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अंग १०१४ · मारू

अंग
1014
मारू
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  1. लागी भूख माइआ मगु जोहै मुकति पदारथु मोहि खरे ॥3॥
  2. आवउ वंञउ डुंमणी किती मित्र करेउ ॥

लागी भूख माइआ मगु जोहै मुकति पदारथु मोहि खरे ॥3॥

अंग १०१३ से चला आ रहा अंश

लागी भूख माइआ मगु जोहै मुकति पदारथु मोहि खरे ॥3॥
करण पलाव करे नही पावै इत उत ढूढत थाकि परे ॥
कामि क्रोधि अहंकारि विआपे कूड़ कुटंब सिउ प्रीति करे ॥4॥
खावै भोगै सुणि सुणि देखै पहिरि दिखावै काल घरे ॥
बिनु गुर सबद न आपु पछाणै बिनु हरि नाम न कालु टरे ॥5॥
जेता मोहु हउमै करि भूले मेरी मेरी करते छीनि खरे ॥
तनु धनु बिनसै सहसै सहसा फिरि पछुतावै मुखि धूरि परे ॥6॥
बिरधि भइआ जोबनु तनु खिसिआ कफु कंठु बिरूधो नैनहु नीरु ढरे ॥
चरण रहे कर कंपण लागे साकत रामु न रिदै हरे ॥7॥
सुरति गई काली हू धउले किसै न भावै रखिओ घरे ॥
बिसरत नाम ऐसे दोख लागहि जमु मारि समारे नरकि खरे ॥8॥
पूरब जनम को लेखु न मिटई जनमि मरै का कउ दोसु धरे ॥
बिनु गुर बादि जीवणु होरु मरणा बिनु गुर सबदै जनमु जरे ॥9॥
खुसी खुआर भए रस भोगण फोकट करम विकार करे ॥
नामु बिसारि लोभि मूलु खोइओ सिरि धरम राइ का डंडु परे ॥10॥
गुरमुखि राम नाम गुण गावहि जा कउ हरि प्रभु नदरि करे ॥
ते निरमल पुरख अपरंपर पूरे ते जग महि गुर गोविंद हरे ॥11॥
हरि सिमरहु गुर बचन समारहु संगति हरि जन भाउ करे ॥
हरि जन गुरु परधानु दुआरै नानक तिन जन की रेणु हरे ॥12॥8॥

हिन्दी अर्थ: सदा इसको माया की भूख ही चिपकी रहती है। सदा माया की राह ही ताकता रहता है। माया के मोह में (फंस के चारों पदार्थों में से) मुक्ति पदार्थ गवा लेता है। 3। (सारी उम्र जीव माया की खातिर ही) विरलाप करता रहता है (मन की तसल्ली योग्य माया) प्राप्त नहीं होती। हर तरफ माया की तलाश करता-करता थक जाता है। काम में। क्रोध में। अहंकार में दबा हुआ जीव सदा नाशवंत पदार्थों के साथ ही प्रीति करता है। सदा अपने परिवार के साथ ही मोह जोड़ के रखता है। 4। (दुनिया के अच्छे-अच्छे पदार्थ) खाता है (विषौ) भोगता है। (शोभा-निंदा आदि के वचन) बार-बार सुनता है। (दुनिया के रंग-तमाशे) देखता है। (सुंदर-सुंदर कपड़े आदि) पहन के (लोगों को) दिखाता है- (बस ! इन्हीं व्यस्तताओं में मस्त हो के) आत्मिक मौत के घर में टिका रहता है (आत्मिक मौत सहेड़ के रखता है)। गुरू के शबद से टूटा हुआ अपने आत्मिक जीवन को पहचान नहीं सकता। परमात्मा के नाम से टूटा हुआ होने के कारण आत्मिक मौत (इसके सिर से) नहीं टलती। 5। जितना ही मोह और अहंकार के कारण जीव सही जीवन-राह से भूलता जाता है। जितना ज्यादा 'मेरी मेरी' (माया) करता है। उतना ही ज्यादा अहंकार और ममता इसके आत्मिक जीवन को छीन के लेते जाते हैं। आखिर में ये शरीर और ये धन। (जिनकी खातिर हर वक्त सहम में रहता था।) नाश हो जाते हैं। तब जीव पछताता है। (पर उस वक्त पछताने से कुछ नहीं बनता) इसके मुँह पर धिक्कारें ही पड़ती हैं। 6। मनुष्य बूढ़ा हो जाता है। जवानी खिसक जाती है शरीर कमजोर हो जाता है। गला बलगम से रुका रहता है। आँखों से पानी बहता रहता है। पैर (चलने से) रह जाते हैं। हाथ काँपने लग जाते हैं। (फिर भी) माया-ग्रसित जीव के हृदय में हरी परमात्मा (का नाम) नहीं (बसता)। 7। (वृद्ध हो जाने पर) अकल ठिकाने नहीं रहती। केश काले और सफेद हो जाते हैं। घर में रखा हुआ किसी को अच्छा नहीं लगता (फिर भी परमात्मा के नाम को भुलाए रखता है) परमात्मा का नाम बिसार के रखने के कारण ऐसी बुराईयाँ इससे चिपकी रहती हैं जिनके कारण जमराज इसको मार के नर्क में ले जाता है। 8। (पर जीव के भी वश की बात नहीं) पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के संस्कारों का लेखा मिटता नहीं (जितना समय वह लेखा मौजूद है। उनके प्रभाव तले कुकर्म कर करके) जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जीव बेचारा और किस को दोष दे। (दरअसल। बात ये है कि) गुरू की शरण पड़े बिना जिन्दगी व्यर्थ जाती है (विकारों में पड़ कर मनुष्य) और आत्मिक मौत सहेड़ता जाता है। गुरू शबद से टूटने के कारण जिंदगी (विकारों में) जल जाती है। 9। जीव दुनियां की खुशियाँ लेने में। रस भोगने में। और फोके व बुरे कर्म करने में पड़ कर दुखी होता है। परमात्मा का नाम भुला के। लोभ में फस के मूल भी गवा लेता है। आखिर इसके सिर पर धर्मराज का डण्डा पड़ता है। 10। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम के गुण गाते हैं। जिन पर हरी-प्रभू मेहर की निगाह करता है वह जगत में हरी-गोबिंद बेअंत पूरन सर्व-व्यापक प्रभू को सिमर के पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 11। हे भाई ! संत जनों की संगति में प्रेम जोड़ के परमात्मा का नाम सिमरो। गुरू के बचन (हृदय में) संभाल के रखो। परमात्मा के दर पर गुरू (का बचन) ही आदर पाता है। संत जनों की संगति ही कबूल पड़ती है। हे नानक ! (अरदास कर-) हे हरी ! (मुझे) उन संत जनों की चरण-धूड़ दे। 12। 8।

