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अंग १०२ · माझ

अंग
102
माझ
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  1. ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥
  2. सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥
  3. तिसु कुरबाणी जिनि तूं सुणिआ ॥
  4. तूं पेडु साख तेरी फूली ॥

ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥

अंग १०१ से चला आ रहा अंश

ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥
जो किछु ठाकुर का सो सेवक का सेवकु ठाकुर ही संगि जाहरु जीउ ॥3॥
अपुनै ठाकुरि जो पहिराइआ ॥ बहुरि न लेखा पुछि बुलाइआ ॥
तिसु सेवक कै नानक कुरबाणी सो गहिर गभीरा गउहरु जीउ ॥4॥18॥25॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) पालनहार प्रभू के सेवक प्रभू के मिलाप का आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। पालणहार प्रभू का स्वै उसके सेवक का स्वै बन जाता है। (ठाकुर और उसके सेवक के आत्मिक जीवन में कोई फर्क नहीं रह जाता)। ठाकुर के चरणों में जुड़ा रह के सेवक (लोक परलोक में) प्रगट हो जाता है।3। जिस (सेवक) को प्यारे ठाकुर प्रभू ने (सेवा भक्ति का) सिरोपा (सम्मान) बख्शा है, उसे फिर (उसके कर्मों का) लेखा नहीं पूछा। (लेखा पूछने के लिए) नहीं बुलाया (भाव, वह सेवक बुरे कर्मों की तरफ जाता ही नहीं)। हे नानक ! (कह) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ। वह सेवक गहरे स्वभाव वाला, बड़े जिगरे वाला और ऊँचे स्वाभाव वाला और उच्च अमोलक जीवन वाला हो जाता है।4।18।25।

सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥

माझ महला 5 ॥
सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥
बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही ॥
गुर परसादी जिनी अंतरि पाइआ सो अंतरि बाहरि सुहेला जीउ ॥1॥
झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा ॥
मनु पीवै सुनि सबदु बीचारा ॥
अनद बिनोद करे दिन राती सदा सदा हरि केला जीउ ॥2॥
जनम जनम का विछुड़िआ मिलिआ ॥
साध क्रिपा ते सूका हरिआ ॥
सुमति पाए नामु धिआए गुरमुखि होए मेला जीउ ॥3॥
जल तरंगु जिउ जलहि समाइआ ॥
तिउ जोती संगि जोति मिलाइआ ॥
कहु नानक भ्रम कटे किवाड़ा बहुड़ि न होईऐ जउला जीउ ॥4॥19॥26॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ सारा आत्मिक सुख हृदय में टिके रहने में है, बाहर भटकने में नहीं। जो मनुष्य बाहर सुख की तलाश करता है वह सुख नहीं पा सकता।ऐसे लोग तो भटकना में पड़े रहके कुमार्ग पर पड़े रहते हैं गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों ने अपने हृदय मेंही टिक के परमात्मा को पा लिया है, वे अंतरात्मे सिमरन करते हुए भी जगत से प्रेम का इस्तेमाल करते हुए भी सदा सुखी रहते हैं।1। (जैसे मध्यॅम-मध्यॅम बरखा होती है और वह धरती को सींचती जाती है उसी तरह जब) आत्मिक अडोलता की हालत में नाम अमृत की धार सहजे सहजे बरसती है तब मनुष्य का मन गुरू का शबद सुन के (प्रभू के गुणों की) विचार सुन के उस अमृत धारा को पीता जाता है (अपने अंदर टिकाए जाता है) (उस अवस्था में मन) हर समय आत्मिक आनंद लेता रहता है, सदैव परमात्मा के मिलाप का सुख प्राप्त करता है।2। (सिफत सलाह की बरकति से) जन्मों जन्मांतरों का बिछुड़ा हुआ जीव प्रभू चरणों से मिलाप हासिल कर लेता है। मनुष्य का रूखा हो चुका मन गुरू की कृपा से प्यार रस से तर हो जाता है। गुरू से जब मनुष्य श्रेष्ठ मति लेता है, तब परमात्मा का नाम सिमरता है। गुरू की शरण पड़ने से जीव का परमात्मा से मिलाप हो जाता है।3। जैसे (नदी आदि के) पानी की लहिर (उस नदी में से उभर के फिर उस) नदी के पानी में ही समा जाती है वैसे ही (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन करने से मनुष्य की) सुरति (जोति) प्रभू की जोति में मिली रहती है। हे नानक ! कह, (गुरू के सन्मुख हो के सिमरन करने से मनुष्य के) भटकनों रूपी किवाड़ (दरवाजे) खुल जाते हैं, और फिर मनुष्य माया के पीछे दौड़-भाग करने वाले स्वभाव का नहीं रहता।4।19।26।

