Lulla Family

अंग 1011

अंग
1011
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर पूरे साबासि है काटै मन पीरा ॥2॥
लाला गोला धणी को किआ कहउ वडिआईऐ ॥
भाणै बखसे पूरा धणी सचु कार कमाईऐ ॥
विछुड़िआ कउ मेलि लए गुर कउ बलि जाईऐ ॥3॥
लाले गोले मति खरी गुर की मति नीकी ॥
साची सुरति सुहावणी मनमुख मति फीकी ॥
मनु तनु तेरा तू प्रभू सचु धीरक धुर की ॥4॥
साचै बैसणु उठणा सचु भोजनु भाखिआ ॥
चिति सचै वितो सचा साचा रसु चाखिआ ॥
साचै घरि साचै रखे गुर बचनि सुभाखिआ ॥5॥
मनमुख कउ आलसु घणो फाथे ओजाड़ी ॥
फाथा चुगै नित चोगड़ी लगि बंधु विगाड़ी ॥
गुर परसादी मुकतु होइ साचे निज ताड़ी ॥6॥
अनहति लाला बेधिआ प्रभ हेति पिआरी ॥
बिनु साचे जीउ जलि बलउ झूठे वेकारी ॥
बादि कारा सभि छोडीआ साची तरु तारी ॥7॥
जिनी नामु विसारिआ तिना ठउर न ठाउ ॥
लालै लालचु तिआगिआ पाइआ हरि नाउ ॥
तू बखसहि ता मेलि लैहि नानक बलि जाउ ॥8॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सेवक पूरे गुरू को धन्य-धन्य कहता है जो उसके मन की पीड़ा दूर करता है। 2। जो मनुष्य मालिक प्रभू का सेवक-गुलाम बन जाता है मैं उसकी क्या महिमा कह सकता हूँ। वह सब ताकतों का मालिक प्रभू अपनी रजा में (अपने सेवक पर) बख्शिश करता है (जिसकी बरकति से सेवक) नाम-सिमरन (की) कार करता रहता है। सेवक अपने गुरू से सदा कुर्बान जाता है जो विछुड़े जीव को परमात्मा के चरणों में मिला लेता है। 3। गुरू की सोहणी मति ले के सेवक-गुलाम की बुद्धि भी बढ़िया हैं जाती है। उसकी सुरति सदा-स्थिर भगती में टिक के सुंदर हो जाती है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की मति उसको (परमात्मा से दूर ले जाने। फीका करने) के रास्ते पर डालने वाली होती है। (पर। हे प्रभू ! जीवों के क्या वश। जीवों को यह) मन और शरीर आपका ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! आप सदा-स्थिर रहने वाला है। आप ही अपनी धुर-दरगाह से जीवों को (सिमरन की) टेक देने वाला है। 4। (सेवक का) उठना-बैठना (सदा ही) सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में रहता है। सिमरन ही उसकी (आत्मिक) खुराक है सिमरन ही उसकी बोली है। सेवक के चित्त में सदा-स्थिर प्रभू (की याद) टिकी रहती है। सदा-स्थिर प्रभू का नाम ही उसका धन है। यही रस सदा चखता रहता है। (सेवक) सदा-स्थिर प्रभू के घर में टिकाए रखता है। 5। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे को (नाम-सिमरन से) बहुत आलस रहता है। वह अपने मन के सूनेपन में ही फसा रहता है। (नाम से सूने मन की अगुवाई में) फँसा हुआ मनमुख नित्य (माया-मोह की) कोझी चोग चुगता है। (अपने मन के पीछे) लग के परमात्म से अपना संबंध खराब कर लेता है। (अपने मन की इस गुलामी में से मनमुख भी) गुरू की कृपा से स्वतंत्र हो के सदा-स्थिर प्रभू में अपनी सुरति जोड़ लेता है। 6। सेवक नाश-रहित प्रभू की याद में टिका रहता है। प्रभू के प्यार में (उसका मन) भेदा रहता है। (सेवक प्रभू-चरणों से) प्यार जोड़ता है। (सेवक को निष्चय है कि) झूठे विकारी लोगों की जिंद सदा-स्थिर प्रभू की याद से टूट के (विकारों में ही) जल के खत्म हो जाती है। (इस वास्ते) सेवक मोह-माया की व्यर्थ के कार्य-व्यवहार त्याग देता है। परमात्मा की भक्ति (सेवक के लिए संसार-समुंद्र में से) तैराने वाली समर्थ बेड़ी है। 7। सेवक व्यर्थ कार्य छोड़कर सत्य का गुणगान कर संसार सागर से पार हो गया है॥ 7॥ जिन्होंने प्रभू का नाम बिसार दिया उन्हें आत्मिक शांति के लिए कोई और जगह नहीं मिलती। सेवक ने माया का लालच त्याग दिया है। और परमात्मा का नाम-धन पा लिया है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं आपसे सदके जाता हूँ। आप स्वयं ही मेहर करे तो जीवों को (अपने चरणों में) मिलाए। 8। 4।
मारू महला 1 ॥
लालै गारबु छोडिआ गुर कै भै सहजि सुभाई ॥
लालै खसमु पछाणिआ वडी वडिआई ॥
खसमि मिलिऐ सुखु पाइआ कीमति कहणु न जाई ॥1॥
लाला गोला खसम का खसमै वडिआई ॥
गुर परसादी उबरे हरि की सरणाई ॥1॥ रहाउ ॥
