हम तुम संगि झूठे सभि बोला ॥ पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ ॥ नानक किरतु न जाइ मिटाइओ ॥2॥ पसु पंखी भूत अरु प्रेता ॥ बहु बिधि जोनी फिरत अनेता ॥ जह जानो तह रहनु न पावै ॥ थान बिहून उठि उठि फिरि धावै ॥ मनि तनि बासना बहुतु बिसथारा ॥ अहंमेव मूठो बेचारा ॥ अनिक दोख अरु बहुतु सजाई ॥ ता की कीमति कहणु न जाई ॥ प्रभ बिसरत नरक महि पाइआ ॥ तह मात न बंधु न मीत न जाइआ ॥ जिस कउ होत क्रिपाल सुआमी ॥ सो जनु नानक पारगरामी ॥3॥ भ्रमत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ ॥ दीना नाथ जगत पित माइआ ॥ प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण ॥ जिसु भावै तिस ही निसतारण ॥ अंध कूप ते काढनहारा ॥ प्रेम भगति होवत निसतारा ॥ साध रूप अपना तनु धारिआ ॥ महा अगनि ते आपि उबारिआ ॥ जप तप संजम इस ते किछु नाही ॥ आदि अंति प्रभ अगम अगाही ॥ नामु देहि मागै दासु तेरा ॥ हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा ॥4॥3॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: संसारी साथियों के साथ (साथ निबाहने वाले) सारे बोल झूठे ही हो जाते हैं। पर। हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही (माया के मोह की) ठॅग-बूटी खिला के जीव को गलत रास्ते पर डाल देता है। (जन्म-जन्मांतरों के) किए हुए कर्मों के संस्कारों के समूह को मिटाया नहीं जा सकता। 2। हे भाई ! (माया के मोह में) अंधा हुआ जीव पशू-पंछी भूत-प्रेत आदि अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है; जिस असल ठिकाने पर जाना है वहाँ टिक नहीं सकता। बेआसरा हो के बार-बार उठ के (और-और जूनियों में) भटकता है। हे भाई ! (माया के मोह के कारण) मनुष्य के मन में तन में अनेकों वासनाओं का पसारा पसरा रहता है। अहंकार इस बेचारे के आत्मिक जीवन को लूट लेता है। इसके अंदर ऐब पैदा हो जाते हैं। और उनकी सजा भी बहुत मिलती है (उससे बचने की दुनियावी पदार्थों की कोई) कीमत नहीं बताई जा सकती (किसी भी कीमत से इस सजा से खलासी नहीं हो सकती)। हे भाई ! परमात्मा का नाम भूलने के कारण जीव नर्क में फेंका जाता है। वहाँ ना माँ। ना कोई संबंधी। ना कोई मित्र। ना स्त्री – (कोई भी सहायता नहीं कर सकता)। जिस पर मालिक-प्रभू मेहरवान होता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) वह मनुष्य (संसार-समुंद्र से) पार लांघने योग्य हो जाता है 3। जीव भटक-भटक के (आखिर उसकी) शरण आता है। हे भाई ! प्रभू दीना नाथ है। जगत का माता-पिता है। दया का घर है। (जीवों के) दुख-दर्द दूर करने वाला है। हे भाई ! जो जीव उस प्रभू को अच्छा लगने लगता है उसको वह (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे भाई ! (संसार-रूप) अंधे कूएँ में से (प्रभू जीव को) निकालने के समर्थ है। प्रभू की प्यार-भरी भक्ति से जीव का पार-उतारा हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा ने गुरू-रूप अपना शरीर (स्वयं ही सदा) धारण किया है। और जीवों को माया की बड़ी आग से स्वयं ही सदा बचाया है। वरना इस जीव से जप तप (नाम की कमाई) और संजम (शुद्ध आचरण) की मेहनत कुछ भी नहीं हो सकती। हे प्रभू ! जगत के आरम्भ से अंत तक आप ही आप कायम रहने वाला है। आप अपहॅुच है। आप अथाह है। आपका दास आपके दर से आपका नाम माँगता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरा हरी-प्रभू आत्मिक जीवन का दर्जा (देने वाला) है। 4। 3। 19।
