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अंग १०१८ · मारू

अंग
1018
मारू
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  1. चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥
  2. चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥1॥
  3. आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥1॥ रहाउ ॥

चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥

अंग १०१७ से चला आ रहा अंश

चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥
महा सागरु नह विआपै खिनहि उतरिओ तीरि ॥2॥
चंदन अगर कपूर लेपन तिसु संगे नही प्रीति ॥
बिसटा मूत्र खोदि तिलु तिलु मनि न मनी बिपरीति ॥3॥
ऊच नीच बिकार सुक्रित संलगन सभ सुख छत्र ॥
मित्र सत्रु न कछू जानै सरब जीअ समत ॥4॥
करि प्रगासु प्रचंड प्रगटिओ अंधकार बिनास ॥
पवित्र अपवित्रह किरण लागे मनि न भइओ बिखादु ॥5॥
सीत मंद सुगंध चलिओ सरब थान समान ॥
जहा सा किछु तहा लागिओ तिलु न संका मान ॥6॥
सुभाइ अभाइ जु निकटि आवै सीतु ता का जाइ ॥
आप पर का कछु न जाणै सदा सहजि सुभाइ ॥7॥
चरण सरण सनाथ इहु मनु रंगि राते लाल ॥
गोपाल गुण नित गाउ नानक भए प्रभ किरपाल ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: (हे मेरे मन ! जो मनुष्य बेड़ी को) पैरों तले दबा के (उसमें) बैठ गया। (उस मनुष्य के) शरीर में (रास्ते की) थकावट ना रही। भयानक समुंद्र (दरिया भी) उस पर अपना असर नहीं डाल सके। (बेड़ी में बैठ के वह) एक छिन में ही (उस दरिया से) उस पार किनारे पर जा उतरा। 2। (हे मेरे मन ! जो मनुष्य धरती पर) चंदन अगर कपूर का लेपन (करता है। धरती) उस (मनुष्य) के साथ (कोई विशेष) प्यार नहीं करती; और (जो मनुष्य धरती पर) गूह-मूत्र (फेंकता है। धरती को) खोद के रक्ती रक्ती (करता है। उस मनुष्य के विरुद्ध अपने) मन में (धरती) बुरा नहीं मनाती। 3। (हे मेरे मन !) कोई ऊँचा हो अथवा नीचा हो। कोई बुराई करे या कोई भलाई करे (आकाश सबके साथ) एक समान ही लगा रहता है। सबके लिए सुखों का छत्र (बना रहता) है। (आकाश) ना किसी को मित्र समझता है ना किसी को वैरी। (आकाश) सारे जीवों के लिए एक-समान है। 4। (हे मेरे मन ! सूर्य) तेज़ रौशनी करके (आकाश में) प्रकट होता है और अंधकार का नाश करता है। अच्छे-बुरे सब जीवों को उसकी किरणें लगती हैं। (सूर्य के) मन में (इस बात का) दुख नहीं होता। 5। हे मेरे मन ! ठंडी (हवा) सुगंधि भरी (पवन) हल्की-हल्की सब जगहों पर एक जैसी ही चलती है; जहाँ भी कोई चीज़ हो (अच्छी हो चाहे बुरी हो) वहाँ भी (सबको) लगती है। रक्ती भर भी संकोच नहीं करती। 6। (हे मेरे मन !) जो भी मनुष्य सद्-भावना से अथवा दुर्भावना से (आग के) नज़दीक आता है। उसकी लगी ठंडक दूर हो जाती है। (आग) ये बात बिल्कुल नहीं जानती कि यह अपना है यह पराया है। (आग) अडोलता में रहती है अपने स्वभाव में रहती है। 7। (हे मेरे मन ! इसी तरह परमात्मा के संत जन) परमात्मा के चरणों की शरण में रह के खसम वाले बन जाते हैं। वे सोहाने प्रभू में रते रहते हैं। उनका यह मन प्रभू के प्रेम-रंग में (रंगा रहता है)। (हे मेरे मन ! आप भी) गोपाल प्रभू के गुण गाता रहा कर। हे नानक ! (जो गुण गाते हैं उन पर) प्रभू जी दयावान हो जाते हैं। 8। 3।

चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥1॥

मारू महला 5 घरु 4 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥1॥
आराधना अराधनु नीका हरि हरि नामु अराधना ॥2॥
तिआगना तिआगनु नीका कामु क्रोधु लोभु तिआगना ॥3॥
मागना मागनु नीका हरि जसु गुर ते मागना ॥4॥
जागना जागनु नीका हरि कीरतन महि जागना ॥5॥
लागना लागनु नीका गुर चरणी मनु लागना ॥6॥
इह बिधि तिसहि परापते जा कै मसतकि भागना ॥7॥
कहु नानक तिसु सभु किछु नीका जो प्रभ की सरनागना ॥8॥1॥4॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 4 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई ! लोग खुशी आदि के मौके पर घरों में दीए आदि जला के रौशनी करते हैं। पर मनुष्य के) हृदय में परमात्मा के नाम की रौशनी हो जाना - ये आँगन में अन्य सभी रौशनियों से उक्तम रौशनी है। 1। हे भाई ! सदा परमात्मा का ही नाम सिमरना- ये अन्य सभी सिमरनों से बढ़िया सिमरन है। 2। (हे भाई ! माया के मोह में से निकलने के लिए लोग गृहस्त त्याग जाते हैं। पर) काम-क्रोध-लोभ (आदि विकारों को हृदय में से) त्याग देना- ये अन्य सारे त्यागों में श्रेष्ठ त्याग है। 3। हे भाई ! गुरू से परमात्मा की सिफत सालाह की खैर माँगना- ये अन्य सभी माँगों से उक्तम माँग है। 4। (हे भाई ! देवी आदि की पूजा के लिए लोग जगराते करते हैं। पर) परमात्मा की सिफत-सालाह महिमा में जागना -यह और सभी जगरातों से श्रेष्ठतम् जगराता है। 5। हे भाई ! गुरू के चरणों में मन का प्यार बन जाना- ये अन्य सभी लगी हुई लगनों में से उच्च दर्जे की लगन है। 6। पर। हे भाई ! ये जुगति उसी ही मनुष्य को प्राप्त होती है। जिसके माथे पर भाग्य जाग उठें। 7। हे नानक ! कह- जो मनुष्य परमात्मा की शरण में आ जाता है। उसको हरेक सद्-गुण प्राप्त हो जाता है। 8। 1। 4।

आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥1॥ रहाउ ॥

मारू महला 5 ॥
आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥1॥ रहाउ ॥
तुधु आवत मेरा मनु तनु हरिआ हरि जसु तुम संगि गावना ॥1॥
संत क्रिपा ते हिरदै वासै दूजा भाउ मिटावना ॥2॥
भगत दइआ ते बुधि परगासै दुरमति दूख तजावना ॥3॥
दरसनु भेटत होत पुनीता पुनरपि गरभि न पावना ॥4॥
नउ निधि रिधि सिधि पाई जो तुमरै मनि भावना ॥5॥
संत बिना मै थाउ न कोई अवर न सूझै जावना ॥6॥
मोहि निरगुन कउ कोइ न राखै संता संगि समावना ॥7॥
कहु नानक गुरि चलतु दिखाइआ मन मधे हरि हरि रावना ॥8॥2॥5॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे प्यारे प्रभू ! आ। मेरे हृदय-गृह में आ बस। और। मेरे कानों में परमात्मा की सिफत-सालाह सुना। 1। रहाउ। हे प्यारे गुरू ! आपके आने से मेरा मन मेरा तन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे सतिगुरू ! आपके चरणों में रह के ही परमात्मा का यश गाया जा सकता है। 1। हे भाई ! गुरू की मेहर से परमात्मा हृदय में आ बसता है। और माया का मोह दूर किया जा सकता है। 2। हे भाई ! परमात्मा के भगत की किरपा से बुद्धि में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। दुर्मति के सारे विकार त्यागे जाते हैं। 3। हे भाई ! गुरू के दर्शन करने से जीवन पवित्र हो जाता है। बार-बार जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ा जाता। 4। हे प्रभू ! जो (भाग्यशाली) मनुष्य आपके मन को प्यारा लगने लग जाता है। वह। (मानो) दुनिया के सारे ही नौ खजाने और करामाती ताकतें हासिल कर लेता है। 5। हे भाई ! गुरू के बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। किसी और जगह जाना मुझे नहीं सूझता। 6। हे भाई ! मेरी गुण-हीन की (गुरू के बिना) और कोई बाँह नहीं पकड़ता। संत जनों की संगति में रह के ही प्रभू-चरणों में लीन हुआ जाता है। 7। हे नानक ! कह- गुरू ने (मुझे) आश्चर्यजनक तमाशा दिखा दिया है। मैं अपने मन में हर वक्त परमात्मा के मिलाप का आनंद ले रहा हूँ। 8। 2। 5।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1018 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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