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अंग १०१ · माझ

अंग
101
माझ
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  1. जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥
  2. निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥
  3. प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥
  4. ओति पोति सेवक संगि राता ॥

जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥

अंग १०० से चला आ रहा अंश

जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥
अमरु होवै जो नाम रसु पावै ॥
नाम निधान तिसहि परापति जिसु सबदु गुरू मनि वूठा जीउ ॥2॥
जिनि हरि रसु पाइआ सो त्रिपति अघाना ॥
जिनि हरि सादु पाइआ सो नाहि डुलाना ॥
तिसहि परापति हरि हरि नामा जिसु मसतकि भागीठा जीउ ॥3॥
हरि इकसु हथि आइआ वरसाणे बहुतेरे ॥
तिसु लगि मुकतु भए घणेरे ॥
नामु निधाना गुरमुखि पाईऐ कहु नानक विरली डीठा जीउ ॥4॥15॥22॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो परमात्मा के नाम का रस पीता है, वह (दुनिया के पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाता है, जो नाम का रस प्राप्त करता है, उसे आत्मिक मौत कभी भी छूह नहीं सकती। (पर प्रभू-) नाम के खजाने सिर्फ उसे मिलते हैं, जिसके मन में गुरू का शबद आ बसता है।2। जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का रस चखा है, वह पूर्ण तौर पे तृप्त हो गया है (उसकी माया वाली प्यास व भूख मिट चुकी है)। जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है, वह (माया के हमलों, विकारों के हमलों के सन्मुख) कभी डोलता नहीं। (पर) परमात्मा का यह नाम सिर्फ उस मनुष्य को मिलता है जिसके माथे के अच्छे भाग्य (जाग जाएं)।3। हे नानक ! कह, जब यह हरि नाम एक (गुरू) के हाथ में आ जाता है तो (उस गुरू के पास से) अनेकों लोग लाभ उठाते हैं। उस (गुरू के) चरणों में लग के अनेकों ही मनुष्य (माया के बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। ये नाम खजाना गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है। विरलों (किसी किसी) ने ही (इस नाम खजाने के) दर्शन किए हैं।4।15।22।

निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥

माझ महला 5 ॥
निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥
जनमु पदारथु गहिर गंभीरै ॥
लाख कोट खुसीआ रंग रावै जो गुर लागा पाई जीउ ॥1॥
दरसनु पेखत भए पुनीता ॥
सगल उधारे भाई मीता ॥
अगम अगोचरु सुआमी अपुना गुर किरपा ते सचु धिआई जीउ ॥2॥
जा कउ खोजहि सरब उपाए ॥ वडभागी दरसनु को विरला पाए ॥
ऊच अपार अगोचर थाना ओहु महलु गुरू देखाई जीउ ॥3॥
गहिर गंभीर अंम्रित नामु तेरा ॥
मुकति भइआ जिसु रिदै वसेरा ॥
गुरि बंधन तिन के सगले काटे जन नानक सहजि समाई जीउ ॥4॥16॥23॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) मेरे वास्ते तो परमात्मा का नाम ही दुनिया के नौ खजाने हैं। प्रभू नाम ही आत्मिक ताकतें हैं। गहरे और बड़े जिगरे वाले परमात्मा की मेहर से मुझे मनुष्य जनम (दुर्लभ) पदार्थ (दिखाई दे रहा) है। (पर ये नाम गुरू की कृपा से ही मिलता है) जो मनुष्य गुरू की चरणीं लगता है, वह लाखों करोड़ों खुशियों का आनंद लेता है।1। (गुरू का) दीदार करके (मेरा तन मन) पवित्र हो गया है। मेरे सारे भाई और मित्र (ज्ञानेंद्रियों को गुरू ने विकारों से) बचा लिये हैं। मैं गुरू की कृपा सेअपने उस मालिक को सिमर रहा हूँ, जो अपहुँच है। जिस तक ज्ञान इंद्रियों की पहुँच नहीं है और जो सदा कायम रहने वाला है।2। जिस परमात्मा को उसके पैदा किए सारे जीव ढूँढते रहते हैं, उसका दर्शन कोई बिरला ही भाग्यशाली मनुष्य प्राप्त करता है। जो प्रभू सबसे ऊँची हस्ती वाला है, जिसके गुणों का दूसरा छोर नहीं मिल सकता, जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती, उसका वह ऊँचा स्थान ठिकाना गुरू (ही) दिखाता है।3। हे गहरे प्रभू ! हे बड़े जिगरे वाले प्रभू ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। जिस मनुष्य के दिल में आपका नाम बस जाता है, वह विकारों से मुक्त हो जाता है। हे नानक ! (जिनके हृदय में प्रभू नाम बसा है) गुरू ने उनके सारे माया के फाहे काट दिए हैं वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4।16।23।

