मिलि सतिगुर निसतारा ॥2॥
हउ हउ करम कमाणे ॥
ते ते बंध गलाणे ॥
मेरी मेरी धारी ॥
ओहा पैरि लोहारी ॥
सो गुर मिलि एकु पछाणै ॥
जिसु होवै भागु मथाणै ॥3॥
सो मिलिआ जि हरि मनि भाइआ ॥
सो भूला जि प्रभू भुलाइआ ॥
नह आपहु मूरखु गिआनी ॥
जि करावै सु नामु वखानी ॥
तेरा अंतु न पारावारा ॥
जन नानक सद बलिहारा ॥4॥1॥17॥
मोहनी मोहि लीए त्रै गुनीआ ॥
लोभि विआपी झूठी दुनीआ ॥
मेरी मेरी करि कै संची अंत की बार सगल ले छलीआ ॥1॥
निरभउ निरंकारु दइअलीआ ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपलीआ ॥1॥ रहाउ ॥
एकै स्रमु करि गाडी गडहै ॥
एकहि सुपनै दामु न छडहै ॥
राजु कमाइ करी जिनि थैली ता कै संगि न चंचलि चलीआ ॥2॥
एकहि प्राण पिंड ते पिआरी ॥
एक संची तजि बाप महतारी ॥
सुत मीत भ्रात ते गुहजी ता कै निकटि न होई खलीआ ॥3॥
होइ अउधूत बैठे लाइ तारी ॥
जोगी जती पंडित बीचारी ॥
ग्रिहि मड़ी मसाणी बन महि बसते ऊठि तिना कै लागी पलीआ ॥4॥
काटे बंधन ठाकुरि जा के ॥
हरि हरि नामु बसिओ जीअ ता कै ॥
साधसंगि भए जन मुकते गति पाई नानक नदरि निहलीआ ॥5॥2॥18॥
सिमरहु एकु निरंजन सोऊ ॥
जा ते बिरथा जात न कोऊ ॥
मात गरभ महि जिनि प्रतिपारिआ ॥
जीउ पिंडु दे साजि सवारिआ ॥
सोई बिधाता खिनु खिनु जपीऐ ॥
जिसु सिमरत अवगुण सभि ढकीऐ ॥
चरण कमल उर अंतरि धारहु ॥
बिखिआ बन ते जीउ उधारहु ॥
करण पलाह मिटहि बिललाटा ॥
जपि गोविद भरमु भउ फाटा ॥
साधसंगि विरला को पाए ॥
नानकु ता कै बलि बलि जाए ॥1॥
राम नामु मनि तनि आधारा ॥
जो सिमरै तिस का निसतारा ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ वसतु सति करि मानी ॥
हितु लाइओ सठ मूड़ अगिआनी ॥
काम क्रोध लोभ मद माता ॥
कउडी बदलै जनमु गवाता ॥
अपना छोडि पराइऐ राता ॥
माइआ मद मन तन संगि जाता ॥
त्रिसन न बूझै करत कलोला ॥
ऊणी आस मिथिआ सभि बोला ॥
आवत इकेला जात इकेला ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के बिना (आत्मिक जीवन का) अंधेरा (ही अंधेरा) है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।