अंग
1019
मारू
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जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥1॥ रहाउ ॥
मारू महला 5 ॥
जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥1॥ रहाउ ॥
पीवना जितु मनु आघावै नामु अंम्रित रसु पीवना ॥1॥
खावना जितु भूख न लागै संतोखि सदा त्रिपतीवना ॥2॥
पैनणा रखु पति परमेसुर फिरि नागे नही थीवना ॥3॥
भोगना मन मधे हरि रसु संतसंगति महि लीवना ॥4॥
बिनु तागे बिनु सूई आनी मनु हरि भगती संगि सीवना ॥5॥
मातिआ हरि रस महि राते तिसु बहुड़ि न कबहू अउखीवना ॥6॥
मिलिओ तिसु सरब निधाना प्रभि क्रिपालि जिसु दीवना ॥7॥
सुखु नानक संतन की सेवा चरण संत धोइ पीवना ॥8॥3॥6॥
जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥1॥ रहाउ ॥
पीवना जितु मनु आघावै नामु अंम्रित रसु पीवना ॥1॥
खावना जितु भूख न लागै संतोखि सदा त्रिपतीवना ॥2॥
पैनणा रखु पति परमेसुर फिरि नागे नही थीवना ॥3॥
भोगना मन मधे हरि रसु संतसंगति महि लीवना ॥4॥
बिनु तागे बिनु सूई आनी मनु हरि भगती संगि सीवना ॥5॥
मातिआ हरि रस महि राते तिसु बहुड़ि न कबहू अउखीवना ॥6॥
मिलिओ तिसु सरब निधाना प्रभि क्रिपालि जिसु दीवना ॥7॥
सुखु नानक संतन की सेवा चरण संत धोइ पीवना ॥8॥3॥6॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! जीने में उस मनुष्य का जीना कामयाब है जो हरी-नाम सुन के सदा हरी-नाम जप के जीता है। 1। रहाउ। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम रस पीना चाहिए। ये पीना ऐसा है कि इसके द्वारा मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहता है। 1। हे भाई ! नाम-भोजन को ही प्राणों की खुराक बनाना चाहिए क्योंकि इसकी बरकति से माया वाली भूख नहीं लगती। संतोष में सदा अघाए रहते हैं। 2। हे जिंदे ! पति-परमेश्वर का नाम-कपड़ा ही सिर पर रख। फिर कभी नंगे सिर नहीं हो सकते। 3। हे भाई ! मन में हरी-नाम रस को ही लेना चाहिए। संतों केी संगति में रह के नाम-रस ही पीना चाहिए। 4। हे भाई ! (किसी सूई की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। किसी धागे की जरूरत नहीं पड़ती; ज्यों-ज्यों नाम जपते रहें) बिना सूई धागा लगाए ही मन परमात्मा की भगती में सीया जाता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रस में रंगे जाते हैं वह असल नशे में मस्त हैं; ये नशा फिर कभी कम नहीं होता। 6। पर। हे भाई ! कृपालु प्रभू ने स्वयं जिस जीव को ये नाम की दाति दी उसको ही सारे खजानों का मालिक (प्रभू) मिल गया। 7। हे नानक ! असल आत्मिक आनंद संत-जनों की सेवा करने में ही है। संतों के चरण धो के पीने में है (भाव। गरीबी-भाव से संतो की सेवा में ही सुख है)। 8। 3। 6।
जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥
मारू महला 5 घरु 8 अंजुलीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥
जिसु ग्रिहि थोरी सु फिरै भ्रमंता ॥
दुहू बिवसथा ते जो मुकता सोई सुहेला भालीऐ ॥1॥
ग्रिह राज महि नरकु उदास करोधा ॥
बहु बिधि बेद पाठ सभि सोधा ॥
देही महि जो रहै अलिपता तिसु जन की पूरन घालीऐ ॥2॥
जागत सूता भरमि विगूता ॥
बिनु गुर मुकति न होईऐ मीता ॥
