दानु पावउ संता संगु नानक रेनु दासारा ॥4॥6॥22॥
त्रिपति आघाए संता ॥
गुर जाने जिन मंता ॥
ता की किछु कहनु न जाई ॥
जा कउ नाम बडाई ॥1॥
लालु अमोला लालो ॥
अगह अतोला नामो ॥1॥ रहाउ ॥
अविगत सिउ मानिआ मानो ॥
गुरमुखि ततु गिआनो ॥
पेखत सगल धिआनो ॥
तजिओ मन ते अभिमानो ॥2॥
निहचलु तिन का ठाणा ॥
गुर ते महलु पछाणा ॥
अनदिनु गुर मिलि जागे ॥
हरि की सेवा लागे ॥3॥
पूरन त्रिपति अघाए ॥
सहज समाधि सुभाए ॥
हरि भंडारु हाथि आइआ ॥
नानक गुर ते पाइआ ॥4॥7॥23॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छोडि सगल सिआणपा मिलि साध तिआगि गुमानु ॥
अवरु सभु किछु मिथिआ रसना राम राम वखानु ॥1॥
मेरे मन करन सुणि हरि नामु ॥
मिटहि अघ तेरे जनम जनम के कवनु बपुरो जामु ॥1॥ रहाउ ॥
दूख दीन न भउ बिआपै मिलै सुख बिस्रामु ॥
गुर प्रसादि नानकु बखानै हरि भजनु ततु गिआनु ॥2॥1॥24॥
जिनी नामु विसारिआ से होत देखे खेह ॥
पुत्र मित्र बिलास बनिता तूटते ए नेह ॥1॥
मेरे मन नामु नित नित लेह ॥
जलत नाही अगनि सागर सूखु मनि तनि देह ॥1॥ रहाउ ॥
बिरख छाइआ जैसे बिनसत पवन झूलत मेह ॥
हरि भगति द्रिड़ु मिलु साध नानक तेरै कामि आवत एह ॥2॥2॥25॥
पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत ॥
मरै न आवै न जाइ बिनसै बिआपत उसन न सीत ॥1॥
मेरे मन नाम सिउ करि प्रीति ॥
चेति मन महि हरि हरि निधाना एह निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥
क्रिपाल दइआल गोपाल गोबिद जो जपै तिसु सीधि ॥
नवल नवतन चतुर सुंदर मनु नानक तिसु संगि बीधि ॥2॥3॥26॥
चलत बैसत सोवत जागत गुर मंत्रु रिदै चितारि ॥
चरण सरण भजु संगि साधू भव सागर उतरहि पारि ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सदा कायम रहने वाले ! हे अविनाशी ! हे प्रकाश रूप ! हे सुंदर स्वरूप वाले ! हे अलख ! हे बेअंत ! हे नानक ! (कह-) आपके संतों की संगति और दासों की चरण-धूड़ – (मेहर कर) मैं ये ख़ैर प्र।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।