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अंग १०१० · मारू

अंग
1010
मारू
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  1. धंधै धावत जगु बाधिआ ना बूझै वीचारु ॥
  2. सबदि मरै ता मारि मरु भागो किसु पहि जाउ ॥
  3. साची कार कमावणी होरि लालच बादि ॥

धंधै धावत जगु बाधिआ ना बूझै वीचारु ॥

अंग १००९ से चला आ रहा अंश

धंधै धावत जगु बाधिआ ना बूझै वीचारु ॥
जंमण मरणु विसारिआ मनमुख मुगधु गवारु ॥
गुरि राखे से उबरे सचा सबदु वीचारि ॥7॥
सूहटु पिंजरि प्रेम कै बोलै बोलणहारु ॥
सचु चुगै अंम्रितु पीऐ उडै त एका वार ॥
गुरि मिलिऐ खसमु पछाणीऐ कहु नानक मोख दुआरु ॥8॥2॥

हिन्दी अर्थ: दुनिया के कार्य-व्यवहार में दौड़-भाग करता हुआ मनुष्य माया के मोह में बँध जाता है। वह (इसमें से निकलने की कोई) सोच सोच ही नहीं सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य ऐसा मूर्ख और बुद्धू बन जाता है कि वह जनम-मरण का चक्कर भुला ही बैठता है। जिनकी रक्षा गुरू ने की। वे सच्चे शबद को अपने सोच-मण्डल में बसा के (मोह की जंजीरों में से) बच निकले। 7। (तोता अपने मालिक के पिंजरे में पड़ कर वही बोली बोलता है जो मालिक सिखाता है। मालिक वह बोली सुन के तोते पर खुश होता है) जो जीव-तोता प्रभू के प्रेम के पिंजरे में पड़ कर वह बोल बोलता है जो इसके अंदर बोलणहार प्रभू को पसंद है। तो वह जीव-तोता सदा-स्थिर नाम की चोग चुगता है नाम-अमृत पीता है। (शरीर पिंजरे को सदा के लिए) एक बार ही त्याग जाता है (बार-बार जनम मरण में नहीं पड़ता)। हे नानक ! कह- अगर गुरू मिल जाए तो पति-परमात्मा के साथ गहरी सांझ पड़ जाती है। और माया के मोह से खलासी का दरवाजा मिल जाता है। 8। 2।