साधसंगि तुटहि हउ बंधन एको एकु निहालीऐ ॥3॥
करम करै त बंधा नह करै त निंदा ॥
मोह मगन मनु विआपिआ चिंदा ॥
गुर प्रसादि सुखु दुखु सम जाणै घटि घटि रामु हिआलीऐ ॥4॥
संसारै महि सहसा बिआपै ॥
अकथ कथा अगोचर नही जापै ॥
जिसहि बुझाए सोई बूझै ओहु बालक वागी पालीऐ ॥5॥
छोडि बहै तउ छूटै नाही ॥
जउ संचै तउ भउ मन माही ॥
इस ही महि जिस की पति राखै तिसु साधू चउरु ढालीऐ ॥6॥
जो सूरा तिस ही होइ मरणा ॥
जो भागै तिसु जोनी फिरणा ॥
जो वरताए सोई भल मानै बुझि हुकमै दुरमति जालीऐ ॥7॥
जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥
करि करि वेखै अपणे जचना ॥
नानक के पूरन सुखदाते तू देहि त नामु समालीऐ ॥8॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥
जिसु ग्रिहि थोरी सु फिरै भ्रमंता ॥
दुहू बिवसथा ते जो मुकता सोई सुहेला भालीऐ ॥1॥
ग्रिह राज महि नरकु उदास करोधा ॥
बहु बिधि बेद पाठ सभि सोधा ॥
देही महि जो रहै अलिपता तिसु जन की पूरन घालीऐ ॥2॥
जागत सूता भरमि विगूता ॥
बिनु गुर मुकति न होईऐ मीता ॥
साधसंगि तुटहि हउ बंधन एको एकु निहालीऐ ॥3॥
करम करै त बंधा नह करै त निंदा ॥
मोह मगन मनु विआपिआ चिंदा ॥
गुर प्रसादि सुखु दुखु सम जाणै घटि घटि रामु हिआलीऐ ॥4॥
संसारै महि सहसा बिआपै ॥
अकथ कथा अगोचर नही जापै ॥
जिसहि बुझाए सोई बूझै ओहु बालक वागी पालीऐ ॥5॥
छोडि बहै तउ छूटै नाही ॥
जउ संचै तउ भउ मन माही ॥
इस ही महि जिस की पति राखै तिसु साधू चउरु ढालीऐ ॥6॥
जो सूरा तिस ही होइ मरणा ॥
जो भागै तिसु जोनी फिरणा ॥
जो वरताए सोई भल मानै बुझि हुकमै दुरमति जालीऐ ॥7॥
जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥
करि करि वेखै अपणे जचना ॥
नानक के पूरन सुखदाते तू देहि त नामु समालीऐ ॥8॥1॥7॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 8 अंजुलीआ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के घर में बहुत माया होती है (अपार धन-संपदा होती है)। उस मनुष्य के (हृदय-) घर में (हर वक्त) चिंता रहती है (कि कहीं खोई ना जाए)। जिस मनुष्य के घर में थोड़ी माया है वह मनुष्य (माया की खातिर) भटकता फिरता है। जो मनुष्य इन दोनों हालातों से बचा रहता है। वही मनुष्य सुखी देखा जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य गृहस्थ के ऐश्वर्य में व्यस्त है। वह (दरअसल) नर्क (भोग रहा है); जो मनुष्य (गृहस्त के जंजालों का) त्याग कर गया है वह सदा क्रोध का शिकार हुआ रहता है। भले ही उसने कई तरीकों से सारे वेद-शास्त्र पढ़े-विचारे हों। हे भाई ! उस मनुष्य की ही मेहनत सफल होती है जो शरीर की खातिर किरत-कार करते हुए ही (माया से) निर्लिप रहता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य अहंकार के बँधनों में बँधा हुआ है वह) जागता हुआ और सोया हुआ हर वक्त भटकना में पड़ कर दुखी होता है। हे मित्र ! गुरू की शरण के बिना इन बँधनों से खलासी नहीं होती। जिस मनुष्य के अहंकार के बँधन गुरू की संगति में टिक के टूट जाते हैं। वह हर जगह एक परमात्मा को ही देखता है। 