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अंग १०२१ · मारू

अंग
1021
मारू
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  1. आपे किस ही कसि बखसे आपे दे लै भाई हे ॥8॥
  2. आपे धरती धउलु अकासं ॥

आपे किस ही कसि बखसे आपे दे लै भाई हे ॥8॥

अंग १०२० से चला आ रहा अंश

आपे किस ही कसि बखसे आपे दे लै भाई हे ॥8॥
आपे धनखु आपे सरबाणा ॥
आपे सुघड़ु सरूपु सिआणा ॥
कहता बकता सुणता सोई आपे बणत बणाई हे ॥9॥
पउणु गुरू पाणी पित जाता ॥
उदर संजोगी धरती माता ॥
रैणि दिनसु दुइ दाई दाइआ जगु खेलै खेलाई हे ॥10॥
आपे मछुली आपे जाला ॥
आपे गऊ आपे रखवाला ॥
सरब जीआ जगि जोति तुमारी जैसी प्रभि फुरमाई हे ॥11॥
आपे जोगी आपे भोगी ॥
आपे रसीआ परम संजोगी ॥
आपे वेबाणी निरंकारी निरभउ ताड़ी लाई हे ॥12॥
खाणी बाणी तुझहि समाणी ॥
जो दीसै सभ आवण जाणी ॥
सेई साह सचे वापारी सतिगुरि बूझ बुझाई हे ॥13॥
सबदु बुझाए सतिगुरु पूरा ॥
सरब कला साचे भरपूरा ॥
अफरिओ वेपरवाहु सदा तू ना तिसु तिलु न तमाई हे ॥14॥
कालु बिकालु भए देवाने ॥
सबदु सहज रसु अंतरि माने ॥
आपे मुकति त्रिपति वरदाता भगति भाइ मनि भाई हे ॥15॥
आपि निरालमु गुर गम गिआना ॥
जो दीसै तुझ माहि समाना ॥
नानकु नीचु भिखिआ दरि जाचै मै दीजै नामु वडाई हे ॥16॥1॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं ही किसी रत्न-जीव को कसवॅटी पर ला के परवान करता है। और हे भाई ! प्रभू स्वयं ही जगत की वणज-व्यापार की कार चला रहा है (रतन देता है और रतन लेता है)। 8। परमात्मा खुद ही धनुष है (खुद ही तीर है) खुद ही तीर-अंदाज है। खुद ही सुचॅजा-सोहाना और सयाना है। हर जगह बोलने वाला सुनने वाला वही खुद ही है जिसने ये जगत रचना रची है। 9। हवा (जो शरीरों के लिए इस तरह है जैसे) गुरू (जीवों की आत्मा के लिए है) प्रभू स्वयं ही है। पानी (जो सब जीवों का) पिता (है। यह भी) प्रभू स्वयं ही है। धरती (जो इसके लिए जीवों की) माँ कहलवाने-योग्य है ये माँ की तरह सब चीजों को अपने पेट में रखती है और पेट में से पैदा करती है- यह भी परमात्मा स्वयं ही है (क्योंकि सब कुछ परमात्मा ने अपने आप से प्रकट किया है)। दिन और रात (जो जीवों के लिए) दोनों खेल खिलाने वाली और खेल खिलाने वाला है (और इनके प्रभाव में) जगत खेल रहा है। यह भी वह स्वयं ही है। यह सारी खेल वह खुद ही खेल रहा है। 