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1005
मारू
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हम तुम संगि झूठे सभि बोला ॥
हम तुम संगि झूठे सभि बोला ॥
पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइओ ॥2॥
पसु पंखी भूत अरु प्रेता ॥
बहु बिधि जोनी फिरत अनेता ॥
जह जानो तह रहनु न पावै ॥
थान बिहून उठि उठि फिरि धावै ॥
मनि तनि बासना बहुतु बिसथारा ॥
अहंमेव मूठो बेचारा ॥
अनिक दोख अरु बहुतु सजाई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
प्रभ बिसरत नरक महि पाइआ ॥
तह मात न बंधु न मीत न जाइआ ॥
जिस कउ होत क्रिपाल सुआमी ॥
सो जनु नानक पारगरामी ॥3॥
भ्रमत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ ॥
दीना नाथ जगत पित माइआ ॥
प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण ॥
जिसु भावै तिस ही निसतारण ॥
अंध कूप ते काढनहारा ॥
प्रेम भगति होवत निसतारा ॥
साध रूप अपना तनु धारिआ ॥
महा अगनि ते आपि उबारिआ ॥
जप तप संजम इस ते किछु नाही ॥
आदि अंति प्रभ अगम अगाही ॥
नामु देहि मागै दासु तेरा ॥
हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा ॥4॥3॥19॥
पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइओ ॥2॥
पसु पंखी भूत अरु प्रेता ॥
बहु बिधि जोनी फिरत अनेता ॥
जह जानो तह रहनु न पावै ॥
थान बिहून उठि उठि फिरि धावै ॥
मनि तनि बासना बहुतु बिसथारा ॥
अहंमेव मूठो बेचारा ॥
अनिक दोख अरु बहुतु सजाई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
प्रभ बिसरत नरक महि पाइआ ॥
तह मात न बंधु न मीत न जाइआ ॥
जिस कउ होत क्रिपाल सुआमी ॥
सो जनु नानक पारगरामी ॥3॥
भ्रमत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ ॥
दीना नाथ जगत पित माइआ ॥
प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण ॥
जिसु भावै तिस ही निसतारण ॥
अंध कूप ते काढनहारा ॥
प्रेम भगति होवत निसतारा ॥
साध रूप अपना तनु धारिआ ॥
महा अगनि ते आपि उबारिआ ॥
जप तप संजम इस ते किछु नाही ॥
आदि अंति प्रभ अगम अगाही ॥
नामु देहि मागै दासु तेरा ॥
हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा ॥4॥3॥19॥
हिन्दी अर्थ: संसारी साथियों के साथ (साथ निबाहने वाले) सारे बोल झूठे ही हो जाते हैं। पर। हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही (माया के मोह की) ठग-बूटी खिला के जीव को गलत रास्ते पर डाल देता है। (जन्म-जन्मांतरों के) किए हुए कर्मों के संस्कारों के समूह को मिटाया नहीं जा सकता। 2। हे भाई ! (माया के मोह में) अंधा हुआ जीव पशू-पंछी भूत-प्रेत आदि अनेकों जूनियों में भटकता फिरता है; जिस असल ठिकाने पर जाना है वहाँ टिक नहीं सकता। बेआसरा हो के बार-बार उठ के (और-और जूनियों में) भटकता है। हे भाई ! (माया के मोह के कारण) मनुष्य के मन में तन में अनेकों वासनाओं का पसारा पसरा रहता है। अहंकार इस बेचारे के आत्मिक जीवन को लूट लेता है। इसके अंदर ऐब पैदा हो जाते हैं। और उनकी सजा भी बहुत मिलती है (उससे बचने की दुनियावी पदार्थों की कोई) कीमत नहीं बताई जा सकती (किसी भी कीमत से इस सजा से खलासी नहीं हो सकती)। हे भाई ! परमात्मा का नाम भूलने के कारण जीव नर्क में फेंका जाता है। वहाँ ना माँ। ना कोई संबंधी। ना कोई मित्र। ना स्त्री - (कोई भी सहायता नहीं कर सकता)। जिस पर मालिक-प्रभू मेहरवान होता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) वह मनुष्य (संसार-समुंद्र से) पार लांघने योग्य हो जाता है 3। जीव भटक-भटक के (आखिर उसकी) शरण आता है। हे भाई ! प्रभू दीना नाथ है। जगत का माता-पिता है। दया का घर है। (जीवों के) दुख-दर्द दूर करने वाला है। हे भाई ! जो जीव उस प्रभू को अच्छा लगने लगता है उसको वह (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे भाई ! (संसार-रूप) अंधे कूएँ में से (प्रभू जीव को) निकालने के समर्थ है। प्रभू की प्यार-भरी भक्ति से जीव का पार-उतारा हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा ने गुरू-रूप अपना शरीर (स्वयं ही सदा) धारण किया है। और जीवों को माया की बड़ी आग से स्वयं ही सदा बचाया है। वरना इस जीव से जप तप (नाम की कमाई) और संजम (शुद्ध आचरण) की मेहनत कुछ भी नहीं हो सकती। हे प्रभू ! जगत के आरम्भ से अंत तक आप ही आप कायम रहने वाले हैं। आप अपहुँच हैं। आप अथाह हैं। आपका दास आपके दर से आपका नाम माँगता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरा हरी-प्रभू आत्मिक जीवन का दर्जा (देने वाला) है। 4। 3। 19।
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥1॥
मारू महला 5 ॥
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥1॥
ऐसी जानि पाई ॥
सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥1॥ रहाउ ॥
भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥2॥
अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥3॥
नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥4॥4॥20॥
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥1॥
ऐसी जानि पाई ॥
सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥1॥ रहाउ ॥
भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥2॥
अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥3॥
नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥4॥4॥20॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे लोगो ! आप क्यों अपने मन को डोलाते हैं। सुंदर प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। 1। हे भाई ! मैंने तो ऐसा समझ लिया है कि परमात्मा सबसे बड़ा दाता है। शरण पड़ों की मदद करने वाला सूरमा है। (अपने सेवक की) आप लाज रखता है। 1। रहाउ। हे लोगो ! परमात्मा अपने भक्तों की आरजू मानने वाला है। और (उनको) सदा सुख देने वाला है। 2। (हे प्रभू ! मैं नानक आपके दर का सेवक हूँ) अपने (इस) सेवक पर मेहर करें। मैं (आपका सेवक) आपका नाम ही सिमरता रहूँ। 3। हे प्रभू ! किसी और दूसरे (को आपके जैसा समझने) का भुलेखा दूर कर के गरीब नानक (आपके दर से) आपका नाम माँगता है। 4। 4। 20।
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥
मारू महला 5 ॥
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥
मोहि सेवकु बेचारा ॥1॥
मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥
मो कउ देहु दाना ॥1॥ रहाउ ॥
सगले मै देखे जोई ॥
बीजउ अवरु न कोई ॥2॥
जीअन प्रतिपालि समाहै ॥
है होसी आहे ॥3॥
दइआ मोहि कीजै देवा ॥
नानक लागो सेवा ॥4॥5॥21॥
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥
मोहि सेवकु बेचारा ॥1॥
मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥
मो कउ देहु दाना ॥1॥ रहाउ ॥
सगले मै देखे जोई ॥
बीजउ अवरु न कोई ॥2॥
जीअन प्रतिपालि समाहै ॥
है होसी आहे ॥3॥
दइआ मोहि कीजै देवा ॥
नानक लागो सेवा ॥4॥5॥21॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू बहुत सारी ताकतों का मालिक है। मैं (तो उसके दर पे एक) निमाणा सेवक हूँ। 1। हे मेरे मन के प्यारे ! हे मेरे प्राणों के प्यारे ! आप मेरे सुंदर प्यारे प्रभु हैं। मुझे (अपने नाम का) दान बख्शें। 1। रहाउ। हे भाई ! अन्य सारे आसरे खोज के देख लिए हैं। कोई और दूसरा (उस प्रभू के बराबर का) नहीं। 2। हे भाई ! परमात्मा सारे जीवों को पालता है। सबको रोज़ी पहुँचाता है। वह अब भी है। आगे भी कायम रहेगा। पहले भी था। 3। हे नानक ! (कह-) हे देव ! मेरे पर दया करें। मैं आपकी सेवा-भक्ति में लगा रहूँ। 4। 5। 21।
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥
मारू महला 5 ॥
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥
ऐसा कोई भेटै संतु जितु हरि हरे हरि धिआईऐ ॥1॥
मो कउ कोइ न जानत कहीअत दासु तुमारा ॥
एहा ओट आधारा ॥1॥ रहाउ ॥
सरब धारन प्रतिपारन इक बिनउ दीना ॥
तुमरी बिधि तुम ही जानहु तुम जल हम मीना ॥2॥
पूरन बिसथीरन सुआमी आहि आइओ पाछै ॥
सगलो भू मंडल खंडल प्रभ तुम ही आछै ॥3॥
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥
ऐसा कोई भेटै संतु जितु हरि हरे हरि धिआईऐ ॥1॥
मो कउ कोइ न जानत कहीअत दासु तुमारा ॥
एहा ओट आधारा ॥1॥ रहाउ ॥
सरब धारन प्रतिपारन इक बिनउ दीना ॥
तुमरी बिधि तुम ही जानहु तुम जल हम मीना ॥2॥
पूरन बिसथीरन सुआमी आहि आइओ पाछै ॥
सगलो भू मंडल खंडल प्रभ तुम ही आछै ॥3॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! विकारियों को बचाने वाले और (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाले परमात्मा से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। (हर वक्त यही प्रार्थना करनी चाहिए कि) कोई ऐसा संत मिल जाए जिससे सदा ही परमात्मा का सिमरन किया जा सके। 1। हे प्रभू ! मुझे (तो) कोई नहीं जानता। पर मैं आपका दास कहलवाता हूँ। मुझे यही सहारा है। मुझे यही आसरा है (कि आप अपने दास की लाज रखेंगे)। 1। रहाउ। हे सारे जीवों को सहारा देने वाले ! हे सबको पालने वाले ! मैं निमाणा एक विनती करता हूँ कि आप पानी हैं और मैं आपकी मछली बना रहूँ (पर ये कैसे संभव हो सके- ये) जुगति आप स्वयं ही जानते हैं। 2। हे सर्व-व्यापक ! हे सारे पसारे के मालिक ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ। यह सारा आकार- धरती। धरतियों के चक्कर। धरती के हिस्से- ये सब कुछ आप स्वयं ही स्वयं हैं (आपने अपने आप से पैदा किए हैं)। 3।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1005 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1005 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।