3। हे भाई ! (जो मनुष्य शास्त्रों के अनुसार निहित धार्मिक) कर्म करता रहता है वह इन कर्मों के जाल में जकड़ा रहता है। और। अगर वह किसी वक्त ये कर्म नहीं करता। तो कर्म-काण्डी लोग उसकी निंदा करते हैं। सो। उसका मन मोह में डूबा रहता है चिंता तले दबा रहता है। हे भाई ! गुरू की किरपा से जो मनुष्य सुख और दुख को एक-समान समझता है वह हरेक शरीर में एक प्रभू को ही बसता देखता है। 4। हे भाई ! जगत (के धँधों) में (मनुष्य को कोई ना कोई) सहम दबा के रखता है; उसको अकथ अगोचर परमात्मा की सिफत-सालाह सूझती ही नहीं। (पर जीव के भी क्या वश।) वही मनुष्य (जीवन का सही रास्ता) समझता है जिसको परमात्मा स्वयं बख्शता है। उस मनुष्य को परमात्मा बच्चे की तरह पालता है। 5। हे भाई ! (जब कोई मनुष्य त्यागी बन के माया को अपनी ओर से) छोड़ बैठता है तब (भी माया) खलासी नहीं करती। जब कोई मनुष्य माया एकत्र करता जाता है जब (संचय करने वाले के) मन में डर बना रहता है (कि कहीं हाथ से चली ना जाए)। इस माया में रहते हुए ही परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य की इज्जत रखता है। उस गुरमुख के सिर पर चवर झुलाया जाता है। 6। हे भाई ! जो मनुष्य माया के मुकाबले पर सूरमा बनता है उसको ही माया की तरफ से उपरामता मिलती है; पर जो मनुष्य (माया से) मात खा जाता है उसको अनेकों जूनियों में भटकना पड़ता है। (सूरमा मनुष्य) उस भाणे को मीठा करके मानता है जो भाणा परमात्मा बरताता है (उसे मीठा समझता है जिसे परमात्मा करता है); वह मनुष्य रज़ा को समझ के (अपने अंदर से) खोटी मति को जला देता है। 7। हे प्रभू ! आप जिस-जिस काम में जीवों को लगाते हैं। उसी उसी काम में जीव लगते हैं। हे भाई ! परमात्मा अपनी मर्ज़ी। के काम कर कर के स्वयं ही उनको देखता है। हे नानक को सारे गुण देने वाले प्रभू ! अगर आप (अपने नाम की दाति) दें तो ही आपका नाम हृदय में बसाया जा सकता है। 8। 1। 7।
बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥
मारू महला 5 ॥
बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥
इकि तते इकि बोलनि मिठे ॥
असतु उदोतु भइआ उठि चले जिउ जिउ अउध विहाणीआ ॥1॥
पाप करेदड़ सरपर मुठे ॥
अजराईलि फड़े फड़ि कुठे ॥
बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥
इकि तते इकि बोलनि मिठे ॥
असतु उदोतु भइआ उठि चले जिउ जिउ अउध विहाणीआ ॥1॥
पाप करेदड़ सरपर मुठे ॥
अजराईलि फड़े फड़ि कुठे ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ (हे भाई ! जैसे सूरज के डूबने के वक्त अनेकों पक्षी किसी वृक्ष पर आ के इकट्ठे होते हैं। इसी तरह) इस आकाश-वृक्ष तले सारे जीव-जंतु आ के एकत्र हुए हैं। कई कड़वे बोल बोलते हैं कई मीठे बोल बोलते हैं। डूबा हुआ सूरज जब आकाश में दोबारा उदय हो उठता है तब (पक्षी वृक्ष से) उठ के उड़ जाते हैं (वैसे ही) ज्यों-ज्यों (जीवों की) उम्र समाप्त हो जाती है (पक्षियों की तरह यहाँ से कूच कर जाते हैं)। 1। हे भाई ! यहाँ पाप करने वाले जीव (अपने आत्मिक जीवन का सरमाया) जरूर लुटा जाते हैं। पाप करने वालों को मौत का फरिश्ता पकड़-पकड़ के कोह (तड़फा-तड़फा) के मारे जा रहा है
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1019 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।