10। हे प्रभू ! आप स्वयं ही मछली हैं और स्वयं ही (मछली फसाने वाला) जाल हैं। आप खुद ही गाय हैं और खुद ही गायों के रखवाले हैं। सारे जीवों में सारे जगत में आपकी ही ज्योति मौजूद है। जगत में वही कुछ हो रहा है जैसे प्रभू ने हुकम किया है (हुकम कर रहा है)। 11। (माया से निर्लिप होने के कारण) प्रभू स्वयं ही जोगी है। (और सारे जीवों में व्यापक होने के कारण) खुद ही (सारे पदार्थों को) भोगने वाला है। सबसे बड़े संयोग (मिलाप) के कारण (सब जीवों में रमा होने के कारण) प्रभू स्वयं ही सारे रस माण रहा है। प्रभू स्वयं ही सारे उजाड़ में रहने वाला है। प्रभू स्वयं ही निराकार है। उसको किसी का डर नहीं। वह स्वयं ही अपने स्वरूप में सुरति जोड़ने वाला है। 12। हे प्रभू ! चारों खाणियों के जीव और उनकी बोलियाँ भी आपके में ही समा जाती हैं। जगत में जो कुछ दिखाई दे रहा है वह पैदा होने मरने के चक्र में है। जिन लोगों को सतिगुरू ने (सही जीवन की) सूझ दी है वही कभी घाटा ना खाने वाले शाह हैं। व्यापारी हैं। 13। हे प्रभू ! (आपका रूप) पूरा सतिगुरू (आपकी सिफत-सालाह की) बाणी (आपके पैदा किए हुए जीवों को) समझाता है। हे सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू ! आप सारी ताकतों के मालिक हैं। आप (अपनी सारी रचना में) हर जगह मौजूद हैं। कोई जीव आपके हुकम को मोड़ नहीं सकता। (इतने बड़े पसारे का मालिक हो के भी) आप सदा बेफिक्र हैं। (हे भाई ! परमात्मा अपने पैदा किए हुए जीवों के लिए सब कुछ करता है। पर) उस को (अपने लिए) कोई रक्ती भर भी लालच नहीं। 14। जनम और मरण उसके नजदीक नहीं फटकते (उसको देख के पागल हो जाते हैं सहम जाते हैं)। (परमात्मा की कृपा से जो मनुष्य) अपने हृदय में उसकी सिफत-सालाह की बाणी बसाता है और आत्मिक अडोलता का रस लेता है। (प्रभू की बख्शी हुई प्रभू-चरनों की) प्रीति से जिस मनुष्य के मन में प्रभू की भक्ति का प्यार जाग उठता है। उसको प्रभू (स्वयं ही विकारों से) निजात देने वाला है स्वयं ही (माया की तृष्णा से) तृप्ति देने वाला है। और स्वयं ही सब बख्शिशें करने वाला है। 15। हे प्रभू ! (इतना बेअंत जगत रच के) आप स्वयं (इसके मोह से) निर्लिप हैं। हे प्रभू ! (आपके रूप) गुरू के द्वारा ही आपके साथ जान-पहचान हो सकती है। (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है वह सब आपके में ही लीन हो जाता है। गरीब नानक आपके दर से (नाम की) ख़ैर माँगता है। हे प्रभू ! मुझे अपना नाम दे। यही मेरे वास्ते सबसे ऊँची इज्जत है। 16। 1।

