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अंग 103

अंग
103
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माझ महला 5 ॥
सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥
गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥
धंनु सु वेला जितु हरि गावत सुनणा आए ते परवाना जीउ ॥1॥
से नेत्र परवाणु जिनी दरसनु पेखा ॥
से कर भले जिनी हरि जसु लेखा ॥
से चरण सुहावे जो हरि मारगि चले हउ बलि तिन संगि पछाणा जीउ ॥2॥
सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥
साधसंगि खिन माहि उधारे ॥
किलविख काटि होआ मनु निरमलु मिटि गए आवण जाणा जीउ ॥3॥
दुइ कर जोड़ि इकु बिनउ करीजै ॥
करि किरपा डुबदा पथरु लीजै ॥
नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला प्रभ नानक मनि भाणा जीउ ॥4॥22॥29॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) उस बाणी को पढ़ना लाभदायक उद्यम है, जिस बाणी से कोई मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है। (पर) गुरू की कृपा से किसी विरले मनुष्य ने (ऐसी बाणी के साथ) सांझ डाली है। (हे भाई !) वह समय भाग्य भरा जानों, जिस वक्त परमात्मा के गुण गाए जाएं और सुने जाएं। जगत में जन्में वो मनुष्य, मनुष्य मियार में पूरे गिने जाते हैं (जो प्रभू की सिफत सलाह करते हैं और सुनते हैं)।1। वही आँखें इन्सानी आँखें कहलाने के योग्य हैं, जिन्होंने परमात्मा का दर्शन किया है। वे हाथ अच्छे हैं, जिन्होंने परमात्मा की सिफत सलाह लिखी है। वह पैर सुख देने वाले हैं, जो परमात्मा के (मिलाप के) राह पर चलते हैं। मैं उन (आॅखें, हाथों, पैरों) से सदके जाता हूँ। इनकी संगति में परमात्मा के साथ सांझ पड़ सकती है।2। हे मेरे प्यारे मित्र प्रभू ! सज्जन प्रभू ! (मेरी विनती) सुन (मुझे साध-संगति दे) साध-संगति में रहने से एक पल में ही (पापों विकारों से) बच जाते हैं। (जो मनुष्य साध-संगति में रहता है) सारे पाप कट के उसका मन पवित्र हो जाता है। उसके जनम मरन के चक्कर मिट जाते हैं।3। (हे भाई !) दोनों हाथ जोड़ के (परमात्मा के दर पे) एक (ये) अरदास करनी चाहिए (कि हे प्रभू !) मेहर कर के (विकारों के समुंद्र में) डूब रहे मुझ कठोर चित्त को बचा ले। (हे भाई ! ये अरदास सुन के) प्रभू जी मुझ नानक पर दयावान हो गए हैं, और प्रभू जी नानक के मन में प्यारे लगने लग पड़े हैं।4।22।29।
माझ महला 5 ॥
अंम्रित बाणी हरि हरि तेरी ॥
सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥
जलनि बुझी सीतलु होइ मनूआ सतिगुर का दरसनु पाए जीउ ॥1॥
सूखु भइआ दुखु दूरि पराना ॥
संत रसन हरि नामु वखाना ॥
जल थल नीरि भरे सर सुभर बिरथा कोइ न जाए जीउ ॥2॥
दइआ धारी तिनि सिरजनहारे ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥
मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥3॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु कीतोनु हरिआ ॥
करणहारि खिन भीतरि करिआ ॥
गुरमुखि नानक तिसै अराधे मन की आस पुजाए जीउ ॥4॥23॥30॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे हरी !आपकी सिफत सलाह की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है (आत्मिक मौत से बचाने वाली है), (गुरू की उचारी हुई ये बाणी) बार बार सुन के मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बनती जा रही है। गुरू का दर्शन करके (तृष्णा, ईश्या आदि की) जलन बुझ जाती है और मन ठंडा ठार हो जाता है।1। आत्मिक आनंद पैदा हो गया (उस का) दुख दूर भाग गया। गुरू की जीभ ने (जब) परमात्मा का नाम उचारा (जैसे बरखा होने से) गड्ढे (टोए टिब्बे) तालाब सब पानी से नाको नाक भर जाते हैं (वैसे ही गुरू के दर पे प्रभू नाम की बरखा होती है तब जो भाग्यशाली मनुष्य गुरू की शरण में आते हैं उनका मन, उनकी ज्ञानेंद्रियां सब नाम जल से नाको नाक भर जाती है। गुरू के दर पे आया कोई मनुष्य (नाम अमृत) से वंचित नहीं रह जाता।