इस पृष्ठ पर
अंग
1003
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
बेदु पुकारै मुख ते पंडत कामामन का माठा ॥
बेदु पुकारै मुख ते पंडत कामामन का माठा ॥
मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥1॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥1॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥2॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥3॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥4॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥6॥15॥
मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥1॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥1॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥2॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥3॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥4॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥6॥15॥
हिन्दी अर्थ: हे पण्डित ! (आपके जैसा कोई तो) मुँह से वेद ऊँची-ऊँची आवाज़ में पढ़ता है। पर आत्मिक कमाई करने के पक्ष से ढीला है; (कोई) मौन-धारी बन के (किसी गुफा आदि में) अकेला बैठा हुआ है। (पर उसके भी) हृदय में मानसिक दौड़-भाग की गाँठ बनी हुई है; (कोई दुनियाँ से) उपराम हो के गृहस्त छोड़ के चल पड़ा है (पर उसकी भी) भटकना खत्म नहीं हुई। 1। (हे पण्डित !) मैं अपने दिल की बात किस को बताऊँ। मैं ऐसा (गुरमुख) कहाँ से तलाशूँ जो स्वयं (मोह माया से) बचा हुआ हो। और मुझे (भी) परमात्मा मिला दे। 1। रहाउ। (हे पण्डित !) कोई तपस्वी (तप) करके (निरे) शरीर को कष्ट दे रहा है। मन (उसका भी) दसों दिशाओं में दौड़ रहा है; किसी ब्रहमचारी ने कामवासना रोकने का अभ्यास कर लिया है। (पर उसके) हृदय में (इसी बात का) अहंकार पैदा हो गया है। (कोई) सन्यासी बन के (हरेक) तीर्थ पर भ्रमण कर रहा है; उसके अंदर उसको मूर्ख बना देने वाला क्रोध पैदा हो गया है (बताएँ। हे पण्डित ! मैं ऐसा मनुष्य कहाँ से ढूँढूँ जो स्वयं मुक्त हो)। 2। (हे पण्डित ! कई ऐसे हैं जो अपने पैरों से) घुंघरू बाँध के रासधारिए बने हैं। पर वे भी रोटियाँ (कमाने के लिए ही ये) ढंग तरीके बरत रहे हैं; (कई ऐसे हैं जो) व्रत-नेम आदि और छे (निहित धार्मिक) कर्म करते हैं। (पर उन्होंने भी) बाहर (लोगों को ही) धार्मिक पहरावा दिखाया हुआ है; (कई ऐसे हैं जो) मुँह से (तो भजनों के) गीत-राग अलापते हैं। (पर अपने) मन (में उन्होंने कभी भी) परमात्मा की सिफत-सालाह नहीं की। 3। (हे पण्डित ! सिर्फ) हरी के संत जन ही पवित्र जीवन वाले हैं। वे खुशी-ग़मी-लोभ-मोह आदि से बचे रहते हैं। जब भगवान दया करे तब मेरा मन उनके चरणों की धूड़ प्राप्त करता है। हे नानक ! (कह-हे पण्डित !) जब पूरा गुरू मिलता है तब मन की चिंता दूर हो जाती है। 4। (हे पण्डित !) मेरा प्रभू-पातशाह सब के दिल को जानने वाला है (वह बाहरी भेषों। प्रयासों से नहीं पतीजता)। हे पण्डित ! मेरी जीवात्मा का पातशाह सब कुछ जानता है (जिसको वह मिल जाता है। वह सारे) दिखावे के बोल बोलने भूल जाता है। 1। रहाउ दूजा। 6। 15।
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
मारू महला 5 ॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥1॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥1॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥2॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥3॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥4॥7॥16॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥1॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥1॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥2॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥3॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥4॥7॥16॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य के हृदय में आपका नाम बसता है वह लाखों-करोड़ों (सब) लोगों (के दिल) का राजा बन जाता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरु ने नाम नहीं दिया वह जनम-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं। 1। हे मेरे सतिगुरू ! आप ही (मेरी) इज्जत के रखवाले हैं। हे प्रभू ! जब से आप (हम जीवों के) चित्त में आ बसे हैं तब से ही (हमें लोक-परलोक में) पूरी इज्जत मिलती है। (आपका नाम) भूलने से मिट्टी में मिल जाते हैं। 1। रहाउ। दुनियाई रूप रंग ख़ुशियां। मन की मौजें और विकार (आत्मिक जीवन में) छेद हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही) सारे सुखों सारी खुशियों का खजाना है; ये नाम ही श्रेष्ठ (पदार्थ) है और आत्मिक स्थिरता (का मूल) है। 2। हे भाई ! जैसे बादलों की छाया (छिन-भंगुर है। वैसे) माया के रंग-तमाशे छिन में फीके पड़ जाते हैं; पर। हे भाई ! जिन्होंने गुरू को मिल के परमात्मा की सिफत-सालाह की। वह लाल (रत्न) हो गए। वे गाढ़े प्रेम-रंग में रंगे गए (उनका आत्मिक आनंद फीका नहीं पड़ता)। 3। वह उस मालिक के दरबार में पहुँचे रहते हैं जो सबसे ऊँचा है जो सबसे बड़ा है जो बेअंत है और अपहुँच है। हे नानक ! जिन्हें पति-प्रभू प्यारा लगता है। उनके वास्ते हरी-नाम ही (दुनिया की) महानता है। नाम ही (लोक-परलोक की) शोभा है। 4। 7। 16।
ओअंकारि उतपाती ॥
मारू महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥1॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥1॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! सर्व-व्यापक परमात्मा ने जगत की उत्पत्ति की है; दिन भी उसने बनाया; रातें भी उसने बनाई। सब कुछ उसने बनाया है। हे भाई ! जंगल। (जंगल का) घास, तीनों भवन, पानी (आदि सारे तत्व)। चारों वेद, चारों खाणियाँ। सृष्टि के अलग-अलग हिस्से (खण्ड)। द्वीप। सारे लोग -ये सारे परमात्मा के हुकम से ही बने हैं। 1। हे भाई ! सृजनहार प्रभू के साथ गहरी सांझ डालें। पर। हे भाई ! जब गुरू मिल जाए तब ही ये सूझ पड़ती है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने ही त्रैगुणी माया का पसारा रचा है। कोई नर्कों में है। कोई स्वर्गों में है। अहंकार के कारण जीव भटकता फिरता है। (जीव का) मन रत्ती भर भी नहीं टिकता।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1003 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1003 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।