Lulla Family

अंग 1013

अंग
1013
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंतरि अगनि न गुर बिनु बूझै बाहरि पूअर तापै ॥
गुर सेवा बिनु भगति न होवी किउ करि चीनसि आपै ॥
निंदा करि करि नरक निवासी अंतरि आतम जापै ॥
अठसठि तीरथ भरमि विगूचहि किउ मलु धोपै पापै ॥3॥
छाणी खाकु बिभूत चड़ाई माइआ का मगु जोहै ॥
अंतरि बाहरि एकु न जाणै साचु कहे ते छोहै ॥
पाठु पड़ै मुखि झूठो बोलै निगुरे की मति ओहै ॥
नामु न जपई किउ सुखु पावै बिनु नावै किउ सोहै ॥4॥
मूंडु मुडाइ जटा सिख बाधी मोनि रहै अभिमाना ॥
मनूआ डोलै दह दिस धावै बिनु रत आतम गिआना ॥
अंम्रितु छोडि महा बिखु पीवै माइआ का देवाना ॥
किरतु न मिटई हुकमु न बूझै पसूआ माहि समाना ॥5॥
हाथ कमंडलु कापड़ीआ मनि त्रिसना उपजी भारी ॥
इसत्री तजि करि कामि विआपिआ चितु लाइआ पर नारी ॥
सिख करे करि सबदु न चीनै लंपटु है बाजारी ॥
अंतरि बिखु बाहरि निभराती ता जमु करे खुआरी ॥6॥
सो संनिआसी जो सतिगुर सेवै विचहु आपु गवाए ॥
छादन भोजन की आस न करई अचिंतु मिलै सो पाए ॥
बकै न बोलै खिमा धनु संग्रहै तामसु नामि जलाए ॥
धनु गिरही संनिआसी जोगी जि हरि चरणी चितु लाए ॥7॥
आस निरास रहै संनिआसी एकसु सिउ लिव लाए ॥
हरि रसु पीवै ता साति आवै निज घरि ताड़ी लाए ॥
मनूआ न डोलै गुरमुखि बूझै धावतु वरजि रहाए ॥
ग्रिहु सरीरु गुरमती खोजे नामु पदारथु पाए ॥8॥
ब्रहमा बिसनु महेसु सरेसट नामि रते वीचारी ॥
खाणी बाणी गगन पताली जंता जोति तुमारी ॥
सभि सुख मुकति नाम धुनि बाणी सचु नामु उर धारी ॥
नाम बिना नही छूटसि नानक साची तरु तू तारी ॥9॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (अपनी ओर से त्यागी बने हुए मनमुख के) मन में तृष्णा की (जलती) आग गुरू के बिना बुझती नहीं। पर बाहर धूणियाँ तपाता है। गुरू की बताई हुई सेवा किए बिना परमात्मा की भक्ति हो नहीं सकती (यह मनमुख) अपने आत्मिक जीवन को कैसे पहचाने। वैसे अंतरात्मे इसको समझ आ जाती है कि (किरती गृहस्तियों की) निंदा कर करके नरकी जीवन व्यतीत कर रहा है। अढ़सठ तीर्थों पर भटक के भी (मनमुख त्यागी) दुखी होते हैं। (तीर्थों पर जाने से) पापों की मैल कैसे धुल सकती है। 3। (लोक दिखावे के लिए) राख छानता है और वह राख अपने शरीर पर मल लेता है। पर (अंतरात्मे) माया का रास्ता ताकता रहता है (कि कोई गृहस्ती दानी आ के माया भेट करे)। (बाहर से और व अंदर से और होने के कारण) अपने अंदर और बाहर जगत में एक परमात्मा को (व्यापक) नहीं समझ सकता। (अगर) ये सच्चा वाक्य उसको कहें तो वह खीझता है। (धर्म-पुस्तकों का) पाठ पढ़ता (तो) है पर मुँह से झूठ ही बोलता है। गुरू हीन होने के कारण उसकी मति उस पहले जैसी ही रहती है (भाव। बाहरी तौर पर त्याग करने से उसके आत्मिक जीवन में कोई बदलाव नहीं पड़ता)। जब तक परमात्मा का नाम नहीं जपता तब तक आत्मिक आनंद नहीं मिलता। प्रभू-नाम के बिना जीवन सुचज्जा (सदाचारी) नहीं बन सकता। 4। कोई सिर मुनवा लेता है। कोई जटाओं का जूड़ा बना लेता है। और मौन धार के बैठ जाता है (इन सारे भेषों का) घमण्ड (भी करता है)। पर आत्मिक तौर पर प्रभू के साथ गहरी सांझ के रंग में रंगे जाने के बिना उसका मन डोलता रहता है। और (माया की तृष्णा में ही) दसों-दिशाओं में दौड़ता-फिरता है। (अंतरात्मे) माया का प्रेमी (होने के कारण) परमात्मा का नाम-अमृत छोड़ देता है और (तृष्णा का वह) जहर पीता रहता है (जो इसके आत्मिक जीवन को मार डालता है)। (पर। इस मनमुख के भी क्या वश।) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह (अंदर से) समाप्त नहीं होता। (उन संस्कारों के असर तले जीव) परमात्मा की रजा को नहीं समझ सकता। (इस तरह। त्यागी बन के भी) पशु-स्वभाव में टिका रहता है। 5। (मनमुख मनुष्य त्यागी बन के) हाथ में कमण्डल पकड़ लेता है। कपड़े की लीरों का चोला पहन लेता है। पर मन में माया की भारी तृष्णा पैदा हुई रहती है (अपनी ओर से त्यागी बन के) अपनी स्त्री छोड़ के आए को काम-वासना ने आ दबाया। तो पराई नारि के साथ चित्त जोड़ता है। चेले बनाता है। गुरू के शबद को नहीं पहचानता। काम-वासना में ग्रसा हुआ है। और (इस तरह सन्यासी बनने की जगह लोगों की नजरों में) मसखरा बना हुआ है। (मनमुख के) अंदर (आत्मिक मौत लाने वाली तृष्णा का) जहर है। बाहर (लोगों को दिखाने के लिए) शांति धारण की हुई है। (ऐसे पाखण्डी को) आत्मिक मौत दुखी करती है। 