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अंग 1007

अंग
1007
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥
करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥1॥ रहाउ ॥
जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥
गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥2॥4॥27॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हृदय में टिकाए रख। हे भाई ! मन लगा के तन लगा के (तन से मन से) और सारे (चिंता-फिक्र) भुला के परमात्मा के साथ प्यार बनाए रख। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) ये जिंद। ये मन। ये शरीर। ये प्राण – (सब कुछ) परमात्मा के ही दिए हुए हैं (आप गुमान किस बात का करता है।) स्वै भाव दूर कर। गोबिंद का भजन किया कर। आपकी सारी जरूरतें भी पूरी होंगी। और। (मनुष्य जन्म की बाजी भी) कभी नहीं हारेगा। 2। 4। 27।
मारू महला 5 ॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥
तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥1॥
मेरे मन नामु अंम्रितु पीउ ॥
आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥
मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥2॥5॥28॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे मेरे मन ! स्वै भाव छोड़ दे। गुरू की चरण-धूड़ बन जा। आपका सारा दुख-कलेश दूर हैं जाएगा। हे प्रभू ! आपका नाम उसी मनुष्य को मिलता है। जिसको आप स्वयं मेहर कर के देता है। 1। हे मेरे मन ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जल पीया कर (नाम की बरकति से) और सारे (मायावी पदार्थों के) नाशवान चस्के भुला के सदा के लिए अटल आत्मिक जीवन वाली जिंदगी गुजार। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य ने एक परमात्मा को ही अपना सज्जन-मित्र और संबंधी बना लिया। उसकी लिव सदा परमात्मा के नाम में लगी रहती है। परमात्मा का नाम ही उसके वास्ते (मायावी पदार्थों के स्वाद हैं)। नाम ही उसके लिए दुनियां के रंग-तमाशे हैं। 2। 5। 28।
मारू महला 5 ॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥
सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥1॥
मेरे मन नाम की करि टेक ॥
तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥1॥ रहाउ ॥
चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥
सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥2॥6॥29॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे मन ! पालना करके प्रभू माँ के पेट में बचाता है। (पेट की आग का) सेक लगने नहीं देता। वही मालिक इस जगत में भी रक्षा करता है। हे भाई ! परख की बुद्धि से यह (सच्चाई) समझ ले। 1। हे मेरे मन ! (सदा) परमात्मा के नाम का आसरा ले। उस परमात्मा को ही (सहारा) समझ। जिसने आपको पैदा किया है। हे मन ! एक प्रभू ही सारे जगत का मूल है। 1। रहाउ। हे भाई ! चतुराईयाँ छोड़ के (दिखावे के) सारे (धार्मिक) पहरावे छोड़ के अपने मन में परमात्मा को याद करता रह। हे नानक ! परमात्मा का सदा सिमरन करके अनेकों जीव संसार-समुंद्र से पार लांघते चले आ रहे हैं। 2। 6। 29।
मारू महला 5 ॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥
महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥1॥
डूबे नाम बिनु घन साथ ॥
करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अंम्रित पाथ ॥
करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥2॥7॥30॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! जिस परमात्मा का नाम पापियों को पवित्र करने योग्य है। जो बेआसरों का आसरा है। वह परमात्मा इस भयानक संसार समुंद्र में (जीव के लिए) जहाज है। (पर ये उसी को मिलता है) जिसके माथे पर (मिलाप के लेख) लिखे होते हैं। 1। हे भाई ! उसके नाम के बिना (ना जाने कितने ही) काफिले (इस संसार समुंद्र में) डूब रहे हैं। (क्योंकि) जगत का मूल परमात्मा (उनके) चित्त में नहीं बसता जो परमात्मा (जीवों को) हाथ दे के बचाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में (टिक के) परमात्मा का नाम परमात्मा के गुण उचारते रहना- यही है आत्मिक जीवन देने वाला रास्ता। हे नानक ! (कह-) हे मुरारी ! मेहर कर (ता कि आपका दास आपकी) सिफत सालाह सुन के आत्मिक जीवन हासिल करता रहे। 2। 7। 30।
मारू अंजुली महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥
पंच धातु करि पुतला कीआ ॥
साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥1॥
जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥
ऊरध मुख महा गुबारे ॥
सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥2॥
विचहु गरभै निकलि आइआ ॥
खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥
आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥3॥
मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥
जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥
जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥4॥1॥31॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू अंजुली महला 5 घरु 7 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (प्राण और शरीर का) मिलाप और विछोड़ा परमात्मा की रजा अनुसार ही होता है। (परमात्मा के हुकम में ही) पाँच तत्व (इकट्ठे) करके शरीर बनाया जाता है। प्रभू-पातशाह के हुकम अनुसार ही जीवात्मा शरीर में आ टिकता है। 1। हे भाई ! जहाँ (माँ के पेट में पेट की) आग बहुत जलती है। उस भयानक अंधेरे में जीव उल्टे मुँह पड़ा रहता है। जीव (वहाँ अपने) हरेक साँस के साथ परमात्मा को याद करता रहता है। उस जगह मालिक-प्रभू ने ही जीव को बचाया होता है। 2। हे भाई ! जब जीव माँ के पेट में से बाहर आ जाता है। मालिक प्रभू को भुला के दुनियां के पदार्थों में चित्त जोड़ लेता है। (प्रभू को बिसारने के कारण) पैदा होने-मरने के चक्कर में (जीव) पड़ जाता है। जूनियों में पाया जाता है। किसी एक जगह इसको ठिकाना नहीं मिलता। 3। उस मेहरवान (प्रभू) ने स्वयं ही (कई जीव जनम-मरण के चक्कर से) बचाए हैं। हे भाई ! सारे जीव उस (परमात्मा) के ही पैदा किए हुए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य (परमात्मा के नाम से) इस कीमती जनम (की बाज़ी) को जीत के यहाँ से चलता है। वह इस जगत में आया हुआ मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल होता है। 4। 1। 31।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम हृदय में टिकाए रख।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।