Lulla Family

अंग 101

अंग
101
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥
अमरु होवै जो नाम रसु पावै ॥
नाम निधान तिसहि परापति जिसु सबदु गुरू मनि वूठा जीउ ॥2॥
जिनि हरि रसु पाइआ सो त्रिपति अघाना ॥
जिनि हरि सादु पाइआ सो नाहि डुलाना ॥
तिसहि परापति हरि हरि नामा जिसु मसतकि भागीठा जीउ ॥3॥
हरि इकसु हथि आइआ वरसाणे बहुतेरे ॥
तिसु लगि मुकतु भए घणेरे ॥
नामु निधाना गुरमुखि पाईऐ कहु नानक विरली डीठा जीउ ॥4॥15॥22॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो परमात्मा के नाम का रस पीता है, वह (दुनिया के पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाता है, जो नाम का रस प्राप्त करता है, उसे आत्मिक मौत कभी भी छूह नहीं सकती। (पर प्रभू-) नाम के खजाने सिर्फ उसे मिलते हैं, जिसके मन में गुरू का शबद आ बसता है।2। जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का रस चखा है, वह पूर्ण तौर पे तृप्त हो गया है (उसकी माया वाली प्यास व भूख मिट चुकी है)। जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है, वह (माया के हमलों, विकारों के हमलों के सन्मुख) कभी डोलता नहीं। (पर) परमात्मा का यह नाम सिर्फ उस मनुष्य को मिलता है जिसके माथे के अच्छे भाग्य (जाग जाएं)।3। हे नानक ! कह, जब यह हरि नाम एक (गुरू) के हाथ में आ जाता है तो (उस गुरू के पास से) अनेकों लोग लाभ उठाते हैं। उस (गुरू के) चरणों में लग के अनेकों ही मनुष्य (माया के बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। ये नाम खजाना गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है। विरलों (किसी किसी) ने ही (इस नाम खजाने के) दर्शन किए हैं।4।15।22।
माझ महला 5 ॥
निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥
जनमु पदारथु गहिर गंभीरै ॥
लाख कोट खुसीआ रंग रावै जो गुर लागा पाई जीउ ॥1॥
दरसनु पेखत भए पुनीता ॥
सगल उधारे भाई मीता ॥
अगम अगोचरु सुआमी अपुना गुर किरपा ते सचु धिआई जीउ ॥2॥
जा कउ खोजहि सरब उपाए ॥ वडभागी दरसनु को विरला पाए ॥
ऊच अपार अगोचर थाना ओहु महलु गुरू देखाई जीउ ॥3॥
गहिर गंभीर अंम्रित नामु तेरा ॥
मुकति भइआ जिसु रिदै वसेरा ॥
गुरि बंधन तिन के सगले काटे जन नानक सहजि समाई जीउ ॥4॥16॥23॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) मेरे वास्ते तो परमात्मा का नाम ही दुनिया के नौ खजाने हैं। प्रभू नाम ही आत्मिक ताकतें हैं। गहरे और बड़े जिगरे वाले परमात्मा की मेहर से मुझे मनुष्य जनम (दुर्लभ) पदार्थ (दिखाई दे रहा) है। (पर ये नाम गुरू की कृपा से ही मिलता है) जो मनुष्य गुरू की चरणीं लगता है, वह लाखों करोड़ों खुशियों का आनंद लेता है।1। (गुरू का) दीदार करके (मेरा तन मन) पवित्र हो गया है। मेरे सारे भाई और मित्र (ज्ञानेंद्रियों को गुरू ने विकारों से) बचा लिये हैं। मैं गुरू की कृपा सेअपने उस मालिक को सिमर रहा हूँ, जो अपहुँच है। जिस तक ज्ञान इंद्रियों की पहुँच नहीं है और जो सदा कायम रहने वाला है।2। जिस परमात्मा को उसके पैदा किए सारे जीव ढूँढते रहते हैं, उसका दर्शन कोई बिरला ही भाग्यशाली मनुष्य प्राप्त करता है। जो प्रभू सबसे ऊँची हस्ती वाला है, जिसके गुणों का दूसरा छोर नहीं मिल सकता, जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती, उसका वह ऊँचा स्थान ठिकाना गुरू (ही) दिखाता है।3। हे गहरे प्रभू ! हे बड़े जिगरे वाले प्रभू ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। जिस मनुष्य के दिल में आपका नाम बस जाता है, वह विकारों से मुक्त हो जाता है। हे नानक ! (जिनके हृदय में प्रभू नाम बसा है) गुरू ने उनके सारे माया के फाहे काट दिए हैं वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4।16।23।
