अंग
103
माझ
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सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥
माझ महला 5 ॥
सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥
गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥
धंनु सु वेला जितु हरि गावत सुनणा आए ते परवाना जीउ ॥1॥
से नेत्र परवाणु जिनी दरसनु पेखा ॥
से कर भले जिनी हरि जसु लेखा ॥
से चरण सुहावे जो हरि मारगि चले हउ बलि तिन संगि पछाणा जीउ ॥2॥
सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥
साधसंगि खिन माहि उधारे ॥
किलविख काटि होआ मनु निरमलु मिटि गए आवण जाणा जीउ ॥3॥
दुइ कर जोड़ि इकु बिनउ करीजै ॥
करि किरपा डुबदा पथरु लीजै ॥
नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला प्रभ नानक मनि भाणा जीउ ॥4॥22॥29॥
सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥
गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥
धंनु सु वेला जितु हरि गावत सुनणा आए ते परवाना जीउ ॥1॥
से नेत्र परवाणु जिनी दरसनु पेखा ॥
से कर भले जिनी हरि जसु लेखा ॥
से चरण सुहावे जो हरि मारगि चले हउ बलि तिन संगि पछाणा जीउ ॥2॥
सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥
साधसंगि खिन माहि उधारे ॥
किलविख काटि होआ मनु निरमलु मिटि गए आवण जाणा जीउ ॥3॥
दुइ कर जोड़ि इकु बिनउ करीजै ॥
करि किरपा डुबदा पथरु लीजै ॥
नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला प्रभ नानक मनि भाणा जीउ ॥4॥22॥29॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) उस बाणी को पढ़ना लाभदायक उद्यम है, जिस बाणी से कोई मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है। (पर) गुरू की कृपा से किसी विरले मनुष्य ने (ऐसी बाणी के साथ) सांझ डाली है। (हे भाई !) वह समय भाग्य भरा जानों, जिस वक्त परमात्मा के गुण गाए जाएं और सुने जाएं। जगत में जन्में वो मनुष्य, मनुष्य मियार में पूरे गिने जाते हैं (जो प्रभू की सिफत सलाह करते हैं और सुनते हैं)।1। वही आँखें इन्सानी आँखें कहलाने के योग्य हैं, जिन्होंने परमात्मा का दर्शन किया है। वे हाथ अच्छे हैं, जिन्होंने परमात्मा की सिफत सलाह लिखी है। वह पैर सुख देने वाले हैं, जो परमात्मा के (मिलाप के) राह पर चलते हैं। मैं उन (आॅखें, हाथों, पैरों) से सदके जाता हूँ। इनकी संगति में परमात्मा के साथ सांझ पड़ सकती है।2। हे मेरे प्यारे मित्र प्रभू ! सज्जन प्रभू ! (मेरी विनती) सुन (मुझे साध-संगति दे) साध-संगति में रहने से एक पल में ही (पापों विकारों से) बच जाते हैं। (जो मनुष्य साध-संगति में रहता है) सारे पाप कट के उसका मन पवित्र हो जाता है। उसके जनम मरन के चक्कर मिट जाते हैं।3। (हे भाई !) दोनों हाथ जोड़ के (परमात्मा के दर पे) एक (ये) अरदास करनी चाहिए (कि हे प्रभू !) मेहर कर के (विकारों के समुंद्र में) डूब रहे मुझ कठोर चित्त को बचा ले। (हे भाई ! ये अरदास सुन के) प्रभू जी मुझ नानक पर दयावान हो गए हैं, और प्रभू जी नानक के मन में प्यारे लगने लग पड़े हैं।4।22।29।
अंम्रित बाणी हरि हरि तेरी ॥
माझ महला 5 ॥
अंम्रित बाणी हरि हरि तेरी ॥
सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥
जलनि बुझी सीतलु होइ मनूआ सतिगुर का दरसनु पाए जीउ ॥1॥
सूखु भइआ दुखु दूरि पराना ॥
संत रसन हरि नामु वखाना ॥
जल थल नीरि भरे सर सुभर बिरथा कोइ न जाए जीउ ॥2॥
दइआ धारी तिनि सिरजनहारे ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥
मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥3॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु कीतोनु हरिआ ॥
करणहारि खिन भीतरि करिआ ॥
गुरमुखि नानक तिसै अराधे मन की आस पुजाए जीउ ॥4॥23॥30॥
अंम्रित बाणी हरि हरि तेरी ॥
सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥
जलनि बुझी सीतलु होइ मनूआ सतिगुर का दरसनु पाए जीउ ॥1॥
सूखु भइआ दुखु दूरि पराना ॥
संत रसन हरि नामु वखाना ॥
जल थल नीरि भरे सर सुभर बिरथा कोइ न जाए जीउ ॥2॥
दइआ धारी तिनि सिरजनहारे ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥
मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥3॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु कीतोनु हरिआ ॥
करणहारि खिन भीतरि करिआ ॥
