ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
लख चउरासीह भ्रमते भ्रमते दुलभ जनमु अब पाइओ ॥1॥
रे मूड़े तू होछै रसि लपटाइओ ॥
अंम्रितु संगि बसतु है तेरै बिखिआ सिउ उरझाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
रतन जवेहर बनजनि आइओ कालरु लादि चलाइओ ॥2॥
जिह घर महि तुधु रहना बसना सो घरु चीति न आइओ ॥3॥
अटल अखंड प्राण सुखदाई इक निमख नही तुझु गाइओ ॥4॥
जहा जाणा सो थानु विसारिओ इक निमख नही मनु लाइओ ॥5॥
पुत्र कलत्र ग्रिह देखि समग्री इस ही महि उरझाइओ ॥6॥
जितु को लाइओ तित ही लागा तैसे करम कमाइओ ॥7॥
जउ भइओ क्रिपालु ता साधसंगु पाइआ जन नानक ब्रहमु धिआइओ ॥8॥1॥
करि अनुग्रहु राखि लीनो भइओ साधू संगु ॥
हरि नाम रसु रसना उचारै मिसट गूड़ा रंगु ॥1॥
मेरे मान को असथानु ॥
मीत साजन सखा बंधपु अंतरजामी जानु ॥1॥ रहाउ ॥
संसार सागरु जिनि उपाइओ सरणि प्रभ की गही ॥
गुर प्रसादी प्रभु अराधे जमकंकरु किछु न कही ॥2॥
मोख मुकति दुआरि जा कै संत रिदा भंडारु ॥
जीअ जुगति सुजाणु सुआमी सदा राखणहारु ॥3॥
दूख दरद कलेस बिनसहि जिसु बसै मन माहि ॥
मिरतु नरकु असथान बिखड़े बिखु न पोहै ताहि ॥4॥
रिधि सिधि नव निधि जा कै अंम्रिता परवाह ॥
आदि अंते मधि पूरन ऊच अगम अगाह ॥5॥
सिध साधिक देव मुनि जन बेद करहि उचारु ॥
सिमरि सुआमी सुख सहजि भुंचहि नही अंतु पारावारु ॥6॥
अनिक प्राछत मिटहि खिन महि रिदै जपि भगवान ॥
पावना ते महा पावन कोटि दान इसनान ॥7॥
बल बुधि सुधि पराण सरबसु संतना की रासि ॥
बिसरु नाही निमख मन ते नानक की अरदासि ॥8॥2॥
ससत्रि तीखणि काटि डारिओ मनि न कीनो रोसु ॥
काजु उआ को ले सवारिओ तिलु न दीनो दोसु ॥1॥
मन मेरे राम रउ नित नीति ॥
दइआल देव क्रिपाल गोबिंद सुनि संतना की रीति ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 5 घरु 3 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि॥ हे मूर्ख ! चौरासी लाख जूनियों में भटकते-भटकते आपको ये मानस जनम मिला है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।