ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥ जो किछु ठाकुर का सो सेवक का सेवकु ठाकुर ही संगि जाहरु जीउ ॥3॥ अपुनै ठाकुरि जो पहिराइआ ॥ बहुरि न लेखा पुछि बुलाइआ ॥ तिसु सेवक कै नानक कुरबाणी सो गहिर गभीरा गउहरु जीउ ॥4॥18॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) पालनहार प्रभू के सेवक प्रभू के मिलाप का आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। पालणहार प्रभू का स्वै उसके सेवक का स्वै बन जाता है। (ठाकुर और उसके सेवक के आत्मिक जीवन में कोई फर्क नहीं रह जाता)। ठाकुर के चरणों में जुड़ा रह के सेवक (लोक परलोक में) प्रगट हो जाता है।3। जिस (सेवक) को प्यारे ठाकुर प्रभू ने (सेवा भक्ति का) सिरोपा (सम्मान) बख्शा है, उसे फिर (उसके कर्मों का) लेखा नहीं पूछा। (लेखा पूछने के लिए) नहीं बुलाया (भाव, वह सेवक बुरे कर्मों की तरफ जाता ही नहीं)। हे नानक ! (कह) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ। वह सेवक गहरे स्वभाव वाला, बड़े जिगरे वाला और ऊँचे स्वाभाव वाला और उच्च अमोलक जीवन वाला हो जाता है।4।18।25।
माझ महला 5 ॥ सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥ बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही ॥ गुर परसादी जिनी अंतरि पाइआ सो अंतरि बाहरि सुहेला जीउ ॥1॥ झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा ॥ मनु पीवै सुनि सबदु बीचारा ॥ अनद बिनोद करे दिन राती सदा सदा हरि केला जीउ ॥2॥ जनम जनम का विछुड़िआ मिलिआ ॥ साध क्रिपा ते सूका हरिआ ॥ सुमति पाए नामु धिआए गुरमुखि होए मेला जीउ ॥3॥ जल तरंगु जिउ जलहि समाइआ ॥ तिउ जोती संगि जोति मिलाइआ ॥ कहु नानक भ्रम कटे किवाड़ा बहुड़ि न होईऐ जउला जीउ ॥4॥19॥26॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ सारा आत्मिक सुख हृदय में टिके रहने में है, बाहर भटकने में नहीं। जो मनुष्य बाहर सुख की तलाश करता है वह सुख नहीं पा सकता।ऐसे लोग तो भटकना में पड़े रहके कुमार्ग पर पड़े रहते हैं गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों ने अपने हृदय मेंही टिक के परमात्मा को पा लिया है, वे अंतरात्मे सिमरन करते हुए भी जगत से प्रेम का इस्तेमाल करते हुए भी सदा सुखी रहते हैं।1। (जैसे मध्यॅम-मध्यॅम बरखा होती है और वह धरती को सींचती जाती है उसी तरह जब) आत्मिक अडोलता की हालत में नाम अमृत की धार सहजे सहजे बरसती है तब मनुष्य का मन गुरू का शबद सुन के (प्रभू के गुणों की) विचार सुन के उस अमृत धारा को पीता जाता है (अपने अंदर टिकाए जाता है) (उस अवस्था में मन) हर समय आत्मिक आनंद लेता रहता है, सदैव परमात्मा के मिलाप का सुख प्राप्त करता है।2। (सिफत सलाह की बरकति से) जन्मों जन्मांतरों का बिछुड़ा हुआ जीव प्रभू चरणों से मिलाप हासिल कर लेता है। मनुष्य का रूखा हो चुका मन गुरू की कृपा से प्यार रस से तर हो जाता है। गुरू से जब मनुष्य श्रेष्ठ मति लेता है, तब परमात्मा का नाम सिमरता है। गुरू की शरण पड़ने से जीव का परमात्मा से मिलाप हो जाता है।3। जैसे (नदी आदि के) पानी की लहिर (उस नदी में से उभर के फिर उस) नदी के पानी में ही समा जाती है वैसे ही (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन करने से मनुष्य की) सुरति (जोति) प्रभू की जोति में मिली रहती है। हे नानक ! कह, (गुरू के सन्मुख हो के सिमरन करने से मनुष्य के) भटकनों रूपी किवाड़ (दरवाजे) खुल जाते हैं, और फिर मनुष्य माया के पीछे दौड़-भाग करने वाले स्वभाव का नहीं रहता।