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अंग 1003

अंग
1003
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बेदु पुकारै मुख ते पंडत कामामन का माठा ॥
मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥1॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥1॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥2॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥3॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥4॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥6॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे पण्डित ! (आपके जैसा कोई तो) मुँह से वेद ऊँची-ऊँची आवाज़ में पढ़ता है। पर आत्मिक कमाई करने के पक्ष से ढीला है; (कोई) मौन-धारी बन के (किसी गुफा आदि में) अकेला बैठा हुआ है। (पर उसके भी) हृदय में मानसिक दौड़-भाग की गाँठ बनी हुई है; (कोई दुनियाँ से) उपराम हो के गृहस्त छोड़ के चल पड़ा है (पर उसकी भी) भटकना खत्म नहीं हुई। 1। (हे पण्डित !) मैं अपने दिल की बात किस को बताऊँ। मैं ऐसा (गुरमुख) कहाँ से तलाशूँ जो स्वयं (मोह माया से) बचा हुआ हो। और मुझे (भी) परमात्मा मिला दे। 1। रहाउ। (हे पण्डित !) कोई तपस्वी (तप) करके (निरे) शरीर को कष्ट दे रहा है। मन (उसका भी) दसों दिशाओं में दौड़ रहा है; किसी ब्रहमचारी ने कामवासना रोकने का अभ्यास कर लिया है। (पर उसके) हृदय में (इसी बात का) अहंकार पैदा हो गया है। (कोई) सन्यासी बन के (हरेक) तीर्थ पर भ्रमण कर रहा है; उसके अंदर उसको मूर्ख बना देने वाला क्रोध पैदा हो गया है (बता। हे पण्डित ! मैं ऐसा मनुष्य कहाँ से ढूँढू जो स्वयं मुक्त हो)। 2। (हे पण्डित ! कई ऐसे हैं जो अपने पैरों से) घुंघरू बाँध के रासधारिए बने हैं। पर वे भी रोटियाँ (कमाने के लिए ही ये) ढंग तरीके बरत रहे हैं; (कई ऐसे हैं जो) व्रत-नेम आदि और छे (निहित धार्मिक) कर्म करते हैं। (पर उन्होंने भी) बाहर (लोगों को ही) धार्मिक पहरावा दिखाया हुआ है; (कई ऐसे हैं जो) मुँह से (तो भजनों के) गीत-राग अलापते हैं। (पर अपने) मन (में उन्होंने कभी भी) परमात्मा की सिफत-सालाह नहीं की। 3। (हे पण्डित ! सिर्फ) हरी के संत जन ही पवित्र जीवन वाले हैं। वे खुशी-ग़मी-लोभ-मोह आदि से बचे रहते हैं। जब भगवान दया करे तब मेरा मन उनके चरणों की धूड़ प्राप्त करता है। हे नानक ! (कह-हे पण्डित !) जब पूरा गुरू मिलता है तब मन की चिंता दूर हो जाती है। 4। (हे पण्डित !) मेरा प्रभू-पातशाह सब के दिल की जानने वाला है (वह बाहरी भेषों। प्रयासों से नहीं पतीजता)। हे पण्डित ! मेरी जीवात्मा का पातशाह सब कुछ जानता है (जिसको वह मिल जाता है। वह सारे) दिखावे के बोल बोलने भूल जाता है। 1। रहाउ दूजा। 6। 15।
मारू महला 5 ॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥1॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥1॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥2॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥3॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥4॥7॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य के हृदय में आपका नाम बसता है वह लाखों-करोड़ों (सब) लोगों (के दिल) का राजा बन जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्यों को गुरु ने नाम नहीं दिया वह जनम-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं। 1। हे मेरे सतिगुरू ! आप ही (मेरी) इज्जत का रखवाला है। हे प्रभू ! जब से आप (हम जीवों के) चित्त में आ बसा है तब से ही (हमें लोक-परलोक में) पूरी इज्जत मिलती है। (आपका नाम) भूलने से मिट्टी में मिल जाते हैं। 1। रहाउ। दुनियाई रूप रंग ख़ुशियां। मन की मौजें और विकार (आत्मिक जीवन में) छेद हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही) सारे सुखों सारी खुशियों का खजाना है; ये नाम ही श्रेष्ठ (पदार्थ) है और आत्मिक स्थिरता (का मूल) है। 2। हे भाई ! जैसे बादलों की छाया (छिन-भंगुर है। वैसे) माया के रंग-तमाशे छिन में फीके पड़ जाते हैं; पर। हे भाई ! जिन्होंने गुरू को मिल के परमात्मा की सिफत-सालाह की। वह लाल (रत्न) हो गए। वे गाढ़े प्रेम-रंग में रंगे गए (उनका आत्मिक आनंद फीका नहीं पड़ता)। 3। वह उस मालिक के दरबार में पहुँचे रहते हैं जो सबसे ऊँचा है जो सबसे बड़ा है जो बेअंत है और अपहुँच है। हे नानक ! जिन्हें पति-प्रभू प्यारा लगता है। उनके वास्ते हरी-नाम ही (दुनिया की) महानता है। नाम ही (लोक-परलोक की) शोभा है। 4। 7। 16।
मारू महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥1॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 4 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! सर्व-व्यापक परमात्मा ने जगत की उत्पक्ति की है; दिन भी उसने बनाया; रातें भी उसने बनाई। सब कुछ उसने बनाया है। हे भाई ! जंगल। (जंगल का) घास। तीनों भवन। पानी (आदि सारे तत्व)। चारों वेद। चारों खाणियाँ। सृष्टि के अलग-अलग हिस्से (खण्ड)। द्वीप। सारे लोग -ये सारे परमात्मा के हुकम से ही बने हैं। 1। हे भाई ! सृजनहार प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल। पर। हे भाई ! जब गुरू मिल जाए तब ही ये सूझ पड़ती है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने ही त्रैगुणी माया का पसारा रचा है। कोई नर्कों में हैं। कोई स्वर्गों में हैं। अहंकार के कारण जीव भटकता फिरता है। (जीव का) मन रक्ती भर भी नहीं टिकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे पण्डित ! (आपके जैसा कोई तो) मुँह से वेद ऊँची-ऊँची आवाज़ में पढ़ता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।