Lulla Family

अंग 1008

अंग
1008
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मारू महला 5 ॥
वैदो न वाई भैणो न भाई एको सहाई रामु हे ॥1॥
कीता जिसो होवै पापां मलो धोवै सो सिमरहु परधानु हे ॥2॥
घटि घटे वासी सरब निवासी असथिरु जा का थानु हे ॥3॥
आवै न जावै संगे समावै पूरन जा का कामु हे ॥4॥
भगत जना का राखणहारा ॥
संत जीवहि जपि प्रान अधारा ॥
करन कारन समरथु सुआमी नानकु तिसु कुरबानु हे ॥5॥2॥32॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! (दुख-दर्द के समय) सिर्फ एक परमात्मा ही मदद करने वाला होता है। ना कोई वैद्य ना ही किसी वैद्य की दवाई; ना कोई बहन ना ही कोई भाई- कोई भी मददगार नहीं होता। 1। हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरन करते रहो जिसका किया हरेक काम (जगत में) हो रहा है। जो (जीवों के) पापों की मैल धोता है। हे भाई ! वह परमात्मा ही (जगत में) शिरोमणि है। 2। हे भाई ! (उस परमात्मा का ही सिमरन करो) जिसका आसन सदा अडोल रहने वाला है। जो हरेक शरीर में बसता है। जो सब जीवों में निवास रखने वाला है। 3। हे भाई ! (उसी परमात्मा का ही सिमरन करो) जिसका हरेक काम मुकम्मल (अभूल) है। जो ना पैदा होता है ना मरता है। पर हरेक जीव के साथ गुप्त बसता है। 4। हे भाई ! वह परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करने वाला है। वह हरेक के प्राणों का आसरा है। संत जन (उसका नाम) जप के आत्मिक जीवन हासिल करते रहते हैं। वह परमात्मा इस जगत-रचना का मूल है। सारी ताकतों का मालिक है। सब का पति है। हे भाई ! नानक (सदा) उससे बलिहार जाता है। 5। 2। 32।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मारू महला 9 ॥
हरि को नामु सदा सुखदाई ॥
जा कउ सिमरि अजामलु उधरिओ गनिका हू गति पाई ॥1॥ रहाउ ॥
पंचाली कउ राज सभा महि राम नाम सुधि आई ॥
ता को दूखु हरिओ करुणा मै अपनी पैज बढाई ॥1॥
जिह नर जसु किरपा निधि गाइओ ता कउ भइओ सहाई ॥
कहु नानक मै इही भरोसै गही आनि सरनाई ॥2॥1॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि॥ मारू महला 9॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा आत्मिक आनंद देने वाला है। जिस नाम को सिमर के अजामल विकारों से बच गया था। (इस नाम को सिमर के) वेश्वा ने भी उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर ली थी। 1। रहाउ। हे भाई ! दुर्याधन के राज-दरबार में द्रोपदी ने (भी) परमात्मा के नाम का ध्यान धरा था। और। तरस-स्वरूप परमात्मा ने उसका दुख दूर किया था। (और इस तरह) अपना रसूख बढ़ाया था। 1। हे भाई ! जिन भी लोगों ने कृपा के खजाने परमात्मा की सिफत-सालाह की। परमात्मा उनका मददगार (हो के) पहुँचा। हे नानक ! कह- मैंने भी इसी ही भरोसे में आ कर परमात्मा की शरण ली है। 2। 1।
मारू महला 9 ॥
अब मै कहा करउ री माई ॥
सगल जनमु बिखिअन सिउ खोइआ सिमरिओ नाहि कन॑ाई ॥1॥ रहाउ ॥
काल फास जब गर महि मेली तिह सुधि सभ बिसराई ॥
राम नाम बिनु या संकट महि को अब होत सहाई ॥1॥
जो संपति अपनी करि मानी छिन महि भई पराई ॥