प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥

माझ महला 5 ॥
प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥
प्रभू दइआ ते मंगलु गावउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत हरि धिआईऐ सगल अवरदा जीउ ॥1॥
नामु अउखधु मो कउ साधू दीआ ॥
किलबिख काटे निरमलु थीआ ॥
अनदु भइआ निकसी सभ पीरा सगल बिनासे दरदा जीउ ॥2॥
जिस का अंगु करे मेरा पिआरा ॥ सो मुकता सागर संसारा ॥
सति करे जिनि गुरू पछाता सो काहे कउ डरदा जीउ ॥3॥
जब ते साधू संगति पाए ॥ गुर भेटत हउ गई बलाए ॥
सासि सासि हरि गावै नानकु सतिगुर ढाकि लीआ मेरा पड़दा जीउ ॥4॥17॥24॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ परमात्मा की मेहर से मैं परमातमा का नाम सिमरता हूँ, परमात्मा की ही कृपा से मैं परमातमा के सिफत सलाह के गीत गाता हूँ। (हे भाई !) उठते बैठते सोते जागते सारी (ही) उम्र परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए।1। परमातमा का नाम दारू (है, जब) मुझे गुरू ने दिया (इस की बरकति से मेरे सारे) पाप कट गए और मैं पवित्र हो गया। (मेरे अंदर आत्मिक) सुख पैदा हो गया। (मेरे अंदर से अहंकार की) सारी पीड़ा निकल गई। मेरे सारे दुख-दर्द दूर हो गए।2। (हे भाई !) मेरा प्यारा (गुरू परमात्मा) जिस मनुष्य की सहायता करता है, वह इस संसार समुंद्र (के विकारों) से मुक्त हो जाता है। जिस मनुष्य ने श्रद्धा धार के गुरू के साथ सांझ डाल ली, उसे (इस समुंद्र से) डरने की जरूरत नहीं रह जाती।3। (हे भाई !) जब से मुझे गुरू की संगति मिली है, सतिगुरू ने (अहंकार आदि विकारों से बचा के) मेरी इज्जत रख ली है। अब नानक हरेक स्वास के साथ परमात्मा के गुण गाता है।4।17।24।

ओति पोति सेवक संगि राता ॥

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माझ महला 5 ॥
ओति पोति सेवक संगि राता ॥
प्रभ प्रतिपाले सेवक सुखदाता ॥
पाणी पखा पीसउ सेवक कै ठाकुर ही का आहरु जीउ ॥1॥
काटि सिलक प्रभि सेवा लाइआ ॥
हुकमु साहिब का सेवक मनि भाइआ ॥
सोई कमावै जो साहिब भावै सेवकु अंतरि बाहरि माहरु जीउ ॥2॥
तूं दाना ठाकुरु सभ बिधि जानहि ॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जैसे कपड़े का सूत) ओत प्रोत हो के परोया होता है (वैसे ही परमात्मा अपने) सेवक के साथ मिला रहता है। (जीवों को) सुख देने वाला प्रभू अपने सेवकों की रक्षा करता है। (मेरी चाहत है कि) मैं प्रभू के सेवकों के दर पे पानी ढोऊँ, पंखा फेरूँ और चक्की पीसूँ। (क्योंकि सेवकों को) पालणहार प्रभू (के सिमरन) का ही उद्यम रहता है।1। प्रभू ने (जिसे उसकी माया की मोह की) फाही काट के अपनी सेवा भक्ति में जोड़ा है उस सेवक के मन में मालिक प्रभू का हुकम प्यारा लगने लगता है। वह सेवक वही कमाई करता है, जो मालिक प्रभू को ठीक लगती है। वह सेवक नाम सिमरन में और जगत से प्रेम के साथ पेश आने में माहिर हो जाता है।2। हे प्रभू ! (अपने सेवकों के दिल की) आप जानते हैं। आप (अपने सेवकों का) पालणहार हैं, आप (सेवकों को माया के मोह से बचाने के) सब तरीके जानते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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