नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: अगर मैं अनेकों ही स्वादिष्ट खाने खाती रहूँ। अनेकों ही सुंदर पहरावे पहनती रहूँ। फिर भी पति-प्रभू से विछुड़ के मेरी जवानी व्यर्थ ही जा रही है। जब तक मैं छुटॅड़ हूँ। मैं (सारी उम्र) झुर-झुर के ही दिन काटूँगी। 5। अगर सदा-स्थिर प्रभू का प्यार-संदेशा सतिगुरू की बाणी की विचार के माध्यम से सुनें। तो उस सदा-स्थिर प्रभू-पति का सदा के लिए साथ मिल जाता है। उस मेहर की नजर वाला प्रभू मेहर की नजर से ताकता है। और उसके प्यार में लीन हो जाया जाता है। 6। परमात्मा से जान-पहचान डालने वाला सदा-स्थिर प्रभू के नाम का सुरमा प्रयोग करता है। और वह (उस) प्रभू का दीदार कर लेता है जो सब जीवों की संभाल करने के समर्थ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (इस भेद को) समझ लेता है वह हउमै-अहंकार दूर करके (उसकी हजूरी में) आदर पाता है। 7। हे पति-प्रभू ! जो जीव-सि्त्रयाँ आपको अच्छी लगती हैं। वह आपके जैसी हैं जाती हैं। (पर आपकी मेहर की निगाह से वंचित हुई) मेरे जैसी भी अनेकों ही हैं। हे नानक ! जो जीव-सि्त्रयाँ सदा-स्थिर प्रभू के प्यार में रंगी रहती हैं। उनके (हृदय) से पति-प्रभू कभी नहीं विछुड़ता। 8। 1। 9।
मारू महला 1 ॥ ना भैणा भरजाईआ ना से ससुड़ीआह ॥ सचा साकु न तुटई गुरु मेले सहीआह ॥1॥ बलिहारी गुर आपणे सद बलिहारै जाउ ॥ गुर बिनु एता भवि थकी गुरि पिरु मेलिमु दितमु मिलाइ ॥1॥ रहाउ ॥ फुफी नानी मासीआ देर जेठानड़ीआह ॥ आवनि वंञनि ना रहनि पूर भरे पहीआह ॥2॥ मामे तै मामाणीआ भाइर बाप न माउ ॥ साथ लडे तिन नाठीआ भीड़ घणी दरीआउ ॥3॥ साचउ रंगि रंगावलो सखी हमारो कंतु ॥ सचि विछोड़ा ना थीऐ सो सहु रंगि रवंतु ॥4॥ सभे रुती चंगीआ जितु सचे सिउ नेहु ॥ सा धन कंतु पछाणिआ सुखि सुती निसि डेहु ॥5॥ पतणि कूके पातणी वंञहु ध्रुकि विलाड़ि ॥ पारि पवंदड़े डिठु मै सतिगुर बोहिथि चाड़ि ॥6॥ हिकनी लदिआ हिकि लदि गए हिकि भारे भर नालि ॥ जिनी सचु वणंजिआ से सचे प्रभ नालि ॥7॥ ना हम चंगे आखीअह बुरा न दिसै कोइ ॥ नानक हउमै मारीऐ सचे जेहड़ा सोइ ॥8॥2॥10॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ ना बहिनें। ना भौजाईयाँ। ना सासें – किसी का भी वैसा साक नहीं जो (सत्संगी) सहेलियों का है। गुरू (सत्संगी-) सहेलियों के साथ मिलाता है (सत्संगियों वाला) सदा स्थिर रहने वाला साक कभी नहीं टूटता। 1। मैं अपने गुरू से बलिहार हूँ। सदा सदके जाती हूँ। गुरू (के मिलाप) के बिना मैं भटक-भटक के बहुत थक गई थी। (अब) गुरू ने मुझे पति मिलाया है। मुझे (पति) मिला दिया है। 1। रहाउ। फूफियाँ। नानियां। मासियां। देवरानियां। जेठानियाँ – यह (संसार में) आती है और चली जाती हैं। सदा (हमारे साथ) नहीं रहती। इन (साकों अंगो-) राहियों के पूरों के पूर भरे हुए समूह चले जाते हैं। 2। मामे। मामियाँ। भाई। पिता। और माँ – (किसी के साथ भी सच्चा साक) नहीं बन सकता। (ये भी मेहमान की तरह हैं) इन पराहुणों के काफिले के काफिले लादे हुए चले जा रहे हैं। संसार-दरिया के पक्त न पर इनकी भीड़ लगी पड़ी है। 3। हे सहेलियो ! हमारा पति-प्रभू ही सदा-स्थिर रहने वाला है और वह प्रेम-रंग में रंगा रहता है। उस सदा-स्थिर के नाम में जुड़ने से उससे विछोड़ा नहीं होता। (चरणों में जुड़ी जीव-स्त्री को) वह पति प्यार से गले लगाए रखता है। 4। उसको वह सारी ही ऋतुएं अच्छी लगती हैं जिस-जिस ऋतु में सदा-स्थिर प्रभू-पति के साथ उसका प्यार बनता है। जो जीव-स्त्री पति-प्रभू (के साक) को पहचान लेती है वह जीव-स्त्री दिन-रात पूर्ण आनंद में शांत-चित्त रहती है। 5। (संसार-दरिया के) पक्तन पर (खड़ा) गुरू मल्लाह (जीव-राहियों को) पुकार के कह रहा है कि (प्रभू-नाम के जहाज में चढ़ो और) दौड़ के छलांग मार के पार लांघ जाएँ। सतिगुरू के जहाज में चढ़ के (संसार-दरिया से) पार पहुँचे हुए (अनेकों ही प्राणी) मैंने (स्वयं) देखे हैं। 