सबदि मरै ता मारि मरु भागो किसु पहि जाउ ॥

मारू महला 1 ॥
सबदि मरै ता मारि मरु भागो किसु पहि जाउ ॥
जिस कै डरि भै भागीऐ अंम्रितु ता को नाउ ॥
मारहि राखहि एकु तू बीजउ नाही थाउ ॥1॥
बाबा मै कुचीलु काचउ मतिहीन ॥
नाम बिना को कछु नही गुरि पूरै पूरी मति कीन ॥1॥ रहाउ ॥
अवगणि सुभर गुण नही बिनु गुण किउ घरि जाउ ॥
सहजि सबदि सुखु ऊपजै बिनु भागा धनु नाहि ॥
जिन कै नामु न मनि वसै से बाधे दूख सहाहि ॥2॥
जिनी नामु विसारिआ से कितु आए संसारि ॥
आगै पाछै सुखु नही गाडे लादे छारु ॥
विछुड़िआ मेला नही दूखु घणो जम दुआरि ॥3॥
अगै किआ जाणा नाहि मै भूले तू समझाइ ॥
भूले मारगु जो दसे तिस कै लागउ पाइ ॥
गुर बिनु दाता को नही कीमति कहणु न जाइ ॥4॥
साजनु देखा ता गलि मिला साचु पठाइओ लेखु ॥
मुखि धिमाणै धन खड़ी गुरमुखि आखी देखु ॥
तुधु भावै तू मनि वसहि नदरी करमि विसेखु ॥5॥
भूख पिआसो जे भवै किआ तिसु मागउ देइ ॥
बीजउ सूझै को नही मनि तनि पूरनु देइ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ आपि वडाई देइ ॥6॥
नगरी नाइकु नवतनो बालकु लील अनूपु ॥
नारि न पुरखु न पंखणू साचउ चतुरु सरूपु ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ तू दीपकु तू धूपु ॥7॥
गीत साद चाखे सुणे बाद साद तनि रोगु ॥
सचु भावै साचउ चवै छूटै सोग विजोगु ॥
नानक नामु न वीसरै जो तिसु भावै सु होगु ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (जब मनुष्य गुरू के) शबद में (जुड़ के) स्वै भाव को मारता है तब वह मौत के डर को मार लेता है। (वैसे मौत से) भाग के मैं किस के पास जा सकता हॅूँ। जिस परमात्मा के डर में रहने से अदब में रहने से (मौत के डर से) बचा जा सकता है (उसका नाम जपना चाहिए)। उसका नाम अटल आत्मिक जीवन देने वाला है। हे प्रभू ! आप स्वयं ही मारते हैं आप खुद ही रक्षा करते हैं। आपके बिना और कोई जगह नहीं (जो मार सके अथवा मौत से बचा सके)। 1। हे प्रभू ! (आपके नाम के बिना) मैं गंदा हूँ। कमजोर-दिल हूँ। बुद्धि-हीन हूँ। आपके नाम के बिना कोई भी जीव किसी भी लायक नहीं (मति-हीन है)। (जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया) पूरे गुरू ने उसको वह मति दे दी जिससे वह जीवन-यात्रा में बिल्कुल गलती नहीं ना खाए। 1। रहाउ। (प्रभू के नाम से टूट के) मैं अवगुणों से नाको-नाक भर जाता हूँ। मेरे में गुण नहीं पैदा होते। और गुणों के बिना मैं (परमात्मा के) देश में कैसे पहुँच सकता हूँ। जो मनुष्य अडोल आत्मिक अवस्था में टिकता है गुरू के शबद में जुड़ता है उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है। पर यह नाम-धन किस्मत के बिना नहीं मिलता। जिनके मन में परमात्मा का नाम नहीं बसता। वे अवगुणों से बँधे हुए दुख सहते हैं। 2। जिन लोगों ने परमात्मा का नाम भुला दिया वे संसार में किसलिए आए। उन्हें ना परलोक में सुख। ना इस लोक में सुख। वे तो राख से लदी हुई गाड़ियाँ हैं (उनके शरीर विकारों से भरे हुए हैं)। वे परमात्मा से विछुड़े हुए हैं। परमात्मा के साथ उनको मिलाप नसीब नहीं होता। वे जमराज के डर से काफी दुख सहते हैं। 3। हे प्रभू ! मुझे ये समझ नहीं कि आपके नाम से टूट के मेरे साथ क्या होंगे। मुझ भूले हुए को। हे प्रभू ! आप स्वयं बुद्धि दे। मुझ गलत राह पर पड़े हुए को जो कोई रास्ता बताएगा। मैं उसके पैरों पर लगूँगा। (सही रास्ते की) दाति देने वाला गुरू के बिना और कोई नहीं। गुरू की बख्शी हुई इस दाति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। 4। (गुरू की शरण पड़ कर) मैं सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन कर रही हूँ। ये सिमरन-रूपी चिट्ठी मैंने (प्रभू-पति को) भेजी है। जब उस सज्जन-प्रभू का मैं दर्शन करूँगी तब मैं उसके गले से लग जाऊँगी। (प्रभू की याद से टूट के) हे बेहाल हो के खड़ी जीव स्त्री ! आप भी गुरू की शरण पड़। और अपनी आँखों से उसका दर्शन कर ले। (पर। हे प्रभू ! हम जीवों के भी क्या वश।) अगर आपको अच्छा लगे तो आप जीवों के मन आ के प्रकट होते हैं। आपकी मेहर की निगाह से आपकी बख्शिश से आपके दशर्नों की वडिआई मिलती है। 5। अगर कोई मनुष्य स्वयं ही (माया के मोह में) भूखा-प्यासा भटक रहा हैं। मैं उससे क्या (नाम की दाति) माँग सकता हॅूँ। वह मुझे क्या दे सकता है। मुझे तो और कोई (दाता) नहीं सूझता। (हाँ।) वही परमात्मा दे सकता है जो जीवों के मन में तन में भरपूर है। जिस परमात्मा ने यह जगत रचा है उसने स्वयं ही इसकी संभाल करनी है। वह स्वयं ही अपने (नाम की दाति की) वडिआई देता है। 6। परमात्मा इन शरीरों का मालिक है। (जीवों को प्यार करने में वह हर वक्त) नया है। बालक (की तरह वह निर्वैर) है। वह अनोखे करिश्मे करने में समर्थ है। परमात्मा सदा-स्थिर रहने वाला है। (स्त्री मर्द पंछी आदि सभी में मौजूद है) पर वह कोई खास स्त्री नहीं। कोई खास मर्द नहीं। कोई खास पंछी नहीं। बुद्धि का पुँज है। जगत में वही कुछ हो रहा है जो उसको भाता है। हे प्रभू ! आप सब जीवों को प्रकाश (ज्ञान) देने वाले हैं। आप सबको सुगन्धि (मीठा स्वभाव) देने वाले हैं। 7। दुनियाँ के गीत सुन के देखे हैं। स्वाद चख के देखे हैं; ये गीत और स्वाद शरीर के रोग ही पैदा करते हैं। जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू प्यारा लगता है जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरता है। उसका (प्रभू से) विछोड़ा समाप्त हो जाता है। उसकी चिंता दूर हो जाती है। हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू का नाम नहीं भूलता। उसको ये यकीन बन जाता है कि जगत में वही कुछ होता है जो प्रभू को पसन्द आता है। 8। 3।

