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अंग १०१२ · मारू

अंग
1012
मारू
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  1. गुर सेवा सदा सुखु है जिस नो हुकमु मनाए ॥7॥
  2. हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥
  3. मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥

गुर सेवा सदा सुखु है जिस नो हुकमु मनाए ॥7॥

अंग १०११ से चला आ रहा अंश

गुर सेवा सदा सुखु है जिस नो हुकमु मनाए ॥7॥
सुइना रुपा सभ धातु है माटी रलि जाई ॥
बिनु नावै नालि न चलई सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
नानक नामि रते से निरमले साचै रहे समाई ॥8॥5॥

हिन्दी अर्थ: गुरू जिस सेवक से परमात्मा का हुकम मनाता है उस सेवक को गुरू की (इस बताई) सेवा से सदा आत्मिक आनंद मिला रहता है। 7। (हे भाई !) सोना-चाँदी आदि सब (नाशवंत) माया है (जब जीव शरीर त्यागता है तो उसके लिए तो ये सब) मिट्टी में मिल गए (क्योंकि उसके किसी काम नहीं आते)। सतिगुरू ने (प्रभू के सेवक को यह) सूझ दे दी है कि परमात्मा के नाम के बिना (सोना-चाँदी आदि कोई भी चीज़ जीव के) साथ नहीं जाती। हे नानक ! (गुरू की कृपा से) जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। वे सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में लीन रहते हैं। 8। 5।

हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥

मारू महला 1 ॥
हुकमु भइआ रहणा नही धुरि फाटे चीरै ॥
एहु मनु अवगणि बाधिआ सहु देह सरीरै ॥
पूरै गुरि बखसाईअहि सभि गुनह फकीरै ॥1॥
किउ रहीऐ उठि चलणा बुझु सबद बीचारा ॥
जिसु तू मेलहि सो मिलै धुरि हुकमु अपारा ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ तू राखहि तिउ रहा जो देहि सु खाउ ॥
जिउ तू चलावहि तिउ चला मुखि अंम्रित नाउ ॥
मेरे ठाकुर हथि वडिआईआ मेलहि मनि चाउ ॥2॥
कीता किआ सालाहीऐ करि देखै सोई ॥
जिनि कीआ सो मनि वसै मै अवरु न कोई ॥
सो साचा सालाहीऐ साची पति होई ॥3॥
पंडितु पड़ि न पहुचई बहु आल जंजाला ॥
पाप पुंन दुइ संगमे खुधिआ जमकाला ॥
विछोड़ा भउ वीसरै पूरा रखवाला ॥4॥
जिन की लेखै पति पवै से पूरे भाई ॥
पूरे पूरी मति है सची वडिआई ॥
देदे तोटि न आवई लै लै थकि पाई ॥5॥
खार समुद्रु ढंढोलीऐ इकु मणीआ पावै ॥
दुइ दिन चारि सुहावणा माटी तिसु खावै ॥
गुरु सागरु सति सेवीऐ दे तोटि न आवै ॥6॥
मेरे प्रभ भावनि से ऊजले सभ मैलु भरीजै ॥
मैला ऊजलु ता थीऐ पारस संगि भीजै ॥
वंनी साचे लाल की किनि कीमति कीजै ॥7॥
भेखी हाथ न लभई तीरथि नही दाने ॥
पूछउ बेद पड़ंतिआ मूठी विणु माने ॥
नानक कीमति सो करे पूरा गुरु गिआने ॥8॥6॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ जब (परमात्मा का) हुकम हो जाता है जब (किसी की) चिट्ठी धुर (दरगाह) से फाड़ दी जाती है। तो वह (इस संसार में) नहीं रह सकता। (हे भाई ! जब तक आपका) ये मन अवगुणों (की फाही) में बँधा हुआ है (तब तक अपने इस) शरीर में (दुख) सह। जो मनुष्य पूरे गुरू के द्वारा परमात्मा के दर का मँगता बनता है उसके सारे गुनाह बख्शे जाते हैं। 1। (हे भाई ! अभी-अभी वक्त है) गुरू के शबद की विचार समझ। (यहाँ सदा) टिके नहीं रहा जा सकता। (जब प्रभू का हुकम आया तब) यहाँ से चलना ही पड़ेगा। (पर। हे प्रभू ! जीवों के क्या वश।) हे बेअंत प्रभू ! आपको वही मनुष्य मिल सकता है जिसको आप स्वयं मिलाए। धुर से आपका (ऐसा ही) हुकम है (ऐसी ही रज़ा है)। 1। रहाउ। (पर। हम जीवों के वश की बात नहीं) हे प्रभू ! जिस हालत में आप मुझे रखते हैं। मैं उसी हालत में रह सकता हूँ। जो (आत्मिक खुराक) आप मुझे देते हैं मैं वही खाता हूँ। (आत्मिक जीवन के रास्ते पर) जिस तरह आप मुझे चलाते हैं मैं उसी तरह चलता हूँ। और अपने मुँह में आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम डालता हूँ। हे मेरे ठाकुर ! आपके अपने हाथ में वडिआईआँ (आदर-मान) हैं (जिसको आप वडिआई बख्शते हैं जिसको आप अपने चरणों में) जोड़ते हैं उसके मन में (आपकी भक्ति का) चाव पैदा हो जाता है। 2। (परमात्मा की सिफत-सालाह छोड़ के परमात्मा के) पैदा किए हुए की वडिआई करने से कोई (आत्मिक) लाभ नहीं होगा (वडिआई उस करतार की करो) जो (जगत-रचना) कर के स्वयं ही (उसकी) संभाल करता है। जिस करतार ने जगत रचा है वही (मेरे) मन में बसता है। मुझे उस जैसा और कोई नहीं दिखाई देता। उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की ही सिफत-सालाह करनी चाहिए (जो करता है उसको) सदा के लिए आदर मिल जाता है। 3। पंडित (शास्त्र। पुराण आदि धर्म-पुस्तकें सिर्फ) पढ़ के (उस अवस्था पर) नहीं पहुँचता (जहाँ परमात्मा से विछोड़ा समाप्त हो जाए। क्योंकि पढ़-पढ़ के भी) वह माया के जंजालों में बहुत फसा रहता है। (धर्म-शास्त्रों के अनुसार) पाप क्या है औरा पुन्य क्या है ये विचार करता हुआ भी वह द्वैत के फंदे में ही रहता है। माया की भूख और आत्मिक मौत (मौत का डर) उसके सिर पर कायम रहते हैं। परमात्मा के चरणों से विछोड़ा और सहम उस मनुष्य का ही खत्म होता है जिसके मन में हर तरह से रक्षा करने वाला परमात्मा बसा रहता है। 4। हे भाई ! किए कर्मों का हिसाब होने पर जिन्हें इज्जत मिलती है वह सम्पूर्ण बर्तन समझे जाते हैं। ऐसे संपूर्ण गुणवान मनुष्य को परमात्मा के दर से मति भी पूरी ही मिलती है (जिसके कारण वह भूलने वाले जीवन के राह पर नहीं पड़ता) और सदा-स्थिर रहने वाली इज्जत प्राप्त होती है। (वह परमात्मा बेअंत दातों का मालिक है। जीव को) सदा देता है (उसके खजाने में) घाटा नहीं पड़ता। जीव दातें ले ले के थक जाता है। 5। (इस बात की बहुत उपमा की जाती है कि देवताओं ने समुंद्र मथा और उसमें से चौदह रत्न निकले। भला) अगर खारा समुंद्र मथने से। उसमें से कोई मनुष्य रत्न ढूँढ ले (तो भी आखिर कौन सी बड़ी बात कर ली। वह रतन) दो-चार दिन ही सुंदर लगता है (अंत में) उस रत्न को कभी ना कभी मिट्टी ही खा जाती है। (सतिगुरू असल समुंद्र है) अगर सतिगुरू" समुंद्र को सेवा जाए (अगर गुरू-समुंद्र की शरण पड़ें। तो गुरू-समुंद्र ऐसा नाम-रत्न) देता है जिसमें कभी भी कमी नहीं आ सकती। 6। सारी दुनिया (माया के मोह की) मैल से भरी हुई है। सिर्फ वह लोग साफ-सुथरे हैं जो परमात्मा को प्यारे लगते हैं। (माया के मोह से) मलीन-मन हुआ आदमी तब ही पवित्र हो सकता है जब वह गुरू पारस की संगति में रह के (परमात्मा के नाम-अमृत से) भीगता है। सदा-स्थिर प्रभू-लाल का नाम-रंग उसको ऐसा चढ़ता है कि किसी भी तरफ से उसका मूल्य नहीं पड़ सकता। 7। पर उस नाम-रंग की गहराई बाहरी धार्मिक पहिरावों से नहीं पाई जा सकती। तीर्थ पर स्नान करने से दान-पून्य करने से नहीं मिलती। मैं बेद पढ़ने वालों से ये भेद पूछता हूँ (धार्मिक पुस्तकें पढ़ने से नाम-रंग की गहराई की समझ नहीं पड़ती)। जब तक नाम-रंग में मन नहीं डूबता (मन नहीं भीगता तब तक सारी दुनिया ही माया-मोह में) ठॅगी जा रही है। हे नानक ! नाम-रंग की कद्र वही मनुष्य करता है जिसको पूरा गुरू मिलता है और (गुरू के माध्यम से परमात्मा के साथ) गहरी सांझ मिलती है। 8। 6।

मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥

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मारू महला 1 ॥
मनमुखु लहरि घरु तजि विगूचै अवरा के घर हेरै ॥
ग्रिह धरमु गवाए सतिगुरु न भेटै दुरमति घूमन घेरै ॥
दिसंतरु भवै पाठ पड़ि थाका त्रिसना होइ वधेरै ॥
काची पिंडी सबदु न चीनै उदरु भरै जैसे ढोरै ॥1॥
बाबा ऐसी रवत रवै संनिआसी ॥
गुर कै सबदि एक लिव लागी तेरै नामि रते त्रिपतासी ॥1॥ रहाउ ॥
घोली गेरू रंगु चड़ाइआ वसत्र भेख भेखारी ॥
कापड़ फारि बनाई खिंथा झोली माइआधारी ॥
घरि घरि मागै जगु परबोधै मनि अंधै पति हारी ॥
भरमि भुलाणा सबदु न चीनै जूऐ बाजी हारी ॥2॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (त्याग के) जोश में अपना घर त्याग के (फिर रोटी आदि की खातिर) औरों के घर ताकता फिरता है। गृहस्त निभाने का फर्ज (किरत करनी) छोड़ देता है (इस गलत त्याग से उसको) सतिगुरू (भी) नहीं मिलता। और अपनी दुर्मति के चक्रवात में (गोते खाता है)। (अपना घर छोड़ के) और और देशों (का) रटन करता फिरता है। (धर्म-पुस्तकों के) पाठ पढ़-पढ़ के भी थक जाता है। (पर माया की) तृष्णा (खत्म होने की जगह बल्कि) बढ़ती जाती है। होछी मति वाला (मनमुख) गुरू के शबद को नहीं विचारता। (और लोगों के घरों से बग़ैर काम काज वाले) पशुओं की तरह अपना पेट भरता है। 1। हे प्रभू ! असल सन्यासी वह है जो ऐसा जीवन जीए कि गुरू के शबद में जुड़ के उसकी लगन एक (आपके चरणों) में लगी रहे। आपके नाम-रंग में रंग के (माया की ओर से) उसे सदा तृप्ति रहेगी। 1। रहाउ। मनमुख बंदा गेरूआ घोलता है। उसका रंग (अपने कपड़ों पर) चढ़ाता है। धार्मिक पहरावे वाले कपड़े पहन के भिखारी बन जाता है। कपड़े फाड़ के (पहनने के लिए) गुदड़ी बनाता है। और (अन्न आटा आदि) माया डालने के लिए झोली (तैयार कर लेता है)। (खुद तो) हरेक घर में (जा के भिक्षा) माँगता है पर जगत को (सत-धर्म का। गृहस्त मार्ग वाला) उपदेश करता है। अपना मन अंधा होने के कारण मनमुख अपनी इज्जत गवा लेता है। भटकना में (पड़ कर जीवन-राह से) विछुड़ा हुआ गुरू के शबद को पहचानता नहीं (जैसे कोई जुआरी) जूए में बाज़ी हारता है (वैसे ही यह मनमुख अपनी मानस जनम की बाज़ी हार जाता है)। 2।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1012 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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