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अंग 1017

अंग
1017
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मारू महला 5 घरु 3 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
लख चउरासीह भ्रमते भ्रमते दुलभ जनमु अब पाइओ ॥1॥
रे मूड़े तू होछै रसि लपटाइओ ॥
अंम्रितु संगि बसतु है तेरै बिखिआ सिउ उरझाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
रतन जवेहर बनजनि आइओ कालरु लादि चलाइओ ॥2॥
जिह घर महि तुधु रहना बसना सो घरु चीति न आइओ ॥3॥
अटल अखंड प्राण सुखदाई इक निमख नही तुझु गाइओ ॥4॥
जहा जाणा सो थानु विसारिओ इक निमख नही मनु लाइओ ॥5॥
पुत्र कलत्र ग्रिह देखि समग्री इस ही महि उरझाइओ ॥6॥
जितु को लाइओ तित ही लागा तैसे करम कमाइओ ॥7॥
जउ भइओ क्रिपालु ता साधसंगु पाइआ जन नानक ब्रहमु धिआइओ ॥8॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 3 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि॥ हे मूर्ख ! चौरासी लाख जूनियों में भटकते-भटकते आपको ये मानस जनम मिला है। 1। हे मूर्ख ! आप नाशवंत (पदार्थों के) स्वाद में फसा रहता है। अटल आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आपके अंदर बसता है (आप उसको छोड़ के आत्मिक मौत लाने वाली) माया के साथ चिपका हुआ है। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! आप आया था रतन और जवाहर खरीदने के लिए। पर आप यहाँ से कलॅर लाद के ही चल पड़ा है। 2। हे मूर्ख ! जिस घर में तूने सदा रहना-बसना है। वह घर आपके कभी चिक्त-चेते में नहीं आया। 3। हे मूर्ख ! तूने आँख झपकने जितने समय के लिए भी कभी उस परमात्मा की सिफत सालाह नहीं की। जो सदा कायम रहने वाला है। जो अविनाशी है। जो प्राण देने वाला है और जो सारे सुख देने वाला है। 4। हे मूर्ख ! जिस जगह आखिर में अवश्य जाना है उस तरफ तूने कभी आँख झपकने जितने समय के लिए भी ध्यान नहीं दिया। 5। हे मूर्ख ! पुत्र। स्त्री और घर का सामान देख के इसके मोह में ही आप फसा हुआ है। 6। (पर। जीव के भी क्या वश।) जिस (काम) में कोई जीव (परमात्मा की ओर से) लाया जाता है उसमें वह लगा रहता है। वैसे ही काम वह करता रहता है। 7। हे दास नानक ! (कह-) जब परमात्मा किसी जीव पर दयावान होता है। तब उसको गुरू का साथ प्राप्त होता है। और। वह परमात्मा में सुरति जोड़ता है। 8। 1।
मारू महला 5 ॥
करि अनुग्रहु राखि लीनो भइओ साधू संगु ॥
हरि नाम रसु रसना उचारै मिसट गूड़ा रंगु ॥1॥
मेरे मान को असथानु ॥
मीत साजन सखा बंधपु अंतरजामी जानु ॥1॥ रहाउ ॥
संसार सागरु जिनि उपाइओ सरणि प्रभ की गही ॥
गुर प्रसादी प्रभु अराधे जमकंकरु किछु न कही ॥2॥
मोख मुकति दुआरि जा कै संत रिदा भंडारु ॥
जीअ जुगति सुजाणु सुआमी सदा राखणहारु ॥3॥
दूख दरद कलेस बिनसहि जिसु बसै मन माहि ॥
मिरतु नरकु असथान बिखड़े बिखु न पोहै ताहि ॥4॥
रिधि सिधि नव निधि जा कै अंम्रिता परवाह ॥
आदि अंते मधि पूरन ऊच अगम अगाह ॥5॥
सिध साधिक देव मुनि जन बेद करहि उचारु ॥
सिमरि सुआमी सुख सहजि भुंचहि नही अंतु पारावारु ॥6॥
अनिक प्राछत मिटहि खिन महि रिदै जपि भगवान ॥
पावना ते महा पावन कोटि दान इसनान ॥7॥
बल बुधि सुधि पराण सरबसु संतना की रासि ॥
