मोनी होइ बैठा इकांती हिरदै कलपन गाठा ॥
होइ उदासी ग्रिहु तजि चलिओ छुटकै नाही नाठा ॥1॥
जीअ की कै पहि बात कहा ॥
आपि मुकतु मो कउ प्रभु मेले ऐसो कहा लहा ॥1॥ रहाउ ॥
तपसी करि कै देही साधी मनूआ दह दिस धाना ॥
ब्रहमचारि ब्रहमचजु कीना हिरदै भइआ गुमाना ॥
संनिआसी होइ कै तीरथि भ्रमिओ उसु महि क्रोधु बिगाना ॥2॥
घूंघर बाधि भए रामदासा रोटीअन के ओपावा ॥
बरत नेम करम खट कीने बाहरि भेख दिखावा ॥
गीत नाद मुखि राग अलापे मनि नही हरि हरि गावा ॥3॥
हरख सोग लोभ मोह रहत हहि निरमल हरि के संता ॥
तिन की धूड़ि पाए मनु मेरा जा दइआ करे भगवंता ॥
कहु नानक गुरु पूरा मिलिआ तां उतरी मन की चिंता ॥4॥
मेरा अंतरजामी हरि राइआ ॥
सभु किछु जाणै मेरे जीअ का प्रीतमु बिसरि गए बकबाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥6॥15॥
कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥
जा कउ नामु न दीआ मेरै सतिगुरि से मरि जनमहि गावारा ॥1॥
मेरे सतिगुर ही पति राखु ॥
चीति आवहि तब ही पति पूरी बिसरत रलीऐ खाकु ॥1॥ रहाउ ॥
रूप रंग खुसीआ मन भोगण ते ते छिद्र विकारा ॥
हरि का नामु निधानु कलिआणा सूख सहजु इहु सारा ॥2॥
माइआ रंग बिरंग खिनै महि जिउ बादर की छाइआ ॥
से लाल भए गूड़ै रंगि राते जिन गुर मिलि हरि हरि गाइआ ॥3॥
ऊच मूच अपार सुआमी अगम दरबारा ॥
नामो वडिआई सोभा नानक खसमु पिआरा ॥4॥7॥16॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि उतपाती ॥
कीआ दिनसु सभ राती ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण पाणी ॥
चारि बेद चारे खाणी ॥
खंड दीप सभि लोआ ॥
एक कवावै ते सभि होआ ॥1॥
करणैहारा बूझहु रे ॥
सतिगुरु मिलै त सूझै रे ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कीआ पसारा ॥
नरक सुरग अवतारा ॥
हउमै आवै जाई ॥
मनु टिकणु न पावै राई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे पण्डित ! (आपके जैसा कोई तो) मुँह से वेद ऊँची-ऊँची आवाज़ में पढ़ता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।