माझ महला 5 ॥
प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥
प्रभू दइआ ते मंगलु गावउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत हरि धिआईऐ सगल अवरदा जीउ ॥1॥
नामु अउखधु मो कउ साधू दीआ ॥
किलबिख काटे निरमलु थीआ ॥
अनदु भइआ निकसी सभ पीरा सगल बिनासे दरदा जीउ ॥2॥
जिस का अंगु करे मेरा पिआरा ॥ सो मुकता सागर संसारा ॥
सति करे जिनि गुरू पछाता सो काहे कउ डरदा जीउ ॥3॥
जब ते साधू संगति पाए ॥ गुर भेटत हउ गई बलाए ॥
सासि सासि हरि गावै नानकु सतिगुर ढाकि लीआ मेरा पड़दा जीउ ॥4॥17॥24॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ परमात्मा की मेहर से मैं परमातमा का नाम सिमरता हूँ, परमात्मा की ही कृपा से मैं परमातमा के सिफत सलाह के गीत गाता हूँ। (हे भाई !) उठते बैठते सोते जागते सारी (ही) उम्र परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए।1। परमातमा का नाम दारू (है, जब) मुझे गुरू ने दिया (इस की बरकति से मेरे सारे) पाप कट गए और मैं पवित्र हो गया। (मेरे अंदर आत्मिक) सुख पैदा हो गया। (मेरे अंदर से अहंकार की) सारी पीड़ा निकल गई। मेरे सारे दुख-दर्द दूर हो गए।2। (हे भाई !) मेरा प्यारा (गुरू परमात्मा) जिस मनुष्य की सहायता करता है, वह इस संसार समुंद्र (के विकारों) से मुक्त हो जाता है। जिस मनुष्य ने श्रद्धा धार के गुरू के साथ सांझ डाल ली, उसे (इस समुंद्र से) डरने की जरूरत नहीं रह जाती।3। (हे भाई !) जब से मुझे गुरू की संगति मिली है, सतिगुरू ने (अहंकार आदि विकारों से बचा के) मेरी इज्जत रख ली है। अब नानक हरेक स्वास के साथ परमात्मा के गुण गाता है।4।17।24।
माझ महला 5 ॥
ओति पोति सेवक संगि राता ॥
प्रभ प्रतिपाले सेवक सुखदाता ॥
पाणी पखा पीसउ सेवक कै ठाकुर ही का आहरु जीउ ॥1॥
काटि सिलक प्रभि सेवा लाइआ ॥
हुकमु साहिब का सेवक मनि भाइआ ॥
सोई कमावै जो साहिब भावै सेवकु अंतरि बाहरि माहरु जीउ ॥2॥
तूं दाना ठाकुरु सभ बिधि जानहि ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जैसे कपड़े का सूत) ओत प्रोत हो के परोया होता है (वैसे ही परमात्मा अपने) सेवक के साथ मिला रहता है। (जीवों को) सुख देने वाला प्रभू अपने सेवकों की रक्षा करता है। (मेरी चाहत है कि) मैं प्रभू के सेवकों के दर पे पानी ढोऊँ, पंखा फेरूँ और चक्की पीसूँ। (क्योंकि सेवकों को) पालणहार प्रभू (के सिमरन) का ही उद्यम रहता है।1। प्रभू ने (जिसे उसकी माया की मोह की) फाही काट के अपनी सेवा भक्ति में जोड़ा है उस सेवक के मन में मालिक प्रभू का हुकम प्यारा लगने लगता है। वह सेवक वही कमाई करता है, जो मालिक प्रभू को ठीक लगती है। वह सेवक नाम सिमरन में और जगत से प्रेम के साथ पेश आने में माहिर हो जाता है।2। हे प्रभू ! (अपने सेवकों के दिल की) आप जानता है। आप (अपने सेवकों का) पालणहार है, आप (सेवकों को माया के मोह से बचाने के) सब तरीके जानता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जो परमात्मा के नाम का रस पीता है, वह (दुनिया के पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाता है, जो नाम का रस प्राप्त करता है, उसे आत्मिक मौत कभी भी छूह नहीं सकती।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English