चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥ महा सागरु नह विआपै खिनहि उतरिओ तीरि ॥2॥ चंदन अगर कपूर लेपन तिसु संगे नही प्रीति ॥ बिसटा मूत्र खोदि तिलु तिलु मनि न मनी बिपरीति ॥3॥ ऊच नीच बिकार सुक्रित संलगन सभ सुख छत्र ॥ मित्र सत्रु न कछू जानै सरब जीअ समत ॥4॥ करि प्रगासु प्रचंड प्रगटिओ अंधकार बिनास ॥ पवित्र अपवित्रह किरण लागे मनि न भइओ बिखादु ॥5॥ सीत मंद सुगंध चलिओ सरब थान समान ॥ जहा सा किछु तहा लागिओ तिलु न संका मान ॥6॥ सुभाइ अभाइ जु निकटि आवै सीतु ता का जाइ ॥ आप पर का कछु न जाणै सदा सहजि सुभाइ ॥7॥ चरण सरण सनाथ इहु मनु रंगि राते लाल ॥ गोपाल गुण नित गाउ नानक भए प्रभ किरपाल ॥8॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (हे मेरे मन ! जो मनुष्य बेड़ी को) पैरों तले दबा के (उसमें) बैठ गया। (उस मनुष्य के) शरीर में (रास्ते की) थकावट ना रही। भयानक समुंद्र (दरिया भी) उस पर अपना असर नहीं डाल सके। (बेड़ी में बैठ के वह) एक छिन में ही (उस दरिया से) उस पार किनारे पर जा उतरा। 2। (हे मेरे मन ! जो मनुष्य धरती पर) चंदन अगर कपूर का लेपन (करता है। धरती) उस (मनुष्य) के साथ (कोई विशेष) प्यार नहीं करती; और (जो मनुष्य धरती पर) गूह-मूत्र (फेंकता है। धरती को) खोद के रक्ती रक्ती (करता है। उस मनुष्य के विरुद्ध अपने) मन में (धरती) बुरा नहीं मनाती। 3। (हे मेरे मन !) कोई ऊँचा हो अथवा नीचा हो। कोई बुराई करे या कोई भलाई करे (आकाश सबके साथ) एक समान ही लगा रहता है। सबके लिए सुखों का छत्र (बना रहता) है। (आकाश) ना किसी को मित्र समझता है ना किसी को वैरी। (आकाश) सारे जीवों के लिए एक-समान है। 4। (हे मेरे मन ! सूर्य) तेज़ रौशनी करके (आकाश में) प्रकट होता है और अंधकार का नाश करता है। अच्छे-बुरे सब जीवों को उसकी किरणें लगती हैं। (सूर्य के) मन में (इस बात का) दुख नहीं होता। 5। हे मेरे मन ! ठंडी (हवा) सुगंधि भरी (पवन) हल्की-हल्की सब जगहों पर एक जैसी ही चलती है; जहाँ भी कोई चीज़ हो (अच्छी हो चाहे बुरी हो) वहाँ भी (सबको) लगती है। रक्ती भर भी संकोच नहीं करती। 6। (हे मेरे मन !) जो भी मनुष्य सद्-भावना से अथवा दुर्भावना से (आग के) नज़दीक आता है। उसकी लगी ठंडक दूर हो जाती है। (आग) ये बात बिल्कुल नहीं जानती कि यह अपना है यह पराया है। (आग) अडोलता में रहती है अपने स्वभाव में रहती है। 7। (हे मेरे मन ! इसी तरह परमात्मा के संत जन) परमात्मा के चरणों की शरण में रह के खसम वाले बन जाते हैं। वे सोहाने प्रभू में रते रहते हैं। उनका यह मन प्रभू के प्रेम-रंग में (रंगा रहता है)। (हे मेरे मन ! आप भी) गोपाल प्रभू के गुण गाता रहा कर। हे नानक ! (जो गुण गाते हैं उन पर) प्रभू जी दयावान हो जाते हैं। 8। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 4 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई ! लोग खुशी आदि के मौके पर घरों में दीए आदि जला के रौशनी करते हैं। पर मनुष्य के) हृदय में परमात्मा के नाम की रौशनी हो जाना – ये आँगन में अन्य सभी रौशनियों से उक्तम रौशनी है। 