कहु नानक यह सोच रही मनि हरि जसु कबहू न गाई ॥2॥2॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 9॥ हे माँ ! समय बीत जाने पर मैं क्या कर सकता हूँ। (भाव। वक्त बीत जाने पर मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता)। जिस मनुष्य ने सारी जिंदगी विषय-विकारों में गवा ली। और। परमात्मा का सिमरन कभी भी ना किया (वह समय बीत जाने पर फिर कुछ नहीं हो सकता)। 1। रहाउ। हे माँ ! जब जमराज (मनुष्य के) गले में मौत का फंदा डाल देता है। तब वह उसकी सारी सुध-बुध भुला देता है। उस बिपता में परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी मददगार नहीं बन सकता (जमों के फंदों से। आत्मिक मौत से सहम से सिर्फ हरी-नाम ही बचाता है)। 1। हे माँ ! जिन धन-पदार्थों को मनुष्य हमेशा अपना समझे रखता है (जब मौत आती है। वह धन-पदार्थ) एक छिन में बेगाना हो जाता है। हे नानक ! कह-उस वक्त मनुष्य के मन में यह पछतावा रह जाता है कि परमात्मा की सिफत सालाह कभी भी ना की। 2। 2।
मारू महला 9 ॥
माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥
माइआ के मदि जनमु सिराइओ राम भजनि नही लागिओ ॥1॥ रहाउ ॥
जम को डंडु परिओ सिर ऊपरि तब सोवत तै जागिओ ॥
कहा होत अब कै पछुताए छूटत नाहिन भागिओ ॥1॥
इह चिंता उपजी घट महि जब गुर चरनन अनुरागिओ ॥
सुफलु जनमु नानक तब हूआ जउ प्रभ जस महि पागिओ ॥2॥3॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 9॥ हे माँ ! (जब से मैंने गुरू-चरणों में प्यार डाला है। तब से मैं पछता रहा हूँ कि) मैंने अपने मन का अहंकार नहीं छोड़ा। माया के नशे में मैंने अपनी उम्र गुजार दी। और। परमात्मा के भजन में ना लगा। 1। रहाउ। (हे भाई ! मनुष्य माया की नींद में गाफिल पड़ा रहता है) जब जमदूत का डंडा (इस के) सिर पर बजता है। तब (माया के मोह की नींद में से) सोया हुआ जागता है। पर उस वक्त के पछतावे से कुछ सँवरता नहीं। (क्योंकि उस समय जमों से) भागने पर बचाव नहीं हो सकता। 1। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू के चरणों में प्यार डालता है। तब उसके हृदय में यह फुरना उठता है (कि प्रभू के भजन के बिना उम्र व्यर्थ ही बीतती रही)। हे नानक ! मनुष्य की जिंदगी कामयाब तब ही होती है जब (यह गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की सिफत-सालाह में जुड़ता है। 2। 3।
मारू असटपदीआ महला 1 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बेद पुराण कथे सुणे हारे मुनी अनेका ॥
अठसठि तीरथ बहु घणा भ्रमि थाके भेखा ॥
साचो साहिबु निरमलो मनि मानै एका ॥1॥
तू अजरावरु अमरु तू सभ चालणहारी ॥
नामु रसाइणु भाइ लै परहरि दुखु भारी ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: मारू असटपदीआ महला 1 घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ अनेकों ऋषि मुनि (मौनधारी) वेद-पुराण (आदि धर्म-पुस्तकें) सुना-सुना के सुन-सुन के थक गए। सब भेषों के अनेकों साधू अढ़सठ तीर्थों पर भटक-भटक के थक गए (परन्तु परमात्मा को प्रसन्न ना कर सके)। वह सदा-स्थिर रहने वाला पवित्र मालिक सिर्फ मन (की पवित्रता) के द्वारा ही पतीजता है। 1। हे प्रभू ! सारी सृष्टि नाशवंत है। (पर) आप कभी बूढ़ा नहीं होता। आप अति श्रेष्ठ है। आप मौत से रहित है। आपका नाम सारे रसों का श्रोत है। जो जीव (आपका नाम) प्रेम से जपता है। वह अपना बड़े से बड़ा दुख दूर कर लेता है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 5॥ हे भाई ! (दुख-दर्द के समय) सिर्फ एक परमात्मा ही मदद करने वाला होता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।