Lulla Family

अंग 1016

अंग
1016
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कलर खेती तरवर कंठे बागा पहिरहि कजलु झरै ॥
एहु संसारु तिसै की कोठी जो पैसै सो गरबि जरै ॥6॥
रयति राजे कहा सबाए दुहु अंतरि सो जासी ॥
कहत नानकु गुर सचे की पउड़ी रहसी अलखु निवासी ॥7॥3॥11॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: कलॅर में खेती बीज के फसल की आशा व्यर्थ है। दरिया के किनारे उगे हुए वृक्षों को आसरा बनाना भूल है। जहाँ कालिख़ उड़-उड़ के पड़ती हैं वहाँ जो लोग सफेद कपड़े पहनते हैं (और उन पर कालिख़ ना लगने की आस रखते हैं वे भूले हुए हैं। इस तरह) ये जगत तृष्णा की कोठी है इसमें जो फस जाता है (वह निकल नहीं सकता) वह अहंकार में (ग़र्क होता है। उसका आत्मिक जीवन तृष्णा की आग में) जल जाता है। 6। राजे और (राजाओं की) प्रजा -ये सब कहाँ हैं। (सब अपनी-अपनी वारी कूच कर जाते हैं)। इस दुनियां में जो पैदा होता है वह अंत में यहाँ से चला जाता है (पर माया की तृष्णा में फंस के जनम-मरण के चक्कर भी सहता है)। नानक कहता है- जो मनुष्य अभॅुल गुरू की पौड़ी का आसरा लेता है (भाव। जो नाम सिमरता है। और सिमरन की पौड़ी के द्वारा) अलख प्रभू के चरणों में सुरति जोड़े रखता है वह अटॅल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 7। 3। 11।
मारू महला 3 घरु 5 असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिस नो प्रेमु मंनि वसाए ॥
साचै सबदि सहजि सुभाए ॥
एहा वेदन सोई जाणै अवरु कि जाणै कारी जीउ ॥1॥
आपे मेले आपि मिलाए ॥
आपणा पिआरु आपे लाए ॥
प्रेम की सार सोई जाणै जिस नो नदरि तुमारी जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
दिब द्रिसटि जागै भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥
सो जोगी इह जुगति पछाणै गुर कै सबदि बीचारी जीउ ॥2॥
संजोगी धन पिर मेला होवै ॥
गुरमति विचहु दुरमति खोवै ॥
रंग सिउ नित रलीआ माणै अपणे कंत पिआरी जीउ ॥3॥
सतिगुर बाझहु वैदु न कोई ॥
आपे आपि निरंजनु सोई ॥
सतिगुर मिलिऐ मरै मंदा होवै गिआन बीचारी जीउ ॥4॥
एहु सबदु सारु जिस नो लाए ॥
गुरमुखि त्रिसना भुख गवाए ॥
आपण लीआ किछू न पाईऐ करि किरपा कल धारी जीउ ॥5॥
अगम निगमु सतिगुरू दिखाइआ ॥
करि किरपा अपनै घरि आइआ ॥
अंजन माहि निरंजनु जाता जिन कउ नदरि तुमारी जीउ ॥6॥
गुरमुखि होवै सो ततु पाए ॥
आपणा आपु विचहु गवाए ॥
सतिगुर बाझहु सभु धंधु कमावै वेखहु मनि वीचारी जीउ ॥7॥
इकि भ्रमि भूले फिरहि अहंकारी ॥
इकना गुरमुखि हउमै मारी ॥
सचै सबदि रते बैरागी होरि भरमि भुले गावारी जीउ ॥8॥
गुरमुखि जिनी नामु न पाइआ ॥
मनमुखि बिरथा जनमु गवाइआ ॥
अगै विणु नावै को बेली नाही बूझै गुर बीचारी जीउ ॥9॥
अंम्रित नामु सदा सुखदाता ॥
गुरि पूरै जुग चारे जाता ॥
जिसु तू देवहि सोई पाए नानक ततु बीचारी जीउ ॥10॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3 घरु 5 असटपदी सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (परमात्मा) जिस मनुष्य के मन में (अपना) प्यार बसाता है। वह मनुष्य प्रभू की सदा-स्थिर सिफत-सालाह की बाणी में (जुड़ा रहता है)। आत्मिक अडोलता में (टिका रहता है) प्रभू प्यार में (लीन रहता है)। (प्रेम की चुभन का यही एक इलाज है)। वही मनुष्य इस वेदना को समझता है। कोई और मनुष्य (जिसके अंदर ये चुभन ये वेदना नहीं। इस पीड़ा का) इलाज नहीं जानता। 1। हे भाई ! परमात्मा स्वयं (जीव को अपने चरणों के साथ) जोड़ता है। स्वयं ही मिलाता है। (जीव के हृदय में) अपना प्यार परमात्मा स्वयं ही पैदा करता है। हे प्रभू ! (आपके) प्यार की कद्र (भी) वही जीव जान सकता है। जिस पर आपकी मेहर की निगाह होती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में प्रभू अपना प्यार बसाता है उसके अंदर) आत्मिक जीवन का प्रकाश देने वाली निगाह जाग उठती है (और वह निगाह उसकी) भटकना दूर कर देती है। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य) सबसे ऊँचा आत्मिक जीवन का दर्जा प्राप्त कर लेता है। (जो मनुष्य) इस जुगति को समझ लेता है वह (सही अर्थों में) जोगी है; गुरू के शबद की बरकति से वह ऊँचे जीवन की सूझ वाला हो जाता है। 2। हे भाई ! अच्छे भाग्यों से जिस जीव स्त्री का प्रभू-पति के साथ मिलाप हो जाता है। वह गुरू की मति पर चल कर अपने अंदर से खोटी मति नाश कर देती है। वह प्रेम के सदका प्रभू-पति के साथ आत्मिक मिलाप का आनंद भोगती है। वह अपने प्रभू-पति की लाडली बन जाती है। 3। हे भाई ! (प्रेम की वेदना का इलाज करने वाला) हकीम गुरू के बिना और कोई नहीं है (जिसका इलाज गुरू कर देता है उसको यह दिखाई दे जाता है कि) वह निर्लिप परमात्मा स्वयं ही स्वयं (हर जगह मौजूद है)। हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर से) बुराई मिट जाती है। मनुष्य ऊँचे आत्मिक जीवन की विचार करने के योग्य हो जाता है। 4। हे भाई ! गुरू का यह श्रेष्ठ शबद जिसके हृदय में परमात्मा बसा देता है। (उसको) गुरू की शरण में डाल कर (उसके अंदर से) माया की तृष्णा माया की भूख दूर कर देता है। हे भाई ! अपनी बुद्धि के बल पर (आत्मिक जीवन का) कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। परमात्मा स्वयं ही मेहर करके यह सक्ता (मनुष्य के अंदर) डालता है। 5। (हे जोगी ! यह निश्चय कि ‘आपण…धारी जीउ’ – यही है हमारे वास्ते ‘अगम निगमु’) प्रभू ने कृपा करके गुरू के द्वारा (जिस मनुष्य को यह) ‘अगम निगमु’ दिखा दिया। वह मनुष्य अपने असल घर में आ टिकता है। हे प्रभू ! जिन पर आपकी मेहर की निगाह होती है। वह मनुष्य इस माया के पसारे में आप निर्लिप को बसता हुआ पहचान लेते हैं। 6। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है। वह (यह) अस्लियत पा लेता है। वह मनुष्य अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर देता है। हे भाई ! अपने मन में विचार कर के देख ले कि गुरू की शरण पड़े बिना हरेक जीव माया के मोह में फसने वाली दौड़-भाग ही कर रहा है। 7। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो भुलेखे में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़े हुए (अपने इस गलत त्याग पर ही) मान करते फिरते हैं। कई ऐसे हैं जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लिया है। हे भाई ! असल बैरागी वह हैं जो सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में रंगे हुए हैं। बाकी मूर्ख (अपने त्याग के) भुलेखे में गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं। 8। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं किया। उन मन के मुरीदों ने अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा ली है। हे भाई ! परलोक में परमात्मा के नाम के बिना और कोई मददगार नहीं। पर इस बात को गुरू के शबद के विचार के द्वारा ही (कोई विरला मनुष्य) समझता है। 9। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आपका आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा आनंद देने वाला है। सदा से पूरे गुरू के द्वारा ही (आपके इस नाम से) सांझ पड़ती आ रही है। हे प्रभू ! वही मनुष्य आपका नाम प्राप्त करता है जिसको आप स्वयं (ये दाति) देता है। वही मनुष्य असल जीवन-भेद को समझने-योग्य होता है। 10। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कलॅर में खेती बीज के फसल की आशा व्यर्थ है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।