बिसरु नाही निमख मन ते नानक की अरदासि ॥8॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! दया करके जिस मनुष्य की रक्षा परमात्मा करता है। उसको गुरू का मिलाप प्राप्त होता है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम का आनंद पाता है। वह अपनी जीभ से प्रभू का नाम जपता है। (उसके मन पर परमात्मा के प्यार का) मीठा गाढ़ा रंग चढ़ा रहता है। 1। हे भाई ! सबके दिल की जानने वाला सुजान परमात्मा ही सदा मेरे मन का सहारा है। वही मेरा मित्र है। वही मेरा सज्जन है। वही मेरा साथी है। वही मेरा रिश्तेदार है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य ने) उस प्रभू का आसरा लिया है जिसने यह संसार-समुंद्र पैदा किया है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से परमात्मा की आराधना करता रहता है। उसको जमदूत भी कुछ नहीं कहते। 2। हे भाई ! मालिक-प्रभू सदा रक्षा करने की समर्था वाला है। वह सुजान प्रभू ही आत्मिक जीवन जीने की जाच सिखाता है जिसके दर पर मुकित टिकी रहती है। जिसका खजाना संतजनों का हृदय है (जो संतजनों के हृदय में सदा बसता है)। 3। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य के हृदय में आ बसता है उसके सारे दुख-दर्द-कलेश मिट जाते हैं। आत्मिक मौत। नर्क। हर मुश्किल जगह। आत्मिक मौत लाने वाली माया – इन में से कोई भी उस पर असर नहीं डाल सकती। 4। हे भाई ! जिस परमात्मा के घर में सारी ही करामाती ताकतें हैं। और सारे ही खजाने हैं। जिसके घर में आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल के झरने बल रहे हैं। वही परमात्मा जगत के शुरू में। अंत में। मध्य में हर समय मौजूद है। वह परमात्मा ही सबसे ऊँचा है। अपहुँच है। और अथाह है। 5। हे भाई ! जोग साधना में सिद्धहस्त योगी। योग-साधना करने वाले साधक योगी। देवता गण। मौनधारी साधु। (वह पण्डित जो) वेदों का पाठ करते रहते हैं – (कोई भी हों) मालिक-प्रभू (का नाम) सिमर के (ही) आत्मिक अडोलता का आनंद पा सकते हैं। (ऐसा आनंद जिसका) अंत नहीं (जो कभी समाप्त नहीं होता) जिसका इस पार का उस पार का छोर पाया नहीं जा सकता। 6। हे भाई ! हृदय में भगवान (का नाम) जप के एक छिन में ही अनेकों पाप मिट जाते हैं। भगवान (का नाम ही) सबसे ज्यादा पवित्र है। नाम-सिमरन ही करोड़ों दान हैं और करोड़ों तीर्थों के स्नान हैं। 7। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही संतजनों की राशि पूँजी है। बल है। बुद्धि है। सूझ-बूझ है। प्राण हैं। यही उनका सब कुछ है। नानक की भी यही विनती है- हे प्रभू ! मेरे मन से आप आँख झपकने जितनें समय के लिए भी ना भूल। 8। 2।
मारू महला 5 ॥
ससत्रि तीखणि काटि डारिओ मनि न कीनो रोसु ॥
काजु उआ को ले सवारिओ तिलु न दीनो दोसु ॥1॥
मन मेरे राम रउ नित नीति ॥
दइआल देव क्रिपाल गोबिंद सुनि संतना की रीति ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ (हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने वृक्ष को किसी) तेज़ धार हथियार से काट दिया (वृक्ष ने अपने) मन में (उस पर) गुस्सा ना किया। (बल्कि वृक्ष ने) उसके काम सवार दिए। और (उसको) रक्ती भर भी कोई दोश ना दिया। 1। हे मेरे मन ! दयालु। प्रकाश रूप। कृपालु गोबिंद के (संतजनों की संगति में रह के) सदा ही परमात्मा का सिमरन करता रह (वह संत जन कैसे होते हैं। उन) संत जनों की जीवन मर्यादा सुन। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 5 घरु 3 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि॥ हे मूर्ख ! चौरासी लाख जूनियों में भटकते-भटकते आपको ये मानस जनम मिला है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।