4।19।26।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे प्रभू !) जिस मनुष्य ने आपका नाम सुना है (जो सदा आपकी सिफत सलाह सुनता है), मैं उससे सदके जाता हूं। जिस मनुष्य ने अपनी जिहवा से आपका नाम उचारा है (जो आपकी सिफत सलाह करता रहता है), उससे मैं वारने जाता हूँ। (हे प्रभू !) उस मनुष्य से (बार बार) कुर्बान जाता हूं, जो अपने मन से अपने शरीर से आपको याद करता रहता है।1। (हे प्रभू !) जो मनुष्य आपके मिलाप के राह पे चलता है, मैं उसके पैर धोता रहूँ। (हे भाई !) दया के श्रोत अकाल-पुरख को मैं अपनी आँखें से देखना चाहता हूँ (इस वास्ते) मैं अपना मन अपने उस सज्जन के हवाले करने को तैयार हूँ जिसने गुरू को मिल के उस प्रभू को पा लिया है।2। (हे प्रभू !) जिस जिस मनुष्य ने आपके साथ सांझ डाली है, वे सब सौभाग्यशाली हैं। (हे भाई !) परमात्मा सब जीवों के अंदर बसता है (फिर भी वह) निर्लिप है और वासना रहित है। (जिस मनुष्य ने उसके साथ सांझ डाली है) साध-संगति में रह के उसने संसार समुंद्र तैर लिया है, उसने (कामादिक) सारे विकार अपने वश में कर लिए हैं।3। मेरा मन उनकी शरण पड़ता है (जिन्होंने सारे दूत वश कर लिए हैं) (हे भाई ! दुनिया वाले) आदर मान छोड़ के (दुनिया वाली) ताकतें छोड़के (जीवन राह में) अंधकार (पैदा करने वाली माया का) मोह त्याग के, (नानक उनके आगे अरदास करते हैं कि) मुझ नानक को (भी) उस अपहुँच अथाह प्रभू का नाम दान के रूप में दो।4।20।27।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप (मानो, एक) वृक्ष है (ये संसार आपके वृक्ष से) फूटी हुई (निकली) टहनियां हैं। हे प्रभू ! आप अदृष्ट है (अपने अदृष्ट रूप से) दिखता जगत बना हैं। हे प्रभू ! आप (मानों, एक) समुंद्र है (ये सारा जगत पसारा, जैसे) झाग और बुलबुला (भी) आप स्वयं ही है। आपके बिना और कोई भी नहीं दिखता।1। (ये सारा जगत पसारा आपसे बना आपका ही स्वरूप, जैसे एक माला है। उस माला का) धागा आप खुद है, मणके भी आप ही है। (मणकों पर) गाँठ भी आप ही है, (सब मणकों के) सिर पर मेरू मणका भी आप ही है। (हे भाई !) (जगत रचना के) शुरू में, मध्य में और अंत में प्रभू स्वयं ही स्वयं है। उससे बगैर और कोई नहीं दिखता।2। हे प्रभू ! आप (अपनी रची माया के) तीन गुणों से परे है। तीनों गुणों से बना जगत पसारा भी आप स्वयं ही है। सब जीवों को सुख देने वाला भी आप स्वयं ही है। आप वासना रहित है (सब जीवों में व्यापक हैं के) रसों को भोगने वाला भी है और रसों के प्यार में मस्त भी है। हे प्रभू ! अपने खेल तमाशे आप स्वयं ही जानता है। आप स्वयं ही सारी संभाल भी कर रहा है।3। हे प्रभू ! मालिक भी आप है और सेवक भी आप स्वयं ही है। हे प्रभू ! (सारे संसार में) आप छुपा हुआ भी है और (संसार रूप हैं के) आप प्रत्यक्ष भी दिखायी दे रहा है। हे नानक ! (कह, आपका ये) दास सदा आपके गुण गाता है। छण भर के लिए ही (इस दास की ओर) मेहर की निगाह से देख।4।21।28।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) पालनहार प्रभू के सेवक प्रभू के मिलाप का आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।