6। असल सन्यासी वह है जो गुरू की बताई हुई सेवा करता है और अपने अंदर से सवै-भाव दूर करता है। (लोगों से) कपड़े और भोजन की आस बनाए नहीं रखता। सहज सुभाय जो मिल जाता है वह ले लेता है। बहुत कम व ज्यादा बोल नहीं बोलता रहता। दूसरों की ज्यादती को सहने के स्वभाव रूप धन अपने अंदर संचित करता है। प्रभू के नाम की बरकति से अंदर से क्रोध को जला देता है। जो मनुष्य सदा परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़े रखता है। वह भाग्यशाली है। (फिर) चाहे वह गृहस्ती है चाहे सन्यासी है चाहे जोगी है। 7। असल सन्यासी वह है जो मायावी आशाओं की तरफ से निराश रहता है और एक परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़े रखता है। जब मनुष्य परमात्मा का नाम-रस पीता है और अंतरात्मे प्रभू-चरणों में जुड़ता है तब इसके अंदर शांति पैदा होती है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (सही जीवन राह) समझता है उसका मन माया की तृष्णा में डोलता नहीं। माया के पीछे दौड़ते मन को वह रोक के रखता है; गुरू की शिक्षा ले के (जंगलों में तलाशने की बजाय) शरीर-घर में खोजता है और परमात्मा का नाम-पूँजी को प्राप्त कर लेता है। 8। ब्रहमा हो। विष्णू हो। शिव हो। वही सबसे श्रेष्ठ हैं जो प्रभू के नाम में रंगे गए और (इस तरह) सुंदर विचारों के मालिक बन गए। हे प्रभू ! (भले ही) चारों खाणियों के जीवों में और उनकी बोलियों में। पाताल-आकाश में सब जीवों के अंदर आपकी ही ज्योति है। पर जिन्होंने आपके सदा-स्थिर नाम को अपने हृदय में टिकाया है जिनके अंदर आपके नाम की रौंअ जारी है जिनकी सुरति आपकी सिफत-सालाह की बाणी में है उन्हें ही सारे सुख हैं उनको ही माया के बँधनों से मुक्ति मिलती है। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना कोई भी जीव माया के मोह से नहीं बच सकता। आप भी यही तैराकी तैर जिससे कभी डूबने का खतरा ना रहेगा। 9। 7।
मारू महला 1 ॥
मात पिता संजोगि उपाए रकतु बिंदु मिलि पिंडु करे ॥
अंतरि गरभ उरधि लिव लागी सो प्रभु सारे दाति करे ॥1॥
संसारु भवजलु किउ तरै ॥
गुरमुखि नामु निरंजनु पाईऐ अफरिओ भारु अफारु टरै ॥1॥ रहाउ ॥
ते गुण विसरि गए अपराधी मै बउरा किआ करउ हरे ॥
तू दाता दइआलु सभै सिरि अहिनिसि दाति समारि करे ॥2॥
चारि पदारथ लै जगि जनमिआ सिव सकती घरि वासु धरे ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ माता और पिता के (शारीरिक) संयोग के द्वारा परमात्मा जीव पैदा करता है। माँ का लहू और पिता का वीर्य मिलने पर परमात्मा (जीव का) शरीर बनाता है। माँ के पेट में उल्टे पड़े हुए की लगन प्रभू-चरणों में लगी रहती है। वह परमात्मा इसकी हर तरह संभाल करता है (और आवश्यक्ता अनुसार पदार्थ) देता है। 1। (परमात्मा के नाम के बिना) संसारी जीव संसार-समुंद्र से किसी भी हालत में पार नहीं लांघ सकता क्योंकि जीव माया आदि के अहंकार के कारण आफरा रहता है। परमात्मा का नाम। जिस पर माया की कालिख का प्रभाव नहीं पड़ सकता। गुरू की शरण पड़ने पर मिलता है। (जिस मनुष्य को नाम प्राप्त होता है) उसका (अहंकार आदि का) असहि भार दूर हो जाता है (यह अहंकार आदि ही भार बन के जीव को संसार समुंद्र में डुबा देता है)। 1। रहाउ। हे हरी ! मुझ गुनाहगार को आपके वह उपकार भूल गए हैं। मैं (माया के मोह में) झल्ला हुआ पड़ा हूँ (आपका सिमरन करने से) बेबस हूँ। पर आप दया का श्रोत है। हरेक जीव के सिर पर (रखवाला) है। और सबको दातें देता है। (हे भाई !) दयालु प्रभू दिन-रात (जीवों की) संभाल करता है और दातें देता है। 2। (जीव परमात्मा से) चारों ही पदार्थ ले के जगत में पैदा हुआ है (फिर भी प्रभू की बख्शिश भुला के सदा) परमात्मा की पैदा की हुई माया के घर में निवास रखता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(अपनी ओर से त्यागी बने हुए मनमुख के) मन में तृष्णा की (जलती) आग गुरू के बिना बुझती नहीं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।