गुरमुखि नानक तिसै अराधे मन की आस पुजाए जीउ ॥4॥23॥30॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे हरी !आपकी सिफत सलाह की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है (आत्मिक मौत से बचाने वाली है), (गुरू की उचारी हुई ये बाणी) बार बार सुन के मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बनती जा रही है। गुरू का दर्शन करके (तृष्णा, ईश्या आदि की) जलन बुझ जाती है और मन ठंडा ठार हो जाता है।1। आत्मिक आनंद पैदा हो गया (उस का) दुख दूर भाग गया। गुरू की जीभ ने (जब) परमात्मा का नाम उचारा (जैसे बरखा होने से) गड्ढे (टोए टिब्बे) तालाब सब पानी से नाको नाक भर जाते हैं (वैसे ही गुरू के दर पे प्रभू नाम की बरखा होती है तब जो भाग्यशाली मनुष्य गुरू की शरण में आते हैं उनका मन, उनकी ज्ञानेंद्रियां सब नाम जल से नाको नाक भर जाती है। गुरू के दर पे आया कोई मनुष्य (नाम अमृत) से वंचित नहीं रह जाता।2। उस सृजनहार प्रभू ने मेहर की (और गुरू को भेजा इस तरह उसने सृष्टि के) सारे जीवों की (विकारों से) रक्षा (की तरकीब) की। मेहरवान, कृपाल, दयावान (परमात्मा की मेहर से गुरू की शरण आए) सारे जीव (माया की प्यास भूख की ओर से) पूर्ण तौर पे तृप्त हो गए।3। जंगल, घास और सारा त्रिवनी जगत हरा कर दिया, जगत के पैदा करने वाले प्रभू ने (बरखा की तो) एक पल में ही हरा कर दिया (उसी तरह उसका भेजा हुआ गुरू, नाम की बरखा करता है, गुरू दर पे आए लोगों के हृदय नाम जल से आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं)। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य उस परमात्मा को सिमरता है, परमात्मा उसके मन की आस पूरी कर देता है (दुनिया की आसा तृष्णा में भटकने से उसको बचा लेता है)।4।23।30।
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥
माझ महला 5 ॥
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥
तूं मेरा बंधपु तूं मेरा भ्राता ॥
तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ ॥1॥
तुमरी क्रिपा ते तुधु पछाणा ॥
तूं मेरी ओट तूंहै मेरा माणा ॥
तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई सभु तेरा खेलु अखाड़ा जीउ ॥2॥
जीअ जंत सभि तुधु उपाए ॥
जितु जितु भाणा तितु तितु लाए ॥
सभ किछु कीता तेरा होवै नाही किछु असाड़ा जीउ ॥3॥
नामु धिआइ महा सुखु पाइआ ॥
हरि गुण गाइ मेरा मनु सीतलाइआ ॥
गुरि पूरै वजी वाधाई नानक जिता बिखाड़ा जीउ ॥4॥24॥31॥
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥
तूं मेरा बंधपु तूं मेरा भ्राता ॥
तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ ॥1॥
तुमरी क्रिपा ते तुधु पछाणा ॥
तूं मेरी ओट तूंहै मेरा माणा ॥
तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई सभु तेरा खेलु अखाड़ा जीउ ॥2॥
जीअ जंत सभि तुधु उपाए ॥
जितु जितु भाणा तितु तितु लाए ॥
सभ किछु कीता तेरा होवै नाही किछु असाड़ा जीउ ॥3॥
नामु धिआइ महा सुखु पाइआ ॥
हरि गुण गाइ मेरा मनु सीतलाइआ ॥
गुरि पूरै वजी वाधाई नानक जिता बिखाड़ा जीउ ॥4॥24॥31॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप मेरे पिता (की जगह) हैं आप ही मेरी माँ (की जगह) हैं। आप मेरे रिश्तेदार हैं, आप ही मेरे भाई हैं। (हे प्रभू ! जब) आप ही सब जगहों पे मेरे रक्षक हैं, तो कोई डर मुझे पोह भी नहीं सकता, कोई चिंता मुझपर जोर नहीं डाल सकती।1। (हे प्रभू !) आपकी मेहर से मैं आपके साथ गहरी सांझ डाल सकता हूँ। आप ही मेरा आसरा हैं, आप ही मेरे गौरव की जगह हैं। आपके बगैर आपके जैसा और कोई नहीं। ये जगत तमाशा ये जगत अखाड़ा आपका ही बनाया हुआ है।2। (हे प्रभू !) जगत के सारे जीव जन्तु आपने ही पैदा किये हैं। जिस जिस काम में आपकी रजा होती है आपने उस उस काम में (सारे जीव जन्तु) लगाए हुए हैं। (जगत में जो कुछ हो रहा है) सब आपका किया ही हो रहा है। हम जीवों का कोई जोर नहीं चल सकता।3। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर के मैंने बड़ा आत्मिक आनंद हासिल किया है। परमात्मा के गुण गा के मेरा मन ठण्डा ठार हो गया है। हे नानक ! (कह) पूरे गुरू के द्वारा (मेरे अंदर) आत्मिक उत्साह का (जैसे) ढोल बज रहा है और मैंने (विकारों के साथ हो रही) मुश्किल कुश्ती को जीत लिया है।4।24।31।
जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥
माझ महला 5 ॥
जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥
भगत जीवहि गुण गाइ अपारा ॥
गुण निधान अंम्रितु हरि नामा हरि धिआइ धिआइ सुखु पाइआ जीउ ॥1॥
मनसा धारि जो घर ते आवै ॥ साधसंगि जनमु मरणु मिटावै ॥
जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥
भगत जीवहि गुण गाइ अपारा ॥
गुण निधान अंम्रितु हरि नामा हरि धिआइ धिआइ सुखु पाइआ जीउ ॥1॥
मनसा धारि जो घर ते आवै ॥ साधसंगि जनमु मरणु मिटावै ॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ परमात्मा (भगत जनों की) जिंद का, प्राणों का, मन का आसरा है। भगत बेअंत प्रभू के गुण गा के आत्मिक जिंदगी हासिल करते हैं। परमात्मा नाम के गुणों का खजाना है। परमात्मा का नाम आत्मिक मौत से बचाने वाला है। भगत, परमात्मा का नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद लेते हैं।1। जो मनुष्य (परमात्मा के मिलाप की) तमन्ना करके घर से चलता है, वह साध-संगति में आ के (प्रभू नाम की बरकति से) अपने जनम मरन का चक्कर खत्म कर लेता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।