साची कार कमावणी होरि लालच बादि ॥

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मारू महला 1 ॥
साची कार कमावणी होरि लालच बादि ॥
इहु मनु साचै मोहिआ जिहवा सचि सादि ॥
बिनु नावै को रसु नही होरि चलहि बिखु लादि ॥1॥
ऐसा लाला मेरे लाल को सुणि खसम हमारे ॥
जिउ फुरमावहि तिउ चला सचु लाल पिआरे ॥1॥ रहाउ ॥
अनदिनु लाले चाकरी गोले सिरि मीरा ॥
गुर बचनी मनु वेचिआ सबदि मनु धीरा ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (प्रभू-मालिक का गुलाम) सदा-स्थिर प्रभू की भक्ति की कार करता है। (नाम-सिमरन के बिना) बाकी के लालच उसको व्यर्थ (दिखाई देते) हैं। सदा-स्थिर प्रभू ने अपने सेवक का मन प्रेम-वश किया हुआ है (इस वास्ते सेवक की) जीभ सदा-स्थिर नाम-सिमरन के स्वाद में (मगन रहती) है। (सेवक को) प्रभू के नाम के बिना और कोई रस (आकर्षित) नहीं (करता)। (सेवक को निष्चय है कि नाम-रस से वंचित रहने वाले) लोग वह चीज इकट्ठी करके ले जाते हैं जो आत्मिक जीवन के लिए जहर है। 1। हे मेरे पति ! हे मेरे प्यारे लाल ! (मेरी आरज़ू) सुन। मैं अपने लाल का (भाव। आपका) ऐसा सेवक-ग़ुलाम हूँ कि (आप) जैसे हुकम करते हैं। मैं वैसे ही (जीवन-राह पर) चलता हूँ। आप ही सदा कायम रहने वाले हैं। 1। रहाउ। सेवक ने हर रोज (हर वक्त) परमात्मा की भक्ति की सेवा ही संभाली हुई है। सेवक को अपने सिर पर मालिक-प्रभू (खड़ा दिखाई देता) है। सेवक ने अपना मन गुरू के वचनों से बेच दिया है। गुरू के शबद में (टिक के) सेवक का मन धैर्य धरता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1010 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०१० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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