करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥1॥ रहाउ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥2॥4॥27॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥1॥
मेरे मन नामु अंम्रितु पीउ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥2॥5॥28॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥1॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥1॥ रहाउ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥2॥6॥29॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥1॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अंम्रित पाथ ॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥2॥7॥30॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥1॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥
ऊरध मुख महा गुबारे ॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥2॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥3॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥4॥1॥31॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हृदय में टिकाए रख।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।