मारू महला 5 ॥ कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥1॥ ऐसी जानि पाई ॥ सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥1॥ रहाउ ॥ भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥2॥ अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥3॥ नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥4॥4॥20॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे लोगो ! आप क्यों अपने मन को डोलाते हैं। सुंदर प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। 1। हे भाई ! मैंने तो ऐसा समझ लिया है कि परमात्मा सबसे बड़ा दाता है। शरण पड़ों की मदद करने वाला सूरमा है। (अपने सेवक की) आप लाज रखता है। 1। रहाउ। हे लोगो ! परमात्मा अपने भक्तों की आरजू मानने वाला है। और (उनको) सदा सुख देने वाला है। 2। (हे प्रभू ! मैं नानक आपके दर का सेवक हूँ) अपने (इस) सेवक पर मेहर करनी। मैं (आपका सेवक) आपका नाम ही सिमरता रहॅूँ। 3। हे प्रभू ! किसी और दूसरे (को आपके जैसा समझने) का भुलेखा दूर कर के गरीब नानक (आपके दर से) आपका नाम माँगता है। 4। 4। 20।
मारू महला 5 ॥ मेरा ठाकुरु अति भारा ॥ मोहि सेवकु बेचारा ॥1॥ मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥ मो कउ देहु दाना ॥1॥ रहाउ ॥ सगले मै देखे जोई ॥ बीजउ अवरु न कोई ॥2॥ जीअन प्रतिपालि समाहै ॥ है होसी आहे ॥3॥ दइआ मोहि कीजै देवा ॥ नानक लागो सेवा ॥4॥5॥21॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू बहुत सारी ताकतों का मालिक है। मैं (तो उसके दर पे एक) निमाणा सेवक हूँ। 1। हे मेरे मन के प्यारे ! हे मेरे प्राणों के प्यारे ! आप मेरा सुंदर प्यारा प्रभू है। मुझे (अपने नाम का) दान बख्श। 1। रहाउ। हे भाई ! अन्य सारे आसरे खोज के देख लिए हैं। कोई और दूसरा (उस प्रभू के बराबर का) नहीं। 2। हे भाई ! परमात्मा सारे जीवों को पालता है। सबको रोज़ी पहुँचाता है। वह अब भी है। आगे भी कायम रहेगा। पहले भी था। 3। हे नानक ! (कह-) हे देव ! मेरे पर दया कर। मैं आपकी सेवा-भक्ति में लगा रहूँ। 4। 5। 21।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! विकारियों को बचाने वाले और (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाले परमात्मा से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। (हर वक्त यही प्रार्थना करनी चाहिए कि) कोई ऐसा संत मिल जाए जिससे सदा ही परमात्मा का सिमरन किया जा सके। 1। हे प्रभू ! मुझे (तो) कोई नहीं जानता। पर मैं आपका दास कहलवाता हूँ। मुझे यही सहारा है। मुझे यही आसरा है (कि आप अपने दास की लाज रखेगा)। 1। रहाउ। हे सारे जीवों को सहारा देने वाले ! हे सबको पालने वाले ! मैं निमाणा एक विनती करता हूँ कि आप पानी हैं और मैं आपकी मछली बना रहूँ (पर ये कैसे संभव हैं सके- ये) जुगति आप स्वयं ही जानता है। 2। हे सर्व-व्यापक ! हे सारे पसारे के मालिक ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ। यह सारा आकार- धरती। धरतियों के चक्कर। धरती के हिस्से- ये सब कुछ आप स्वयं ही स्वयं है (तूने अपने आप से पैदा किए हैं)। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “संसारी साथियों के साथ (साथ निबाहने वाले) सारे बोल झूठे ही हो जाते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।