परखता है। और ठीक तरह तौलता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ये यकीन जानो कि ऐसों को) सृजनहार ने नर्क में डाल रखा है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।