6। (सतिगुरू का आहवाहन सुन के) अनेकों जीवों ने (संसार-दरिया से पार लांघने के लिए प्रभू-नाम का सौदा गुरू के जहाज में) लाद लिया है। अनेकों ही लाद के पार पहुँच गए हैं। पर अनेकों ही (ऐसे भी दुर्भाग्यशाली हैं जिन्होंने गुरू की पुकार की परवाह ही नहीं की। और वे विकारों के भार के साथ) भारे हो के संसार-समुंद्र में (डूब गए हैं)। जिन्होंने (गुरू का उपदेश सुन के) सदा-स्थिर रहने वाला नाम-सौदा खरीदा है वह (सदा-स्थिर प्रभू के) चरणों में लीन हो गए हैं। 7। (ऐसे भाग्यशाली लोग ये निश्चय रखते हैं कि) हम (सबसे) अच्छे नहीं कहे जा सकते। और हमसे बुरा कोई मनुष्य (जगत में) दिखता नहीं। हे नानक ! (प्रभू चरणों में एक-मेक होने के लिए) अहंकार को दूर करनाप चाहिए (जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर अहंकार को दूर कर लिया) वह सदा-स्थिर प्रभू जैसा ही बन गया। 8। 2। 10।
मारू महला 1 ॥ ना जाणा मूरखु है कोई ना जाणा सिआणा ॥ सदा साहिब कै रंगे राता अनदिनु नामु वखाणा ॥1॥ बाबा मूरखु हा नावै बलि जाउ ॥ तू करता तू दाना बीना तेरै नामि तराउ ॥1॥ रहाउ ॥ मूरखु सिआणा एकु है एक जोति दुइ नाउ ॥ मूरखा सिरि मूरखु है जि मंने नाही नाउ ॥2॥ गुर दुआरै नाउ पाईऐ बिनु सतिगुर पलै न पाइ ॥ सतिगुर कै भाणै मनि वसै ता अहिनिसि रहै लिव लाइ ॥3॥ राजं रंगं रूपं मालं जोबनु ते जूआरी ॥ हुकमी बाधे पासै खेलहि चउपड़ि एका सारी ॥4॥ जगि चतुरु सिआणा भरमि भुलाणा नाउ पंडित पड़हि गावारी ॥ नाउ विसारहि बेदु समालहि बिखु भूले लेखारी ॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ मैं नहीं समझ सकता कि जो (व्यक्ति परमात्मा का नाम सिमरता है) वह मूर्ख (कैसे) है। और जो मनुष्य नाम नहीं सिमरता वह समझदार कैसे है। (असल समझदारी नाम-सिमरने में है। इस वास्ते) मैं हर वक्त प्रभू का नाम सिमरता हूँ और सदा मालिक प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता हूँ। 1। हे प्रभू ! (आपके नाम से टूट के) मैं मति-हीन रहता हूँ मैं आपके नाम से सदके जाता हूँ (आपके नाम की बरकति से ही मुझे समझ आती है कि) आप हमारा सृजनहार है। आप हमारे दिल की जानता है। आप हमारे कामों को हर वक्त देखता है। मैं आपके नाम में जुड़ के ही पार लांघ सकता हूँ। 1। रहाउ। पर चाहे कोई मूर्ख है चाहे कोई समझदार है (हरेक जीव) एक ही परमात्मा में बसता है। मूर्ख और समझदार दो अलग-अलग नाम हैं जोति दोनों में एक ही है। जो आदमी परमात्मा का नाम सिमरना नहीं कबूलता। वह महा मूर्ख है। 2। परमात्मा का नाम गुरू-दर से मिलता है। गुरू की शरण के बिना प्रभू के नाम की प्राप्ति नहीं हो सकती। अगर गुरू के हुकम में चल के मनुष्य के मन में नाम बस जाए। तब वह दिन-रात नाम में सुरति जोड़े रखता है। 3। जो लोग राज। रंग-तमाशे। रूप। माल-धन और जवानी -सिर्फ इसी में मस्त रहते हैं उनको जुआरिए समझो। पर उनके भी क्या वश। प्रभू के हुकम में बँधे हुए वह (मायावी पदार्थों की) चौपड़ खेल खेलते रहते हैं। एक माया की तृष्णा ही उनकी नर्द है। 4। जो बंदा माया की भटकना में पड़ कर जीवन-राह से विछुड़ता जा रहा है वही जगत में चतुर और सयाना माना जाता है; पढ़ते हैं (माया कमाने वाली) मूर्खों की विद्या। पर अपना नाम कहलवाते हैं ‘पंडित’। (ये पण्डित) परमात्मा का नाम भुला देते हैं; और अपनी ओर से वेद (आदि धर्म-पुस्तकों) को संभाल रहे हैं। ये विद्वान आत्मिक जीवन की मौत लाने वाली माया के जहर में भूले पड़े हैं। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर मैं अनेकों ही स्वादिष्ट खाने खाती रहूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।