गुरि मंत्रु अवखधु नामु दीना जन नानक संकट जोनि न पाइ ॥5॥2॥ रे नर इन बिधि पारि पराइ ॥ धिआइ हरि जीउ होइ मिरतकु तिआगि दूजा भाउ ॥ रहाउ दूजा ॥2॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! जिस को गुरू ने नाम मंत्र दे दिया। वह मनुष्य (चौरासी लाख) जूनियों के कलेश में नहीं पड़ता। 5। 2। हे भाई ! इस तरह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। आप भी परमात्मा का ध्यान धरा कर। विकारों से विरक्त (मुर्दा) हैं जा। और प्रभू के बिना और और के प्यार को छोड़ दे। रहाउ दूजा। 2। 11।
मारू महला 5 ॥ बाहरि ढूढन ते छूटि परे गुरि घर ही माहि दिखाइआ था ॥ अनभउ अचरज रूपु प्रभ पेखिआ मेरा मनु छोडि न कतहू जाइआ था ॥1॥ मानकु पाइओ रे पाइओ हरि पूरा पाइआ था ॥ मोलि अमोलु न पाइआ जाई करि किरपा गुरू दिवाइआ था ॥1॥ रहाउ ॥ अदिसटु अगोचरु पारब्रहमु मिलि साधू अकथु कथाइआ था ॥ अनहद सबदु दसम दुआरि वजिओ तह अंम्रित नामु चुआइआ था ॥2॥ तोटि नाही मनि त्रिसना बूझी अखुट भंडार समाइआ था ॥ चरण चरण चरण गुर सेवे अघड़ु घड़िओ रसु पाइआ था ॥3॥ सहजे आवा सहजे जावा सहजे मनु खेलाइआ था ॥ कहु नानक भरमु गुरि खोइआ ता हरि महली महलु पाइआ था ॥4॥3॥12॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ गुरू ने हृदय में ही मुझे परमात्मा का दीदार करवा दिया है। अब मैं परमात्मा की खोज बाहर (जंगलों में) करन से बच गया हूँ। जब परमात्मा के आश्चर्य रूप का हृदय में अनुभव हो गया है। तो अब मेरा मन उसका आसरा छोड़ किसी ओर तरफ़ नहीं भटकता । 1। हे भाई ! मैंने मोती पा लिया है। मैंने पूरन परमात्मा को पा लिया है। है भाई ! यह मोती बहुत अमूल्य है। किसी भी मूल्य पर नहीं मिल सकता। मुझे तो यह मोती गुरू ने दिलवा दिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा इन आँखों से नहीं दिखता। हमारी ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका मुकम्मल स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। हे भाई ! गुरू को मिल के मैंने उसकी सिफत-सालाह करनी शुरू कर दी है। हे भाई ! मेरे दिमाग़ में अब हर वक्त सिफत-सालाह की बाणी प्रभाव डाल रही है; मेरे अंदर अब हर वक्त आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस टपक रहा है। 2। हे भाई ! मेरे मन में कभी ना समाप्त होने वाले नाम-खजाने भर गए हैं। इन खजानों में कभी कमी नहीं आ सकती। मन में (बस रही) तृष्णा (-आग की लाट) बुझ गई है। मैं हर वक्त गुरू के चरणों का आसरा ले रहा हूँ। मैंने नाम-अमृत का स्वाद चख लिया है। और पहले वाला बेढबी घाड़त वाला मन अब सुंदर मनमोहक बन गया है। 3। हे भाई ! नाम-खजाने की बरकति से मेरा मन हर वक्त आत्मिक अडोलता में टिक के कार्य-व्यवहार कर रहा है। मन सदा आत्मिक अडोलता में खेल रहा है। हे नानक ! कह- (जब से) गुरू ने मेरी भटकना दूर कर दी है। तब से मैंने सदा-स्थिर ठिकाने वाले हरी (के चरणों में) ठिकाना पा लिया है। 4। 3। 12।
मारू महला 5 ॥ जिसहि साजि निवाजिआ तिसहि सिउ रुच नाहि ॥ आन रूती आन बोईऐ फलु न फूलै ताहि ॥1॥ रे मन वत्र बीजण नाउ ॥ बोइ खेती लाइ मनूआ भलो समउ सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥ खोइ खहड़ा भरमु मन का सतिगुर सरणी जाइ ॥ करमु जिस कउ धुरहु लिखिआ सोई कार कमाइ ॥2॥ भाउ लागा गोबिद सिउ घाल पाई थाइ ॥ खेति मेरै जंमिआ निखुटि न कबहू जाइ ॥3॥ पाइआ अमोलु पदारथो छोडि न कतहू जाइ ॥ कहु नानक सुखु पाइआ त्रिपति रहे आघाइ ॥4॥4॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको पैदा करके कई बख्शिशें की हुई हैं। उससे ही आपका प्यार नहीं। (आप और-और काम-काजों में लगा फिरता है। पर अगर) ऋतु कोई हैं। बीज कोई और बो दें। उसे ना फूल लगता है ना फल। 1। हे (मेरे) मन ! (ये मनुष्य जीवन परमात्मा का) नाम-बीजने के लिए सही समय है। हे भाई ! अपना मन लगा के (हृदय की) खेती में (नाम) बीज ले। यही सही मौका है। (इसी में) लाभ है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन की जिद्द अपने मन की भटकना दूर कर। और। गुरू की शरण जा पड़ (और परमात्मा का नाम-बीज बीज ले)। पर ये काम वही मनुष्य करता है जिसके माथे पर प्रभू की हजूरी से ये लेख लिखा हुआ हो। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य का परमात्मा से प्यार बन जाता है। (उसकी नाम-सिमरन की) मेहनत परमात्मा प्रवान कर लेता है। हे भाई ! मेरे हृदय-खेत में भी वह नाम-फसल उग पड़ी है जो कभी समाप्त नहीं होती। 3। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने (प्रभू का नाम) अमूल्य पदार्थ पा लिया। वे इसको छोड़ के किसी और तरफ नहीं भटकते; वे आत्मिक आनंद भोगते हैं। वे (माया से) पूरी तरह से संतोखी जीवन वाले हो जाते हैं। 4। 4। 13।
मारू महला 5 ॥ फूटो आंडा भरम का मनहि भइओ परगासु ॥ काटी बेरी पगह ते गुरि कीनी बंदि खलासु ॥1॥ आवण जाणु रहिओ ॥ तपत कड़ाहा बुझि गइआ गुरि सीतल नामु दीओ ॥1॥ रहाउ ॥ जब ते साधू संगु भइआ तउ छोडि गए निगहार ॥ जिस की अटक तिस ते छुटी तउ कहा करै कोटवार ॥2॥ चूका भारा करम का होए निहकरमा ॥ सागर ते कंढै चड़े गुरि कीने धरमा ॥3॥ सचु थानु सचु बैठका सचु सुआउ बणाइआ ॥ सचु पूंजी सचु वखरो नानक घरि पाइआ ॥4॥5॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! उसके मन में आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो गई। उसका भ्रम (भटकना) का अण्डा टूट गया (उसका मन आत्मिक उड़ान लगाने के योग्य हो गया। जैसे अण्डे का कवच टूट जाने के बाद उसके अंदर का पंछी उड़ान भरने के लायक हो जाता है)। गुरू ने जिस मनुष्य के पैरों से (मोह की) बेड़ियाँ काट दीं। जिसको मोह की कैद से आजाद कर दिया। 1। उसकी (माया की खातिर) भटकना समाप्त हो गई। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने आत्मिक ठंड देने वाला हरी-नाम दे दिया। उसके अंदर से तृष्णा की आग के शोले बुझ गए।1। रहाउ। हे भाई ! जब (किसी भाग्यशाली मनुष्य को) गुरू का मिलाप हासिल हो जाता है। तब (उसके आत्मिक जीवन पर) निगाह रखने वाले (विकार उसको) छोड़ जाते हैं। जब परमात्मा की ओर से (आत्मिक जीवन की राह में) डाली हुई रुकावट उसकी मेहर से (गुरू के द्वारा) खत्म हो जाती है तब (उन निगाह रखने वालों का सरदार) कोतवाल (मोह) भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 2। उनका अनेकों जन्मों के किए बुरे कर्मों का कर्ज (भाव। विकारों के संस्कारों का संग्रह) खत्म हो गया। वे बुरे कर्मों की कैद में से निकल गए। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर गुरू ने उपकार कर दिया। वह (संसार-) समुंद्र (में डूबने) से (बच के) किनारे पर पहुँच गए। 3। हे नानक ! (कह- जिस मनुष्य पर गुरू ने मेहर की। उसने अपने) हृदय-घर में सदा कायम रहने वाला नाम-राशि को पा लिया। सदा कायम रहने वाला नाम-सौदा प्राप्त कर लिया। उसने सदा-स्थिर हरी-नाम को अपनी जिंदगी का मनोरथ बना लिया। सदा-स्थिर हरी-चरण ही उसके लिए (आत्मिक निवास का) स्थल बन गए। बैठक बन गई। 4। 5। 14।
मारू महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! जिस को गुरू ने नाम मंत्र दे दिया।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।