Lulla Family

अंग १००७ · मारू

अंग
1007
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · ५ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥
  2. तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
  3. प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
  4. पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
  5. संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥

मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥

अंग १००६ से चला आ रहा अंश

मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥
करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥1॥ रहाउ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥2॥4॥27॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हृदय में टिकाए रख। हे भाई ! मन लगा के तन लगा के (तन से मन से) और सारे (चिंता-फिक्र) भुला के परमात्मा के साथ प्यार बनाए रख। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) ये जिंद। ये मन। ये शरीर। ये प्राण - (सब कुछ) परमात्मा के ही दिए हुए हैं (आप गुमान किस बात का करते हैं।) स्वै भाव दूर कर। गोबिंद का भजन किया कर। आपकी सारी जरूरतें भी पूरी होंगी। और। (मनुष्य जन्म की बाजी भी) कभी नहीं हारेगा। 2। 4। 27।

तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥

मारू महला 5 ॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥1॥
मेरे मन नामु अंम्रितु पीउ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥2॥5॥28॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे मेरे मन ! स्वै भाव छोड़ दे। गुरू की चरण-धूड़ बन जा। आपका सारा दुख-कलेश दूर हो जाएगा। हे प्रभू ! आपका नाम उसी मनुष्य को मिलता है। जिसको आप स्वयं मेहर कर के देते हैं। 1। हे मेरे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जल पीया कर (नाम की बरकति से) और सारे (मायावी पदार्थों के) नाशवान चस्के भुला के सदा के लिए अटल आत्मिक जीवन वाली जिंदगी गुजार। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य ने एक परमात्मा को ही अपना सज्जन-मित्र और संबंधी बना लिया। उसकी लिव सदा परमात्मा के नाम में लगी रहती है। परमात्मा का नाम ही उसके वास्ते (मायावी पदार्थों के स्वाद हैं)। नाम ही उसके लिए दुनियां के रंग-तमाशे हैं। 2। 5। 28।

प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥

मारू महला 5 ॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥1॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥1॥ रहाउ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥2॥6॥29॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे मन ! पालना करके प्रभू माँ के पेट में बचाता है। (पेट की आग का) सेक लगने नहीं देता। वही मालिक इस जगत में भी रक्षा करता है। हे भाई ! परख की बुद्धि से यह (सच्चाई) समझ ले। 1। हे मेरे मन ! (सदा) परमात्मा के नाम का आसरा ले। उस परमात्मा को ही (सहारा) समझ। जिसने आपको पैदा किया है। हे मन ! एक प्रभू ही सारे जगत का मूल है। 1। रहाउ। हे भाई ! चतुराईयाँ छोड़ के (दिखावे के) सारे (धार्मिक) पहरावे छोड़ के अपने मन में परमात्मा को याद करता रह। हे नानक ! परमात्मा का सदा सिमरन करके अनेकों जीव संसार-समुंद्र से पार लांघते चले आ रहे हैं। 2। 6। 29।

पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥

मारू महला 5 ॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥1॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अंम्रित पाथ ॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥2॥7॥30॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! जिस परमात्मा का नाम पापियों को पवित्र करने योग्य है। जो बेआसरों का आसरा है। वह परमात्मा इस भयानक संसार समुंद्र में (जीव के लिए) जहाज है। (पर ये उसी को मिलता है) जिसके माथे पर (मिलाप के लेख) लिखे होते हैं। 1। हे भाई ! उसके नाम के बिना (ना जाने कितने ही) काफिले (इस संसार समुंद्र में) डूब रहे हैं। (क्योंकि) जगत का मूल परमात्मा (उनके) चित्त में नहीं बसता जो परमात्मा (जीवों को) हाथ दे के बचाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) परमात्मा का नाम परमात्मा के गुण उचारते रहना- यही है आत्मिक जीवन देने वाला रास्ता। हे नानक ! (कह-) हे मुरारी ! मेहर कर (ता कि आपका दास आपकी) सिफत सालाह सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता रहे। 2। 7। 30।

संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥

मारू अंजुली महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥1॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥
ऊरध मुख महा गुबारे ॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥2॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥3॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥4॥1॥31॥

हिन्दी अर्थ: मारू अंजुली महला 5 घरु 7 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (प्राण और शरीर का) मिलाप और विछोड़ा परमात्मा की रजा अनुसार ही होता है। (परमात्मा के हुकम में ही) पाँच तत्व (इकट्ठे) करके शरीर बनाया जाता है। प्रभू-पातशाह के हुकम अनुसार ही जीवात्मा शरीर में आ टिकता है। 1। हे भाई ! जहाँ (माँ के पेट में पेट की) आग बहुत जलती है। उस भयानक अंधेरे में जीव उल्टे मुँह पड़ा रहता है। जीव (वहाँ अपने) हरेक साँस के साथ परमात्मा को याद करता रहता है। उस जगह मालिक-प्रभू ने ही जीव को बचाया होता है। 2। हे भाई ! जब जीव माँ के पेट में से बाहर आ जाता है। मालिक प्रभू को भुला के दुनियां के पदार्थों में चित्त जोड़ लेता है। (प्रभू को बिसारने के कारण) पैदा होने-मरने के चक्कर में (जीव) पड़ जाता है। जूनियों में पाया जाता है। किसी एक जगह इसको ठिकाना नहीं मिलता। 3। उस मेहरवान (प्रभू) ने स्वयं ही (कई जीव जनम-मरण के चक्कर से) बचाए हैं। हे भाई ! सारे जीव उस (परमात्मा) के ही पैदा किए हुए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य (परमात्मा के नाम से) इस कीमती जनम (की बाज़ी) को जीत के यहाँ से चलता है। वह इस जगत में आया हुआ मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल होता है। 4। 1। 31।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1007 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १००७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English