आवउ वंञउ डुंमणी किती मित्र करेउ ॥

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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मारू काफी महला 1 घरु 2 ॥
आवउ वंञउ डुंमणी किती मित्र करेउ ॥
सा धन ढोई न लहै वाढी किउ धीरेउ ॥1॥
मैडा मनु रता आपनड़े पिर नालि ॥
हउ घोलि घुमाई खंनीऐ कीती हिक भोरी नदरि निहालि ॥1॥ रहाउ ॥
पेईअड़ै डोहागणी साहुरड़ै किउ जाउ ॥
मै गलि अउगण मुठड़ी बिनु पिर झूरि मराउ ॥2॥
पेईअड़ै पिरु संमला साहुरड़ै घरि वासु ॥
सुखि सवंधि सोहागणी पिरु पाइआ गुणतासु ॥3॥
लेफु निहाली पट की कापड़ु अंगि बणाइ ॥
पिरु मुती डोहागणी तिन डुखी रैणि विहाइ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ मारू काफी महला 1 घरु 2॥ (हे प्रीतम प्रभू ! आपसे विछुड़ के) मैं (दुविधा और) दु-चित्ती में (डावाँडोल) होई हुई (जन्मों के चक्कर में) भटकती फिरती हूँ (दिलासा धरने के लिए) मैं अनेकों मित्र बनाती हूँ। पर जब तक आपसे विछुड़ी हुई हूँ। मुझे धरवास कैसे आए। (आपसे विछुड़ी हुई) जीव-स्त्री (किसी और जगह) आसरा पा ही नहीं सकती। 1। ता कि मेरा मन (आप) अपने प्यारे पति के साथ रंगा जाए- (हे प्रीतम प्रभू !) मैं आपसे वारने जाती हूँ। कुर्बान जाती हूँ। रक्ती भर भी समय ही (मेरी ओर) मेहर की नजर से देख। 1। रहाउ। (इस संसार) पेके घर में मैं (सारी उम्र) प्रभू-पति से विछुड़ी रही हूँ। मैं पति-प्रभू के देश में कैसे पहुँच सकती हूँ। (प्रभू से विछोड़े के कारण) अवगुण मेरे गले तक पहुँच गए हैं। (सारी उम्र) मुझे अवगुणों ने ठॅग के रखा है। पति-प्रभू के मिलाप से वंचित रह के मैं अंदर-अंदर से दुखी भी हो रही हूँ। और आत्मिक मौत भी मैंने सहेड़ ली है। 2। यदि मैं (इस संसार) पेके घर में पति-प्रभू को (अपने हृदय में) संभाल के रखूँ तो पति-प्रभू के देश में मुझे उसके चरणों में जगह मिल जाए। वह भाग्यशाली (जीवन-रात) सुख से सो के गुजारती हैं जिन्होंने (पेके घर में) गुणों के खजाना पति-प्रभू को पा लिया है। 3। वे अगर रेशम का लेफ लें। रेशम की तुलाई लें। और कपड़ा भी रेशम का बना के ही शरीर पर प्रयोग करें। तब भी उनकी जीवन-रात दुखों में ही बीतती है जिन दुर्भाग्यपूर्ण (सि्त्रयों) ने पति को भुला दिया और जो छुटॅड़ हो गई। 4।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1014 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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