2। उस सृजनहार प्रभू ने मेहर की (और गुरू को भेजा इस तरह उसने सृष्टि के) सारे जीवों की (विकारों से) रक्षा (की तरकीब) की। मेहरवान, कृपाल, दयावान (परमात्मा की मेहर से गुरू की शरण आए) सारे जीव (माया की प्यास भूख की ओर से) पूर्ण तौर पे तृप्त हो गए।3। जंगल, घास और सारा त्रिवनी जगत हरा कर दिया, जगत के पैदा करने वाले प्रभू ने (बरखा की तो) एक पल में ही हरा कर दिया (उसी तरह उसका भेजा हुआ गुरू, नाम की बरखा करता है, गुरू दर पे आए लोगों के हृदय नाम जल से आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं)। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य उस परमात्मा को सिमरता है, परमात्मा उसके मन की आस पूरी कर देता है (दुनिया की आसा तृष्णा में भटकने से उसको बचा लेता है)।4।23।30।
माझ महला 5 ॥
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥
तूं मेरा बंधपु तूं मेरा भ्राता ॥
तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ ॥1॥
तुमरी क्रिपा ते तुधु पछाणा ॥
तूं मेरी ओट तूंहै मेरा माणा ॥
तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई सभु तेरा खेलु अखाड़ा जीउ ॥2॥
जीअ जंत सभि तुधु उपाए ॥
जितु जितु भाणा तितु तितु लाए ॥
सभ किछु कीता तेरा होवै नाही किछु असाड़ा जीउ ॥3॥
नामु धिआइ महा सुखु पाइआ ॥
हरि गुण गाइ मेरा मनु सीतलाइआ ॥
गुरि पूरै वजी वाधाई नानक जिता बिखाड़ा जीउ ॥4॥24॥31॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप मेरा पिता (की जगह) है आप ही मेरी माँ (की जगह) है। आप मेरा रिश्तेदार है, आप ही मेरा भाई है। (हे प्रभू ! जब) आप ही सब जगहों पे मेरा रक्षक है, तो कोई डर मुझे पोह भी नहीं सकता, कोई चिंता मुझपर जोर नहीं डाल सकती।1। (हे प्रभू !) आपकी मेहर से मैं आपके साथ गहरी सांझ डाल सकता हूँ। आप ही मेरा आसरा है, आप ही मेरे गौरव की जगह है। आपके बगैर आपके जैसा और कोई नहीं। ये जगत तमाशा ये जगत अखाड़ा आपका ही बनाया हुआ है।2। (हे प्रभू !) जगत के सारे जीव जन्तु तूने ही पैदा किये हैं। जिस जिस काम में आपकी रजा होती है तूने उस उस काम में (सारे जीव जन्तु) लगाए हुए हैं। (जगत में जो कुछ हैं रहा है) सब आपका किया ही हैं रहा है। हम जीवों का कोई जोर नहीं चल सकता।3। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर के मैंने बड़ा आत्मिक आनंद हासिल किया है। परमात्मा के गुण गा के मेरा मन ठण्डा ठार हो गया है। हे नानक ! (कह) पूरे गुरू के द्वारा (मेरे अंदर) आत्मिक उत्साह का (जैसे) ढोल बज रहा है और मैंने (विकारों के साथ हो रही) मुश्किल कुश्ती को जीत लिया है।4।24।31।
माझ महला 5 ॥
जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥
भगत जीवहि गुण गाइ अपारा ॥
गुण निधान अंम्रितु हरि नामा हरि धिआइ धिआइ सुखु पाइआ जीउ ॥1॥
मनसा धारि जो घर ते आवै ॥ साधसंगि जनमु मरणु मिटावै ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ परमात्मा (भगत जनों की) जिंद का, प्राणों का, मन का आसरा है। भगत बेअंत प्रभू के गुण गा के आत्मिक जिंदगी हासिल करते हैं। परमात्मा नाम के गुणों का खजाना है। परमात्मा का नाम आत्मिक मौत से बचाने वाला है। भगत, परमात्मा का नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद लेते हैं।1। जो मनुष्य (परमात्मा के मिलाप की) तमन्ना करके घर से चलता है, वह साध-संगति में आ के (प्रभू नाम की बरकति से) अपने जनम मरन का चक्कर खत्म कर लेता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) उस बाणी को पढ़ना लाभदायक उद्यम है, जिस बाणी से कोई मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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