आपे धरती धउलु अकासं ॥

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मारू महला 1 ॥
आपे धरती धउलु अकासं ॥
आपे साचे गुण परगासं ॥
जती सती संतोखी आपे आपे कार कमाई हे ॥1॥
जिसु करणा सो करि करि वेखै ॥
कोइ न मेटै साचे लेखै ॥
आपे करे कराए आपे आपे दे वडिआई हे ॥2॥
पंच चोर चंचल चितु चालहि ॥
पर घर जोहहि घरु नही भालहि ॥
काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी बिनु सबदै पति जाई हे ॥3॥
गुर ते बूझै त्रिभवणु सूझै ॥
मनसा मारि मनै सिउ लूझै ॥
जो तुधु सेवहि से तुध ही जेहे निरभउ बाल सखाई हे ॥4॥
आपे सुरगु मछु पइआला ॥
आपे जोति सरूपी बाला ॥
जटा बिकट बिकराल सरूपी रूपु न रेखिआ काई हे ॥5॥
बेद कतेबी भेदु न जाता ॥
ना तिसु मात पिता सुत भ्राता ॥
सगले सैल उपाइ समाए अलखु न लखणा जाई हे ॥6॥
करि करि थाकी मीत घनेरे ॥
कोइ न काटै अवगुण मेरे ॥
सुरि नर नाथु साहिबु सभना सिरि भाइ मिलै भउ जाई हे ॥7॥
भूले चूके मारगि पावहि ॥
आपि भुलाइ तूहै समझावहि ॥
बिनु नावै मै अवरु न दीसै नावहु गति मिति पाई हे ॥8॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (सारा जगत प्रभू के अपने आप से प्रकट हुआ है। इस वास्ते प्रभू) स्वयं ही धरती है स्वयं धरती का आसरा है। स्वयं ही आकाश है। प्रभू स्वयं ही अपने सदा-स्थिर रहने वाले गुणों का प्रकाश करने वाला है। स्वयं ही जती है। स्वयं ही दानी है। स्वयं ही संतोषी है। स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के जत-सत-संतोख के अभ्यास की) कार कमाने वाला है। 1। जिस करतार का यह रचा हुआ संसार है वह इसको रच-रच के स्वयं ही इसकी संभाल करता है। कोई जीव उस परमात्मा के सदा-स्थिर रहने वाले हुकम की उलंघना नहीं कर सकता। (जीवों में व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही सब कुछ कर रहा है। स्वयं ही जीवों से (अपने हुकम अनुसार काम) करवा रहा है। स्वयं ही (जिनको अपने नाम की दाति देता है उनको) आदर दे रहा है। 2। (प्रभू की अपनी रजा में ही) भरमा देने वाले पाँच कामादिक चोर (जीवों के) मन को मोह लेते हैं। (जिनके मन कामादिक आदि मोह लेते हैं) वे पराए घरों में ताकते हैं। अपने हृदय-घर को नहीं खोजते। (विकारों में फसे हुओं का आखिर) शरीर शहर गिर जाता है। गिर के ढेरी हो जाता है; गुरू के शबद से वंचित रहने के कारण उनकी इज्जत जाती रहती है। 3। (हे प्रभू ! आपकी मेहर से जो मनुष्य) गुरू का ज्ञान हासिल करता है उसको आप तीनों भवनों में व्यापक दिखाई दे जाते हैं। वे मनुष्य मन के मायावी फुरने मार के मन से मुकाबला करता है (और इसको वश में रखता है)। हे प्रभू ! जो लोग आपको सिमरते हैं वह आपके जैसे हो जाते हैं। आप किसी से ना डरने वाले उनका सदा का साथी बन जाते हैं। 4। (सारी सृष्टि प्रभू के अपने आप से प्रकट होने के कारण) प्रभू स्वयं ही स्वर्ग-लोक है। स्वयं ही मातृ लोक है। स्वयं ही पाताल लोक है। स्वयं ही सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश है और सबसे बड़ा है। भयानक और डरावनी जटाएं धारने वाला भी स्वयं ही है। फिर भी उस का ना कोई खास रूप है ना कोई खास चक्र-चिन्ह है। 5। ना ही हिन्दू धर्म की वेद आदिक धर्म पुस्तकों ने ना ही पश्चिमी मतों की कुरान आदि किताबों ने परमात्मा की हस्ती की गहराई को समझा है। उस परमात्मा की ना कोई माँ। ना उसका कोई खास पुत्र ना कोई भाई है। बड़ऋे बड़े पहाड़ आदिक पैदा करके (जब चाहे) सारे ही अपने में लीन कर लेता है। उसका स्वरूप बयान से परे है। बियान नहीं किया जा सकता। 6। (परमात्मा से टूट के) अनेकों (देवी-देवताओं को) मैं अपने मित्र बना-बना के हार गई हूँ। (मेरे अंदर से) कोई (ऐसा मित्र) मेरे अवगुण दूर नहीं कर सका। वह परमात्मा ही सारे देवताओं और मनुष्यों का पति है। वही सब जीवों के सर पर मालिक है। प्यार के द्वारा जिस बंदे को वह मिल जाता है उसका (पापों-विकारों का सारा) सहम दूर हो जाता है। 7। हे प्रभू ! भटके हुए गलत रास्ते पर पड़े हुए बंदों को आप स्वयं ही सही मार्ग पर लगाते हैं। आप खुद ही गलत रास्ते पर डाल के फिर खुद ही (सीधे राह की) समझ बख्शते हैं (भटकना से बचने के लिए) आपके नाम के बिना मुझे और कोई वसीला दिखाई नहीं देता। आपका नाम सिमरने से ही पता चलता है कि आप कैसे (दयालु) हैं। कितने बड़े (बेअंत) हैं। 8।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1021 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०२१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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