लाले नो सिरि कार है धुरि खसमि फुरमाई ॥
लालै हुकमु पछाणिआ सदा रहै रजाई ॥
आपे मीरा बखसि लए वडी वडिआई ॥2॥
आपि सचा सभु सचु है गुर सबदि बुझाई ॥
तेरी सेवा सो करे जिस नो लैहि तू लाई ॥
बिनु सेवा किनै न पाइआ दूजै भरमि खुआई ॥3॥
सो किउ मनहु विसारीऐ नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा साहु तिनै विचि पाइआ ॥
जा क्रिपा करे ता सेवीऐ सेवि सचि समाइआ ॥4॥
लाला सो जीवतु मरै मरि विचहु आपु गवाए ॥
बंधन तूटहि मुकति होइ त्रिसना अगनि बुझाए ॥
सभ महि नामु निधानु है गुरमुखि को पाए ॥5॥
लाले विचि गुणु किछु नही लाला अवगणिआरु ॥
तुधु जेवडु दाता को नही तू बखसणहारु ॥
तेरा हुकमु लाला मंने एह करणी सारु ॥6॥
गुरु सागरु अंम्रित सरु जो इछे सो फलु पाए ॥
नामु पदारथु अमरु है हिरदै मंनि वसाए ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (प्रभू का) सेवक (वह है जिस) ने अहंकार त्याग दिया है गुरू के डर-अदब में रह के सेवक अडोल आत्मिक अवस्था में टिका रहता है। प्रेम स्वभाव वाला बन जाता है। सेवक वह है जिसने मालिक के साथ गहरी सांझ डाल ली है। मालिक से बहुत आदर-मान मिलता है। अगर पति-प्रभू मिल जाए। तो सेवक को इतना आत्मिक आनंद प्राप्त होता है कि उस आनन्द का मूल्य नहीं पाया जा सकता। 1। जो मनुष्य परमात्मा-मालिक का सेवक गुलाम बनता है वह पति-प्रभू की ही सिफत-सालाह करता रहता है। जो लोग गुरू की कृपा से परमात्मा की शरण पड़ते हैं वह (माया के मोह से) बच निकलते हैं। 1। रहाउ। पति-प्रभू ने धुर से ही हुकम दे दिया अपने सेवक को सिर पर (हुकम मानने की) कार सौंप दी (इस वास्ते प्रभू का) सेवक प्रभू का हुकम पहचानता है और सदा उसकी रजा में रहता है। मालिक स्वय ही (सेवक पर) बख्शिशें करता है और उसको बहुत आदर-मान देता है। 2। हे प्रभू ! तूने गुरू के शबद के द्वारा सेवक को ये समझ दी है कि आप स्वयं सदा अटल है और आपका सारा (नियम) अटल है। हे प्रभू ! आपकी सेवा-भगती वही मनुष्य करता है जिसको आप स्वयं सेवा-भगती में जोड़ता है। आपकी सेवा-भक्ति के बिना कोई जीव आपको नहीं पा सका। (आपकी सेवा-भक्ति के बिना जीव) माया की भटकना में पड़ कर जीवन-राह से टूटा रहता है। 3। उस परमात्मा को कभी मन से भुलाना नहीं चाहिए जो सब जीवों को सब कुछ सदा देता है और उसका दिया नित्य बढ़ता रहता है। ये प्राण और ये शरीर सब उस प्रभू का ही दिया हुआ है। शरीर में साँसें भी उसी ने ही रखी है। (पर उसकी सेवा-भक्ति भी उसकी मेहर से ही की जा सकती है) जब वह कृपा करता है तब उसकी सेवा की जा सकती है। जीव सेवा-भक्ति करके सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 4। वह मनुष्य प्रभू का सेवक (कहलवा सकता) है जो दुनिया की किरत-कार करता हुआ माया के मोह की ओर से मरा रहता है। माया के मोह से ऊपर रह के अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करता है। (ऐसे सेवक के माया वाले) बँधन टूट जाते हैं। माया के मोह से उसको स्वतंत्रता मिल जाती है। वह अपने अंदर से माया की तृष्णा की आग बुझा देता है। वैसे तो परमात्मा का नाम-खजाना हरेक जीव के अंदर ही मौजूद है। पर कोई वही आदमी इस खजाने को पा सकता है जो गुरू की शरण पड़ता है। 5। (हे प्रभू ! आपकी मेहर के बिना) सेवक में कोई गुण पैदा नहीं हैं सकता। वह तो बल्कि अवगुणों से भरा रहता है। हे प्रभू ! आपके जितना दाता और कोई नहीं। आप स्वयं ही बख्शिश करता है। और आपका सेवक आपका हुकम मानता है। हुकम मानने को ही सबसे उक्तम कार्य समझता है। 6। गुरू समुंद्र है। गुरू अमृत से भरा हुआ सरोवर है (‘अमृतसर’ है। सेवक इस अमृत के सरोवर गुरू की शरण पड़ता है। फिर यहाँ से) जो कुछ माँगता है वह फल ले लेता है। (गुरू की मेहर से सेवक अपने) हृदय में मन में परमात्मा का नाम बसाता है जो (असल) सरमाया है और जो कभी खत्म होने वाला नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सेवक पूरे गुरू को धन्य-धन्य कहता है जो उसके मन की पीड़ा दूर करता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।