तिसु कुरबाणी जिनि तूं सुणिआ ॥

माझ महला 5 ॥
तिसु कुरबाणी जिनि तूं सुणिआ ॥
तिसु बलिहारी जिनि रसना भणिआ ॥
वारि वारि जाई तिसु विटहु जो मनि तनि तुधु आराधे जीउ ॥1॥
तिसु चरण पखाली जो तेरै मारगि चालै ॥
नैन निहाली तिसु पुरख दइआलै ॥
मनु देवा तिसु अपुने साजन जिनि गुर मिलि सो प्रभु लाधे जीउ ॥2॥
से वडभागी जिनि तुम जाणे ॥
सभ कै मधे अलिपत निरबाणे ॥
साध कै संगि उनि भउजलु तरिआ सगल दूत उनि साधे जीउ ॥3॥
तिन की सरणि परिआ मनु मेरा ॥
माणु ताणु तजि मोहु अंधेरा ॥
नामु दानु दीजै नानक कउ तिसु प्रभ अगम अगाधे जीउ ॥4॥20॥27॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे प्रभू !) जिस मनुष्य ने आपका नाम सुना है (जो सदा आपकी सिफत सलाह सुनता है), मैं उससे सदके जाता हूं। जिस मनुष्य ने अपनी जिहवा से आपका नाम उचारा है (जो आपकी सिफत सलाह करता रहता है), उससे मैं वारने जाता हूँ। (हे प्रभू !) उस मनुष्य से (बार बार) कुर्बान जाता हूं, जो अपने मन से अपने शरीर से आपको याद करता रहता है।1। (हे प्रभू !) जो मनुष्य आपके मिलाप के राह पे चलता है, मैं उसके पैर धोता रहूँ। (हे भाई !) दया के श्रोत अकाल-पुरख को मैं अपनी आँखें से देखना चाहता हूँ (इस वास्ते) मैं अपना मन अपने उस सज्जन के हवाले करने को तैयार हूँ जिसने गुरू को मिल के उस प्रभू को पा लिया है।2। (हे प्रभू !) जिस जिस मनुष्य ने आपके साथ सांझ डाली है, वे सब सौभाग्यशाली हैं। (हे भाई !) परमात्मा सब जीवों के अंदर बसता है (फिर भी वह) निर्लिप है और वासना रहित है। (जिस मनुष्य ने उसके साथ सांझ डाली है) साध-संगति में रह के उसने संसार समुंद्र तैर लिया है, उसने (कामादिक) सारे विकार अपने वश में कर लिए हैं।3। मेरा मन उनकी शरण पड़ता है (जिन्होंने सारे दूत वश कर लिए हैं) (हे भाई ! दुनिया वाले) आदर मान छोड़ के (दुनिया वाली) ताकतें छोड़के (जीवन राह में) अंधकार (पैदा करने वाली माया का) मोह त्याग के, (नानक उनके आगे अरदास करते हैं कि) मुझ नानक को (भी) उस अपहुँच अथाह प्रभू का नाम दान के रूप में दो।4।20।27।

तूं पेडु साख तेरी फूली ॥

माझ महला 5 ॥
तूं पेडु साख तेरी फूली ॥
तूं सूखमु होआ असथूली ॥
तूं जलनिधि तूं फेनु बुदबुदा तुधु बिनु अवरु न भालीऐ जीउ ॥1॥
तूं सूतु मणीए भी तूंहै ॥
तूं गंठी मेरु सिरि तूंहै ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई अवरु न कोइ दिखालीऐ जीउ ॥2॥
तूं निरगुणु सरगुणु सुखदाता ॥
तूं निरबाणु रसीआ रंगि राता ॥
अपणे करतब आपे जाणहि आपे तुधु समालीऐ जीउ ॥3॥
तूं ठाकुरु सेवकु फुनि आपे ॥
तूं गुपतु परगटु प्रभ आपे ॥
नानक दासु सदा गुण गावै इक भोरी नदरि निहालीऐ जीउ ॥4॥21॥28॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप (मानो, एक) वृक्ष हैं (ये संसार आपके वृक्ष से) फूटी हुई (निकली) टहनियां हैं। हे प्रभू ! आप अदृष्ट हैं (अपने अदृष्ट रूप से) दिखता जगत बने हैं। हे प्रभू ! आप (मानों, एक) समुंद्र हैं (ये सारा जगत पसारा, जैसे) झाग और बुलबुला (भी) आप स्वयं ही हैं। आपके बिना और कोई भी नहीं दिखता।1। (ये सारा जगत पसारा आपसे बना आपका ही स्वरूप, जैसे एक माला है। उस माला का) धागा आप खुद हैं, मणके भी आप ही हैं। (मणकों पर) गाँठ भी आप ही हैं, (सब मणकों के) सिर पर मेरू मणका भी आप ही हैं। (हे भाई !) (जगत रचना के) शुरू में, मध्य में और अंत में प्रभू स्वयं ही स्वयं है। उससे बगैर और कोई नहीं दिखता।2। हे प्रभू ! आप (अपनी रची माया के) तीन गुणों से परे हैं। तीनों गुणों से बना जगत पसारा भी आप स्वयं ही हैं। सब जीवों को सुख देने वाला भी आप स्वयं ही हैं। आप वासना रहित हैं (सब जीवों में व्यापक हो के) रसों को भोगने वाले भी हैं और रसों के प्यार में मस्त भी हैं। हे प्रभू ! अपने खेल तमाशे आप स्वयं ही जानते हैं। आप स्वयं ही सारी संभाल भी कर रहे हैं।3। हे प्रभू ! मालिक भी आप हैं और सेवक भी आप स्वयं ही हैं। हे प्रभू ! (सारे संसार में) आप छुपे हुए भी हैं और (संसार रूप हो के) आप प्रत्यक्ष भी दिखायी दे रहे हैं। हे नानक ! (कह, आपका ये) दास सदा आपके गुण गाता है। छण भर के लिए ही (इस दास की ओर) मेहर की निगाह से देख।4।21।28।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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