अमरु होवै जो नाम रसु पावै ॥
नाम निधान तिसहि परापति जिसु सबदु गुरू मनि वूठा जीउ ॥2॥
जिनि हरि रसु पाइआ सो त्रिपति अघाना ॥
जिनि हरि सादु पाइआ सो नाहि डुलाना ॥
तिसहि परापति हरि हरि नामा जिसु मसतकि भागीठा जीउ ॥3॥
हरि इकसु हथि आइआ वरसाणे बहुतेरे ॥
तिसु लगि मुकतु भए घणेरे ॥
नामु निधाना गुरमुखि पाईऐ कहु नानक विरली डीठा जीउ ॥4॥15॥22॥
निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥
जनमु पदारथु गहिर गंभीरै ॥
लाख कोट खुसीआ रंग रावै जो गुर लागा पाई जीउ ॥1॥
दरसनु पेखत भए पुनीता ॥
सगल उधारे भाई मीता ॥
अगम अगोचरु सुआमी अपुना गुर किरपा ते सचु धिआई जीउ ॥2॥
जा कउ खोजहि सरब उपाए ॥ वडभागी दरसनु को विरला पाए ॥
ऊच अपार अगोचर थाना ओहु महलु गुरू देखाई जीउ ॥3॥
गहिर गंभीर अंम्रित नामु तेरा ॥
मुकति भइआ जिसु रिदै वसेरा ॥
गुरि बंधन तिन के सगले काटे जन नानक सहजि समाई जीउ ॥4॥16॥23॥
प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥
प्रभू दइआ ते मंगलु गावउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत हरि धिआईऐ सगल अवरदा जीउ ॥1॥
नामु अउखधु मो कउ साधू दीआ ॥
किलबिख काटे निरमलु थीआ ॥
अनदु भइआ निकसी सभ पीरा सगल बिनासे दरदा जीउ ॥2॥
जिस का अंगु करे मेरा पिआरा ॥ सो मुकता सागर संसारा ॥
सति करे जिनि गुरू पछाता सो काहे कउ डरदा जीउ ॥3॥
जब ते साधू संगति पाए ॥ गुर भेटत हउ गई बलाए ॥
सासि सासि हरि गावै नानकु सतिगुर ढाकि लीआ मेरा पड़दा जीउ ॥4॥17॥24॥
ओति पोति सेवक संगि राता ॥
प्रभ प्रतिपाले सेवक सुखदाता ॥
पाणी पखा पीसउ सेवक कै ठाकुर ही का आहरु जीउ ॥1॥
काटि सिलक प्रभि सेवा लाइआ ॥
हुकमु साहिब का सेवक मनि भाइआ ॥
सोई कमावै जो साहिब भावै सेवकु अंतरि बाहरि माहरु जीउ ॥2॥
तूं दाना ठाकुरु सभ बिधि जानहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जो परमात्मा के नाम का रस पीता है, वह (दुनिया के पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाता है, जो नाम का रस प्राप्त करता है, उसे आत्मिक मौत कभी भी छूह नहीं सकती।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।