1। हे भाई ! सदा परमात्मा का ही नाम सिमरना- ये अन्य सभी सिमरनों से बढ़िया सिमरन है। 2। (हे भाई ! माया के मोह में से निकलने के लिए लोग गृहस्त त्याग जाते हैं। पर) काम-क्रोध-लोभ (आदि विकारों को हृदय में से) त्याग देना- ये अन्य सारे त्यागों में श्रेष्ठ त्याग है। 3। हे भाई ! गुरू से परमात्मा की सिफत सालाह की खैर माँगना- ये अन्य सभी माँगों से उक्तम माँग है। 4। (हे भाई ! देवी आदि की पूजा के लिए लोग जगराते करते हैं। पर) परमात्मा की सिफत-सालाह महिमा में जागना -यह और सभी जगरातों से श्रेष्ठतम् जगराता है। 5। हे भाई ! गुरू के चरणों में मन का प्यार बन जाना- ये अन्य सभी लगी हुई लगनों में से उच्च दर्जे की लगन है। 6। पर। हे भाई ! ये जुगति उसी ही मनुष्य को प्राप्त होती है। जिसके माथे पर भाग्य जाग उठें। 7। हे नानक ! कह- जो मनुष्य परमात्मा की शरण में आ जाता है। उसको हरेक सद्-गुण प्राप्त हो जाता है। 8। 1। 4।
मारू महला 5 ॥ आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥1॥ रहाउ ॥ तुधु आवत मेरा मनु तनु हरिआ हरि जसु तुम संगि गावना ॥1॥ संत क्रिपा ते हिरदै वासै दूजा भाउ मिटावना ॥2॥ भगत दइआ ते बुधि परगासै दुरमति दूख तजावना ॥3॥ दरसनु भेटत होत पुनीता पुनरपि गरभि न पावना ॥4॥ नउ निधि रिधि सिधि पाई जो तुमरै मनि भावना ॥5॥ संत बिना मै थाउ न कोई अवर न सूझै जावना ॥6॥ मोहि निरगुन कउ कोइ न राखै संता संगि समावना ॥7॥ कहु नानक गुरि चलतु दिखाइआ मन मधे हरि हरि रावना ॥8॥2॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे प्यारे प्रभू ! आ। मेरे हृदय-गृह में आ बस। और। मेरे कानों में परमात्मा की सिफत-सालाह सुना। 1। रहाउ। हे प्यारे गुरू ! आपके आने से मेरा मन मेरा तन आत्मिक जीवन वाला हैं जाता है। हे सतिगुरू ! आपके चरणों में रह के ही परमात्मा का यश गाया जा सकता है। 1। हे भाई ! गुरू की मेहर से परमात्मा हृदय में आ बसता है। और माया का मोह दूर किया जा सकता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के भगत की किरपा से बुद्धि में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। दुर्मति के सारे विकार त्यागे जाते हैं। 3। हे भाई ! गुरू के दर्शन करने से जीवन पवित्र हो जाता है। बार-बार जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ा जाता। 4। हे प्रभू ! जो (भाग्यशाली) मनुष्य आपके मन को प्यारा लगने लग जाता है। वह। (मानो) दुनिया के सारे ही नौ खजाने और करामाती ताकतें हासिल कर लेता है। 5। हे भाई ! गुरू के बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। किसी और जगह जाना मुझे नहीं सूझता। 6। हे भाई ! मेरी गुण-हीन की (गुरू के बिना) और कोई बाँह नहीं पकड़ता। संत जनों की संगति में रह के ही प्रभू-चरणों में लीन हुआ जाता है। 7। हे नानक ! कह- गुरू ने (मुझे) आश्चर्यजनक तमाशा दिखा दिया है। मैं अपने मन में हर वक्त परमात्मा के मिलाप का आनंद ले रहा हूँ। 8। 2। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे मेरे मन ! जो मनुष्य बेड़ी को) पैरों तले दबा के (उसमें) बैठ गया।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।